दूर के ढोल सुहाने!

खबर शेयर कीजिए

यूरोप की चमक-दमक और खाली जेब! ज्यादा कमाई, ज्यादा मेहनत, फिर भी महीने के अंत में कंगाली! यूरोप यात्रा ने सिखाया जिंदगी का असली हिसाब-किताब

Article Desk, Taj News | 🌐 tajnews.in | Friday, October 16, 2026, 09:05:00 PM IST.

Taj News Logo
आर्टिकल डेस्क
Brij Khandelwal

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद

विशेष स्तंभकार | 🌐 tajnews.in

दूर के ढोल सुहाने! यूरोप की चमक-दमक और खाली जेब!

बृज खंडेलवाल | 16 अक्टूबर 2026

यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं!

लेकिन जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?

मेरी हाल की यूरोप यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया। खूबसूरत शहर देखे, नदियों के किनारे घूमे, शानदार सार्वजनिक सुविधाएं देखीं और लोगों का अनुशासन भी। लेकिन साथ ही समझ आया कि यहां जिंदगी जीना कोई मुफ्त का तमाशा नहीं है। यहां तो प्रकृति की पुकार सुनने के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ सकती है!

HIGHLIGHTS
  • चकाचौंध के पीछे महंगाई: यूरोप के साफ-सुथरे शहरों और आधुनिक सुविधाओं के पीछे जीवन यापन का भारी-भरकम खर्च।
  • कुदरत की पुकार भी सशुल्क: सार्वजनिक शौचालय के उपयोग से लेकर पीने के पानी और बुनियादी खानपान पर जेब ढीली करने की विवशता।
  • कमाई लाखों में, बचत शून्य: भारी टैक्स, महंगे किराए और परिवहन लागत के चलते महीने के अंत में खाली रह जाती है जेब।
  • भारत की अनूठी सामाजिक पूंजी: लंगर, भंडारे, मुफ्त पानी और सामाजिक संबल जैसी परंपराएं जो जीवन को बनाती हैं सहज।

भारत में सार्वजनिक शौचालय अक्सर मुफ्त मिल जाते हैं या कुछ रुपये देकर काम चल जाता है। हां, बदबू ऐसी कि नाक बंद करके भागने का मन करे। कई जगह पानी गायब, सफाई नदारद और दरवाजे का भरोसा भगवान भरोसे!

लेकिन कम से कम जेब तो सलामत रहती है। यूरोप में सार्वजनिक शौचालयों में एक यूरो, यानी करीब सौ रुपये या उससे ज्यादा, खर्च करने पड़ सकते हैं। सोचिए, पेट खराब हो और जेब खाली हो, तो आदमी जाए तो जाए कहां? यहां तो कुदरत की पुकार भी आर्थिक संकट बन सकती है!

टैक्सी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भारत में पांच किलोमीटर की सवारी सौ-दो सौ रुपये में मिल सकती है, जबकि यूरोप के बड़े शहरों में यही सफर पंद्रह सौ से ढाई हजार रुपये तक पड़ सकता है। बस या मेट्रो का टिकट भी कई बार दो-तीन सौ रुपये का होता है। एक कप कॉफी चार-पांच सौ रुपये की और मामूली दोपहर का भोजन पंद्रह सौ रुपये के आसपास! पत्नी को रेस्तरां में खाना खिलाकर निकलिए, तो रास्ते में हिसाब लगाने लगेंगे कि अगली बार घर पर खिचड़ी बनाना ही बेहतर रहेगा।

सुपरमार्केट में फल-सब्जियां खरीदना भी किसी परीक्षा से कम नहीं। सेब, केला, टमाटर, आलू और प्याज के दाम देखकर भारतीय ग्राहक की आंखें फैल जाती हैं। दूध और ब्रेड भी सस्ते नहीं। आप कुछ जरूरी सामान खरीदने जाते हैं और बिल देखकर लगता है कि गलती से पूरा सुपरमार्केट ही खरीद लिया! सबसे सस्ता टूथ ब्रश 350 रुपए का था, सोचा उंगली से ही कुछ दिन काम चला लें।

मगर सबसे बड़ा झटका मकान का किराया देता है। एम्स्टर्डम में एक छोटे से फ्लैट का किराया महीने का दो लाख रुपये या उससे ज्यादा हो सकता है। पेरिस, बर्लिन और ब्रसेल्स भी कम महंगे नहीं हैं। दूसरी तरफ, आगरा में दस-पंद्रह हजार रुपये में ठीकठाक फ्लैट मिल सकता है। तीन कमरों वाला घर भी यूरोप के बड़े शहरों की तुलना में काफी कम किराये पर उपलब्ध हो सकता है।

जरा हिसाब लगाइए। यूरोप में एक महीने का किराया कभी-कभी आगरा में पूरे साल के किराये से भी ज्यादा बैठता है। मकान मालिक तो मालामाल हो जाए और किरायेदार की जेब में हवा बचे! महीने की शुरुआत में तनख्वाह देखकर खुशी होती होगी, लेकिन किराया, बिजली, खाना और आने-जाने का खर्च कटते ही खुशी काफूर हो जाती होगी।

बेशक, यूरोप में वेतन भारत से काफी ज्यादा है। लेकिन खर्च भी उसी रफ्तार से दौड़ते हैं। ज्यादा कमाई का मतलब हमेशा ज्यादा बचत नहीं होता। आदमी सुबह से शाम तक मेहनत करे, टैक्स भरे, मकान का किराया चुकाए और फिर महीने के आखिर में बैंक खाते को ऐसे देखे, जैसे डॉक्टर मरीज की नब्ज देखता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी तस्वीर मिली-जुली है। यूरोप में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई देशों में अच्छी है, लेकिन निजी डॉक्टर, विशेषज्ञ और कुछ इलाज काफी महंगे पड़ सकते हैं। भारत में डॉक्टर की फीस और अस्पताल का खर्च तुलनात्मक रूप से कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियां जरूर हैं, मगर यहां कम आमदनी वाला व्यक्ति भी अपनी हैसियत के मुताबिक इलाज के विकल्प तलाश सकता है।

अब भारत की एक ऐसी खूबी पर आइए, जिसका हिसाब किसी अर्थशास्त्री की किताब में आसानी से नहीं मिलेगा।

हमारे यहां मंदिरों, गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थाओं में रोज लाखों लोगों को भोजन मिलता है। गुरुद्वारे का लंगर हो या मंदिर का भंडारा, भूखे पेट को खाना खिलाने की परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के लिए सहारा है। वहां किसी से यह नहीं पूछा जाता कि जेब में कितने रुपये हैं, कौन-सी गाड़ी से आए हैं या बैंक खाते में कितना पैसा है। आओ, बैठो और भोजन करो। इंसानियत का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा?

यूरोप में भी चैरिटी, फूड बैंक और जरूरतमंदों के लिए सामुदायिक रसोई हैं। लेकिन भारत में धार्मिक संस्थाओं के जरिए मुफ्त भोजन की परंपरा का अपना अलग विस्तार और सामाजिक महत्व है।

पानी का मामला भी दिलचस्प है। भारत में अनेक सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों और गुरुद्वारों में पीने का पानी मुफ्त मिल जाता है। यूरोप में नल का पानी कई जगह साफ और पीने योग्य है, लेकिन कैफे में बोतलबंद पानी खरीदने जाएं तो बिल देखकर गला सूख सकता है। पानी पीने आए थे, मगर कीमत देखकर प्यास ही मर गई!

हां, भारत की कमजोरियां भी कम नहीं हैं। गंदे शौचालय, प्रदूषित नदियां, कूड़े के ढेर, ट्रैफिक और बदहाल नागरिक सुविधाएं हमें मुंह चिढ़ाती हैं। यूरोप से हमें शहरों की योजना, नदियों की सफाई, सार्वजनिक परिवहन और नागरिक अनुशासन सीखना चाहिए। खूबसूरत नदियां और साफ सार्वजनिक स्थान अपने आप नहीं बनते। इनके पीछे बेहतर व्यवस्था, पैसा और नागरिक जिम्मेदारी होती है।

लेकिन यूरोप की चमक देखकर अपनी हर चीज को बेकार समझ लेना भी नासमझी होगी। वहां सुविधाएं अच्छी हैं, मगर उनकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। भारत में जीवनशैली की कई परतें हैं। कोई पांच सितारा होटल में भोजन करता है, तो कोई सड़क किनारे ढाबे पर। कोई मॉल में खरीदारी करता है, तो कोई साप्ताहिक बाजार में मोलभाव करके खुश होता है। दोनों अपनी हैसियत के मुताबिक जिंदगी का आनंद ले सकते हैं।

मेरी यूरोप यात्रा आंखें खोलने वाली रही। वहां की नदियों, शहरों और व्यवस्थाओं से बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन लौटकर भारत की कुछ खूबियों की अहमियत भी समझ आई। यहां कम पैसों में गुजारा करने के रास्ते ज्यादा हैं, सामाजिक सहयोग की परंपरा मजबूत है और जिंदगी के कई विकल्प उपलब्ध हैं।

यूरोप हमें सिखाता है कि शहर कैसे सुंदर और व्यवस्थित बनाए जाएं। भारत याद दिलाता है कि जिंदगी का आनंद केवल मोटी तनख्वाह से नहीं मिलता।

आखिर में बात इतनी सी है। चमक-दमक देखकर ही किसी जिंदगी को खुशहाल मत मानिए। कभी-कभी चमकती दुकान के पीछे महंगे बिलों का अंबार होता है। और कभी किसी गुरुद्वारे के लंगर में मिली दाल-रोटी, मुफ्त पानी और जेब में बचे सौ रुपये ही जिंदगी का असली खजाना बन जाते हैं!

यह भी पढ़ें

इतिहास का वो अद्भुत स्वाद: कैसे चाट, गोल गप्पे बने भारत की सबसे लोकतांत्रिक डिश | बृज खंडेलवाल पासपोर्ट है, नागरिकता नहीं! भारतीय पहचान का नया गणित | वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का प्रहार काफ़ी हुआ है, बहुत बाकी है! चमकते एक्सप्रेसवे, जर्जर इंसाफ़: क्या सिर्फ़ सड़कें विकसित होने से देश विकसित होता है? | बृज खंडेलवाल सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है | बृज खंडेलवाल का विशेष विश्लेषण “जनता मालिक, प्रतिनिधि सेवक: लोकतंत्र में वास्तविक VIP कौन?” | डॉ प्रमोद कुमार का विशेष विश्लेषण
Pawan Singh Chief Editor Taj News

Pawan Singh

Chief Editor

pawansingh@tajnews.in | 🌐 tajnews.in


खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment