Article Desk, 🌐 tajnews.in | Sunday, 19 July, 2026, 12:35:00 PM IST


पौराणिक कहानियां क्यों लुभाती हैं? क्या है मिथकों का मिथक?
— बृज खंडेलवाल
सिनेमा हॉल के बंद अंधेरे में एक गहरा सन्नाटा पसरा है। विशाल रुपहले पर्दे पर देवता और असुर पूर्ण आक्रामकता के साथ आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूँजते हैं, और आकाश से अनगिनत दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही अंतिम क्षणों में शाश्वत धर्म की जीत होती है और महाबलशाली राक्षस धरातल पर धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और जयघोष के विमर्श से गूँज उठता है। उस भीड़ में कई दर्शकों की आँखें भावुकता से नम हैं। यह विधिक रूप से केवल एक व्यावसायिक फिल्म का अंत नहीं है, बल्कि इंसानी मन के भीतर दबे गहरे डर, अटूट उम्मीद और शाश्वत न्याय की चाह का एक सामूहिक विस्फोट है। सदियों से त्रस्त इंसान ऐसी ही पौराणिक कहानियों के सहारे अपने अवचेतन मन का बोझ हल्का करता आया है। फिल्म खत्म होती है, लेकिन कहानी का चक्र कभी खत्म नहीं होता। वही दर्शक रात को अपने घर लौटकर अपने बच्चों को बड़े चाव से भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की लंका विजय या योगेश्वर कृष्ण की बाल लीलाएं सुनाते हैं।
इसी समानांतर समय में कर्नाटक के एक छोटे-से दूरस्थ गांव में विशाल बरगद के पेड़ के नीचे बैठा एक बूढ़ा अनुभवी किस्सागो भी लोक परंपरा में यही काम कर रहा है। वह एकाग्रचित्त होकर राजा मनु और महाप्रलय की प्रलयंकारी कथा सुनाता है। सबसे अद्भुत विधिक और दार्शनिक विरोधाभास देखिए कि यही प्रलय की कहानी ईसाई संस्कृति की पवित्र बाइबिल के नूह (Noah) और प्राचीन मेसोपोटामिया सभ्यता के महाकाव्य में उत्नापिष्टिम (Utnapishtim) की दास्तानों में भी बिल्कुल इसी रूप में सुनाई देती है। यहाँ आकर हज़ारों साल का कालखंड और हज़ारों किलोमीटर का भौगोलिक फ़ासला पल भर में विधिक रूप से मिट जाता है। मूल कहानी पूरी तरह वही रहती है, केवल देशकाल के अनुसार पात्रों के नाम और कूटनीतिक किरदार बदल जाते हैं। इंसान हमेशा से ही ऐसी रहस्यमयी कहानियों का दीवाना रहा है। यही लोक किस्से दुनिया के अलग-अलग मुल्कों, भिन्न संस्कृतियों और सदियों के इतिहास को एक ही वैचारिक धागे में पिरो देते हैं।
पौराणिक कथाएँ वास्तव में सिर्फ़ काल्पनिक देवताओं, राक्षसों और जादुई चमत्कारों की कोई पुरानी संकीर्ण दास्तानें नहीं हैं, बल्कि ये मानव जीवन और मृत्यु, नेकी और बुराई, अटूट उम्मीद और ब्रह्मांडीय रहस्य को विधिक रूप से समझने का एक दार्शनिक ज़रिया हैं। जब आधुनिक विज्ञान के पास सृष्टि के बुनियादी सवालों के कोई ठोस जवाब नहीं थे, तब इन प्राचीन मिथकों ने ही भयभीत इंसान को जीने के मायने और सामाजिक मूल्य दिए थे। दुनिया की हर प्राचीन सभ्यता ने जीवन के गूढ़ रहस्यों का हल खोजने के लिए अपने-अपने विशिष्ट मिथक और कथाएँ गढ़ीं कि—हम इस धरती पर क्यों आए हैं? शारीरिक मौत के बाद हमारी आत्मा का क्या होता है? और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमें कैसी नैतिक ज़िंदगी जीनी चाहिए? ये मिथक वास्तव में किसी भी समाज की विधिक सोच, अटूट आस्था और उनकी तहज़ीब की सबसे मजबूत बुनियाद होते हैं। सदियों तक ये कहानियाँ आग के अलाव के पास बैठकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से सुनाई जाती रहीं, और बाद में इन्हें विधिक रूप से ग्रंथबद्ध किया गया।
इन प्राचीन कथाओं में अतिरंजित कल्पना और दार्शनिक प्रतीक ज़रूर दिखाई देते हैं, लेकिन इनके अंतरतम में इंसानी फ़िटरत, मनोविज्ञान और समाज के संचालन की गहरी विधिक सच्चाइयाँ छिपी हैं। इनका व्यापक कूटनीतिक असर आज के स्थापित वैश्विक धर्मों के ढांचे पर भी साफ़ तौर पर दिखाई देता है। विख्यात मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग (Carl Jung) का यह विधिक और वैज्ञानिक मानना था कि ये सभी मिथक मूलतः संपूर्ण मानवता के “सामूहिक अवचेतन” (Collective Unconscious) से जन्म लेते हैं। इसका विधिक तात्पर्य यह है कि कुछ बुनियादी मानवीय भावनाएँ, आदिम भय और मानसिक प्रतीक ऐसे हैं जो समूची इंसानियत में पूरी तरह साझा हैं। यही मुख्य वजह है कि दुनिया के दो सुदूर और पृथक हिस्सों की पौराणिक कहानियाँ विधिक रूप से एक जैसी लगती हैं। सुप्रसिद्ध जनचिंतक पारस नाथ झा इसी भाषाई विमर्श को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ये प्राचीन मिथक हमें केवल कोरी कल्पना के लोक में नहीं ले जाते, बल्कि वे हमारे गहरे इंसानी अनुभवों का एक पारदर्शी और विधिक आईना दिखाई देते हैं।
इन वैश्विक मिथकों का एक बहुत बड़ा नीतिगत मक़सद मानव समाज को हमेशा सही और विधिक रास्ता दिखाना भी रहा है। देवताओं और पौराणिक नायकों की ये अमर कहानियाँ आम जनमानस को कठिन समय में साहस, अडिग ईमानदारी, जीवमात्र पर दया और सर्वोच्च त्याग की विधिक सीख देती हैं। इसके साथ ही, ये मानव मन के भीतर छिपे विनाशकारी लालच, अहंकार, घमंड और जलन जैसी विकृत बुराइयों के अंत के प्रति सख़्ती से आगाह भी करती हैं। विभिन्न धर्मग्रंथों में वर्णित स्वर्ग, नरक, वैतरणी और परलोक की विधिक कथाएँ प्राचीन काल से ही इंसानों को एक नेक, अनुशासित और मक़सद भरी सामाजिक ज़िंदगी जीने की निरंतर प्रेरणा देती आई हैं। सबसे हैरानी और अचरज की विधिक सच्चाई यह है कि दुनिया की दूर-दराज़ की सभ्यताओं में भी कई बुनियादी मिथक लगभग एक समान पाए जाते हैं, जबकि प्राचीन काल में उनका आपस में कोई भी सीधा भौगोलिक या कूटनीतिक संपर्क संभव नहीं था।
वैश्विक महाप्रलय की कहानी इस भाषाई और दार्शनिक अंतर्संबंध का सबसे प्रामाणिक उदाहरण है। हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान विष्णु मत्स्य रूप धारण कर राजा मनु को बचाते हैं, बाइबिल की विधिक कथा में नूह अपनी विशाल नाव के जरिए पृथ्वी के जीवन की रक्षा करते हैं, और मेसोपोटामिया में उत्नापिष्टिम ठीक यही विधिक भूमिका निभाते हैं। प्रलय की ऐसी ही डरावनी कथाएँ यूनान के प्राचीन इतिहास, चीन की लोककथाओं, ऑस्ट्रेलिया के मूल आदिवासियों (एबोरिजिनल्स) की मान्यताओं और सुदूर अमेरिका की माया सभ्यता में भी विधिक रूप से दर्ज मिलती हैं। समाजशास्त्री मानते हैं कि ये कथाएँ या तो हिमयुग के अंत में आई किसी वास्तविक वैश्विक प्राकृतिक आपदा की साझा स्मृति हैं, या फिर पानी के प्रलयंकारी रूप के प्रति आदिम इंसान के साझा डर और उसके प्रति विधिक सम्मान की एक मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति हैं।
सृष्टि के जन्म की विधिक कथाओं में भी एक और अत्यंत महत्वपूर्ण साझा विषय दिखाई देता है; वह है—अराजकता (Chaos) से ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Order) का उदय होना। प्राचीन मिस्र (इजिप्ट) की कूटनीतिक कथाओं के अनुसार, आदिकालीन जल के भीतर से अचानक सूर्य देव प्रकट होते हैं। बेबीलोन की पौराणिक कथा में एक शक्तिशाली देवी के शरीर के विधिक हिस्सों से इस धरती का निर्माण होता है। इसी प्रकार, प्राचीन यूनानी और हिंदू दार्शनिक परंपराएँ भी स्पष्ट रूप से बताती हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था वास्तव में आदिम अव्यवस्था को चीरकर पैदा हुई थी। यह वैचारिक यात्रा विधिक रूप से इंसान के संकीर्ण भ्रम से निकलकर सर्वोच्च आध्यात्मिक समझ तक पहुँचने की एक विकासवादी कहानी भी है। इन पौराणिक कथाओं के देवता अक्सर तत्कालीन इंसानी समाज की प्रशासनिक और विधिक संरचना का ही एक प्रतिबिंब होते हैं। जैसे हमारे लौकिक समाज में राजा, सामंत, योद्धा और मेहनतकश श्रमिक होते हैं, वैसे ही पारलौकिक देवताओं की भी अलग-अलग विधिक ज़िम्मेदारियाँ और विभाग तय किए गए थे।
प्राचीन यूनानी कथाओं में ज़्यूस (Zeus) आकाश के, पोसाइडन (Poseidon) अगाध समुद्र के और हेडीज़ (Hades) अंधकारमय पाताल लोक के संप्रभु स्वामी माने गए हैं। इसके ठीक समानांतर, हमारी सनातन हिंदू विधिक परंपरा में देवराज इंद्र वर्षा और स्वर्ग के देवता हैं, अग्नि देव ऊर्जा के और भगवान विष्णु समूची सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में विधिक रूप से स्थापित हैं। इन कथाओं ने प्राचीन मानव समाज को एक सुदृढ़ विधिक व्यवस्था, राजसत्ता के नियम और नैतिक ज़िम्मेदारी को समझने में कूटनीतिक रूप से बहुत बड़ी मदद की थी। अधिकांश वैश्विक मिथकों के केंद्र में एक शाश्वत संघर्ष हमेशा बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है: वह है विधिक व्यवस्था और अराजकता के बीच का महासंग्राम। देवता और असुर, रोशनी और अंधेरा, नेकी और बदी हमेशा आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। यह केवल किसी कथा का रोमांच नहीं है, बल्कि यह स्वयं इंसान के अंतरमन और समाज की विधिक संरचना के भीतर अनवरत चलने वाली एक मनोवैज्ञानिक जद्दोजहद का प्रतीक है।
आज के इस आधुनिक और वैज्ञानिक दौर में हम पहले जैसी प्राचीन पौराणिक कथाएँ भले ही नई नहीं गढ़ रहे हों, लेकिन हॉलीवुड की सुपरहीरो फ़िल्में, ‘स्टार वॉर्स’ जैसी अंतरिक्ष गाथाएं, कॉस्मिक यात्राओं की वैज्ञानिक कहानियां और वर्तमान में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (Artificial Intelligence) से उपजे विधिक संकटों की दास्तानें असल में उसी प्राचीन मिथक-परंपरा का एक नया आधुनिक रूप हैं। विज्ञान ने आज अपनी खोजों से बिजली कड़कने, बादलों के बनने और बाढ़ आने के प्राकृतिक रहस्यों को पूरी तरह विधिक रूप से समझा दिया है, लेकिन इंसान के भीतर छिपी अनंत कल्पनाशीलता और जीवन के गहरे अर्थ की तलाश आज भी उतनी ही शिद्दत से ज़िंदा है। हालांकि, इंटरनेट और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम ने हमारे साझा लोक किस्सों की जगह अब अलग-अलग संकीर्ण डिजिटल दुनिया (इको चैंबर्स) बना दी है। पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्में आज के आधुनिक समाज में इसी शाश्वत भाषाई आकर्षण की सबसे बड़ी और विधिक मिसाल बन चुकी हैं।
रामायण, महाभारत और यूनानी महाकाव्यों पर बनी बड़ी फिल्में आज भी दुनिया भर के सिनेमाघरों में करोड़ों दर्शकों को अपनी ओर चुंबकीय रूप से खींचती हैं। इन फिल्मों के विशाल दृश्य (VFX), असाधारण नायक और कर्तव्य, त्याग तथा विधिक नियति (Destiny) जैसे सनातन विषय आधुनिक इंसानों को आज भी अंदर तक बाँध लेते हैं। विख्यात निर्देशक जेम्स कैमरून की फिल्म ‘अवतार’ (Avatar) इसका सबसे बेहतरीन और कूटनीतिक उदाहरण है। पेंडोरा ग्रह की वह चमकती हुई काल्पनिक दुनिया, अद्भुत जीव-जंतु और प्रकृति के साथ रोपे गए गहरे विधिक व आध्यात्मिक रिश्ते दर्शकों को एक ऐसी नई, लेकिन बेहद जानी-पहचानी दुनिया में ले जाते हैं जो उनके अवचेतन को झकझोर देती है। यह फिल्म विधिक रूप से बताती है कि आधुनिक तकनीक के चरम पर रहने के बावजूद इंसान आज भी प्रकृति और इस अनंत ब्रह्मांड के साथ अपना कोई न कोई शाश्वत रिश्ता तलाशना चाहता है।
विज्ञान और कूटनीति के इस सुपर-फास्ट दौर में भी इंसान का मन केवल ठंडे और नीरस विधिक तथ्यों या गणितीय आंकड़ों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता; उसे अपनी ज़िंदगी का कोई न कोई गहरा और आत्मीय मतलब चाहिए। वर्तमान के इस भयानक जलवायु संकट (Climate Crisis), तेज़ी से बदलती अनियंत्रित तकनीक और एक बेहद अनिश्चित भविष्य के काले साए के बीच हम पुनः प्रेरणादायक अंतरिक्ष यात्रियों, सच के विधिक मार्ग पर चलने वाले महानायकों और इस धरती को एक जीवित माँ (Gaia Hypothesis) मानने वाली प्राचीन कहानियों की ओर विधिक रूप से लौट रहे हैं। इन्हीं कथाओं के भीतर हमें हमारी भावी उम्मीद और जीवन का असली मक़सद मिलता है। बरगद के पेड़ के नीचे बैठा वह ग्रामीण बूढ़ा किस्सागो शायद यह गूढ़ विधिक और मनोवैज्ञानिक बात बिना किसी आधुनिक किताब को पढ़े भी बहुत गहराई से समझता है। उसकी जुबान से सुनाई जाने वाली महाप्रलय की वह प्राचीन कहानी आज के कंप्यूटर युग के बच्चों को भी हज़ारों साल पुराने उनके पुरखों और उनकी मिट्टी से विधिक रूप से जोड़ देती है। विज्ञान हमें केवल यह बताता है कि यह भौतिक दुनिया कैसे चलती है, लेकिन ये पौराणिक कहानियां हमें समझाती हैं कि यह दुनिया हमारे मानवीय अस्तित्व के लिए क्यों और कितनी मायने रखती है। जब तक इस पृथ्वी पर इंसान का वजूद रहेगा, तब तक ये मिथक भी विधिक रूप से हमेशा अमर रहेंगे, क्योंकि कहानियां कहना और उन्हें सुनना हमारी इंसानी फ़ितरत का सबसे खूबसूरत और अभिन्न हिस्सा है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
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Pawan Singh
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