चीन चैंपियन क्यों बना?
भारत में लोकतंत्र का चुनावी जाल और विकास की धीमी चाल
क्या वोट बैंक की राजनीति ने भारत की विकास यात्रा को लंगड़ा बना दिया है?
हर चुनाव में पीएम की साख दांव पर!
— बृज खंडेलवाल
एक चुनाव खत्म।
दूसरे की तैयारी शुरू。
पोस्टर अभी उतरे नहीं कि नए बैनर छपने लगे。
माइक ठंडे नहीं हुए कि अगली रैली की तारीख तय हो गई। सरकारें फाइलों से ज्यादा चुनावी गणित में डूबी हुई हैं। देश स्थायी “इलेक्शन मोड” में जी रहा है। किसी को नाराज नहीं करना। हर जाति चाहिए। हर बिरादरी चाहिए। हर वोट चाहिए。
कल तक जो नेता एक दूसरे को लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे थे, आज साथ मंच साझा कर रहे हैं। रातों रात दोस्त दुश्मन बन जाते हैं। दुश्मन गले लग जाते हैं। बयान थूक कर चाट लिए जाते हैं। विचारधारा अब मौसम की तरह बदलती है।
और इस बीच देश?
वह ट्रैफिक में फंसा खड़ा है। भारत में सरकारें बदलती रहती हैं। नारे बदलते हैं। योजनाओं के नाम बदलते हैं। लेकिन क्या शासन बदलता है?
यही असली सवाल है。
और शायद यहीं भारत की विकास कहानी लड़खड़ा जाती है। दुनिया के सामने आज दो मॉडल खड़े हैं。
एक चीन, जिसने गरीबी से निकलकर दुनिया की फैक्ट्री, इंफ्रास्ट्रक्चर महाशक्ति और टेक्नोलॉजी ताकत बनने तक का सफर तय कर लिया。
दूसरा भारत, जहां हर फैसले के पीछे चुनावी कैलकुलेटर बैठा रहता है।
यहां सड़क से ज्यादा सीटों की चिंता होती है। नीति से ज्यादा जाति की। भविष्य से ज्यादा अगले चुनाव की。
भारत में “गवर्नमेंट” बहुत है, “गवर्नेंस” कम। सरकार यानी कुर्सी पर बैठे लोग। गवर्नेंस यानी फैसले लेने, उन्हें लागू करने और व्यवस्था चलाने की क्षमता। और जब फैसले ले लिए जाएं तब अदालतें समीक्षात्मक कार्यवाही करें। बस यहीं भारत बार बार अटक जाता है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब एशिया और अफ्रीका के देश आजाद हुए, तब लगभग सबकी हालत खराब थी। गरीबी, बीमारी, टूटी अर्थव्यवस्था, कम शिक्षा। दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, चीन, मलेशिया, वियतनाम: सब कभी गरीब थे। लेकिन उन्होंने कठिन फैसले लिए। दशकों तक अनुशासन बनाए रखा। शिक्षा, उद्योग, निर्यात और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया।
भारत ने भी कोशिश की। लेकिन यहां राजनीति अक्सर अर्थव्यवस्था के ऊपर बैठ गई।
भारत में हर नीति के पीछे पहला सवाल होता है: “वोट मिलेगा या नहीं?”
अगर अतिक्रमण हटाना हो, तो वोट बैंक नाराज हो सकता है। अगर बिजली चोरी रोकनी हो, तो चुनाव प्रभावित हो सकता है। अगर मुफ्त योजनाएं सीमित करनी हों, तो विपक्ष हमला कर देगा। अगर कृषि, श्रम, जनसंख्या, प्रदूषण या शहरी नियोजन पर कठोर कदम उठाने हों, तो राजनीतिक जोखिम बढ़ जाता है।
नतीजा?
फैसले टलते रहते हैं। समस्याएं बढ़ती रहती हैं। देश अवसर खोता रहता है。
चीन ने 1978 के बाद बाजार आधारित सुधार किए। विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया। उद्योगों को बढ़ाया। करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। वहां लोकतंत्र नहीं था, इसलिए शासन में निरंतरता थी। हर नीति रोज टीवी डिबेट और चुनावी रैली में नहीं फंसती थी।
भारत में हाईवे कोर्ट में फंस जाते हैं। फैक्ट्रियां आंदोलनों में अटक जाती हैं। मेट्रो परियोजनाएं वर्षों खिंचती रहती हैं। और नेता अगले चुनाव की रणनीति में लगे रहते हैं。
लोकतंत्र जरूरी है। बहुत जरूरी है。
लेकिन क्या चुनावी उन्माद विकास को खा रहा है? यह सवाल अब खुलकर पूछा जाना चाहिए।
दक्षिण कोरिया ने शिक्षा को राष्ट्रीय मिशन बनाया。
सिंगापुर ने मेरिट और अनुशासन को सर्वोच्च रखा。
ताइवान ने टेक्नोलॉजी पर दांव लगाया。
वियतनाम ने युद्ध के बाद भी व्यावहारिक आर्थिक सुधार किए。
भारत में?
यहां विश्वविद्यालय कई बार राजनीति के अखाड़े बन गए。
शहर बिना योजना के फैलते गए。
मुफ्त योजनाओं की बारिश होती रही。
और राष्ट्र निर्माण धीरे धीरे “इलेक्शन मैनेजमेंट” में बदलता गया।
आज भारत में ऐसा लगता है जैसे शासन नहीं, लगातार चुनाव चल रहे हों।
पंचायत चुनाव। नगर निगम। विधानसभा। लोकसभा। उपचुनाव। गठबंधन। जातीय समीकरण।
नीति की उम्र यहां अक्सर चुनावी मौसम से ज्यादा नहीं होती。
भारत ने 1991 के बाद प्रगति तो की। लेकिन विकास असमान और अव्यवस्थित रहा। शहर अराजक होते गए। प्रदूषण बढ़ा। ट्रैफिक विकराल हुआ। प्रशासनिक सुस्ती और राजनीतिक हिचकिचाहट विकास की रफ्तार को खाती रही।
भारत का लोकतंत्र जीवंत है। लेकिन शासन दिशाहीन है। भारत को यह जरूर समझना होगा कि विकास केवल चुनाव जीतने से नहीं आता। विकास आता है दीर्घकालिक सोच, संस्थागत क्षमता और कठिन फैसलों से。
हर चीज वोट बैंक से नहीं चल सकती。
अगर हर नीति का लक्ष्य केवल अगला चुनाव होगा, तो अगली पीढ़ी हार जाएगी。
दुनिया की विकास दौड़ में सफल देशों ने साबित किया है कि राष्ट्र निर्माण नारों से नहीं, सक्षम और निरंतर शासन से होता है।
भारत के पास प्रतिभा है। युवा आबादी है। बाजार है। उद्यमिता है। लोकतंत्र है。
जो कमी दिखती है, वह है राजनीतिक साहस। कड़वी दवा से डरने वाला समाज अक्सर लंबी बीमारी झेलता है। भारत को तय करना होगा: क्या हम हमेशा चुनाव लड़ते रहेंगे, या कभी देश भी चलाएंगे?
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: ‘चुनावी चक्रव्यूह’ में फंसा विकास और ‘रेवड़ी संस्कृति’ का घातक जाल
बृज खंडेलवाल जी का यह आलेख भारतीय लोकतंत्र के उस सबसे स्याह पहलू को उजागर करता है, जिस पर अमूमन चर्चा करने से हर राजनीतिक दल बचता है। वह पहलू है—’पॉपुलिज्म’ (Populism) या आसान शब्दों में कहें तो ‘रेवड़ी संस्कृति’। आज़ादी के 75 से अधिक वर्षों बाद भी भारत अगर इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक के मामले में चीन से दशकों पीछे खड़ा है, तो इसका दोष हमारी जनता को नहीं, बल्कि हमारे उस राजनीतिक ढांचे को जाता है जहाँ नीतियां (Policies) 20 साल के विज़न से नहीं, बल्कि अगले 5 महीने में होने वाले चुनावों के लिए बनाई जाती हैं। जब शासक राजनेता के बजाय एक ‘इवेंट मैनेजर’ की तरह सोचने लगे, तो देश की विकास यात्रा का लड़खड़ाना तय है।
स्थायी चुनावी मोड और नीतिगत लकवा (Policy Paralysis):
भारत में चुनाव एक उत्सव नहीं, बल्कि एक ‘स्थायी बीमारी’ बन चुके हैं। कभी पंचायत, कभी नगर निगम, कभी विधानसभा तो कभी लोकसभा—देश का कोई न कोई हिस्सा हमेशा ‘आदर्श आचार संहिता’ (Model Code of Conduct) की चपेट में रहता है। इसका सीधा असर प्रशासन पर पड़ता है। ब्यूरोक्रेसी कोई नया और कड़ा फैसला लेने से डरती है, क्योंकि अगर किसी वर्ग का वोट बैंक नाराज़ हो गया, तो सरकार गिर सकती है। इसी ‘चुनावी थकान’ को दूर करने के लिए ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (One Nation, One Election) की बहस शुरू हुई है। यदि देश में एक साथ चुनाव हों, तो कम से कम 4 साल सरकारें बिना किसी दबाव के केवल सुशासन (Governance) और दीर्घकालिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। बिना कड़े फैसले लिए—चाहे वह श्रम सुधार हों या कृषि सुधार—भारत कभी भी विदेशी निवेशकों के लिए चीन का एक मजबूत विकल्प (China Plus One) नहीं बन पाएगा।
कड़वी दवा और लोकतंत्र का ‘अंधा मोह’:
आलेख में दक्षिण कोरिया और सिंगापुर का जो उदाहरण दिया गया है, वह आंखें खोलने वाला है। ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) ने जब सिंगापुर का निर्माण किया, तो उन्होंने लोकलुभावन फैसलों को किनारे रखकर मेरिट, अनुशासन और कड़े कानूनों को प्राथमिकता दी। इसके विपरीत, हमारे लोकतंत्र में अगर कोई सरकार अतिक्रमण (Encroachment) हटाने जाती है, तो विपक्ष अगले ही दिन धरने पर बैठ जाता है। सड़क चौड़ी करने पर धार्मिक भावनाएं आहत हो जाती हैं। बिजली के बिल की वसूली सख्ती से की जाए, तो उसे जनविरोधी बताकर मुफ्त बिजली बांटने के वादे शुरू हो जाते हैं। यह ‘मुफ्तखोरी की राजनीति’ न केवल राज्य के खज़ाने को खोखला कर रही है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों पर कर्ज का एक ऐसा पहाड़ लाद रही है, जिसके नीचे हमारा बुनियादी ढांचा (Infrastructure) दम तोड़ देगा। विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय या अस्पताल बनाने के बजाय, राजनेता लैपटॉप, साइकिल और नकद पैसे बांटकर सत्ता हासिल करने का शॉर्टकट खोज चुके हैं।
निष्कर्ष: मतदाता की जिम्मेदारी:
चीन की प्रगति का रहस्य केवल उसका तानाशाही ढांचा नहीं है, बल्कि ‘निरंतरता’ (Continuity) और ‘दीर्घकालिक लक्ष्य’ हैं। भारत को चीन जैसी तानाशाही की आवश्यकता नहीं है, लेकिन भारत को एक ‘परिपक्व लोकतंत्र’ (Mature Democracy) की आवश्यकता अवश्य है। यह जिम्मेदारी केवल राजनेताओं की नहीं है; यह जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है। जब तक मतदाता अपनी जाति, धर्म और तात्कालिक लालच के आधार पर वोट देता रहेगा, तब तक राजनेता देश चलाने के बजाय केवल चुनाव जीतने का ही प्रबंधन करते रहेंगे। “कड़वी दवा से डरने वाला समाज अक्सर लंबी बीमारी झेलता है”—लेखक का यह वाक्य उस हर भारतीय के लिए एक चेतावनी है, जो विकास तो चाहता है, लेकिन अनुशासन और कड़े फैसलों की कीमत चुकाने को तैयार नहीं है। अगर भारत को विश्वगुरु बनना है, तो उसे ‘इलेक्शन मैनेजमेंट’ के मोहपाश से निकलकर ‘नेशन बिल्डिंग’ के यथार्थ को अपनाना ही होगा।
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