Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 07 Mar 2026, 03:00 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस विशेष आलेख में भारतीय घरों की एक खौफनाक हकीकत को उजागर किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे सास-बहू का पारंपरिक झगड़ा अब टीवी सीरियलों से निकलकर खूनी और जानलेवा अपराधों में बदल रहा है। पढ़िए उनका यह बेबाक आलेख:
आज पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है। इसलिए यह दिन महिलाओं के अधिकारों की बात करने का है। हालांकि हमारे समाज की एक बहुत कड़वी सच्चाई भी मौजूद है। दरअसल हमारे घरों में महिलाओं के बीच ही एक खामोश और खतरनाक जंग चल रही है। अगर पुरानी फिल्मों वाली ललिता पवार टाइप सास आज की आधुनिक बहू से सीधे टकरा जाए, तो घर का मंजर कैसा होगा? इसके अलावा अगर लोकप्रिय टीवी सीरियल “वसुधा” या “क्यूंकि सास भी कभी बहू थी” की लड़ाई असल जिंदगी में उतर आए, तो कहानी कुछ और ही होगी। बरसों से सास-बहू का यह उलझा हुआ रिश्ता टीवी सीरियलों का मुख्य विषय रहा है। बॉलीवुड फिल्मों और डिनर टेबल की गपशप में भी यही विषय सबसे पसंदीदा रहा है। आम तौर पर लोग इसे हल्के-फुल्के मज़ाक या ड्रामे के तौर पर पेश करते हैं। इसमें हमेशा एक चालाक सास और एक बेचारी सताई हुई बहू नज़र आती है।
लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों से बेहद खौफनाक खबरें आई हैं। ये दर्दनाक खबरें इस मज़ाकिया टीवी वाली तस्वीर को बिल्कुल झुठला देती हैं। अब यह रिश्ता सिर्फ रोजमर्रा के तानों और शिकायतों तक सीमित नहीं रहा है। अब यह चुप्पी भरे झगड़ों की हदों को पार कर चुका है। कई जगह यह भयानक टकराव सीधी हिंसा और कत्ल तक पहुँच गया है। महाराष्ट्र से लेकर तमिलनाडु तक यही खूनी खेल चल रहा है। संयुक्त परिवार की जो चमकदार और आदर्श तस्वीर हमें हमेशा आकर्षित करती थी, अब उसके पीछे छिपे गहरे तनाव खुलकर सामने आने लगे हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात इन आपराधिक मामलों की बर्बरता है। अब यह विवाद सिर्फ दहेज उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने तक बिल्कुल सीमित नहीं रहा है। कई ताज़ा मामलों में सीधे-सीधे निर्मम हत्याएं हो रही हैं। औरतें ही औरतों के खून की प्यासी हो गई हैं।
उदाहरण के लिए जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के ठाणे में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी। वहां 60 साल की एक सास पर पुलिस ने हत्या का गंभीर आरोप लगाया। आरोप था कि उसने अपनी सगी बहू का बेरहमी से गला घोंट कर उसे मार डाला। इस जघन्य हत्या की वजह कोई मामूली घरेलू झगड़ा बिल्कुल नहीं था। असल में यह पूरी लड़ाई सरकारी नौकरी के फायदे और मुआवज़े की रकम को लेकर थी। सास को पूरी तरह लगता था कि बेटे की मौत के बाद उस पैसे पर सिर्फ उसका हक है। लेकिन भारतीय कानून के मुताबिक वह पूरी रकम सीधे बेटे की विधवा पत्नी को मिलनी थी। यानी गहरे दुख, आर्थिक डर और भविष्य की भयानक असुरक्षा ने मिलकर सास के गुस्से को एक कातिलाना शक्ल दे दी। इसके अलावा ऐसे खौफनाक मामले पहले भी कई बार सामने आ चुके हैं।
साल 2016 में मुंबई के पास मुंब्रा इलाके में एक रूह कंपा देने वाली घटना हुई थी। वहां एक सास ने अपनी बहू और उसकी माँ की धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या कर दी। इस दोहरे हत्याकांड की वजह जानकर आप वाकई हैरान रह जाएंगे। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसका बेटा अपनी पत्नी को अपनी माँ से ज्यादा तवज्जो देता था। यह सास-बहू के संघर्ष का सबसे पुराना और बुनियादी मनोवैज्ञानिक रूप है। यह असल में बेटे या शौहर पर भावनात्मक कब्ज़े की एक अंधी जंग है। इसी तरह 2019 में वसई में एक सास ने अपनी बहू को गुस्से में आकर सीधा चाकू मार दिया। इसके बाद वह औरत खुद खून से सने हाथों के साथ सीधे पुलिस स्टेशन पहुंच गई। इससे यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि घरेलू सत्ता की इस अंधी लड़ाई में कभी-कभी लोग अपने पूरे होश-ओ-हवास खो देते हैं।
ये हिंसक घटनाएँ सिर्फ किसी एक प्रदेश या शहर तक सीमित नहीं हैं। नतीजतन यह एक तरह से पूरे हिंदुस्तान के हर घर की कहानी बनती जा रही है। साल 2025 में झारखंड राज्य में 60 साल की अनीता देवी को अदालत ने कड़ी सज़ा सुनाई। पुलिस ने उसे अपनी बहू को खाने में जहर देने के जुर्म में गिरफ्तार किया था। अदालत ने उसे इस जघन्य अपराध के लिए उम्रकैद की सज़ा दी। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में इन झगड़ों की वजहें और भी ज्यादा दिलचस्प और हैरान करने वाली हैं। साल 2023 में यूपी के अमरोहा जिले में एक सास ने अपनी बहू को सीधे गोली मार दी। पुलिस पूछताछ में सास ने इसकी एक अजीब वजह बताई। उसने बताया कि उसे अपनी बहू का “आधुनिक लाइफस्टाइल” बिल्कुल पसंद नहीं था। इसके अलावा बहू घर के कामों में कोई दिलचस्पी नहीं लेती थी।
यह टकराव दरअसल दो अलग-अलग पीढ़ियों की सोच की सीधी टक्कर है। एक तरफ पुरानी और पारंपरिक सोच वाली सास खड़ी है। वह सास हमेशा एक आज्ञाकारी और घरेलू बहू चाहती है। दूसरी तरफ नई पीढ़ी की स्वतंत्र और पढ़ी-लिखी औरत खड़ी है। वह आधुनिक औरत अपने करियर और अपनी आज़ादी से कोई समझौता नहीं करना चाहती है। वह अपनी जिंदगी के सारे अहम फैसले खुद स्वतंत्र होकर करना चाहती है। लेकिन इस खूनी कहानी का एक दूसरा डरावना पहलू भी मौजूद है। हर बार सास ही हमलावर या कातिल नहीं होती है। अब कई नए मामलों में बहू भी उसी हिंसक तरीके से सीधा पलटवार कर रही है। और वह पलटवार भी बेहद खतरनाक और जानलेवा साबित हो रहा है। बहुएं भी अब खूनी रास्ते अपना रही हैं।
उदाहरण के लिए 2025 में देश की राजधानी दिल्ली में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया। वहां एक गर्भवती महिला ने अपनी सास को चाकू मारकर मौत के घाट उतार दिया। हत्या के बाद उसने पुलिस को गुमराह करने के लिए घर में लूट का झूठा नाटक रचा। इसके बाद उसने सारे सबूत मिटाने के लिए अपनी सास की लाश को आग लगा दी। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के शांत इलाके सिरमौर में भी ऐसा ही एक जुर्म हुआ। वहां एक बहू ने घरेलू सामान और जिम्मेदारियों को लेकर हुए मामूली झगड़े में अपनी बुजुर्ग सास पर तेज हथियार से जानलेवा हमला कर दिया। झांसी शहर में भी ज़मीन के झगड़े ने एक परिवार को बर्बाद कर दिया। वहां कथित अवैध रिश्तों के शक ने एक बहू को इतना अंधा कर दिया कि उसने अपनी सास को जहर दे दिया।
इन सभी खौफनाक घटनाओं से एक बात पूरी तरह साफ हो जाती है। हमारे समाज में “बेचारी बहू” और “जालिम सास” वाला पुराना टीवी स्टीरियोटाइप अब पूरी तरह टूट रहा है। असलियत इस टीवी ड्रामे से कहीं ज्यादा जटिल और जहरीली बन चुकी है। शायद सबसे ज्यादा सिहराने वाला मामला 2026 की शुरुआत में दक्षिण भारत से सामने आया। यह दर्दनाक घटना तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले में घटी। यहां एक सास मैरी और उसकी बेटी एमिली ने मिलकर एक भयानक साजिश रची। उन्होंने 25 साल की नंदिनी को कथित अवैध संबंधों के शक में बेरहमी से मार डाला। उन्होंने उसे पहले बहला-फुसला कर अगवा किया और फिर मौत के घाट उतार दिया। बाद में पुलिस ने नंदिनी की लाश एक नदी किनारे से बरामद की।
यह घटना साफ दिखाती है कि कई बार परिवार के बाकी लोग भी मिलकर इस हिंसक साजिश में शामिल हो जाते हैं। वे सभी मिलकर “बाहरी” बहू के खिलाफ एक खतरनाक मोर्चा खोल लेते हैं। तो आखिर इन खौफनाक आपराधिक घटनाओं की असली जड़ क्या है? असल वजह हमारे भारतीय परिवार की कुछ बहुत पुरानी और गहरी कमजोरियां हैं। संयुक्त परिवार को कभी हमारे समाज में सबसे बड़ा सहारा और सुरक्षा का सिस्टम माना जाता था। लेकिन अब वही संयुक्त परिवार कई बार महिलाओं के लिए एक घुटन भरा प्रेशर कुकर बन जाता है। एक सास अक्सर विधवा होती है या उसने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ परिवार के लिए कुर्बान कर दी होती है। इसलिए वह अपनी पहचान और अपनी बुढ़ापे की सुरक्षा को सिर्फ अपने बेटे से जोड़ कर देखती है। उसे बेटा ही अपना एकमात्र सहारा लगता है।
ऐसे माहौल में एक नई बहू का घर में आना उसे सीधा खतरा लगता है। उसे लगता है कि अब उसका रुतबा और उसकी जगह हमेशा के लिए छिन जाएगी। उधर बहू को भी घर में हर वक्त की दखलअंदाजी बहुत बुरी लगती है। उसे सास का यह नियंत्रण एक भयानक घुटन जैसा महसूस होता है। घर में पैसे का लेन-देन, निजी जगह की कमी और बच्चों की परवरिश जैसे मुद्दे ताकत की लड़ाई बन जाते हैं। और जब घर में आपस में बातचीत पूरी तरह बंद हो जाती है, तो हालात बेकाबू हो जाते हैं। इस बीच बेटा या पति अक्सर एक चुप तमाशबीन बना रहता है। इसलिए छोटे-छोटे घरेलू झगड़े कभी-कभी अचानक खूनी हादसों में बदल जाते हैं। ये सारी हिंसक घटनाएँ हमारे समाज के लिए एक बहुत कड़वी चेतावनी हैं। सास-बहू का यह रिश्ता अब सिर्फ टीवी सीरियल का मसाला बिल्कुल नहीं रहा है।
यह रिश्ता अब मानसिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का एक भयानक संगम बनता जा रहा है। यही जहरीला संगम आज कई हंसते-खेलते घरों को सीधे क्राइम सीन में बदल रहा है। आज महिला दिवस के इस खास मौके पर हमें इन गंभीर मुद्दों पर सोचना चाहिए। हम दुनिया भर में महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन हम अपने ही घरों के अंदर महिलाओं की इस आपसी दुश्मनी को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं को इस तरह से ढाल दिया है कि वे एक-दूसरे की ही सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती हैं। घर की सत्ता हासिल करने की यह अंधी होड़ महिलाओं को मानसिक रूप से बीमार कर रही है। एक औरत ही दूसरी औरत का दर्द समझने के बजाय उस पर सीधा अत्याचार कर रही है।
समाज को यह समझना होगा कि सास और बहू दोनों ही इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पुरानी शिकार हैं। दोनों को अपनी असुरक्षा की गहरी भावना से तुरंत बाहर निकलना होगा। पुरुषों को भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी समझनी होगी और इस मूक दर्शक की भूमिका को छोड़ना होगा। पति को अपनी माँ और पत्नी के बीच एक सही संतुलन बनाना सीखना चाहिए। जब तक हम अपनी पारिवारिक संरचना में बुनियादी बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक यह समस्या सुलझने वाली नहीं है। हमें लड़कियों को शुरू से ही आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना होगा। इसी तरह हमें बुजुर्ग महिलाओं के लिए भी सामाजिक सुरक्षा की बेहतर नीतियां बनानी होंगी। अगर परिवारों ने समय रहते एक दूसरे की इज्ज़त करना नहीं सीखा, तो हालात और बिगड़ेंगे। महिलाओं को एक दूसरे से उचित दूरी और समझदारी के नए उसूल अपनाने होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अखबारों में ऐसी खूनी सुर्खियां शायद भविष्य में और भी आम होती जाएंगी।
Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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