स्विट्जरलैंड से लौटने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेज किया जनसंपर्क; बोलीं—‘चुनाव लड़ने नहीं, समाज को लड़वाने आई हूं’, ओपी राजभर से मुलाकात के बाद गरमाई दलित सियासत
राजनीतिक डेस्क, 🌐 tajnews.in | बुधवार, 16 सितंबर 2026, 08:52:15 PM IST

tajnews.in | लखनऊ/मेरठ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति के भीतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण में वर्गीकरण जैसे मुद्दों को लेकर गतिविधियां तेज हो रही हैं। इसी बीच स्विट्जरलैंड से भारत लौटने के बाद डॉ. रोहिणी घावरी ने वाल्मीकि समाज के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी बैठकों और जनसंपर्क कार्यक्रमों ने दलित राजनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
रोहिणी घावरी हालिया कार्यक्रमों में वाल्मीकि समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की मांग उठा रही हैं। मेरठ में उन्होंने कहा कि वाल्मीकि समाज को केवल वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व में भी उसे पर्याप्त भागीदारी मिलनी चाहिए।
‘चुनाव लड़ने नहीं, लड़वाने आई हूं’
रोहिणी घावरी ने अपने हालिया बयानों में कहा है कि फिलहाल उनका खुद चुनाव लड़ने का लक्ष्य नहीं है। उनका कहना है कि वह वाल्मीकि समाज के लोगों को चुनाव लड़ाने और उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए काम करना चाहती हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि जो राजनीतिक दल आरक्षण में वर्गीकरण के साथ वाल्मीकि समाज को टिकट और संगठन में पर्याप्त हिस्सेदारी देने की बात करेगा, उसके साथ राजनीतिक संवाद किया जा सकता है। मेरठ में उनके कार्यक्रमों में वाल्मीकि समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और आरक्षण के मुद्दे प्रमुखता से उठे। आगामी विधानसभा चुनाव में समाज को अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की मांग भी उनके अभियान का हिस्सा है।
ओपी राजभर से मुलाकात के बाद बढ़ी चर्चा
15 सितंबर को रोहिणी घावरी ने उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज पाल सिंह अम्मू भी मौजूद रहे। मुलाकात में आरक्षण में वर्गीकरण और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। ओम प्रकाश राजभर भी लंबे समय से आरक्षण में वर्गीकरण की मांग उठाते रहे हैं। हालांकि इस मुलाकात के बाद किसी राजनीतिक दल के साथ औपचारिक गठजोड़ या समर्थन की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इस मुलाकात को फिलहाल राजनीतिक संवाद के रूप में ही देखा जाना उचित है।
चंद्रशेखर आजाद से पुराना विवाद भी चर्चा में
रोहिणी घावरी की राजनीतिक सक्रियता की चर्चा नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के संदर्भ में भी हो रही है। दोनों पहले एक-दूसरे के संपर्क में रहे हैं। बाद में दोनों के बीच विवाद हुआ और रोहिणी घावरी ने चंद्रशेखर आजाद पर गंभीर आरोप लगाए थे। चंद्रशेखर आजाद की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया गया था।
अब वाल्मीकि समाज के बीच रोहिणी घावरी के बढ़ते संपर्क को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, उनकी सक्रियता का चंद्रशेखर आजाद के राजनीतिक प्रभाव पर वास्तविक असर कितना होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसके लिए उनके संगठनात्मक विस्तार, जमीनी समर्थन और आगामी चुनाव में भूमिका को देखना होगा।
करीब 21 विधानसभा क्षेत्रों में संपर्क का दावा
रोहिणी घावरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित करीब 21 विधानसभा क्षेत्रों में वाल्मीकि समाज के बीच संपर्क बढ़ाने की बात कह रही हैं। इनमें आगरा, मेरठ, गाजियाबाद, अलीगढ़ और कानपुर की कुछ विधानसभा सीटों का भी उल्लेख किया गया है। इससे पहले अप्रैल 2026 में उत्तर प्रदेश में उनके व्यापक जनसंपर्क अभियान की योजना से जुड़ी रिपोर्ट सामने आई थी। उस समय गैर-जाटव दलित समुदायों, विशेषकर वाल्मीकि और पासी समाज के बीच करीब 200 बैठकें करने की योजना बताए जाने की जानकारी सामने आई थी।
चंद्रशेखर आजाद का गोंडा प्रकरण भी चर्चा में
इधर चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक गतिविधियां भी सुर्खियों में रही हैं। सितंबर में गोंडा के कारोबारी विनोद साहनी हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे चंद्रशेखर आजाद को बाराबंकी के रामनगर में पुलिस ने रोक दिया था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चंद्रशेखर आजाद बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ गोंडा जा रहे थे। पुलिस ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्हें आगे जाने से रोका। इस दौरान उनके समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की तथा हंगामे की खबरें सामने आईं। घटना के बाद आजाद समाज पार्टी की ओर से पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए।
पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति में आगे क्या?
रोहिणी घावरी की मौजूदा सक्रियता में वाल्मीकि समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण में वर्गीकरण और संगठन में हिस्सेदारी प्रमुख मुद्दे दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर, चंद्रशेखर आजाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में सक्रिय राजनीतिक चेहरा हैं। ऐसे में रोहिणी घावरी की गतिविधियों को लेकर राजनीतिक चर्चा होना स्वाभाविक है। लेकिन फिलहाल इसे किसी निश्चित चुनावी मुकाबले या राजनीतिक परिणाम के रूप में देखना उचित नहीं होगा। आने वाले महीनों में रोहिणी घावरी की बैठकों, संगठनात्मक नेटवर्क और राजनीतिक दलों के साथ संवाद से उनकी राजनीतिक दिशा अधिक स्पष्ट हो सकती है।
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Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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