आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | गुरुवार, 17 सितंबर 2026, 07:28:17 PM IST

पेरिस: एफिल टावर चमका, पैरों ने बगावत की और हैंडबैग ने रचा थ्रिलर
बृज खंडेलवाल द्वारा | पेरिस, 17 सितंबर 2026
प्रमुख अंश (Highlights):
- यूरोस्टार से सीन नदी तक का जादू: इंग्लिश चैनल के नीचे सुरंग से गुजरते हुए पेरिस का दीदार, सीन नदी का मनमोहक क्रूज और रात में एफिल टावर की जादुई रोशनी।
- 10,000 कदमों की पैदल चुनौती: वर्साय के भव्य महलों, संग्रहालयों और डिज्नीलैंड के बीच चलते-चलते थके पैरों की बगावत और टूरिस्ट बस में राहत का अहसास।
- फ्रांस में खालिस पंजाबी स्वाद: शैंपेन के बाद शिवम रेस्टोरेंट में शुद्ध शाकाहारी भारतीय थाली ने पेरिस की गलियों में ताजा कर दी पंजाब की खुशबू।
- हैंडबैग और पासपोर्ट का महा-सस्पेंस: गुम हुए बैग से लेकर होटल की लॉबी में संयुक्त राष्ट्र जैसी आपातकालीन बैठक और अंततः मुड़े हुए स्वेटर के नीचे मिले समाधान का रोचक संस्मरण।

बृज खंडेलवाल
पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया। उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया।
लंदन से उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी।
और फिर आया यूरोस्टार।
इंग्लिश चैनल के नीचे से ट्रेन का गुजरना अपने आप में एक कमाल है। हम आराम से बैठे थे और ऊपर कहीं समुद्र बह रहा था। मन में सवाल आया, जब चैनल के ऊपर से उड़ सकते हैं तो नीचे से क्यों न निकल जाएँ? हम सब कुछ देर के लिए शानदार कपड़े पहने हुए सुरंग के चूहे जैसे महसूस कर रहे थे।
पेरिस में दिन बहुत तेज़ी से भागे। सबसे यादगार रहा सीन नदी का क्रूज़। नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और पेरिस दोनों किनारों पर अपना हुस्न दिखा रहा था। लगता था जैसे पूरा शहर हमारे लिए चलता-फिरता पोस्टकार्ड बन गया हो।
एफिल टावर की चमक और मोबाइल का जादू
फिर आया एफिल टावर।
रात के अँधेरे में जब टावर अचानक जगमगाने लगा तो सबकी निगाहें ऊपर थीं और मोबाइल कैमरे नीचे नहीं आ रहे थे। हर घंटे होने वाली पाँच मिनट की रोशनी ने माहौल में जादू घोल दिया। ठंडी हवा ने खूब कोशिश की कि रोमांस में खलल डाले, लेकिन नाकाम रही।
दिलचस्प बात यह थी कि उस समय किसी ने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल की शिकायत नहीं की। जिस मोबाइल को लेकर हम बच्चों को डाँटते हैं, उसी ने उस रात एफिल टावर को कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
एफिल की रोशनी सचमुच कमाल की थी। लोहे की यह बुज़ुर्ग महिला आज भी महफ़िल लूटना जानती है।
फिर पहुँचे वर्साय।
महल की शान देखकर लगा कि पुराने ज़माने के राजा-महाराजा सचमुच अलग ही दुनिया में रहते थे। इतनी शानो-शौकत कि आदमी सोचने लगे, आखिर जनता कब तक यह सब देखती रहती?
म्यूज़ियमों में कला और इतिहास का खजाना मिला। हर तरफ सदियों पुरानी कहानियाँ थीं। और फिर आया डिज़नीलैंड। वहाँ जाकर पता चला कि उम्र चाहे कितनी भी हो, सही माहौल मिले तो बच्चा अंदर से बाहर आने में देर नहीं लगाता।
पैरों की बगावत और पेरिस में पंजाब का स्वाद
लेकिन पेरिस ने हमें एक और बड़ा सबक दिया, सुंदर शहरों में सुंदरता देखने के लिए पैर भी चाहिए।
हम चलते रहे। फिर चलते रहे। और चलते ही रहे।
रोज़ के 10,000 कदम कब पार हो गए, पता ही नहीं चला। शाम तक हमारे पैर शिकायत नहीं कर रहे थे। वे बाकायदा राजनयिक छूट (diplomatic immunity) की मांग कर रहे थे।
कुछ पैरों ने तो शायद खतरा भत्ता भी माँगा होगा।
ऐसे में हमारी आरामदेह बस यात्रा किसी शांति समझौते से कम नहीं थी। बस में बैठते ही पैरों और यात्रियों के बीच युद्धविराम हो जाता था।
खाने की चिंता जरूर थी, क्योंकि हम शाकाहारी हैं। लेकिन पेरिस ने यहाँ भी ज्यादा परेशान नहीं किया। अच्छे भारतीय शाकाहारी भोजन ने दिल जीत लिया।
एक शाम शैंपेन के बाद हम पहुँचे शिवम रेस्टोरेंट। जालंधर के एक मेहनती पंजाबी उद्यमी द्वारा चलाया जा रहा यह रेस्तराँ उस रात हमें पेरिस से सीधे पंजाब ले गया।
थाली में सब्ज़ियाँ थीं, स्वाद में घर की याद थी और मन में सुकून। हमें पहली बार लगा कि विदेश में भी कोई समझता है कि सब्ज़ी का मतलब केवल प्लेट सजाना नहीं होता।
मार्था हमेशा की तरह हमारे साथ रहीं। उनका मुस्कुराता चेहरा, मदद का जज़्बा और हर वक्त काम की जानकारी बहुत काम आई। हमारी लोकल गाइड मैग्डलीन ने भी पेरिस की कहानी को और दिलचस्प बना दिया। उन्होंने इमारतों और जगहों के पीछे छिपी कई बातें बताईं।
2026 का हैंडबैग थ्रिलर: जब कमरे में बनी संयुक्त राष्ट्र की बैठक
लेकिन असली थ्रिलर अभी बाकी था।
होटल पहुँचते ही पद्मिनी अय्यर ने ऐसा ऐलान किया कि पूरा खुशहाल पर्यटक दल अचानक आपातकालीन समिति बन गया।
“मेरा हैंडबैग खो गया!”
हैंडबैग में मोबाइल था।
और उससे भी बड़ी आफ़त, पासपोर्ट था।
पैसा खो जाए तो वापस आ सकता है। मोबाइल भी खरीदा जा सकता है। लेकिन पासपोर्ट! वह तो ऐसा कागज़ है जिसके गायब होते ही आदमी को अंतरराष्ट्रीय नौकरशाही के लंबे गलियारों के सपने आने लगते हैं।
सलाहों की बौछार शुरू हो गई।
पुलिस को फोन करो। रास्ता दोबारा देखो। जहाँ-जहाँ गए थे, वहाँ तलाश करो। किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सीन नदी में भी देख लेना चाहिए।
तभी किसी समझदार ने धीरे से कहा:
“पहले होटल का कमरा तो देख लीजिए।”
मैं फोन करने लगा और संभावित संकट की योजनाएँ बनाने लगा। मार्था आसपास तलाश करने निकल गईं। होटल की लॉबी कुछ देर के लिए संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक जैसी लगने लगी।
बस फर्क इतना था कि यहाँ राजनयिक कम और सूटकेस ज्यादा थे।
और तभी पद्मिनी दौड़ती हुई वापस आईं।
“मिल गया!”
हैंडबैग कमरे में ही था।
पूरे समय वहीं था।
कपड़ों के ढेर के नीचे चुपचाप पड़ा था। शायद वह भी हमारे साथ लुका-छिपी खेलना चाहता था।
एक पल में अंतरराष्ट्रीय संकट खत्म हो गया।
पुलिस की जरूरत नहीं पड़ी। दूतावास को फोन नहीं करना पड़ा। कोई राजनयिक तार नहीं भेजना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र को भी खबर नहीं करनी पड़ी।
एक कपड़े ने पूरी कूटनीति बचा ली।
सच कहें तो पेरिस फिर से सुंदर उसी क्षण लगा।
पेरिस का फलसफा और सफर की यादें
पीछे मुड़कर देखें तो इस यात्रा में सब कुछ था। सीन का रोमांस था। एफिल टावर की जगमगाहट थी। वर्साय की शानो-शौकत थी। म्यूज़ियमों का इतिहास था। डिज़नीलैंड की बचपन वाली खुशी थी।
आरामदेह बस थी। स्वादिष्ट भारतीय शाकाहारी खाना था। मार्था की मदद थी। मैग्डलीन की जानकारी थी।
और सबसे बढ़कर था: 2026 का हैंडबैग थ्रिलर।
फ्रांस ने हमें कला, इतिहास और वास्तुकला दी।
पेरिस ने हमें रोज़ 10,000 कदम दिए।
हमारे पैरों ने बदले में हमें याद दिलाया कि हर हसीन शहर का अपना हिसाब होता है।
और पद्मिनी ने इस यात्रा की सबसे शानदार सस्पेंस कहानी दे दी।
पेरिस की सीख सीधी है।
एफिल टावर की चमक देखिए। सीन पर तैरिए। वर्साय में हैरत कीजिए। अच्छा खाना खाइए। खूब घूमिए।
लेकिन अगर होटल में कोई सामान गायब हो जाए, तो पुलिस, दूतावास या संयुक्त राष्ट्र को फोन करने से पहले कपड़ों के नीचे जरूर देख लीजिए।
कभी-कभी सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट, एक मुड़े हुए स्वेटर के नीचे पड़ा होता है।
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Thakur Pawan Singh
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