Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 15 Mar 2026, 06:35 PM IST
Taj News Global Desk
विशेष अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक और विस्तृत भू-राजनीतिक विश्लेषण में पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में लगी ताज़ा आग के दूरगामी परिणामों पर चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद अब यह युद्ध किस दिशा में जा रहा है और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या खौफनाक असर होने वाला है। पढ़िए यह बेबाक आलेख:
मुख्य बिंदु
- 28 फरवरी 2026 से जारी ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और अली खामेनेई की मौत के बाद धधकता पश्चिम एशिया।
- ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का पलटवार और होर्मुज़ की खाड़ी बंद होने से वैश्विक तेल संकट।
- युद्ध के बाद ‘नए मिडिल ईस्ट’ की 4 संभावित तस्वीरें और खाड़ी देशों का अमेरिका से मोहभंग।
- पेट्रोडॉलर व्यवस्था पर खतरा; ब्रिक्स (BRICS) देशों की नई रणनीति और ड्रोन-साइबर युद्ध का नया खौफनाक दौर।
इस भरी गर्मी में मिडिल ईस्ट में लगी ये भयंकर आग आखिर कब बुझेगी? यह खूनी जंग कब खत्म होगी? हर तरफ फैले तबाही के दर्दनाक मंजर आज पूरी दुनिया से चीख-चीख कर एक ही सवाल पूछ रहे हैं। क्या यह तीसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ है या फिर दुनिया खत्म होने वाली है? पूरा पश्चिम एशिया इस समय बुरी तरह धधक रहा है। 28 फरवरी 2026 से इस पूरे क्षेत्र में युद्ध की एक बड़ी आग लगी हुई है। अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर एक बहुत बड़ा और घातक हमला किया था। उन्होंने अपने इस सैन्य अभियान को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ का नाम दिया था। इस अचानक हुए हमले से पहले ही दिन पूरे इलाके में एक भूचाल आ गया था। जब उस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए थे। उनके साथ ही ईरान के कई बड़े और खूंखार कमांडर भी खत्म हो गए थे। ईरान के कई अहम सैन्य ठिकाने पूरी तरह तबाह कर दिए गए थे।
लेकिन यह खूनी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई है। अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने भी अपना कड़ा जवाब दिया। आसमान से अनगिनत मिसाइलें चलीं। सैकड़ों सुसाइड ड्रोन उड़े। ईरान के सीधे निशाने पर इज़राइल, खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने और उनके सहयोगी देश बने। इस जवाबी कार्रवाई से पूरा इलाका भारी दहशत में आ गया। लेकिन पूरी दुनिया को सबसे बड़ा आर्थिक झटका तब लगा जब ईरान ने होर्मुज़ की खाड़ी को पूरी तरह बंद कर दिया। दुनिया के कच्चे तेल का सबसे बड़ा रास्ता वहीं से होकर गुजरता है। दुनिया की तेल की सप्लाई अचानक बुरी तरह गिर गई। तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं और शेयर बाजार धड़ाम हो गए।
आज 15 मार्च 2026 है। इस भयानक युद्ध को शुरू हुए पूरे दो हफ्ते बीत चुके हैं। लेकिन यह जंग अभी तक थमी नहीं है। और सच कहें तो इसे जल्दी रुकने के कोई आसार भी नहीं दिख रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस युद्ध में कौन जीतेगा? अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्धों में जीत की तस्वीर कभी भी हमेशा साफ नहीं होती है। एक तरफ अमेरिका और इज़राइल बहुत गर्व से कह रहे हैं कि उन्होंने ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को 90 से 95 प्रतिशत तक पूरी तरह खत्म कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ ईरान बहुत मजबूती से कह रहा है कि असली लड़ाई तो अभी जारी है। ईरान का एक नया और आक्रामक नेतृत्व दुनिया के सामने आ चुका है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका को खुली चुनौती देते हुए साफ कहा है: “हमारा कड़ा मुकाबला अंत तक जारी रहेगा।”
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इस पूरे मामले की असली सच्चाई शायद इन दोनों दावों के बीच में ही कहीं छिपी हुई है। यह सच है कि इस भीषण हमले से ईरान की सेना बहुत कमजोर हुई है। लेकिन उसके पाले हुए खतरनाक प्रॉक्सी नेटवर्क आज भी पूरी तरह जिंदा हैं। लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती विद्रोही और इराक़ में फैली शिया मिलिशिया। ये सभी वो छोटे-छोटे लेकिन ज़हरीले कांटे हैं, जो बड़ी-बड़ी ताकतों को भी लगातार चुभते रहते हैं। और उन्हें चैन से सोने नहीं देते हैं। इसलिए शायद इस युद्ध में किसी भी एक पक्ष की कोई “पूरी जीत” कभी नहीं होगी। अंततः बस ईरान को सामरिक रूप से बहुत कमजोर करके छोड़ दिया जाएगा। इस जंग का एक और सबसे बड़ा मुद्दा था: ईरान का खतरनाक परमाणु कार्यक्रम। लेकिन अंदरूनी सच यह है कि वह कार्यक्रम पहले ही अपने लक्ष्य से काफी पीछे जा चुका था। साल 2025 में ही कई गुप्त हमलों में उसके बड़े प्लांट नष्ट हो चुके थे। नतांज़ और फोर्डो जैसे अहम परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचा था। अब इन नए और ताज़ा अमेरिकी हमलों ने उसे और भी कई साल पीछे धकेल दिया है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसियाँ भी लगातार यही कह रही हैं कि अभी ईरान के पास जल्दी परमाणु बम बनने की कोई संभावना नहीं दिखती है। यानी दुनिया से परमाणु हमले का वह खतरा फिलहाल लगभग खत्म हो चुका है।
इस युद्ध ने दुनिया को अमेरिका की असली सैन्य ताकत भी दिखाई है। और साथ ही उसकी सबसे बड़ी मुश्किल भी उजागर कर दी है। उसने दुनिया को यह दिखा दिया है कि जरूरत पड़े तो वह किसी भी संप्रभु देश पर कितना बड़ा और घातक हमला कर सकता है। लेकिन इस तानाशाही हमले के बाद खाड़ी के देशों में एक बहुत नई और गहरी बेचैनी पैदा हो गई है। वे देश अब डरे हुए हैं और एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। क्या अमेरिकी सुरक्षा ही आज उन्हें सबसे ज्यादा खतरे में डाल रही है? क्या अमेरिका की दोस्ती उनकी दुश्मनी से ज्यादा भारी पड़ रही है? सिर्फ खाड़ी देशों में ही नहीं, बल्कि आज पूरे यूरोप में भी कड़े सवाल उठे हैं। कई यूरोपीय देश और नेता अमेरिका के इस हमले को पूरी तरह गैर-कानूनी और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कह रहे हैं। दुनिया का भविष्य अभी बहुत धुंधला है। लेकिन युद्ध के बाद के इस ‘नए मिडिल ईस्ट’ की चार अहम तस्वीरें साफ दिखाई देती हैं।
पहली तस्वीर: ईरान का मौजूदा इस्लामी शासन पूरी तरह गिर जाए। वहां एक बिल्कुल नई सरकार आए, जो पश्चिमी देशों के अनुकूल हो। ईरान की सभी न्यूक्लियर साइट्स हमेशा के लिए अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण में चली जाएं। और दुनिया भर में होर्मुज़ से तेल फिर से पहले की तरह बिना किसी बाधा के बहने लगे।
दूसरी तस्वीर: ईरान का यह कट्टरपंथी शासन किसी तरह बच जाए। लेकिन वह सैन्य और आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा कमजोर हो जाए। इस वजह से पूरे इलाके में छिटपुट हमले और प्रॉक्सी युद्ध हमेशा जारी रहें। और दुनिया भर में तेल हमेशा के लिए महंगा बना रहे।
तीसरी तस्वीर: यह जंग और ज्यादा भयंकर रूप ले ले और पूरी दुनिया में फैल जाए। इसमें तुर्की, इराक़ और लेबनान भी पूरी तरह शामिल हो जाएं। अगर इस युद्ध में चीन और रूस भी ईरान के समर्थन में खुलकर कूद पड़े, तो पूरी दुनिया एक भयानक आर्थिक संकट और तीसरे विश्व युद्ध में जा सकती है।
चौथी तस्वीर: युद्ध लड़ते-लड़ते सभी पक्ष पूरी तरह थक जाएं। दोनों तरफ से भारी नुकसान हो। फिर मजबूरी में कूटनीतिक बातचीत शुरू हो। दुनिया के बड़े देशों के बीच एक नया और कड़ा समझौता बने। यह कुछ-कुछ वैसा ही हो, जैसा कभी JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) हुआ करता था। पाठकों को बता दें कि JCPOA साल 2015 का एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौता था। इसमें ईरान ने अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम को सीमित करने पर अपनी पक्की सहमति दी थी। और इसके बदले में पश्चिमी देशों ने उस पर लगे सभी कड़े आर्थिक प्रतिबंध हटाने का पक्का वादा किया था। जिसे बाद में ट्रम्प प्रशासन ने ही तोड़ दिया था।
अब सवाल यह है कि इस सब के बीच खाड़ी के देश क्या करेंगे? इस ताज़ा खूनी जंग ने उनका एक बहुत पुराना और प्यारा भ्रम हमेशा के लिए तोड़ दिया है। उनका वह भ्रम था कि “संकट के समय अमेरिका हमेशा हमें बचाएगा।” अब खाड़ी के सभी अमीर देश एक नई और स्वतंत्र सोच में हैं। यूएई (UAE), सऊदी अरब और कतर जैसे देश अब बहुत सतर्क हो गए हैं। अब वे अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रहेंगे। वे अब कई अलग-अलग दिशाओं में अपने नए रणनीतिक रिश्ते बनाएंगे। वे फ्रांस से आधुनिक हथियार खरीदेंगे। वे चीन से नई टेक्नोलॉजी हासिल करेंगे। और वे भारत के साथ अपना व्यापार और गहरा करेंगे। यानी वे अब एक ‘मल्टी-पोलर सुरक्षा मॉडल’ की तरफ तेजी से बढ़ेंगे। इस युद्ध ने डॉलर और तेल की एक नई कहानी भी लिखनी शुरू कर दी है। अभी संकट के इस शुरुआती समय में तो अमेरिकी डॉलर काफी मजबूत हुआ है। क्योंकि लोग संकट में हमेशा एक सुरक्षित मुद्रा ढूंढते हैं। लेकिन अगर तेल का यह संकट लंबा चला तो दुनिया में एक बिल्कुल नई आर्थिक कहानी शुरू हो सकती है। ब्रिक्स (BRICS) देश पहले ही डॉलर का एक मजबूत विकल्प ढूंढ रहे हैं। चीन, रूस और भारत इसके अगुवा हैं। अगर दुनिया में तेल का व्यापार डॉलर से बाहर गया, तो अमेरिका की पूरी पेट्रोडॉलर व्यवस्था जड़ से हिल सकती है। और यह अमेरिका के लिए किसी भी मिसाइल हमले से ज्यादा खतरनाक होगा।
इस जंग का सबसे बड़ा और सीधा आर्थिक झटका एशिया को ही लगेगा। इसमें भारत और चीन की मुश्किल सबसे ज्यादा बढ़ने वाली है। भारत और चीन दोनों अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा कच्चा तेल इन्ही खाड़ी देशों से लेते हैं। अगर वैश्विक बाजार में कीमतें इसी तरह तेजी से बढ़ीं तो इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी और विकास दर घटेगी। ऐसे में भारत क्या कर रहा है? भारत अपनी समझदारी से रूस से लगातार सस्ता तेल खरीद रहा है। भारत अपने बनाए हुए रणनीतिक तेल भंडार का सोच-समझकर इस्तेमाल कर रहा है। वह सोलर ऊर्जा और कोयले पर अपना जोर बढ़ा रहा है। चीन भी बिल्कुल यही कर रहा है। वह रूस और अफ्रीका के देशों से अपना तेल ले रहा है। वह अपनी ऊर्जा बचत को तेजी से बढ़ा रहा है। इस युद्ध से इन दोनों देशों की ग्रोथ थोड़ी धीमी जरूर होगी। लेकिन ये दोनों दुनिया की बहुत बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। ये दोनों देश किसी न किसी तरह इस बड़े संकट को संभाल ही लेंगे।
इन सबके बीच एक सवाल और बार-बार उठता है। दुनिया में शांति स्थापित करने वाला संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) आखिर कहाँ है? सच यह है कि इस युद्ध में उसका दखल तभी होगा जब मानवीय तबाही अपनी सारी हदें पार कर जाएगी। जब लाखों लोग भूखे-प्यासे शरणार्थी बन जाएंगे। जब हर तरफ सिर्फ मौत और भुखमरी होगी। जब बड़े पैमाने पर शहरों का विनाश होगा। लेकिन तब भी दुनिया के सामने एक सबसे बड़ी समस्या जस की तस बनी रहेगी। वह समस्या है अमेरिका का ‘वीटो पावर’। अमेरिका किसी भी प्रस्ताव को अपने वीटो से रोक देगा। और दुनिया फिर से लाचारी से यही कहेगी कि UN एक बिल्कुल बेबस और फालतू संस्था बन गया है। इस युद्ध ने दुनिया को एक और कड़वा सच दिखाया है। भविष्य की जंग का पूरा तरीका अब हमेशा के लिए बदल गया है। अब जंग टैंकों से नहीं, बल्कि हजारों सस्ते ड्रोनों और सैकड़ों अचूक मिसाइलों से लड़ी जाती है। ये झुंड में आते हैं और महंगे से महंगे एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे आयरन डोम) को भी पूरी तरह चकमा दे देते हैं। आज कोई भी फाइटर जेट बिना भारी इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा के हवा में नहीं उड़ता है। जमीन पर भी सेना अब बड़े दस्तों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे और सुरक्षित समूहों में चलती है। पुराने ज़माने की टैंक बनाम टैंक की लड़ाई का दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो रहा है। अब असली युद्ध सिर्फ ड्रोन, घातक साइबर हमलों और स्टैंड-ऑफ मिसाइलों का ही रह गया है।
अंत में हम सबको यह सोचना होगा कि इस खौफनाक जंग में सबसे बड़ी कीमत आखिर कौन दे रहा है? यह कीमत सिर्फ आम लोग ही चुका रहे हैं। लाखों बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं। उनके पुश्तैनी घर हमेशा के लिए उजड़ गए हैं। कल तक आबाद रहने वाले शहर आज खंडहर होकर खामोश हो गए हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास गवाह है कि वह अक्सर ऐसे ही खूनी मोड़ों पर बदलता है। शायद यह भयंकर जंग भी दुनिया को एक बहुत बड़ा और कड़वा सबक देकर जाए। वह सबक यह है कि दुनिया की कोई भी एक महाशक्ति पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में नियंत्रित नहीं कर सकती है। इस युद्ध के बाद दुनिया में बिल्कुल नए और अनोखे रिश्ते बनेंगे। देशों की नई और आक्रामक रणनीतियाँ बनेंगी। और शायद दुनिया में ऊर्जा का पूरा नक्शा ही बदल जाएगा। पश्चिम एशिया की यह ताज़ा जंग सिर्फ एक युद्ध नहीं है। बल्कि यह एक नई, खतरनाक और तेजी से बदलती हुई दुनिया का सबसे बड़ा ऐलान है। हमें इस नए दौर के लिए खुद को पूरी तरह तैयार रखना होगा।
Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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