Opinion Desk, Taj News | Thursday, June 11, 2026, 02:45:12 PM IST


एवं सामाजिक विश्लेषक
धार्मिक स्थलों को उन्मादी भीड़ से बचाओ: तीर्थ स्थान या थीम पार्क?
रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?
— बृज खंडेलवाल
क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से? क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी? इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।
भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था। लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।
कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ। हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि “चेक-इन” करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं। इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है? प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।
हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है। भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है। एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया। यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।
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कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए? शायद नहीं। देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी होनी चाहिए।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा। युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए। लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है। कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।
आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह “टच एंड गो” संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है। यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी। तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है। जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।

Pawan Singh
7579990777



