Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 12 Mar 2026, 03:45 pm IST

Taj News Satire Desk
विशेष व्यंग्य आलेख

बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस तीखे और विचारोत्तेजक व्यंग्य में ‘सेल्फ़ी युग’ की खोखली समाजसेवा पर गहरा प्रहार किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे आज के दौर में ज़मीन पर काम कम होता है, लेकिन सोशल मीडिया पर श्रेय लूटने की होड़ सबसे ज्यादा मची रहती है। पढ़िए उनका यह मारक आलेख:
मुख्य बिंदु
- सेल्फ़ी और सोशल मीडिया के युग में समाजसेवा का गिरता स्तर और श्रेय लेने की होड़।
- एक्टिविस्ट और डिजिटल इन्फ्लुएंसर के बीच मिटता फर्क; समस्याओं से ज्यादा ‘लाइक्स’ पर फोकस।
- RTI (सूचना का अधिकार) का नया रूप: ‘Recognition Through Internet’ यानी पहले पहचान, फिर काम।
- पर्दे के पीछे रहकर काम करने की पुरानी परंपरा का पतन और ‘पर्सनल ब्रांड एक्टिविज़्म’ का उदय।
सेवा का काम कभी शोर नहीं करता है। उसका सीधा असर ज़मीन पर होना चाहिए। लेकिन आज के आधुनिक समय में असर से पहले ही एक पोस्ट आ जाती है। आप जरा गौर से देखें। आज समाजसेवा भी कुछ-कुछ एक क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। यहाँ सबकी नज़र सिर्फ एक स्कोरबोर्ड पर टिकी है। लोग देखते हैं कि किसने सबसे पहले ट्वीट किया। किसने फेसबुक पर अपनी “ब्रेकिंग न्यूज़” डाली। किसने अपनी मुस्कुराती फोटो के साथ लिखा कि यह सब “मेरे प्रयासों से” हुआ। असल मुद्दा क्या था, यह बात लोगों को बहुत बाद में याद आती है। सबसे पहले यह याद आता है कि आखिर पोस्ट किसकी वायरल हुई। आजकल जमीनी सेवा बहुत कम होती है। इसके विपरीत सेल्फ़ी की चमक ज़्यादा होती है। यह हमारे समाज का एक बहुत ही कड़वा और नंगा सच है। हम धीरे-धीरे एक दिखावटी दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं।
किसी आम नागरिक ने सड़क के एक गड्ढे की शिकायत की। उस गड्ढे को भरने से पहले ही सोशल मीडिया पर पाँच अलग-अलग पोस्ट आ गईं। हर तथाकथित नेता और कार्यकर्ता ने लिखा: “देखिए, मेरे अथक प्रयास से नगर निगम हरकत में आ गया।” वहां नगर निगम का बेचारा कर्मचारी मन ही मन सोचता रह जाता है। उसने कड़ी धूप में पसीना बहाकर वह गड्ढा भरा। लेकिन उसका पूरा श्रेय किसी और ने आसानी से अपनी झोली में भर लिया। यह श्रेय की एक अंधी और स्वार्थी दौड़ है। इस दौड़ में असली काम करने वाला इंसान हमेशा पीछे छूट जाता है। हर कोई बस अपना चेहरा चमकाना चाहता है। काम चाहे छोटा हो या बड़ा, कैमरा हमेशा सबसे आगे रहता है। ऐसा लगता है कि बिना कैमरे के कोई पुण्य का काम हो ही नहीं सकता है।
एक पुराना ज़माना था जब सच्चे समाजसेवक हमेशा चुपचाप अपना काम करते थे। वे कभी मंच पर आकर अपनी तारीफ नहीं करते थे। आम लोग बहुत बाद में एक-दूसरे को बताते थे। वे कहते थे कि “अरे, यह अच्छा काम फलाँ व्यक्ति ने करवाया था।” लेकिन अब यह पूरा दौर बिल्कुल उल्टा हो चुका है। अब किसी भी काम से पहले एक बड़ी घोषणा होती है। फिर सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट होती है। उसके बाद बड़े नेताओं और अधिकारियों की टैगिंग होती है। फिर एक नया हैशटैग भी जमकर चलता है। लेकिन असली काम कब होता है? यह अहम सवाल अक्सर हवा में ही लटक जाता है। यह बात तो कभी-कभी प्रशासन को भी बहुत बाद में पता चलती है। आज के समय में एक एक्टिविस्ट और एक इन्फ्लुएंसर में फर्क करना बहुत मुश्किल हो गया है।
असल में फर्क बस इतना ही बचा है। एक डिजिटल इन्फ्लुएंसर इंटरनेट पर अपना साबुन और तेल बेचता है। और एक सो-कॉल्ड एक्टिविस्ट जनता के बीच अपना श्रेय बेचता है। दोनों का ही असली मक़सद सिर्फ अपनी ब्रांडिंग करना होता है। हमारे देश में RTI (सूचना का अधिकार) एक बहुत शानदार औज़ार है। यह हमारे लोकतंत्र की एक मजबूत एक्स-रे मशीन है। आप सरकार से सीधे सवाल पूछो, तो उसे जवाब देना ही पड़ता है। सरकारी दफ्तरों की बंद फाइलें खुलती हैं। कड़वा सच बाहर निकलकर आता है। लेकिन हमारे यहाँ अब RTI का भी एक बिल्कुल नया और आधुनिक संस्करण आ गया है। इस नए युग में RTI का मतलब “Recognition Through Internet” हो गया है। यानी असली सूचना बाद में आएगी, लेकिन व्यक्ति की पहचान पहले बननी चाहिए।
किसी ने अभी RTI ठीक से लगाई भी नहीं होती है। लेकिन उसकी फेसबुक पोस्ट पहले ही तैयार हो जाती है। वह बहुत गर्व से लिखता है: “मेरी RTI से एक बहुत बड़ा खुलासा!” असल में खुलासा क्या हुआ, यह बात तो बाद में फुरसत से पढ़ी जाएगी। सबसे पहले यह देख लिया जाए कि उस पोस्ट पर कुल कितने लाइक आए। कभी-कभी यह देखकर बहुत अजीब लगता है। ऐसा लगता है कि RTI फाइल कम हो रही है, लेकिन प्रेस रिलीज़ ज़्यादा हो रही है। आजकल हर छोटे-बड़े आंदोलन में मुख्य रूप से दो मोर्चे होते हैं। एक असली मोर्चा होता है, जहाँ असल में समस्या मौजूद है। दूसरा सोशल मीडिया का मोर्चा होता है, जहाँ सिर्फ चमकती हुई फोटो है। यहाँ हमेशा असली मुद्दा पीछे रहता है, और नेता का चेहरा आगे रहता है।
पहले के समय में लोग सच में पेड़-पौधे और वृक्ष बचाते थे। वे पर्यावरण के लिए अपना खून-पसीना एक करते थे। अब लोग सिर्फ पेड़ के किनारे खड़े होकर अपनी सेल्फ़ी बचाते हैं। किसी ने एक सफाई अभियान में जोश में आकर झाड़ू उठाई। ठीक अगले ही पल उसकी एक बढ़िया फोटो पोस्ट हो गई। उस फोटो के नीचे एक भारी भरकम कैप्शन लिखा होता है। वह लिखता है: “शहर की सफाई के लिए मेरी एक ऐतिहासिक लड़ाई।” यह देखकर पूरा शहर बेचारा अपने मन में सोचता होगा। शहर पूछता है: “भाई, तुम ज़मीन पर झाड़ू चलाओगे या सिर्फ अपना कैमरा चलाओगे?” यह एक बहुत ही हास्यास्पद और चिंताजनक स्थिति बन चुकी है। दिखावा अब एक महामारी बन गया है।
आज हमारे समाज में श्रेय लेना भी एक गंदी राजनीति जैसा हो गया है। हर व्यक्ति को यह झूठा श्रेय चाहिए। और वह भी उन्हें तुरंत चाहिए। कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ इसे एक गंभीर ‘छपास रोग’ (अखबार में छपने की बीमारी) का नाम देते हैं। अगर शहर में कहीं भी कोई एक अच्छा काम हो जाए। तो वहां पाँच लोग तुरंत प्रकट हो जाते हैं। वे सभी एक स्वर में कहते हैं: “यह सब सिर्फ मेरे प्रयासों से हुआ है।” इस भीड़ में छठा व्यक्ति थोड़ा विनम्र होने का नाटक करता है। वह अपनी पोस्ट में लिखता है: “यह मेरे एक छोटे से प्रयास का सुखद परिणाम है।” दरअसल उसका वह छोटा प्रयास इतना छोटा होता है कि वह कभी-कभी जमीन पर दिखता ही नहीं है। लेकिन उसकी वह सोशल मीडिया पोस्ट बहुत बड़ी और वायरल होती है। यह सब देखकर असली काम करने वालों का मनोबल बुरी तरह टूट जाता है।
इस सोशल मीडिया ने समाज में एक बिल्कुल नई चीज़ पैदा की है। इसे हम “पर्सनल ब्रांड एक्टिविज़्म” कह सकते हैं। यहाँ किसी का असली उद्देश्य समस्या को हल करना बिल्कुल नहीं होता है। उनका एकमात्र लक्ष्य सिर्फ अपनी प्रोफ़ाइल को चमकाना होता है। जैसे ही शहर का कोई नया मुद्दा इंटरनेट पर ट्रेंड करता है। वैसे ही कुछ खास लोग तुरंत अपना हाई-क्वालिटी कैमरा लेकर वहाँ पहुँच जाते हैं। वे वहां एक बढ़िया फोटो खींचते हैं। वे एक लंबा-चौड़ा ज्ञानवर्धक पोस्ट लिखते हैं। वे दो-चार बड़े लोगों और मंत्रियों को टैग करते हैं। और अंत में वे एक क्रांतिकारी लाइन लिखते हैं: “हमारा यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।” असल में यह संघर्ष ज़मीन पर कहाँ जारी है, यह बात किसी को पता नहीं होती है। लेकिन इंटरनेट पर उनके खोखले पोस्ट जरूर लगातार जारी रहते हैं।
ज़िंदगी का सच अक्सर बहुत थोड़ा सादा और कड़वा होता है। असली सच यह है कि समाज का कोई भी बड़ा काम केवल एक व्यक्ति से कभी नहीं होता है। एक काम के पीछे कई लोग दिन-रात मेहनत करते हैं। उनमें से कुछ लोग मंच के सामने दिखते हैं। लेकिन कई लोग हमेशा पर्दे के पीछे खामोशी से रह जाते हैं। वे बिना किसी स्वार्थ के अपना पसीना बहाते हैं। लेकिन आजकल के दौर में पर्दे के पीछे रहना किसी को भी पसंद नहीं है। शायद लोगों को गुमनामी से बदबू आती है। आज हर किसी को लगता है कि दुनिया का इतिहास उसी के जन्म से शुरू होता है। सामाजिक मर्यादा और शर्म आजकल लोगों को थोड़ा पुराना फ़ैशन लगती है। संयम का असली मतलब यह है: पहले काम को पूरी तरह होने दो, फिर उसके बारे में बोलो। लेकिन सोशल मीडिया का आधुनिक नियम बिल्कुल अलग है। वह कहता है: पहले ज़ोर से बोलो, फिर काम होने का आराम से इंतज़ार करो।
अगर आप सच पूछिए तो समाज सेवा का असली सुख कहाँ है? वह सुख फेसबुक के लाइक और ट्विटर के शेयर में बिल्कुल नहीं होता है। वह सच्चा सुख उस दिन मिलता है, जब किसी गरीब की समस्या सच में हल हो जाती है। जब किसी मजबूर के चेहरे पर असली मुस्कान आती है। लोगों की ताली की आवाज़ सिर्फ दो सेकंड तक रहती है। लेकिन समाज में आए एक अच्छे परिवर्तन की गूँज कई वर्षों तक सुनाई देती है। यह गूँज आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवारती है। लेकिन इस गहरी बात को समझने के लिए इंसान के अंदर थोड़ा धैर्य होना चाहिए। और आज की इस चमकीली सोशल मीडिया की दुनिया में, धैर्य ही सबसे दुर्लभ और महंगा संसाधन बन चुका है। हमें अपनी इस ‘सेल्फ़ी सेवा’ वाली झूठी मानसिकता से जल्द से जल्द बाहर निकलना होगा। हमें सिर्फ शोर मचाने के बजाय शांति से ज़मीन पर असरदार काम करना होगा। तभी जाकर यह समाज और यह देश सही मायने में आगे बढ़ सकेगा। अन्यथा हम सब हमेशा के लिए सिर्फ एक डिजिटल भ्रम में ही जीते रह जाएंगे। हमारी असली समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी और हम सिर्फ अपनी तस्वीरों पर लाइक गिनते रह जाएंगे। अब समय आ गया है कि हम ‘पोस्ट’ कम करें और ‘प्रयास’ ज़्यादा करें।

Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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