डिग्रियों का ढेर, ज्ञान का अकाल: भारत के क्लासरूम में आखिर हो क्या रहा है?

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Article Desk, Taj News | Saturday, May 23, 2026, 01:15:20 PM IST

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार
एवं सामाजिक विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक विश्लेषक बृज खंडेलवाल ने देश की वर्तमान परीक्षा केंद्रित व्यवस्था, गिरते हुए शैक्षणिक स्तर और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों के नीतिगत खोखलेपन पर यह तीखा आलेख तैयार किया है। यह रपट डिग्रियों की होड़ के बीच दम तोड़ती वास्तविक मेधा और क्लासरूम के कड़वे सच को सामने लाती है।
HIGHLIGHTS
  1. रिपोर्ट कार्ड चमक रहे हैं, शिक्षा दम तोड़ रही है; देश में रटंत प्रणाली के चलते वास्तविक समझ का घोर अकाल पड़ा हुआ है।
  2. बीएड (B.Ed.) और प्रशिक्षण संस्थान केवल फाइलें भरने तक सीमित, वास्तविक क्लासरूम की चुनौतियों से निपटने में नए शिक्षक पूरी तरह असहाय।
  3. महंगे एलीट स्कूलों में भी कम वेतन पर काम कर रहे अनुभवहीन शिक्षक; सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा के अभाव में प्रतिभाओं की दूरी।
  4. बदलते सामाजिक परिवेश और मोबाइल की लत के चलते गुरु-शिष्य परंपरा में घटता सम्मान और जवाबदेही व्यवस्था के लिए गंभीर खतरे की घंटी।

डिग्रियों का ढेर, ज्ञान का अकाल: भारत के क्लासरूम में आखिर हो क्या रहा है?

रिपोर्ट कार्ड चमक रहे हैं, शिक्षा दम तोड़ रही है
जब शिक्षक ही तैयार नहीं, तो बच्चे क्या सीखेंगे?

— बृज खंडेलवाल

एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है। स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को स्पेलिंग पढ़ा रहे थे : “Girl बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?” मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, गर्ल को ग्रिल्ड ही पढ़ाऊंगा।”

यह सिर्फ मज़ाक नहीं। यह उस टूटती हुई व्यवस्था की कहानी है, जहां शिक्षक भी हताश है और छात्र भी भटक रहा है। एक अंग्रेज़ी शिक्षक खुद ढंग से अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता, लेकिन बच्चों को ग्रामर पढ़ा रहा है। मई की तपती दोपहर में साठ बच्चों की क्लास में पंखा बंद पड़ा है। बच्चे कॉपियों से हवा कर रहे हैं। बी.एड. में टॉप करने वाला नया शिक्षक पहली ही क्लास में शोर मचाते बच्चों के सामने घबरा जाता है।

मां-बाप शादी में गुरुजनों के पैर छूते हैं, लेकिन स्कूल में टीचर की सैलरी पर ऐसे मोलभाव करते हैं जैसे सब्ज़ी खरीद रहे हों। यही है आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कड़वा विरोधाभास। जिस देश में सरस्वती की पूजा होती है, वहीं शिक्षक धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है। डिग्रियां बढ़ रही हैं। कोचिंग सेंटर हर गली में उग रहे हैं। चमचमाते स्कूलों के विज्ञापन आसमान छू रहे हैं। लेकिन असली शिक्षा जेठ की धूप में सूखते तालाब की तरह सिकुड़ती जा रही है।

कभी भारत में शिक्षक सिर्फ नौकरीपेशा कर्मचारी नहीं था। गांव का “मास्टरजी” समाज का नैतिक स्तंभ माना जाता था। बच्चे उनसे डरते भी थे और सम्मान भी करते थे। मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई ही नहीं, संस्कार भी शिक्षक के भरोसे छोड़ देते थे। आज वह सम्मान चॉक की धूल की तरह हवा में उड़ रहा है।

भारत एक गहरे शैक्षणिक संकट से गुजर रहा है। कमजोर शिक्षक प्रशिक्षण, रटंत शिक्षा, गिरता स्तर, घटती सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रेरणाहीन कक्षाओं ने शिक्षण पेशे को भीतर से खोखला कर दिया है। यह अब सिर्फ शिक्षा विभाग की समस्या नहीं रही। यह देश के भविष्य का संकट बन चुकी है।

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सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि देश में लाखों शिक्षक भारी-भरकम डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं : बी.एड., एम.एड., डिप्लोमा, सर्टिफिकेट, लेकिन उनमें से कई के पास न विषय की गहराई है, न पढ़ाने की कला, न आत्मविश्वास, न संवाद क्षमता। डिग्रियां दीवार पर टंगी रहती हैं, लेकिन क्लासरूम में शिक्षक असहाय दिखता है। सिर्फ डिग्री हासिल कर लेना किसी को अच्छा शिक्षक नहीं बना देता। मगर हमारी व्यवस्था इसी भ्रम में जी रही है।

सरकारी स्कूलों की हालत कई जगह बेहद चिंताजनक है। अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले कई शिक्षक खुद धाराप्रवाह अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते। उच्चारण कमजोर है। शब्दावली सीमित है। साहित्य पढ़ने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है। बच्चे तोते की तरह उत्तर रट लेते हैं, लेकिन सामान्य सवालों पर चुप हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण स्कूल का निरीक्षण करने गए एक रिटायर्ड अफसर ने बताया कि वहां का अंग्रेज़ी शिक्षक खुद सामान्य बातचीत तक नहीं कर पा रहा था। बच्चे पूरे पैराग्राफ याद करके सुना रहे थे, लेकिन अपने दम पर दो वाक्य नहीं बना पा रहे थे। यह शिक्षा नहीं। यह रटी हुई नकल का कारखाना है।

समस्या सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं। बड़े-बड़े “इंटरनेशनल” और “स्मार्ट” स्कूल भी कई बार चमकदार पैकेजिंग भर साबित होते हैं। वहां कम वेतन पाने वाले, अनुभवहीन और असुरक्षित शिक्षक काम कर रहे हैं। कई शिक्षकों की तनख्वाह मॉल कर्मचारियों या डिलीवरी बॉय से भी कम है। जिस पेशे में सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों न हों, वहां प्रतिभाशाली लोग क्यों आएंगे? कभी शिक्षक बनना गर्व की बात थी। आज कई लोग मजबूरी में इस पेशे में आते हैं, क्योंकि दूसरी नौकरी नहीं मिली।

सबसे गहरी बीमारी हमारी शिक्षण पद्धति में है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज भी जिज्ञासा को अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है। रचनात्मकता परीक्षा के ढांचे में फिट नहीं बैठती। शिक्षक बोलता रहता है। छात्र कॉपी करते रहते हैं। परीक्षा याददाश्त को मापती है, समझ को नहीं। नतीजा यह है कि बच्चे डिग्रियां तो ले आते हैं, लेकिन आत्मविश्वास, संवाद क्षमता और स्वतंत्र सोच विकसित नहीं हो पाती। कई पढ़े-लिखे युवा ठीक से ईमेल नहीं लिख पाते, इंटरव्यू में बात नहीं कर पाते और व्यावहारिक समस्याओं का हल नहीं ढूंढ पाते।

त्रासदी की शुरुआत तो शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से ही हो जाती है। बी.एड. कॉलेजों में आज भी फाइलें भरने और सैद्धांतिक बातें रटाने पर ज़ोर है। वास्तविक क्लासरूम की चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। दिल्ली की एक प्रशिक्षु शिक्षिका ने कहा, “बी.एड. ने मुझे लेसन प्लान बनाना सिखाया, लेकिन कमजोर बच्चे को पढ़ाना या शोरगुल वाली क्लास संभालना नहीं सिखाया।” यही एक वाक्य पूरे संकट की तस्वीर पेश कर देता है। इंटर्नशिप कई जगह सिर्फ औपचारिकता बन चुकी है। अनुभवी शिक्षकों से मार्गदर्शन कमजोर है। नए शिक्षक बिना तैयारी के क्लास में पहुंच जाते हैं।

उधर स्कूलों का बुनियादी ढांचा भी हालात बिगाड़ रहा है। भीड़भाड़ वाली कक्षाएं। टूटी बेंचें। खाली लाइब्रेरियां। इंटरनेट की कमी। शिक्षकों की भारी कमी। एक ही शिक्षक कई क्लासें संभाल रहा है। ऐसे माहौल में व्यक्तिगत शिक्षा संभव ही नहीं। सामाजिक बदलावों ने भी स्थिति को उलझाया है। पश्चिमी सोच की नकल करते हुए हमने कई जगह शिक्षक और छात्र के रिश्ते में अनुशासन का महत्व ही कम कर दिया। “टीचर सिर्फ दोस्त हो” वाली सोच ने सम्मान और जवाबदेही दोनों को कमजोर किया है।

कई शिक्षक निजी बातचीत में मानते हैं कि आज छात्रों में शिक्षकों और यहां तक कि माता-पिता के प्रति भी सम्मान घटता जा रहा है। मोबाइल की लत, घटती पढ़ने की आदत और सिकुड़ती ध्यान क्षमता ने समस्या और बढ़ा दी है। गांव का वह सख्त लेकिन समर्पित “मास्टरजी” अब धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब हो रहा है। और जब शिक्षक का अधिकार कमजोर पड़ता है, तो क्लासरूम दिशा खो देता है।

समाधान मुश्किल नहीं, लेकिन राजनीतिक भाषणों से नहीं आएंगे। शिक्षक प्रशिक्षण को फाइलों और औपचारिक भाषणों से निकालकर वास्तविक क्लासरूम से जोड़ना होगा। लंबी इंटर्नशिप, अनुभवी शिक्षकों की मेंटरशिप, नियमित प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास जरूरी हैं। भर्ती में सिर्फ परीक्षा अंक नहीं, बल्कि संवाद क्षमता, विषय ज्ञान, भावनात्मक समझ और पढ़ाने की प्रतिभा को महत्व देना होगा। शिक्षकों को बेहतर वेतन, सामाजिक सम्मान और स्पष्ट करियर रास्ते देने होंगे। स्कूलों में लाइब्रेरी, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।

सबसे जरूरी बात यह है कि भारत को शिक्षा को सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का खेल समझना बंद करना होगा। शिक्षा आखिरकार इंसानों द्वारा इंसानों को गढ़ने की प्रक्रिया है। कोई भी देश अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकता। अगर भारत ने अपने शिक्षक, अपनी शिक्षण पद्धति और अपने क्लासरूम को बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो “शिक्षा महाशक्ति” बनने का सपना सरकारी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा, जबकि देश की असली कक्षाएं चुपचाप टूटती रहेंगी।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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