Article Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 15 July, 2026, 12:05:43 PM IST.


क्या वाकई औरतें मर्दों पर भारी पड़ रही हैं? एक सनसनीखेज़ हत्या से सदियों की असमानता नहीं मिट जाती
— बृज खंडेलवाल
मेरठ का विख्यात नीला ड्रम कांड, ताजनगरी आगरा में क्रूरता की हदें पार कर फर्श के नीचे दफन किया गया पति, मुंबई-वसई क्षेत्र में सह-जीवन (लिव-इन) पार्टनर द्वारा प्रेमी की नृशंस हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ खूनी वारदातों ने पूरे देश के मानस को झकझोर कर रख दिया है। इन घटनाओं के सामने आते ही टेलीविजन स्टूडियो तीखे विमर्शों से गरज उठे, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर डिजिटल मीम्स की एक अनियंत्रित बाढ़ आ गई और देखते ही देखते एक नया कूटनीतिक निष्कर्ष विधिक रूप से स्थापित करने की होड़ मच गई: “क्या अब भारतीय महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?” लेकिन क्या कतिपय असाधारण और भयावह अपराध सचमुच भारत की वास्तविक सामाजिक और जमीनी हकीकत को बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी संस्थागत पितृसत्ता, विधिक असमानता और महिलाओं के खिलाफ होने वाली चौतरफा हिंसा के विशालकाय पहाड़ को पल भर में मिटा सकती हैं? इस बुनियादी सवाल का जवाब संकीर्ण भावनाओं या तात्कालिक बहसों में नहीं, बल्कि प्रामाणिक राष्ट्रीय आंकड़ों और वैज्ञानिक विश्लेषणों में छिपा है।
आज के इस आधुनिक डिजिटल दौर में ठोस और प्रामाणिक विधिक सच से कहीं तेज़ गति से दौड़ती है कृत्रिम सनसनी। किसी पत्नी पर जब पति की पूर्व-नियोजित हत्या का आरोप विधिक रूप से लगता है, या कहीं किसी अन्य पुरुष (प्रेमी) के साथ विधिक साठगांठ करके हत्या की खौफनाक साज़िश रची जाती है, तो टीवी चैनलों पर दिन-रात बिना किसी विधिक मर्यादा के वही वीभत्स दृश्य बार-बार चलाए जाते हैं। सोशल मीडिया की रील्स पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है और कूटनीतिक ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ तत्काल अपना अंतिम विधिक फैसला सुना देती है कि “अब तो औरतें मर्दों पर बुरी तरह भारी पड़ने लगी हैं।” कुछ अति-उत्साही लोग तो यहाँ तक जनहित की बहसों में दावा करने लगते हैं कि समकालीन भारतीय समाज में अब पुरुष ही सबसे बड़े और लाचार पीड़ित बन चुके हैं। ऐसी सतही बातें सामान्य जनमानस को सुनने में निश्चित रूप से अत्यंत आकर्षक लगती हैं, लेकिन जब इन्हें कड़े विधिक और सांख्यिकीय आंकड़ों की कसौटी पर परखा जाता है, तो ये एक पल भी टिक नहीं पाती हैं।
विधिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी जघन्य अपराध का अपना कोई विशिष्ट लिंग नहीं होता। कानून की विधिक संहिता के समक्ष हत्या जैसे संगीन कृत्य को अंजाम देने वाला अपराधी चाहे पुरुष हो या महिला, विधिक न्यायशास्त्र की नज़र में दोनों पूर्णतः बराबर हैं और दोषी को सख्त से सख्त विधिक सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ चुनिंदा, सनसनीखेज़ और कूटनीतिक रूप से उछाले गए अपवादों के आधार पर पूरे आधी आबादी की सामाजिक तस्वीर को बदल देना न तो विधिक न्यायसंगत है और न ही बौद्धिक बुद्धिमानी। कुछ विच्छिन्न आपराधिक मामले सदियों की स्थापित सामाजिक हकीकत और विधिक विषमताओं को कतई ओझल नहीं कर सकते। यह सर्वथा सच है कि स्वतंत्र भारत में आधुनिक शिक्षा, विधिक सुधारों और विभिन्न जनहित योजनाओं के कारण महिलाओं की विधिक व सामाजिक स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर और सुदृढ़ हुई है। आज पहले के किसी भी दशक की तुलना में कहीं अधिक ग्रामीण और शहरी लड़कियाँ देश के प्रतिष्ठित स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक पहुँच रही हैं।
विधिक रिपोर्टों के अनुसार, उच्च शिक्षा (हायर एजुकेशन) के क्षेत्र में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात (GER) अब राष्ट्रीय स्तर पर पुरुषों के मुकाबले अधिक दर्ज किया जा रहा है। हमारी बेटियाँ आज भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमान (फाइटर जेट्स) उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का कूटनीतिक नेतृत्व कर रही हैं, बड़े-बड़े औद्योगिक साम्राज्य चला रही हैं, और देश की स्वतंत्र न्यायपालिका व प्रशासनिक ढांचे में अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक पदों पर आसीन हैं। त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में विधिक आरक्षण के चलते लाखों ग्रामीण महिलाएँ आज जनप्रतिनिधि के रूप में धरातल पर कमान संभाल रही हैं। देश में मातृ मृत्यु दर (MMR) में उल्लेखनीय कमी आई है, विधिक अस्पतालों में संस्थागत प्रसव (इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी) का ग्राफ तेज़ी से बढ़ा है, और वित्तीय समावेशन के तहत करोड़ों महिलाओं के स्वतंत्र विधिक बैंक खाते सफलतापूर्वक खोले गए हैं। यह विधिक और ढांचागत बदलाव अत्यंत स्वागत योग्य और गौरवशाली है। लेकिन कुछ गिनी-चुनी सफल महिलाओं की इन कूटनीतिक उपलब्धियों को ही पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक धरातलीय स्थिति मान लेना सबसे बड़ी वैचारिक भूल होगी।
असली और नीतिगत सवाल यह है कि देश के सुदूर गाँवों, कस्बों और महानगरीय मलिन बस्तियों की आम महिला आज किस तरह की सामाजिक और विधिक ज़िंदगी जीने को मजबूर है? यहीं पर हमारी कूटनीतिक और कागजी तस्वीर पूरी तरह से बदल जाती है। ‘ब्रज मंडल’ और राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समाजसेविका पद्मिनी अय्यर इस पर गंभीर विधिक चिंता जताते हुए कहती हैं, “भारत में महिलाओं की आर्थिक श्रम भागीदारी दर (LFPR) विधिक सुधारों के बाद हालिया वर्षों में बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी वह पुरुषों की कार्यबल भागीदारी की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें से अधिकांश असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्रों (अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर) में बेहद कम मजदूरी पर कार्यरत हैं, जहाँ न तो विधिक रूप से नौकरी की कोई सुरक्षा है, न विधिक न्यूनतम वेतन की गारंटी और न ही किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध है। इससे भी बड़ा और कड़वा सामाजिक सच यह है कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू और देखभाल संबंधी उस विशाल श्रम का देश में कोई विधिक मूल्यांकन या मौद्रिक वेतन नहीं मिलता। राष्ट्रीय समय-उपयोग सर्वेक्षण (Time Use Survey) के प्रामाणिक आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में प्रतिदिन औसतन तीन घंटे से अधिक का अतिरिक्त अनुत्पादक समय रसोई, साफ-सफाई, बच्चों के लालन-पालन और बीमार बुज़ुर्गों की सेवा-देखभाल में विधिक रूप से बिना किसी पारिश्रमिक के लगाती हैं। यह मूक श्रम पूरे देश की आर्थिक व्यवस्था को रीढ़ प्रदान करता है, लेकिन इसे न तो कोई वेतन मिलता है और न ही कोई विधिक या सामाजिक सम्मान।”
हमारे देश में पैतृक संपत्ति का विधिक बँटवारा और मालिकाना हक भी आज तक लैंगिक बराबरी की कोई सुखद कहानी नहीं कहता। प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (NFHS) के विधिक साक्ष्यों के अनुसार, देश में केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाएँ ऐसी हैं जिनके नाम पर अकेले कोई स्वतंत्र मकान या आवास पंजीकृत है, और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी स्वयं की विधिक कृषि भूमि या जमीन का मालिकाना हक है। यह भारी आर्थिक निर्भरता आज भी महिलाओं की सामाजिक और कूटनीतिक निर्भरता को निरंतर जन्म देती है। सामाजिक विसंगतियों पर पैनी नज़र रखने वाली विधिक कार्यकर्ता विद्या चौधरी के मुताबिक, “समकालीन भारत का सबसे कठोर, क्रूर और नग्न विधिक सच महिलाओं के खिलाफ होने वाली अंतहीन हिंसा का है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आधिकारिक विधिक प्रतिवेदन के अनुसार, वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक आपराधिक मामले विधिक रूप से दर्ज किए गए। इस भयावह आंकड़े का सीधा और विधिक तात्पर्य यह है कि हमारे देश में हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक बेबस महिला के खिलाफ कोई न कोई गंभीर विधिक अपराध घटित हो रहा है। इनमें भी सबसे अधिक मामले आईपीसी की विधिक धाराओं के तहत पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता (घरेलू हिंसा) के हैं। इसके बाद क्रमशः नृशंस दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दमनकारी दहेज हत्याओं से जुड़े गंभीर विधिक अपराध आते हैं।”
यहाँ यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि ये केवल वे विधिक मामले हैं जो थानों तक पहुँचकर दर्ज हो पाते हैं। ‘एनएफएचएस’ की विस्तृत रिपोर्ट आगे यह भी खुलासा करती है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक महिला ने अपने जीवनकाल में अपने ही पति या घरेलू साथी द्वारा किसी न किसी रूप में भयानक शारीरिक, मानसिक, विधिक या यौन हिंसा को प्रत्यक्ष रूप से झेला है। विधिक विशेषज्ञ और समाजशास्त्री एकमत से यह मानते हैं कि देश की असंख्य पीड़ित महिलाएँ सामाजिक लोकलाज, बदनामी के डर, पूर्ण आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण स्थानीय विधिक तंत्र में कोई औपचारिक शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाती हैं। यही हमारे भारत की असली, बुनियादी और विधिक तस्वीर है। इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पत्नियों द्वारा पतियों की वीभत्स हत्या के कुछ इक्का-दुक्का चर्चित और सनसनीखेज़ मामलों ने पूरे देश का ध्यान कूटनीतिक रूप से आकर्षित किया है। ये घटनाएँ विधिक रूप से सर्वथा निंदनीय और जघन्य हैं, और इनके दोषियों को कानून के तहत कठोरतम सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन ये विधिक अपवाद (Exceptions) हैं, समाज की मुख्यधारा की कोई सामान्य प्रवृत्ति (Trend) नहीं।
आधुनिक सोशल मीडिया अपने एल्गोरिदम के कारण इन अपवादों को ही सामान्य सत्य बनाकर पेश कर देता है। एक सनसनीखेज़ और कूटनीतिक रूप से चटपटी हत्या कई हफ्तों तक मीडिया की मुख्य सुर्खियों में तैरती रहती है, जबकि हर रात अपने ही घरों में घरेलू हिंसा और विधिक दमन झेलने वाली सैकड़ों मूक महिलाएँ किसी भी मुख्य समाचार पत्र की सामान्य विधिक पात्र भी नहीं बन पातीं। टीवी स्क्रीन पर लगातार दिखाई जाने वाली ये असाधारण और प्रायोजित घटनाएँ धीरे-धीरे आम समाज में यह गंभीर भ्रम पैदा कर देती हैं कि अब देश में सामाजिक सत्ता का संतुलन पूरी तरह से बदल गया है। लेकिन कोई भी विधिक आंकड़ा या तथ्य इस संकीर्ण भ्रम की पुष्टि नहीं करता। हाँ, महिलाओं की विधिक सुरक्षा के लिए बने विशेष कानूनों (जैसे धारा 498ए या घरेलू हिंसा अधिनियम) के कतिपय दुरुपयोग और झूठे विधिक मामलों के कुछ उदाहरण अवश्य सामने आए हैं। लेकिन कुछ गिने-चुने झूठे मामलों की आड़ लेकर महिलाओं की जीवनरक्षा के लिए बने पूरे विधिक सुरक्षा तंत्र और कानूनों को ही गलत या एकतरफा ठहरा देना कतई न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
भारतीय समाज की एक और अत्यंत दुखद और उपेक्षित विधिक सच्चाई हमारी बेसहारा विधवाओं की है। देश में आज भी करोड़ों विधवाएँ घोर गरीबी, कुपोषण, पारिवारिक उपेक्षा, विधिक संपत्ति अधिकारों से वंचित किए जाने और दमनकारी सामाजिक तिरस्कार का नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। वृंदावन और काशी जैसे धार्मिक शहर आज भी ऐसी हजारों बेसहारा और बेनाम विधवाओं की मूक विधिक पीड़ा के साक्षात और मौन गवाह बने हुए हैं। उनका यह अंतहीन विधिक व मानवीय दर्द कभी भी सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होता, क्योंकि समाज की यह ख़ामोश और बदसूरत पीड़ा टीवी चैनलों को कोई कूटनीतिक टीआरपी (TRP) या डिजिटल रीच नहीं देती। एक सनसनीखेज़ हत्या केवल एक सप्ताह तक मीडिया की सुर्खियाँ और मीम्स का हिस्सा बन सकती है, लेकिन वह भारत की करोड़ों आम महिलाओं के हिस्से में आज भी विधिक रूप से दर्ज असमानता, दैनिक हिंसा और सामाजिक भेदभाव की सदियों पुरानी कड़वी कहानी को कतई बदल नहीं सकती। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
यह भी पढ़ें

Pawan Singh
7579990777




