Brij Khandelwal article on United Nations failure, UNSC veto power and global geopolitics

टूट गई एक आस, मोती बिखर गए! बुढ़ऊ और बेज़ुबान शेर बन चुका है संयुक्त राष्ट्र संघ?

आर्टिकल

Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 14 Mar 2026, 04:45 pm IST

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विशेष अंतरराष्ट्रीय आलेख

Brij Khandelwal Writer

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद बेबाक आलेख में संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की लाचारी और महाशक्तियों की गुंडागर्दी पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे वीटो पावर के दुरुपयोग ने इस महान संस्था को महज़ एक ‘बेज़ुबान शेर’ बनाकर रख दिया है। पढ़िए यह विस्तृत विश्लेषण:

मुख्य बिंदु

  • द्वितीय विश्व युद्ध की राख से पैदा हुआ संयुक्त राष्ट्र आज महाशक्तियों की कठपुतली बनकर रह गया है।
  • सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों (P5) द्वारा अब तक 300 से अधिक बार ‘वीटो पावर’ का स्वार्थी दुरुपयोग।
  • रवांडा, स्रेब्रेनित्सा, इराक, सीरिया से लेकर गाज़ा तक, संयुक्त राष्ट्र की विफलता का खूनी इतिहास।
  • क्या बिना ठोस सुधारों और वीटो पर लगाम लगाए UN दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचा पाएगा?

दूसरे विश्व युद्ध की राख से एक बहुत बड़ा सपना पैदा हुआ था। साल 1945 में पूरी दुनिया युद्ध से थक चुकी थी। उस समय शहर के शहर खंडहर बन चुके थे। लाखों मासूम लोग बेमौत मारे जा चुके थे। इसलिए इंसानियत ने एक पक्का इरादा ठान लिया। अब ऐसा भयानक युद्ध फिर कभी नहीं होगा। इसी सकारात्मक सोच के साथ संयुक्त राष्ट्र (UN) बना। इसका असली इरादा बहुत ही साफ था। दुनिया के सभी ताक़तवर देश मिलकर काम करेंगे। देशों के आपसी झगड़े हमेशा बातचीत से सुलझेंगे। इसके अलावा नए आज़ाद हुए गरीब देशों को भी एक बड़ा मंच मिलेगा। जहाँ सिर्फ ताक़त की नहीं, बल्कि इंसाफ की बात होगी। यह एक बेहद खूबसूरत सपना था। लेकिन अस्सी साल बाद आज यह सपना पूरी तरह टूटता हुआ दिखता है। आज कई बार संयुक्त राष्ट्र सिर्फ एक मूक दर्शक जैसा लगता है। दुनिया के कई हिस्सों में भयानक युद्ध चल रहे हैं। हर तरफ आतंकवाद लगातार फैल रहा है। महाशक्तियों की आपसी होड़ तेजी से बढ़ती जा रही है。

और जो संस्था पूरी दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए बनी थी। वही संस्था आज कई बार बहुत लाचार दिखाई देती है। न्यूयॉर्क में बड़ी-बड़ी बैठकें होती हैं। नेता लंबे-लंबे भाषण देते हैं। कई शांति प्रस्ताव आते हैं। लेकिन दुनिया में अमन और चैन बिल्कुल नहीं आता है। इसके उलट गरीब मुल्क भारी आर्थिक मार झेल रहे हैं। वे इन शक्तिशाली देशों की दादागिरी से परेशान हैं। सबसे बड़ी विडंबना तो यही है। जिन बड़े देशों को दुनिया की स्थिरता बचाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। अक्सर वही शक्तिशाली देश इस व्यवस्था को पूरी तरह पंगु बना रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में सिर्फ पाँच स्थायी सदस्य हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल हैं। इनके पास दुनिया का सबसे ताक़तवर हथियार मौजूद है। इसे हम वीटो पावर कहते हैं। एक वीटो का इस्तेमाल होता है। और शांति का कोई भी बड़ा प्रस्ताव तुरंत खत्म हो जाता है。

साल 1946 से लेकर अब तक लगभग 300 बार वीटो का इस्तेमाल हो चुका है। रूस और सोवियत संघ ने मिलकर 130 से ज़्यादा बार वीटो लगाया है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने भी करीब 90 बार इसका इस्तेमाल किया है। इनमें से ज़्यादातर वीटो अमेरिका ने सिर्फ इज़राइल के बचाव में लगाए हैं। इसलिए नतीजा सबके सामने बिल्कुल साफ है। जहाँ भी किसी बड़ी ताक़त का अपना हित जुड़ जाता है। वहाँ संयुक्त राष्ट्र बस एक फालतू बहस का अखाड़ा बन जाता है। वहाँ सिर्फ खोखली बातें होती हैं। लेकिन ठोस फैसले हमेशा गायब हो जाते हैं। इसकी सबसे साफ और खौफनाक तस्वीर आज मध्य पूर्व में दिखती है। दशकों से यह पूरा इलाका एक खूनी जंग का मैदान बना हुआ है। इराक पूरी तरह बर्बाद हो गया। सीरिया खंडहर में तब्दील हो गया। इसके अलावा ईरान की परछाई वाली कई लड़ाइयाँ चल रही हैं। और अब गाज़ा की भयानक तबाही दुनिया देख रही है。

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हर नए संकट में हमेशा एक ही पुरानी कहानी दोहराई जाती है। न्यूयॉर्क मुख्यालय में एक आपात बैठक बुलाई जाती है। नेता बहुत कड़े बयान देते हैं। एक नया ड्राफ्ट प्रस्ताव तैयार होता है। फिर इसके बाद देशों का सियासी सौदा-सुलूक शुरू होता है। और अंत में, यह सब कुछ बिल्कुल ठंडा पड़ जाता है। हाल ही में पारित हुआ सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2817 इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। 11 मार्च 2026 को पारित इस प्रस्ताव में सिर्फ ईरान के हमलों की निंदा की गई। बहरीन ने इस प्रस्ताव को पेश किया था। कुल 134 देशों ने इसका खुला समर्थन किया। सुरक्षा परिषद में 13 वोट इसके पक्ष में पड़े। चीन और रूस ने इस वोटिंग से अपनी दूरी बना ली। लेकिन अंतरराष्ट्रीय आलोचकों ने इस पर तुरंत कड़े सवाल उठाए। इस प्रस्ताव में उस अहम घटना का जिक्र ही नहीं था। जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक इस टकराव की असली वजह मानते हैं। यानी 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरानी ठिकानों पर भयानक हमले किए थे। उस हमले पर संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह खामोश रहा। फिर से वही पुरानी कहानी सामने आई। शक्तिशाली देशों का चुनिंदा गुस्सा दिखा। दुनिया को आधी सच्चाई बताई गई। एक बड़ा कूटनीतिक ड्रामा रचा गया। और अंततः संयुक्त राष्ट्र की बची-खुची साख पर एक और काला दाग लग गया। असल समस्या सिर्फ इस लंबी प्रक्रिया की बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह उस मूल विचारधारा के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है। जिस विचारधारा के साथ कभी UN बना था। संयुक्त राष्ट्र को हमेशा ताक़त की राजनीति से ऊपर उठना था। लेकिन वह संस्था आज भी उसी गंदे जाल में बुरी तरह फंसी हुई है。

इस धारणा को मजबूत करने में हमेशा अमेरिका की भूमिका बहुत बड़ी रही है। वाशिंगटन ने कई बार दुनिया को साफ संदेश दिया है। जहाँ भी अमेरिका के रणनीतिक हित दांव पर लगे हों। वहाँ कोई भी अंतरराष्ट्रीय सहमति जरूरी नहीं होती है। साल 2003 में इराक पर हुआ भयानक हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सुरक्षा परिषद की औपचारिक अनुमति के बिना ही वह युद्ध शुरू हो गया था। उस समय भी संयुक्त राष्ट्र बस लाचारी से देखता रह गया। आज गाज़ा संकट के दौरान भी बिल्कुल यही सब कुछ हुआ है। अक्टूबर 2023 से लेकर सितंबर 2025 के बीच अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाया। अमेरिका ने कम से कम छह युद्धविराम प्रस्तावों पर अपना वीटो लगाया। जबकि महासभा में 153 देशों ने मानवीय संघर्षविराम की पुरजोर मांग की थी। लेकिन इस तबाही की जिम्मेदारी सिर्फ अमेरिका की ही नहीं है। रूस ने भी बार-बार अपने वीटो पावर का गलत इस्तेमाल किया है। साल 2011 से लेकर अब तक उसने सीरिया पर कई अहम प्रस्ताव रोक दिए हैं। इनमें रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की जांच शामिल थी। इसके अलावा नागरिक इलाकों पर हुए हमलों की जांच को भी रोका गया। साल 2022 में रूस ने एक और हैरान करने वाला काम किया। उसने अपने ही यूक्रेन आक्रमण की निंदा वाले प्रस्ताव को तुरंत वीटो कर दिया। यानी हमलावर भी वही देश है। और फैसला करने वाला भी वही देश है। चीन भी अक्सर इन मौकों पर रूस या ईरान के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। वह कभी वीटो लगाता है। और कभी खामोश रहकर उनका समर्थन करता है。

इतिहास के पन्नों में कई बहुत दर्दनाक मिसालें दर्ज हैं। साल 1994 में रवांडा का नरसंहार हुआ था। सिर्फ सौ दिनों के भीतर वहां लगभग आठ लाख निर्दोष लोग मारे गए थे। वहां संयुक्त राष्ट्र शांति सेना पहले से ही बहुत कम थी। लेकिन उसे बढ़ाने के बजाय सुरक्षा परिषद ने उसे और ज्यादा घटा दिया। इसका नतीजा एक भयानक क़त्लेआम के रूप में सामने आया। फिर साल 1995 में स्रेब्रेनित्सा का कांड हुआ। संयुक्त राष्ट्र के घोषित “सुरक्षित क्षेत्र” में आठ हजार से ज्यादा बोस्नियाई मुसलमानों का बेरहमी से नरसंहार हुआ। वहां डच शांति सैनिक हथियार लेकर मौजूद थे। लेकिन वे पूरी तरह बेबस और लाचार बने रहे। सीरिया में भी ठीक यही कहानी दोहराई गई। वहां मासूमों पर रासायनिक हमले हुए। शहरों पर भारी बमबारी हुई। लोग भूख से तड़पते रहे। लेकिन हर बार शक्तिशाली देशों का वीटो एक मजबूत दीवार बनकर खड़ा हो गया। आज छोटे और मध्यम देशों के लिए यह बहुत निराशाजनक स्थिति है। कभी वे गरीब देश संयुक्त राष्ट्र को अपना सबसे बड़ा सुरक्षात्मक मंच मानते थे। लेकिन आज कई बार यह सिर्फ एक दिखावटी मंच लगता है। जहाँ बड़ी ताक़तें अपनी सियासी बाज़ीगरी खुलकर दिखाती हैं। दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का वह महान सपना, धीरे-धीरे चुनिंदा न्याय में बदल गया है。

इस बीच हमारी दुनिया और भी ज्यादा असुरक्षित होती जा रही है। आज के आधुनिक युद्ध पहले से बहुत ज्यादा जटिल हो गए हैं। कई देशों में छोटी-छोटी लड़ाइयाँ चल रही हैं। शक्तिशाली देश प्रॉक्सी युद्ध लड़ रहे हैं। हाइब्रिड संघर्ष का नया दौर शुरू हो गया है। सब कुछ बहुत बुरी तरह उलझा हुआ है। और इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र आज भी वहीं खड़ा है। वह जैसे कोई थका हुआ बूढ़ा चौकीदार हो। उसे “बेज़ुबान शेर” कहना शायद कुछ लोगों को कड़ा लगे। लेकिन आज की दुनिया का कड़वा सच यही है। संयुक्त राष्ट्र गरज़ता तो बहुत है। वह अपने प्रस्तावों में गरज़ता है। वह अपने कड़े बयानों में गरज़ता है। वह बंद कमरों की बैठकों में गरज़ता है। लेकिन जब असली और ठोस कार्रवाई की ज़रूरत पड़ती है। खासकर जब किसी बड़ी ताक़त के खिलाफ कड़े कदम उठाने होते हैं। तब उसकी वह भारी दहाड़ एक धीमी फुसफुसाहट बन जाती है। फिर भी यह संस्था पूरी तरह से बेकार नहीं हुई है। उसकी कई एजेंसियाँ आज भी लाखों बेगुनाह लोगों की जान बचाती हैं। ह्यूमन राइट्स कमीशन दुनियाभर के शरणार्थियों की बहुत मदद करता है। विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) करोड़ों भूखों तक रोज़ाना खाना पहुँचाता है। यूनिसेफ (UNICEF) बच्चों की भलाई के लिए बेहतरीन काम करता है। दुनिया के कई बड़े संकटों में ये सभी एजेंसियाँ आज भी उम्मीद की एक छोटी सी रोशनी हैं。

लेकिन जिस सबसे बड़े मकसद के लिए UN का जन्म हुआ था। वह मकसद युद्ध रोकना और दुनिया में शांति कायम करना था। उसमें वह बार-बार बहुत कमजोर साबित हुआ है। और वास्तव में यही आज की सबसे असली त्रासदी है। यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की नाकामी बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह इंसानियत के एक बहुत बड़े सपने का धीरे-धीरे मर जाना है। संयुक्त राष्ट्र उस गहरी उम्मीद से पैदा हुआ था कि दुनिया फिर कभी विश्व युद्ध जैसी तबाही नहीं देखेगी। आज जब देशों के बीच टकराव लगातार बढ़ रहे हैं। और महाशक्तियों की हथियारों वाली प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। तो यह संस्था कई बार एक जर्जर और पुरानी इमारत जैसी लगती है। जिसके महान आदर्शों को अब ताक़तवर देश उतनी अहमियत बिल्कुल नहीं देते हैं। अब पूरी दुनिया के सामने सवाल बहुत साफ है। क्या संयुक्त राष्ट्र खुद को समय के साथ बदल पाएगा? क्या सुरक्षा परिषद का उचित विस्तार होगा? क्या शक्तिशाली देशों की वीटो की ताक़त पर कोई लगाम लगेगी? अगर भविष्य में ऐसे बड़े सुधार तुरंत नहीं हुए। तो संयुक्त राष्ट्र शायद बस इतिहास की एक निशानी बनकर ही रह जाएगा। वह एक ऐसे नेक इरादे की निशानी होगा, जो दुनिया ने मिलकर कभी देखा था। लेकिन उसे वे कभी पूरा नहीं कर सके। आज इंसानियत एक दोराहे पर खड़ी है। या तो हम इस संस्था को मजबूत करें। या फिर एक और विनाशकारी विश्व युद्ध का इंतज़ार करें。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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