Samik Lahiri article on Bengal politics and Election Commission

बंगाल एसआईआर : जातीय-राज्य के निर्माण के लिए एक गठजोड़

आर्टिकल

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 05 Mar 2026, 03:25 pm IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Samik Lahiri Writer

समिक लाहिड़ी

पूर्व सांसद एवं सदस्य, माकपा केंद्रीय समिति

पूर्व सांसद समिक लाहिड़ी (अनुवाद: संजय पराते) ने अपने इस विश्लेषणात्मक लेख में चुनाव प्रणाली पर उठ रहे सवालों, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की विसंगतियों और वर्तमान राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय राजनीतिक परिदृश्य पर वामपंथी दृष्टिकोण से बेबाक टिप्पणी की है। पढ़िए उनका यह आलेख:

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में शामिल ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ के सामने अस्तित्व का संकट है। हाल के सालों में, चुनाव प्रणाली पर एक सोचा-समझा हमला सामने आया है, जिसमें लाखों मतदाताओं को डराने-धमकाने के लिए ‘तार्किक विसंगतियों’ का दिखावा किया जा रहा है। यह अभियान खास तौर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों और गरीबों को लक्षित करता है। भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई), जो कभी संवैधानिक रूप से निष्पक्ष संस्था थी, अब उसने अपनी स्वायत्तता का त्याग कर दिया है और अब वह आरएसएस-भाजपा की केंद्र सरकार के अधीनस्थ उपकरण की तरह काम कर रहा है। यह सिर्फ़ जन प्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन नहीं है ; बल्कि यह संविधान के ‘आधारभूत ढांचे’ पर सीधा हमला है। चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना भारत के चुनाव आयोग का सबसे बड़ा संवैधानिक काम है। फिर भी, कुल डाले गए मतों और उसके अंतिम मिलान के बीच एक बड़ा फ़र्क सामने आया है। ये तथाकथित ‘तर्कसंगत विसंगति’ तकनीकी गड़बड़ियां नहीं हैं ; ये राजनीतिक हथियार हैं। अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग के संकेन्द्रण वाले इलाकों से मतदाता सूचियों से इन समुदाय से जुड़े नामों को व्यवस्थित तरीके से हटाना एक शास्त्रीय नव-फासीवादी तरीका है। भाजपा शासित राज्यों में, लाखों लोगों को उनकी नागरिकता को लेकर लगातार डराया जा रहा है। ये विसंगतियां ‘डी-वोटर’ (संदेहास्पद मतदाता) स्टेटस या एनआरसी की शुरुआत का काम करते हैं, जिसका इस्तेमाल अनुच्छेद 324 का सीधा उल्लंघन करते हुए हाशिए पर पड़े लोगों से उनके मतदान का अधिकार छीनने के लिए किया जाता है।

भारतीय संविधान कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक नाजुक संतुलन पर टिका है। मौजूदा शासन ने व्यवस्थित तरीके से इस संतुलन को खत्म कर दिया है। भारत का चुनाव आयोग, चुनावी झगड़ों को सुलझाने के बजाय, खुद को जवाबदेही से बचाने के लिए जानबूझकर न्यायपालिका को राजनैतिक दलदल में घसीट रहा है। कानूनी तकनीकी बातों की आड़ लेकर, आयोग अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से बच रहा है, जिससे असल में न्यायिक दखलअंदाजी को बढ़ावा मिल रहा है। चुनाव आयोग संविधान और आम जनता के प्रति जवाबदेह संस्था बनने के बजाय, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के निर्देशों के तहत, पीएमओ का एक हिस्सा बन गया है। जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951, हर वयस्क नागरिक के मताधिकार की सुरक्षा का आदेश देता है, चाहे उसकी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति कुछ भी क्यों न हो। आरएसएस-संचालित केंद्र सरकार इस आदेश को कुचल रही है। ऐसा वह निम्न तरीकों से कर रही है : क) लक्षित समुदाय को मताधिकार से वंचित करके : मतदान को रोकने के लिए अल्पसंख्यक इलाकों में चुनाव केंद्रों की जगहों में रणनीतिक हेरफेर करके। ख) सामाजिक बहिष्करण : दलितों, आदिवासियों और प्रवासी मज़दूरों को — जिनके पास पक्षपाती नौकरशाही द्वारा अक्सर एकतरफ़ा तौर से मांगे गए ‘मानक’ दस्तावेजों की कमी होती है — को मतदान से वंचित करने के लिए प्रशासनिक लालफीताशाही का इस्तेमाल करना। ग) तकनीकी गड़बड़ी : विरोधी मतदाताओं को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए आखिरी समय में मतदाता सूची में तकनीकी त्रुटियां’ डालना।

पश्चिम बंगाल में हाल ही में ‘तार्किक विसंगतियों’ की आड़ में 60 लाख मतदाताओं को निलंबित करना अनुच्छेद 326 का खुला उल्लंघन है। एक भी वोट डाले जाने से पहले पूरे चुनाव क्षेत्र के लोकतांत्रिक नतीजों को बदलना एक गैर-संवैधानिक कदम है। यह कोई अलग-अलग घटनाओं का सिलसिला नहीं है ; यह एक समन्वित राजनैतिक एजेंडा है। आरएसएस के ‘हिंदू राष्ट्र’ के विज़न के लिए सार्वभौमिक मताधिकार सबसे बड़ी बाधा है। जब लोग रोटी, रोजगार और जनवादी अधिकारों की मांग करते हैं, तो भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति लड़खड़ाने लगती है। इसलिए, उनकी रणनीति असली चुनावी लड़ाई शुरू होने से पहले ही विरोधी मतदाताओं को मानसिक और कानूनी तौर पर कमज़ोर करना है। हम देश के सबसे ऊंचे ओहदों से किया जा रहा एक ‘संवैधानिक तख्तापलट’ देख रहे हैं। चुनावी विसंगतियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में लंबी देरी ने अनजाने में आरएसएस-भाजपा गठजोड़ को एक सुनहरा मौका दे दिया है। 60 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड के सत्यापन का काम कुछ सौ न्यायाधीशों को सौंपना एक गणितीय बेवकूफी है — एक ‘प्रशासनिक भ्रम’। यह बाधा जानबूझकर पैदा की गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जब तक कोई कानूनी उपाय मिलेगा, चुनाव बीत चुके होंगे, जिससे न्याय बेमानी हो जाएगा। यह सिर्फ़ नाकाबिलियत नहीं है ; यह न्यायपालिका को नव-फासीवादी एजेंडा के लिए ढाल के तौर पर इस्तेमाल करने की एक सोची-समझी चाल है।

पश्चिम बंगाल में, लोकतंत्र की क्षरण ने एक अनोखा रूप ले लिया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य की नौकरशाही को एक व्यक्तिगत सेना में बदल दिया है। बीडीओ से लेकर डीएम तक, अधिकारी संविधान के बजाय कालीघाट (मुख्यमंत्री के घर) से आदेश लेते हैं। इस प्रशासनिक कमजोरी ने न्यायपालिका को रोज़ाना के काम में दखल देने पर मजबूर कर दिया है, जो राज्य की संस्थाओं में जनता के भरोसे के पूरी तरह से टूटने का संकेत है। जबकि टीएमसी नेतृत्व भाजपा के खिलाफ विरोध का नाटक करती है, उसके प्रशासन का तानाशाही मॉडल आरएसएस के एजेंडे को पूरा करता है। टीएमसी प्रशासनिक पक्षाघात को बढ़ावा दे रही है। वह मतदाता सूचियों को बचाने में नाकाम रही है। इस प्रकार, उसने ही भाजपा को वह ज़मीन दी है, जिसकी उसे आगे बढ़ने के लिए ज़रूरत है। टीएमसी का ‘छद्म-विरोध’ सिर्फ़ नव-फासीवाद का एक क्षेत्रीय रूप है, जो अपना स्थानीय दबदबा बनाए रखने के लिए हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों की कुर्बानी दे रहा है।

फासीवाद के खिलाफ लड़ाई अदालत के कक्षों या विनम्र याचिकाओं तक सीमित नहीं रह सकती। हमें कानूनी चुनौतियों के साथ-साथ लगातार चलने वाले बड़े आंदोलनों को भी जोड़ना होगा। वामपंथ हमेशा से लोकतांत्रिक अधिकारों का अगुआ रहा है। आज, वामपंथी कार्यकर्ताओं को मतदाता सूची में पुनरीक्षण से लेकर मतों की आखिरी गिनती तक सबसे बड़े पहरेदार के तौर पर काम करना होगा। हमें आम आदमी के लिए ‘तार्किक विसंगति’ की धोखाधड़ी को समझना होगा। हमें चुनाव आयोग की स्वायत्तता को फिर से बहाल करने की मांग करनी चाहिए और हर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में उसके तानाशाही रवैये को चुनौती देनी चाहिए। संविधान एक जीती-जागती चीज़ है, लेकिन जब ‘रक्षक’ ही ‘शिकारी’ बन जाते हैं, तो इसे बचाने की ज़िम्मेदारी आम जनता पर ही आ जाती है। ‘संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ’ अब कोई नारा नहीं रहा — यह ज़िंदा रहने की पुकार है। प्रतीकात्मक रैलियों का समय बीत चुका है ; बड़े पैमाने पर नाकाबंदी का समय आ गया है। हमें याद रखना चाहिए कि सत्ता कभी हार नहीं मानती, और जनवादी अधिकार कभी भी उत्पीड़कों से ‘उपहार’ में नहीं मिलते — उन्हें बड़े पैमाने पर संघर्ष की नई, मज़बूत ताकत से ही वापस छीना जा सकता है।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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