Article Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 29 July, 2026, 04:41:


क्या हमारे स्कूल सिर्फ़ कॉकरोच फैक्ट्री ही रहेंगे, या बदलाव की नर्सरी बनेंगे?
— बृज खंडेलवाल
देश की नई पीढ़ी ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) का बहुचर्चित मैदानी आंदोलन तो फिलहाल सड़कों से समाप्त हो गया है, लेकिन इसके बाद गालियों और तीखे अपशब्दों के रूप में जो भाषाई मलबा सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिखरा पड़ा है, उससे अनेक गंभीर और असहज करने वाले सवाल आज वैचारिक अंतरिक्ष में निरंतर भ्रमण कर रहे हैं! अगर हमारे देश के स्कूल सचमुच ज्ञान और शिक्षा के पवित्र मंदिर हैं, तो उनसे पढ़कर निकल रही यह नई युवा पीढ़ी स्वस्थ संवाद, सहिष्णुता और तार्किक विमर्श के बजाय इतनी तेज़ी से नफ़रत, असहिष्णुता और अपशब्दों की विकृत भाषा कहाँ से और क्यों सीख रही है?
यह सवाल केवल एक शैक्षणिक संस्था का नहीं है; यदि सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च करके विशाल स्कूल और बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी जाएँ, लेकिन फिर भी कक्षा का बच्चा एक साधारण पैराग्राफ भी ठीक से न पढ़ सके, तो फिर ऐसी खोखली शिक्षा व्यवस्था का क्या अर्थ रह जाता है? अगर हमारे सरकारी स्कूल सचमुच बुनियादी रूप से बेहतर और सक्षम हैं, तो देश के लाखों मध्यमवर्गीय और गरीब माता-पिता हर साल अपनी क्षमता से बाहर जाकर उन्हें छोड़कर महंगे निजी स्कूलों की शरण में जाने को क्यों मजबूर हो रहे हैं? और अगर हमारी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था सही और पारदर्शी रास्ते पर अग्रसर है, तो हाल ही में देश के हजारों युवा जंतर-मंतर की सड़कों पर नीट (NEET) परीक्षा में हुई गंभीर गड़बड़ियों के खिलाफ विधिक न्याय, पारदर्शिता और कड़े प्रशासनिक सुधारों की मांग लेकर इस तरह बेखौफ क्यों उतर आए? ये तीनों अलग-अलग छिटपुट सवाल नहीं हैं। ये असल में हमारी समूची व्यवस्था को लगी एक ही गंभीर बीमारी के तीन अलग-अलग प्रत्यक्ष लक्षण हैं। यह बीमारी हमारे स्कूलों की बेजान इमारतों में नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा की बुनियादी सोच में है। सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं, उस समूचे समाज का है जिसे हमारे ये स्कूल रोज गढ़ रहे हैं।
आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की ताज़ा प्रामाणिक रिपोर्ट इस बेचैन करने वाली कड़वी सच्चाई की मुकम्मल पुष्टि करती है। भारत की स्कूली शिक्षा आज एक ऐसे ऐतिहासिक और संवेदनशील मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ कागजों पर कुछ दिखावटी उपलब्धियां भले नज़र आती हैं, लेकिन धरातल पर उनसे कहीं बड़े संकट हमारी व्यवस्था को मुँह चिढ़ाते दिखते हैं। एक तरफ जहाँ कुछ कागजी सुधार होते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक व्यवस्था की कोई दूसरी भयावह कमजोरी पूरी प्रणाली को खींचकर पीछे धकेल देती है।
रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल नामांकित छात्रों की संख्या 24.80 करोड़ से घटकर 24.72 करोड़ रह गई है। चिंताजनक तथ्य यह है कि अकेले सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चे कम हुए हैं, जबकि भारी-भरकम फीस वाले निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े हैं। बेबस माता-पिता अपने इस आर्थिक फैसले से प्रशासनिक तंत्र को साफ संदेश दे रहे हैं। केवल एक ही वर्ष के भीतर देश भर में 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल ताला बंद होकर हमेशा के लिए खत्म हो गए। सामाजिक रूप से पिछड़े अनुसूचित जाति (SC) के विद्यार्थियों का कुल नामांकन भी घटा है। आज भी स्वतंत्र भारत में एक लाख से अधिक सरकारी स्कूल केवल एक अकेले शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं, जहां लगभग 34 लाख मासूम बच्चों को एक साथ एक ही कमरे में कई अलग-अलग कक्षाओं की पढ़ाई मजबूरी में कराई जाती है।
लेकिन देश की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा और जानलेवा संकट स्कूल की बेजान इमारतों या चहारदीवारी में नहीं, बल्कि कक्षाओं के भीतर दी जा रही पढ़ाई के स्तर में है। प्रथम संस्था की एएसईआर (ASER) 2024 की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि कोरोना महामारी के दौर के बाद कुछ बुनियादी सुधार जरूर दर्ज हुए हैं, परंतु स्थितियां अभी भी अत्यधिक चिंताजनक और दयनीय बनी हुई हैं। कक्षा तीन में पढ़ने वाले देश के केवल लगभग एक चौथाई (25%) बच्चे ही कक्षा दो की आसान पाठ्यपुस्तक को ठीक से पढ़ पाने में सक्षम हैं। लगभग दो-तिहाई (66%) बच्चे साधारण घटाव और जोड़ का गणितीय हिसाब तक नहीं कर पाते। इसके अलावा पारख (PARAKH) और नीति आयोग की संयुक्त रिपोर्टें खुलासा करती हैं कि कक्षा छह के अनेक विद्यार्थी साधारण भिन्न (Fractions) और रोजमर्रा के गणितीय हिसाब में पूरी तरह से फिसड्डी हैं। आठवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते बच्चों के बुनियादी हिंदी व अंग्रेजी पढ़ने की क्षमता भी पहले के वर्षों की तुलना में गिर चुकी है।
इसका सीधा सांख्यिकीय और व्यावहारिक अर्थ यह है कि हमारे बच्चे हर साल केवल परीक्षा पास करके अगली कक्षाओं में प्रमोट तो हो रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे कुछ भी नया और उपयोगी सीख नहीं रहे हैं। उनके हाथों में अगली क्लास का सरकारी प्रमाणपत्र तो मौजूद है, पर भीतर कोई आत्मविश्वास नहीं है। उनकी मार्कशीट पर अंक तो दर्ज हैं, पर उनके पास मौलिक ज्ञान और तार्किक समझ का नामोनिशान नहीं है।
स्कूलों के भीतर बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली कनेक्शन, शौचालय और पेयजल की उपलब्धता बढ़ी है। यह निसंदेह एक स्वागतयोग्य प्रशासनिक कदम है। लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि देश के हजारों स्कूलों में आज भी बच्चों के खेलने के लिए कोई खेल का मैदान नहीं है, दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप या विशेष शौचालय की विधिक सुविधाएं नहीं हैं, कंप्यूटर रूम धूल फांक रहे हैं और हाई-स्पीड इंटरनेट केवल सरकारी फाइलों के दावों में ही मौजूद है।
शिक्षा बजट पर सरकारी खर्च के आंकड़े भी गहरे संकट की गवाही देते हैं। पिछले एक दशक के दौरान केंद्रीय बजट में शिक्षा की कुल हिस्सेदारी लगातार घटी है। इस कम वित्तीय निवेश का सीधा प्रतिकूल असर नए शिक्षकों की पारदर्शी नियुक्तियों, उनके गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और क्लासरूम पढ़ाई के स्तर पर पड़ता है। कंक्रीट की इमारतें तो बजट जारी करके जल्दी बनाई जा सकती हैं, लेकिन किसी व्यवस्था पर जनता का भरोसा बहुत धीरे-धीरे और निष्ठा से बनता है।
आज देश की संपूर्ण स्कूली शिक्षा मुख्य रूप से पांच बड़ी गंभीर बीमारियों से बुरी तरह जूझ रही है। सबसे पहली और घातक बीमारी है—छात्रों की बेहद कमजोर सीखने की क्षमता (Learning Outcome Crisis)। बच्चे वर्षों तक नियमित स्कूल जाते हैं, लेकिन फिर भी पढ़ना, लिखना और प्राथमिक गणित तक ठीक से नहीं सीख पाते। दूसरी सबसे बड़ी समस्या है—बीच रास्ते में पढ़ाई छोड़ देना (Dropout Rate)। पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले मासूम बच्चों में से लगभग आधे बच्चे बारहवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते व्यवस्था से पूरी तरह बाहर हो जाते हैं। तीसरी बड़ी चुनौती है—योग्य शिक्षकों की भारी और भयावह कमी। एक लाख से अधिक स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के सहारे सांस ले रहे हैं। चौथी बीमारी है—हमारी शिक्षा व्यवस्था का संस्थागत बिखराव। देश में प्राथमिक स्कूल तो बहुत हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के स्कूल बेहद कम हैं, जिससे बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है और उनकी पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है। पाँचवीं चुनौती है—गहरी सामाजिक और क्षेत्रीय असमानता। राज्यों, आय वर्गों और सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा के स्तर में जमीन-आसमान का अंतर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की सीखने की क्षमता आज भी बहुत पीछे छूटी हुई है।
समस्या केवल यहीं पर खत्म नहीं होती। देश में दर्जनों अलग-अलग शिक्षा बोर्ड, विरोधाभासी पाठ्यक्रम और परस्पर विरोधी परीक्षा प्रणालियां एक साथ संचालित हो रही हैं। सीबीएसई (CBSE), सीआईएससीई (CISCE), एनआईओएस (NIOS), विभिन्न राज्यों के स्टेट बोर्ड, संस्कृत बोर्ड, मदरसा बोर्ड और कई अंतरराष्ट्रीय बोर्ड; सब बिना किसी तालमेल के अपनी-अपनी दिशा में भाग रहे हैं। यह स्थिति शैक्षणिक विविधता कम और छात्रों के दिमाग में भ्रम ज्यादा पैदा करती है।
भारत का एक आम छात्र अपनी जिंदगी के लगभग पच्चीस वर्ष केवल और केवल किसी न किसी परीक्षा की तैयारी करने में ही होम कर देता है। पहले स्कूल बोर्ड, फिर कॉलेज प्रवेश, फिर प्रतियोगी परीक्षाएं और अंत में नौकरी का इंटरव्यू। इस अंधी दौड़ में जीवन जीने की वास्तविक कला, आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking), रचनात्मकता (Creativity) और जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढने जैसे बुनियादी मानवीय कौशल बहुत पीछे छूट जाते हैं।
नीट (NEET) परीक्षा को लेकर जंतर-मंतर की सड़कों पर देश के युवाओं का जो प्रचंड गुस्सा दिखाई दिया, वह अचानक एक दिन में नहीं फूटा था। उसकी असली शुरुआत तो उन बेजान कक्षाओं में सालों पहले हुई थी जहाँ बच्चों को समझने के बजाय केवल रटना सिखाया गया। उस गुस्से की नींव उन महंगे कोचिंग सेंटरों में पड़ी, जिनके विज्ञापनों पर सरकारी स्कूलों से ज्यादा सामाजिक भरोसा पैदा हो गया। और वह आक्रोश उन असहाय घरों में उपजा, जहाँ माता-पिता अपने बच्चों के अनिश्चित भविष्य पर अपनी जिंदगी भर की सारी जमा-पूंजी दांव पर लगाने को मजबूर हैं।
हमारा भारत कभी नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात ज्ञान परंपराओं का वैश्विक केंद्र हुआ करता था। आज भी आईआईटी (IIT) और कुछ गिने-चुने शीर्ष संस्थान दुनिया भर में अपना लोहा मनवाते हैं। लेकिन हमारी संपूर्ण प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था आज तक उस मानक तक नहीं पहुँच सकी, जिसकी उम्मीद विश्व की एक उभरती हुई महाशक्ति से की जाती है। भारत को आज केवल कागजों पर अधिक संख्या में स्कूलों की जरूरत नहीं है, बल्कि बेहतर और सक्षम स्कूलों की जरूरत है। केवल अधिक दाखिलों के आंकड़ों की नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों की जरूरत है। केवल साल में दर्जनों परीक्षाओं की नहीं, बल्कि जीवन को समृद्ध बनाने वाली सच्ची शिक्षा की जरूरत है।
देश की नई ‘जेन ज़ी’ अपना स्पष्ट फैसला सुना चुकी है। वह सड़कों पर उतरकर व्यवस्था से तीखे सवाल पूछ चुकी है। अब असली परीक्षा हमारी सरकारों, नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और समूचे भारतीय समाज की है। देश का हर युवा छात्र आज अपनी सरकार से केवल एक ही सीधा सवाल पूछ रहा है—क्या हमारी यह शिक्षा प्रणाली हमें जीवन की वास्तविक लड़ाइयों के लिए तैयार करेगी, या केवल अगली परीक्षा में पास होने का एक बेजान प्रमाणपत्र थमाएगी? इसी एक सवाल के जवाब पर भारत के भविष्य का अंतिम फैसला निर्भर करेगा। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
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Pawan Singh
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