बदलते मौसम और सामाजिक उपेक्षा की दोहरी मार झेल रहे देश के बुजुर्ग: हैल्पेज इंडिया की राष्ट्रीय रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे, सरकारी योजनाएं बनीं सहारा

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Agra Desk, 🌐 tajnews.in | Updated: Tuesday, 16 June 2026, 09:10:14 PM IST

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आगरा: ‘वर्ल्ड एल्डर एब्यूज अवेयरनेस डे’ के अवसर पर देश की अग्रणी गैर-लाभकारी संस्था हैल्पेज इंडिया ने नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अपनी नई विस्तृत रिपोर्ट, ‘क्लाईमेट रेजिलिएंट एजिंग – एन्श्योरिंग केयर, डिग्निटी एंड एजेंसी’ जारी की है[cite: 1]। इस रिपोर्ट के माध्यम से भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बढ़ती उम्र के साथ बदलती जलवायु और सामाजिक उपेक्षा के गंभीर प्रभावों को उजागर किया गया है[cite: 1]। रिपोर्ट के आधिकारिक विमोचन कार्यक्रम में सरकार, समाज, शिक्षा जगत और मीडिया के प्रमुख हितधारकों ने हिस्सा लिया[cite: 1]। कार्यक्रम में संस्था की गवर्निंग बॉडी के चेयरपर्सन किरण कर्णिक, वाईस चेयरपर्सन रुमझुम चटर्जी और भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सेक्रेटरी अमरजीत सिन्हा ने मुख्य वक्ता के रूप में अपनी बात रखी[cite: 1]। उनके साथ प्रतिष्ठित कलाकार और हैल्पेज इंडिया की ऑनरेरी ब्रांड एम्बेसडर शर्मिला टैगोर भी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहीं[cite: 1]। इस राष्ट्रीय रिपोर्ट के लिए देश के 10 राज्यों के 20 जिलों में 2,224 बुजुर्गों का सघन सर्वे किया गया है, जिसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं[cite: 1]।

HIGHLIGHTS
  1. बड़ा राष्ट्रीय सर्वे: हैल्पेज इंडिया ने 10 राज्यों के 2,224 बुजुर्गों पर किया अध्ययन, मौसम और सामाजिक अकेलेपन का दिखा गहरा असर[cite: 1]।
  2. मौसम की मार: सर्वे में शामिल 78% बुजुर्गों ने पिछले तीन वर्षों में कम से कम एक बड़े मौसम संबंधी खतरे (लू, बाढ़ या सूखा) का सामना किया[cite: 1]।
  3. सुरक्षा घेरा गायब: देश के 52% बुजुर्ग वित्तीय तंगी के कारण आवश्यक दवाएं खरीदने में पूरी तरह असमर्थ, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भरता[cite: 1]।
  4. पारिवारिक ताना-बाना: लगभग 73% बुजुर्ग बच्चों या रिश्तेदारों के साथ रहते हैं, लेकिन युवाओं के रोजगार हेतु पलायन से अकेलेपन का संकट बढ़ा[cite: 1]।

अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार, भारत के ग्रामीण अंचलों में मौसम परिवर्तन का बुजुर्गों पर बहुत गहरा और सीधा असर हो रहा है[cite: 1]। इंटरसेक्शनल प्लेस पर्सपेक्टिव (IPP) फ्रेमवर्क के विश्लेषण से पता चलता है कि बुजुर्गों पर मौसम का प्रभाव केवल उनकी उम्र पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उनका जेंडर, शारीरिक अक्षमता, गरीबी और रहने की व्यवस्था भी उनकी लाचारी को बढ़ा देती है[cite: 1]। सर्वे में शामिल 78 प्रतिशत बुजुर्गों ने माना कि उन्हें पिछले तीन सालों में कम से कम एक मौसम संबंधी प्राकृतिक संकट से जूझना पड़ा है[cite: 1]। इनमें से 45 प्रतिशत बुजुर्ग भीषण लू (हीटवेव), 27 प्रतिशत बाढ़ और 20 प्रतिशत सूखे के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुए[cite: 1]। इस खतरे का सामना करने वाले एक तिहाई बुजुर्गों पर इसका मानसिक व शारीरिक प्रभाव बहुत गहरा दर्ज किया गया[cite: 1]। सबसे ज्यादा पीड़ित होने वाले बुजुर्गों में 13 प्रतिशत अकेले रहने वाले, 33 प्रतिशत विधवा महिलाएं और 28 प्रतिशत ऐसे वृद्ध शामिल हैं जिनकी उम्र 80 वर्ष या उससे अधिक है[cite: 1]।

हैल्पेज इंडिया के सीईओ रोहित प्रसाद ने इस संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मौसम के बढ़ते खतरे का सबसे अधिक नुकसान उन बुजुर्गों को होता है जो अकेले रहते हैं या चलने-फिरने में असमर्थ हैं[cite: 1]। इसके बावजूद वर्तमान आपदा प्रबंधन नीतियों में बुजुर्गों पर केंद्रित उपायों का स्पष्ट अभाव दिखता है[cite: 1]। भीषण गर्मी के दौर में कच्चे या कम वेंटिलेशन वाले घरों में रहने वाले 60 प्रतिशत बुजुर्गों ने स्वीकार किया कि उनके मकान पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं[cite: 1]। लू के दौरान 90 प्रतिशत बुजुर्ग घरों के अंदर ही सिमटे रहते हैं और 81 प्रतिशत अत्यधिक पानी पीकर काम चलाते हैं, फिर भी 74 प्रतिशत मामलों में बीमारी बढ़ जाती है और 33 प्रतिशत के लिए स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करना बेहद मुश्किल हो जाता है[cite: 1]। स्वास्थ्य के स्तर पर देश के लगभग आधे बुजुर्ग किसी न किसी लंबी अक्षमता के साथ जी रहे हैं, जिनमें 32 प्रतिशत को चलने-फिरने और 24 प्रतिशत को दृष्टि की गंभीर समस्या है[cite: 1]। इसके बावजूद 52 प्रतिशत बुजुर्ग अपनी रोजमर्रा की दवाएं खरीदने में पूरी तरह असमर्थ हैं[cite: 1]।

ग्रामीण भारत में बुजुर्गों की निर्भरता के संबंध में पॉलिसी रिसर्च की हेड अनुपमा दत्ता ने बताया कि एक बड़ी संख्या में बुजुर्ग, जिनकी शिक्षा और आर्थिक बचत न के बराबर है, पूरी तरह सरकारी कल्याण योजनाओं और परिवार के सहयोग पर ही आश्रित हैं[cite: 1]। वर्तमान में 73 प्रतिशत बुजुर्ग अपने बच्चों या रिश्तेदारों के साथ रहते हैं और 94 प्रतिशत को पारिवारिक देखभाल मिल रही है, जिसमें मुख्य रूप से बेटों (31 प्रतिशत), जीवनसाथियों (30 प्रतिशत) और बहुओं (17 प्रतिशत) की भूमिका है[cite: 1]। हालांकि, रोजगार की तलाश में युवाओं के पलायन ने इस ताने-बाने को कमजोर किया है[cite: 1]। करीब 18 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में से बेटे (76 प्रतिशत) काम के सिलसिले में दूसरी जगह चले जाते हैं, जिससे बुजुर्गों को मिलने वाली तात्कालिक केयर खत्म हो जाती है[cite: 1]। जो बुजुर्ग बिल्कुल अकेले रह जाते हैं, उनमें से 38 प्रतिशत को पड़ोसियों पर और 20 प्रतिशत को दूर रहने वाले रिश्तेदारों पर निर्भर रहना पड़ता है, जबकि 16 प्रतिशत बुजुर्गों को कोई भी देखभाल करने वाला उपलब्ध नहीं है, जिससे वे डिप्रेशन और अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं[cite: 1]।

आर्थिक मोर्चे पर देश के 55 प्रतिशत बुजुर्गों के पास कोई खेती की जमीन नहीं है और लगभग आधे बुजुर्गों की आय का एकमात्र साधन केवल सरकारी या निजी पेंशन है[cite: 1]। 25 प्रतिशत बुजुर्ग स्वयं खेती करते हैं और 13 प्रतिशत खेत मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं[cite: 1]। वहीं, 16 प्रतिशत बुजुर्गों के पास न तो कोई शारीरिक काम है और न ही कोई स्वतंत्र कमाई[cite: 1]। राहत की बात यह है कि देश के बुजुर्गों में सरकारी कल्याण योजनाओं को लेकर जागरूकता का स्तर काफी ऊंचा है[cite: 1]। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के बारे में 93 प्रतिशत, वृद्धावस्था पेंशन को लेकर 71 प्रतिशत और आयुष्मान भारत (PM-JAY) जैसी रियायती स्वास्थ्य योजनाओं के बारे में 67 प्रतिशत बुजुर्ग पूरी तरह जागरूक हैं और इनका नियमित लाभ उठा रहे हैं[cite: 1]। हालांकि, मिशन हेड गिरीश मिश्रा ने कहा कि इस बदलते दौर में बुजुर्गों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी आपदा प्रबंधन और स्थानीय समाधानों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि वे केवल आश्रित न रहकर आत्मनिर्भर और सहनशील समाज के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दे सकें[cite: 1]।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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