Article Desk, 🌐 tajnews.in | Monday, 27 July, 2026, 10:28:45 AM IST.


इमारतें ढहाने से कमजोर होता है देश
— राम पुनियानी (अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)
इन दिनों उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित ऐतिहासिक मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर छात्रों का अनिश्चितकालीन धरना अनवरत जारी है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान, जो वर्तमान में कारागार में निरुद्ध हैं, इस उच्च शिक्षण संस्थान का संचालन करने वाले ‘मोहम्मद अली जौहर न्यास’ के अध्यक्ष हैं। विश्वविद्यालय के सैकड़ों विद्यार्थी रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के उस विवादित प्रशासनिक नोटिस के खिलाफ अनुशासित धरना दे रहे हैं, जिसमें परिसर के 40 में से 38 प्रमुख भवनों को पूर्णतः ढहाए जाने का विधिक आदेश जारी किया गया है। यदि इस प्रशासनिक आदेश पर अमल किया जाता है, तो यह सीधा-सीधा इस विशाल विश्वविद्यालय को हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर देने जैसा ही साबित होगा।
राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस (20 जुलाई 2026) की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय की विधि संकाय (Law Faculty) की प्रतिभावान छात्रा मेहरोजा खान ने अपनी गहरी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, “हमारा समूचा करियर, शैक्षणिक वर्ष और स्वर्णिम भविष्य दांव पर लग गया है। हमने शांतिपूर्ण धरने पर बैठने का विधिक फैसला इसलिए किया, क्योंकि हम चाहते हैं कि शासन-प्रशासन विश्वविद्यालय के भवनों को ढहाने के अपने कठोर फैसले पर तत्काल पुनर्विचार करे। हम जैसे साधारण परिवारों के छात्र कहीं और अपनी उच्च शिक्षा जारी नहीं रख पाएंगे, विशेषकर बहुत दूर स्थित महंगे कॉलेजों में। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि यहां हमें विभिन्न शुल्कों में व्यापक छूट मिलती है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के छात्रों को फीस में 50 प्रतिशत तक सीधी छूट मिलती है। जिन अनाथ छात्रों के माता-पिता का देहांत हो चुका है, उन्हें भी विशेष वित्तीय रियायत मिलती है। इसके अलावा यहां बी. फार्मा और डी. फार्मा जैसे रोजगारपरक व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी संचालित होते हैं, जिनकी पढ़ाई हममें से बहुत से छात्र किसी अन्य महंगे संस्थान में करने में पूरी तरह असमर्थ होंगे।”
ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों पर नजर डालें तो रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का औपचारिक शिलान्यास 18 सितंबर 2006 को हुआ था। इसे मोहम्मद अली जौहर न्यास द्वारा कई वर्षों में अथक प्रयासों से धीरे-धीरे एक विशाल विद्या केंद्र के रूप में विकसित किया गया। हालांकि इसके विभिन्न भवनों के निर्माण कार्यों की समय-सारणी अब एक पेचीदा कानूनी और प्रशासनिक विवाद का केंद्र बन गई है। रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के विधिक तर्कों के अनुसार, जहां विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज और एक प्रशासनिक खंड का निर्माण विधिवत अनुमतियां एवं प्रशासनिक स्वीकृतियां हासिल करने के बाद ही किया गया है, वहीं परिसर में स्थित 38 अन्य भवनों का निर्माण सक्षम शासकीय कार्यालयों की अनिवार्य अनुमतियां हासिल किए बिना कर लिया गया।
दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन का साफ शब्दों में कहना है कि इन सभी भवनों का निर्माण वर्षों पहले किया गया था—उस दौर में जब यह संबंधित भौगोलिक स्थान (सिंगनखेड़ा गांव) आरडीए के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार में आता ही नहीं था—और इन सभी निर्माणों की वैध अनुमति तत्कालीन स्थानीय जिला पंचायत से विधिवत ली गई थी। परंतु आरडीए के अनुसार, बिना अनुमोदन के किए गए इन कथित निर्माणों और भूमि उपयोग के नियमों के उल्लंघनों के आधार पर उसने इन 38 भवनों को ध्वस्त करने का नोटिस दिया है। विश्वविद्यालय के छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने पुरजोर निवेदन किया कि ज्ञान के इस मंदिर के भवनों को ढहाया जाना पूर्णतः अनुचित होगा, क्योंकि यह संस्थान शोषित और वंचित वर्गों के छात्रों की अमूल्य सेवा कर रहा है, विशेषकर मुस्लिम समुदाय और अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के प्रतिभावान युवाओं की।
नागरिक समाज के विचारकों ने दावा किया कि वर्तमान नीतिगत कदमों का मुख्य ध्येय अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा से वंचित करना है। वैसे भी, शिक्षा उन प्रमुख प्राथमिक मुद्दों में से एक है जिनके प्रति मौजूदा सत्ता का रवैया बेहद उपेक्षापूर्ण रहा है, जैसा कि इन दिनों देश भर में चल रही बेरोजगार युवाओं एवं आंदोलित विद्यार्थियों की आक्रोश की लहर से साफ जाहिर होता है। जहाँ तक अल्पसंख्यकों की आधुनिक शिक्षा का सवाल है, उसकी राह में तो जानबूझकर और भी अधिक प्रशासनिक बाधाएं खड़ी की जा रही हैं।
इस पूरे प्रकरण का दूसरा और अत्यधिक चिंताजनक पहलू है—मुस्लिम पहचान से जुड़े ऐतिहासिक भवनों, शिक्षण संस्थानों और धार्मिक ढांचों को निशाना बनाकर तोड़ना। जौहर विश्वविद्यालय की इमारतों पर मंडराता यह खतरा इसी राजनीतिक सिलसिले की नवीनतम कड़ी है। काशी, मथुरा, संभल, अजमेर दरगाह और सहारनपुर की पुरानी मस्जिदें आदि इस सूची में शामिल दिखती हैं। हाल के समय में हमने देखा कि मध्य प्रदेश में स्थित ऐतिहासिक कमाल मौला मस्जिद को भी इस आधार पर सौंपा गया कि वह प्राचीन वाग्देवी का मंदिर है। बाबरी मस्जिद के विध्वंस की तर्ज पर कई अन्य ऐतिहासिक मस्जिदें भी निशाने पर ली जा रही हैं।
इन प्राचीन धरोहरों पर नया दावा जताने के लिए रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान अपनाई गई वही पुरानी रणनीति बार-बार दोहराई जा रही है। मध्यकालीन इतिहास का मनगढ़ंत दुरुपयोग संकीर्ण राजनीतिक और सांप्रदायिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किया जा रहा है। मस्जिदों पर खड़े किए जा रहे अधिकांश विवाद इस कुतर्क पर आधारित हैं कि मध्यकाल में मंदिरों को तोड़कर उन्हीं स्थानों पर मस्जिदों का निर्माण किया गया था। ये दावे अक्सर इतिहास की बढ़ा-चढ़ाकर की गई या पूरी तरह विकृत व्याख्याओं पर आधारित होते हैं, जिनमें औपनिवेशिक ब्रिटिश काल की पक्षपातपूर्ण टीका-टिप्पणियों का हवाला दिया जाता है। इस तरह के आक्रामक दावे देश के संसद द्वारा पारित ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991’ (Places of Worship Act, 1991) के स्पष्ट विधिक प्रावधानों के सीधे खिलाफ हैं, जो बाबरी मस्जिद के अलावा देश के सभी उपासना स्थलों के मामलों में 15 अगस्त 1947 की यथास्थिति बनाए रखने का कड़ा विधिक आदेश देता है।
इस विध्वंसक सिलसिले की वास्तविक शुरुआत बाबरी मस्जिद को ढहाने के बाद से तेज हुई। यद्यपि न्यायालय के निर्णय में यह माना गया था कि 1949 में वहां रामलला की मूर्ति की स्थापना किया जाना एक गैर-कानूनी काम था और 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को ढहाए जाने की घटना को भी एक गंभीर अपराध स्वीकार किया गया था, फिर भी इस घटनाक्रम ने एक विशेष राजनीतिक दल की चुनावी सफलताओं का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन बाबरी विध्वंस से मिले राजनीतिक लाभ ने यह लालच दिया कि इसी संप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाकर और अधिक चुनावी कामयाबी हासिल की जा सकती है। यही वजह है कि अन्य स्थानों के संबंध में भी लगातार ऐसे दावे पेश किए जाते रहे हैं और न्यायपालिका 1991 के अधिनियम की मूल भावना को नजरअंदाज करते हुए जांच के आदेश देती रही, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा।
अब इस दक्षिणपंथी रणनीति के तहत एक विश्वविद्यालय को निशाना बनाने का विचार सामने आया है। इस प्रस्तावित तोड़फोड़ से एक अतिरिक्त उद्देश्य की पूर्ति होगी—वह है मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना और उसके साथ ही अल्पसंख्यक युवाओं को आधुनिक शिक्षा से महरूम करना, जिसकी उन्हें आज सबसे सख्त जरूरत है। इसी तर्ज पर सहारनपुर की एक बहुत पुरानी छोटी सी मस्जिद को भी प्रशासनिक नोटिस जारी कर इस आधार पर हटाए जाने को कहा गया है कि उसके निर्माण के समय अनिवार्य अनुमतियां नहीं ली गईं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिकूल कब्जे का कानून (Law of Adverse Possession) अल्पसंख्यकों के मामलों में अनदेखा कर दिया जाता है, और येन-केन-प्रकारेण उनके निर्माणों को गैरकानूनी साबित कर बुलडोजर चलाने का प्रयास जारी रहता है।
बुलडोजरों का मनमाना और असंवैधानिक प्रयोग करके समाज के एक खास वर्ग में आक्रामक लोकप्रियता हासिल करना, अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से अलग-थलग करने का एक नया माध्यम बन गया है। ऐसा लगता है जैसे राष्ट्रीय संपदा को ढहाना ही उनका ‘राष्ट्र निर्माण’ का नया तरीका बन चुका है। निर्मित भवनों, शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों को इस तरह गिराए जाने से देश की राष्ट्रीय संपदा और सार्वजनिक धन की कितनी जबरदस्त तबाही होती है, इसकी सत्ताधीशों को रत्ती भर परवाह नहीं है।
आजादी के बाद भारत में राष्ट्र निर्माण (Nation Building) के मायने और दृष्टिकोण बिल्कुल अलग थे। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का स्पष्ट विधिक नजरिया था कि देश में आईआईटी (IIT), एम्स (AIIMS), भाखड़ा नांगल जैसे विशाल बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के कल-कारखाने और आधुनिक वैज्ञानिक अवसंरचनाएं बनाकर ही हम देश में व्याप्त गरीबी, अज्ञानता और अभावों से मुक्ति पा सकते हैं। परंतु आज हमारा रास्ता पूरी तरह भटक गया है; हम आधुनिक निर्माण करने के बजाय मस्जिदों और शिक्षण संस्थानों के नीचे प्राचीन अवशेष खोजने और बने-बनाए ढांचों को गैर-कानूनी साबित कर ध्वस्त करने में अपनी पूरी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं। इससे एक राजनीतिक दल को तात्कालिक चुनावी लाभ भले मिल जाए, लेकिन हमारे सामाजिक ताने-बाने में नफरत का जहर घुलता है और देश आंतरिक रूप से कमजोर होता है।
अब बुनियादी सवाल यह है कि क्या हमें समय रहते संवैधानिक सद्बुद्धि आएगी? क्या हम पुनः भारतीय संविधान के प्रस्तावना में दर्ज मूल्यों के अनुरूप एक समावेशी और आधुनिक राष्ट्र निर्माण के मार्ग पर चलना शुरू करेंगे? क्या हम इस विध्वंसक बुलडोजर संस्कृति, इमारतों को ढहाने की राजनीति और छोटी-मोटी विसंगतियों को तूल देकर शिक्षण संस्थानों व अल्पसंख्यक निर्माणों को ध्वस्त करने के इस घातक खेल से बाज आएंगे? क्योंकि राष्ट्र का निर्माण इमारतें ढहाने से नहीं, बल्कि ज्ञान, सौहार्द और नए संस्थानों के निर्माण से ही संभव है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
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Pawan Singh
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