Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 06 Mar 2026, 02:30 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस विशेष आलेख में भारत में तेजी से बढ़ते ध्वनि प्रदूषण, लाउडस्पीकर संस्कृति और सामाजिक दिखावे पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पढ़िए उनका यह विचारोत्तेजक और बेबाक आलेख:
भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है। वह चीज़ खामोशी है। जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा गायब हो चुका है। यह देश त्योहारों का देश है। यह रस्मों का देश है। यह जुलूसों का देश है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ मौजूद है। वह चीज़ अखंड और असीम शोर है। आजकल शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा परेशान दिखता है। पीछे डीजे का विशाल ट्रक चलता है। बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हैं। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान लगते हैं। यह एक अजीब विडंबना है। दरअसल शादी प्यार का उत्सव है। लेकिन संगीत ऐसा बजता है कि दिल नहीं, कान फट जाएं। लोग दिखावे के लिए बड़े-बड़े स्पीकर लगाते हैं। इसके अलावा पूरी सड़क जाम कर दी जाती है। बीमार और बुजुर्ग लोग इस शोर से कांप उठते हैं। फिर भी कोई इस पर ध्यान नहीं देता है।
और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो आप गलत हैं। आप किसी श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है। वहां प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी आपको लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे। मृत्यु कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी। लेकिन अब मृत्यु एम्पलीफायर पर एक संगीतमय विदाई बन गई है। इसी तरह भजन भी बहुत तेज बजते हैं। ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो। भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल लगता है। उदाहरण के लिए होली आती है। तब ढोल, डीजे और चीखती भीड़ नज़र आती है। चारों तरफ घिसे पिटे फिल्मी गाने बजते हैं। कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे और रात्रि जागरण होते हैं। लाउडस्पीकर पर जयकारे लगते हैं। मूर्ति विसर्जन के दौरान बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस निकलते हैं। ढोल-ताशे और बड़े सबवूफर बजते हैं। जब पूजा होती है, तो कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं। इसी तरह दीवाली पर आसमान सिर्फ पटाखों से नहीं भरता। बल्कि आसमान डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार पर एक अजीब प्रतियोगिता हो रही है! लोग सोचते हैं कि कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।
कागज पर शोर रोकने के नियम मौजूद हैं। साल 2000 के ध्वनि प्रदूषण नियम बहुत साफ बात कहते हैं। रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल की सीमा है। रात में 45 डेसिबल की सीमा तय की गई है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम सीमा है। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है। असलियत में इन नियमों का कोई पालन नहीं करता है। प्रशासन भी अक्सर मूकदर्शक बना रहता है। दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह शोर 100 डेसिबल तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की भयंकर आवाज़ में जी रहे हैं। कोई बेवजह प्रेशर हॉर्न बजाता है। कोई अपनी बुलेट बाइक का साइलेंसर निकालकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है! युवा इसे शान की बात मानते हैं। लेकिन यह सरासर बेवकूफी है। यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है। हम भारतीय इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? हमारा इतिहास हमें कुछ संकेत देता है। प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को हमेशा शक्ति का प्रतीक माना जाता था। प्राचीन मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है। इसके अलावा यह भी माना जाता था कि तेज आवाज़ देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है। लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम है। यह सामाजिक प्रदर्शन बहुत ज्यादा है।
हमारी राजनीति ने इस शोर को और ज्यादा बढ़ाया है। चुनावी रैलियाँ होती हैं। बड़े माइक और स्पीकर लगते हैं। तेज नारे लगते हैं। लंबी गाड़ियों के काफिले निकलते हैं। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं है। बल्कि लोकतंत्र की ताकत लाउडस्पीकर में छिप गई है। हर नेता सबसे तेज आवाज़ में बोलना चाहता है। धार्मिक मंच भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। हर उपदेशक के हाथ में एक बड़ा माइक्रोफोन होता है। वहाँ अक्सर ज्ञान कम होता है। लेकिन वॉल्यूम हमेशा ज्यादा होता है। टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर के प्रवचन तक एक ही नियम लागू है। नियम यह है कि जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा। शांति से बात करना अब हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा। फिर तकनीक का एक नया चमत्कार या आविष्कार आया। यह आविष्कार लाउडस्पीकर देव है। 1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह एक खतरनाक सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ-सौ साउंड डेक्स लगाए जाते हैं। नतीजा यह है कि कोई चैन से न जीए। आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस और हर सभा के पास अपनी खुद की विशाल ध्वनि सेना है। जहाँ पहले सिर्फ एक छोटी घंटी बजती थी, अब वहाँ भारी बास स्पीकर गूंजते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता अब भक्ति से नहीं जाता। बल्कि यह रास्ता अधिक वॉट्स वाले एम्पलीफायर से होकर जाता है।
दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से अपनी जगह बनाते हैं। इस लगातार शोर का हमारे शरीर पर असर बहुत गंभीर है। इसके कारण हाई ब्लड प्रेशर की समस्या बढ़ती है। लोगों को नींद की कमी का सामना करना पड़ता है। लगातार शोर से मानसिक तनाव बढ़ता है। सबसे बुरा असर हमारी सुनने की क्षमता का ह्रास है। हर साल हजारों भारतीय लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं। इसका कारण कोई खतरनाक वायरस नहीं है। इसका असली कारण अनियंत्रित डेसिबल है। डॉक्टर लगातार इस खतरे की चेतावनी दे रहे हैं। लेकिन हम सुनने को तैयार नहीं हैं। लेकिन इस भयानक शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब शोर से सुरक्षित नहीं रहीं। त्योहारों और पर्यटन के मौसम में पहाड़ों पर भी 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है। इसका सीधा असर प्रकृति पर पड़ता है। शोर के कारण पक्षी अपने घोंसले छोड़ देते हैं। डरे हुए जानवर घने जंगलों में भाग जाते हैं। पालतू कुत्ते और बिल्लियां तेज आवाज़ से सहम जाते हैं। प्रकृति को हमने हमेशा ध्यान और योग की पावन भूमि कहा था। लेकिन अब वही प्रकृति लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है। विडंबना देखिए। हम ऋषियों की भूमि में रहते हैं। लेकिन यहाँ योग शिविर भी बड़े माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी भयंकर आवाज़ में चलती हैं! यहां तक कि प्राणायाम की गहरी सांसें भी विशाल स्पीकर से गूंजती हैं। खामोशी अब एक दुर्लभ चीज़ बन गई है। जो खामोशी कभी आध्यात्मिक अनुभव की असली आत्मा थी, वह अब एलिट लोगों का शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद हम सबके लिए थोड़ी असहज है।
हमें ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ कड़े कदम उठाने होंगे। सरकार को अपने नियम सख्ती से लागू करने चाहिए। पुलिस को भी इस मामले में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। अक्सर देखा गया है कि रात दस बजे के बाद भी डीजे बजते रहते हैं। लोग पुलिस से शिकायत करते हैं। लेकिन पुलिस कई बार कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती है। यह स्थिति बेहद निराशाजनक है। हमें एक जिम्मेदार नागरिक बनना चाहिए। हमें खुद समझना होगा कि हमारी खुशी किसी दूसरे की परेशानी का कारण न बने। स्कूलों और अस्पतालों के पास विशेष ध्यान देने की जरूरत है। मरीज शांति से आराम करना चाहते हैं। छात्र अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। लेकिन तेज शोर उनकी एकाग्रता भंग कर देता है। बुजुर्ग लोगों को दिल का दौरा पड़ने का खतरा रहता है। नवजात शिशु तेज आवाज़ से डर कर रोने लगते हैं। इन सब बातों पर हमें गहराई से विचार करना चाहिए। हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी संवेदनशीलता खोते जा रहे हैं। यूरोप और अन्य विकसित देशों में शोर को लेकर कड़े कानून हैं। वहां लोग सार्वजनिक स्थानों पर धीरे बोलते हैं। गाड़ियों के हॉर्न का इस्तेमाल केवल आपात स्थिति में होता है। हमें उनसे यह अच्छी आदत सीखनी चाहिए। हमारा देश विश्व गुरु बनने का सपना देखता है। लेकिन एक शोरगुल वाला समाज कभी विश्व गुरु नहीं बन सकता। हमें अपनी आदतों में सुधार लाना होगा। तभी हम एक सभ्य और विकसित समाज कहलाएंगे।
दरअसल यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा का संकेत है। इसके साथ ही यह हमारी सामूहिक बेचैनी का भी संकेत है। हम एक ऐसा समाज बन गए हैं जहाँ हर कोई खुद को सुनाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका सिर्फ आवाज़ बढ़ा देना है। इसलिए आज हर छोटे-बड़े मंच पर एक माइक है। हर राजनीतिक और धार्मिक जुलूस में एक विशाल स्पीकर है। हर गली और मोहल्ले में एक डीजे मौजूद है। लेकिन असली सवाल अभी भी वही है। क्या हमारे भगवान सचमुच हमसे इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल की तेज़ आवाज़ चाहिए? या फिर हम अपनी ही अंदरूनी खालीपन को बाहर की तेज़ आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं? भारत की असली ताकत उसकी विशाल विविधता है। भारत की ताकत उसकी समृद्ध संस्कृति है। भारत की ताकत उसका उल्लासपूर्ण उत्सव है। लेकिन उत्सव का मतलब सिर्फ कोलाहल या शोरगुल बिल्कुल नहीं होना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान भयानक शोर नहीं होती है। बल्कि सभ्यता की असली पहचान आत्म-संयम होती है। शायद अब वह समय आ गया है कि हम सही मायने में जश्न मनाना सीखें। हमें बिना पड़ोसी के कान फाड़े खुशियां मनानी चाहिए। हमें अपना माइक थोड़ा कम करना चाहिए। हमें अपना ढोल थोड़ा धीमा बजाना चाहिए। और शायद, बस शायद, हमारा भारत फिर से खामोशी का वह मीठा और सुकून भरा संगीत सुन सके।
Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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