मथुरा-वृंदावन में यमुना प्रदूषण और अवैध निर्माण पर NGT बेहद सख्त: यूपी सरकार, CPCB और MVDA सहित कई विभागों को नोटिस जारी

Agra Desk, tajnews.in | Wednesday, April 22, 2026, 05:50:30 PM IST

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Agra Desk | Environment & Law

मथुरा/नई दिल्ली: ब्रजमंडल की जीवनदायिनी और करोड़ों सनातन धर्मालंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र मानी जाने वाली पवित्र यमुना नदी की दुर्दशा पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने एक बार फिर कड़ा रुख अख्तियार किया है। वृंदावन और मथुरा जैसे विश्व प्रसिद्ध तीर्थ नगरों में यमुना नदी में लगातार गिर रहे अनियंत्रित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट (Industrial Waste) और नदी के डूब क्षेत्र (Floodplains) में धड़ल्ले से हो रहे अवैध निर्माणों को लेकर एनजीटी ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है। 16 अप्रैल 2026 को हुई एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान [cite: 11], ट्रिब्यूनल ने जल संसाधन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा-वृंदावन नगर निगम, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA), ब्रज तीर्थ विकास परिषद, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है [cite: 53]। एनजीटी की प्रधान पीठ के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव, विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की कोरम ने इस गंभीर मामले की सुनवाई की [cite: 13, 14, 15]। यह कार्रवाई एक निष्पादन याचिका (Execution Application) पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि प्रशासन की घोर लापरवाही के कारण आज यमुना का जल न केवल आचमन (पीने) बल्कि स्नान करने लायक भी नहीं बचा है।

HIGHLIGHTS
  1. NGT का कड़ा एक्शन: मथुरा-वृंदावन में यमुना के प्रदूषण और सीवेज गिरने के मामले में यूपी सरकार, MVDA, CPCB और NMCG सहित कई विभागों को नोटिस।
  2. अवैध निर्माणों पर संज्ञान: नदी के बाढ़ क्षेत्र (Floodplains) में धड़ल्ले से हो रहे अवैध कब्जों और निर्माण कार्यों को लेकर ट्रिब्यूनल ने जताई गहरी नाराजगी।
  3. जल आचमन लायक भी नहीं: CPCB के मानकों के अनुसार यमुना का जल अभी भी ‘D’ श्रेणी में है, जो स्नान और घरेलू उपयोग के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त है।
  4. अगली सुनवाई 4 अगस्त को: एनजीटी ने सभी संबंधित पक्षों से जवाब मांगते हुए इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को तय की है।

निष्पादन याचिका में उठे प्रशासन की विफलता के गंभीर सवाल

यह पूरा मामला मूल रूप से साल 2021 में दायर एक याचिका (OA No. 102/2021) से जुड़ा है [cite: 5]। हालिया सुनवाई में इस मामले को एक निष्पादन याचिका (Execution Application No. 24/2026) के रूप में ट्रिब्यूनल के समक्ष रखा गया था [cite: 4, 59]। ब्रज वृन्दावन देवालय समिति के संयुक्त सचिव और श्री राधा मदन मोहन मंदिर के प्रधान सेवायत विजय किशोर गोस्वामी ने यह याचिका दायर की है [cite: 6]। याचिकाकर्ता की ओर से जाने-माने पर्यावरण अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ, शुभम उपाध्याय और अनुकृति बाजपेयी ने एनजीटी के समक्ष मजबूती से अपना पक्ष रखा [cite: 16]।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों ने बताया कि यह निष्पादन याचिका ट्रिब्यूनल द्वारा 17 दिसंबर 2021 को पारित आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए दायर की गई है [cite: 19]। उस आदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) और अन्य संबंधित राज्य अधिकारियों को सीवेज उपचार व्यवस्था (STPs) को सुधारने, यमुना के डूब क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने और नदी की सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे [cite: 51]। याचिकाकर्ता विजय किशोर गोस्वामी ने ट्रिब्यूनल को बताया कि वृंदावन और कोसी कस्बों से बिना शोधित सीवेज (untreated sewage) और अपशिष्ट जल सीधे यमुना नदी और सुनरख के पास कोसी ड्रेन में बहाया जा रहा है [cite: 20]। इस घोर लापरवाही ने राज्य के अधिकारियों की विफलता को उजागर किया है और इन कस्बों में सीवेज उपचार की अनुचित सुविधाओं की पोल खोल कर रख दी है [cite: 21]。

‘D’ श्रेणी में यमुना का जल, श्रद्धालुओं की सेहत से खिलवाड़

मथुरा और वृंदावन ऐसे तीर्थ स्थल हैं जहां देश-विदेश से प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन और यमुना स्नान के लिए आते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत रोंगटे खड़े कर देने वाली है। याचिकाकर्ता की ओर से बहस करते हुए अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ ने न्यायालय को चौंकाने वाले तथ्य बताए। उन्होंने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के “डिज़ाइनेटेड बेस्ट यूज़ क्राइटेरिया” के अनुसार, मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में यमुना नदी का जल अब भी सबसे खराब यानी ‘D’ श्रेणी में बना हुआ है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि यमुना का जल स्नान करने, पीने या किसी भी घरेलू उपयोग के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त और जहरीला हो चुका है।

पूर्व में ट्रिब्यूनल द्वारा गठित एक निगरानी समिति (Monitoring Committee) ने भी अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया था कि मथुरा-वृंदावन में यमुना नदी के अपस्ट्रीम (upstream) की तुलना में डाउनस्ट्रीम (downstream) जल की गुणवत्ता बहुत खराब है [cite: 27]। इसका सीधा कारण नदी में गिरने वाले गंदे नाले हैं, जिनका बायो-रेमेडिएशन (bio/phytoremediation) ठीक से नहीं हो पा रहा है [cite: 27, 28, 29]। अधिवक्ता ने अपनी दलील में कहा, “न्यायालय के सख्त और स्पष्ट निर्देशों के बावजूद नदी के किनारे अवैध निर्माण और पक्के ढांचे लगातार खड़े किए जा रहे हैं। प्रतिदिन हजारों लोग गहरी आस्था के साथ यमुना नदी पर आते हैं और उनमें से कई अनजान श्रद्धालु इसी प्रदूषित जल से आचमन भी करते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।”

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MVDA और प्रशासनिक लापरवाही पर NGT की सीधी नजर

एनजीटी (NGT) के दस्तावेजों के अनुसार, ट्रिब्यूनल ने मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) को पहले ही सख्त निर्देश दिए थे कि वह प्रदूषण को रोके, अतिक्रमण (Encroachment) हटाए और नदी के तटीय इलाकों में पर्याप्त वृक्षारोपण (Plantation) सुनिश्चित करे [cite: 51]। पूर्व की समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि जिन जमीनों को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है, वहां MVDA को एक सघन वृक्षारोपण अभियान चलाना चाहिए, ताकि उन जमीनों पर दोबारा कब्जा न हो सके [cite: 38]। समिति ने वहां फलदार और स्थानीय किस्मों के पौधे लगाने को बढ़ावा देने की बात कही थी [cite: 39]。

लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि ट्रिब्यूनल के इन आदेशों को कागजों तक ही सीमित रखा गया है। नाले सीधे यमुना में गिर रहे हैं और एसटीपी (STP) अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य नहीं कर रहे हैं। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि यूपी के मुख्य सचिव को अन्य राज्य प्राधिकरणों के साथ समन्वय स्थापित कर इन सभी निर्देशों के अनुपालन की निगरानी करनी चाहिए [cite: 51]। प्रशासन की यही घोर लापरवाही अब उनके गले की फांस बन गई है। ब्रज क्षेत्र के पर्यावरणविदों और संतों का कहना है कि यमुना में केवल मथुरा-वृंदावन का ही सीवेज नहीं गिर रहा है, बल्कि दिल्ली और हरियाणा से आने वाला औद्योगिक कचरा भी स्थिति को बदतर बना रहा है।

अगली सुनवाई 4 अगस्त को: क्या जागेगा तंत्र?

याचिकाकर्ता की दलीलों और जमीनी हकीकत की गंभीरता को भांपते हुए, एनजीटी की प्रधान पीठ ने सभी प्रतिवादियों (Respondents) को नोटिस जारी कर दिया है [cite: 53]। ट्रिब्यूनल ने याचिकाकर्ता को यह निर्देश दिया है कि वे प्रतिवादियों को नोटिस सर्व कराएं और अगली सुनवाई की तारीख से कम से कम एक सप्ताह पहले सेवा का हलफनामा (affidavit of service) दाखिल करें [cite: 53]।

इस पूरे मामले की अगली और बेहद अहम सुनवाई 4 अगस्त 2026 को सूचीबद्ध (List) की गई है [cite: 55]। अब देखना यह है कि जब 4 अगस्त को सभी संबंधित विभाग— चाहे वह यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हो या नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG)— एनजीटी के समक्ष अपना हलफनामा पेश करेंगे, तो वे अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए क्या नए बहाने तलाशते हैं। ब्रज क्षेत्र की जनता, साधु-संतों और पर्यावरण प्रेमियों की नजरें अब एनजीटी के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या इस बार एनजीटी का चाबुक मथुरा-वृंदावन के भ्रष्ट और लापरवाह सिस्टम को सुधार पाएगा? क्या यमुना को उसका पुराना निर्मल और स्वच्छ स्वरूप वापस मिल पाएगा? ये वो ज्वलंत सवाल हैं, जिनका जवाब आने वाले महीनों में ट्रिब्यूनल की अदालत से ही तय होगा।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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