सूखाग्रस्त धरती और प्रदूषित नदी के बीच खड़ा इंसान, जो प्रकृति और मानव अधिकारों के बीच के संबंध को दर्शाता है।

Wednesday, 10 December 2025, 02:15:00 PM. Agra, Uttar Pradesh

धरती सांस ले रही है, मगर हाँफते हुए। आसमान पीला हो चुका है, नदियाँ रो रही हैं और जंगलों की चीख अब शहरों की गलियों में गूंजने लगी है। लेकिन अफ़सोस, इंसान अब भी खुद को उस प्रकृति का ‘मालिक’ समझे बैठा है जिसके बिना उसका अस्तित्व एक क्षण भी पूरा नहीं होता। आज 10 दिसंबर को ‘मानव अधिकार दिवस’ पर पूरी दुनिया इंसान के अधिकारों पर चर्चा कर रही है। पर कड़वा सच यह है कि इंसान के अधिकार तभी बचे रहेंगे जब प्रकृति के अधिकार ज़िंदा रहेंगे। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जो पानी हमारे शरीर का 70% हिस्सा बनाता है, जो अन्न हमें जीवन देता है—वह सब प्रकृति की देन है। इस देन को हमने संसाधन कहा, और फिर संसाधन से ‘वस्तु’ बना दिया। क्या हम वाकई विकास कर रहे हैं या विनाश की ओर दौड़ रहे हैं?


Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल

धरती सांस ले रही है , मगर हाँफते हुए। आसमान पीला हो चुका है, नदियाँ रो रही हैं, जंगलों की चीख अब शहरों की गलियों में गूंजने लगी है। लेकिन अफ़सोस, इंसान अब भी खुद को उस प्रकृति का “मालिक” समझे बैठा है जिसके बिना उसका अस्तित्व एक क्षण भी पूरा नहीं होता।
आज मानव अधिकार दिवस पर पूरी दुनिया इंसान के अधिकारों पर चर्चा कर रही है। पर सच यह है कि इंसान के अधिकार तभी बचे रहेंगे जब प्रकृति के अधिकार ज़िंदा रहेंगे। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जो पानी हमारे शरीर का 70% हिस्सा बनाता है, जो अन्न हमें जीवन देता है वह सब प्रकृति की देन है। इस देन को हमने संसाधन कहा, और फिर संसाधन से “वस्तु” बना दिया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि हर साल वायु प्रदूषण के कारण भारत में लगभग 14 लाख लोग असमय मरते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, देश की 70% नदियाँ किसी न किसी स्तर पर प्रदूषित हैं। यह आंकड़े सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, यह मानव अधिकारों का संकट हैं क्योंकि शुद्ध हवा और स्वच्छ पानी से बड़ा अधिकार कोई नहीं।
हमने सोचा, जंगल हमारे लिए हैं; नदियाँ हमारे लिए हैं; पहाड़ हमारे लिए हैं। इसी सोच ने हमें अधीर, क्रूर और लालची बना दिया। “तुरंत लाभ” और “तुरंत पैसा” के इस युग में हमने मानवता के दीर्घ भविष्य से सौदा कर लिया।
अब सवाल यह उठता है किसे हराकर हम सचमुच जीते हैं?
जब हम पेड़ काटते हैं, नदियों में ज़हर घोलते हैं, पहाड़ों को तोड़ते हैं तब हम अपने ही बच्चों का भविष्य चुरा रहे होते हैं।
प्रकृति के भी अधिकार हैं :
पेड़ों का अधिकार है कि वे निर्भीक होकर बढ़ें। नदियों का अधिकार है कि वे स्वतंत्र और निर्मल बहें।
पहाड़ों का अधिकार है कि उन्हें अनावश्यक रूप से न खोदा जाए, न मारा जाए।
2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदियों को “जीवित इकाई” घोषित किया था, जिनके अपने कानूनी अधिकार हैं। यह निर्णय एक संकेत था कि प्रकृति कोई निर्जीव वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई है।
धरती के भी अपने चक्र, सीमाएं और आत्मा हैं। अगर हमने उसकी आवाज़ न सुनी, तो यह खामोशी अंततः हमें ही निगल जाएगी।
भारतीय आदिवासी परंपराएँ सिखाती हैं , जंगल माता हैं, नदियाँ बहन हैं, धरती पालनहार है। यही भाव ‘संतुलन’ का बीज है, जो आज के विकास-रूपी शोर में दब गया है। आधुनिक समाज ने इन रिश्तों को तोड़ दिया, और अब हम अपने बनाए कंक्रीट के जंगलों में कैद हैं।
संयुक्त राष्ट्र का Intergovernmental Science-Policy Platform on Biodiversity (IPBES) बताता है कि पृथ्वी पर करीब 10 लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं। इंसान ने न सिर्फ अपने लिए जीना भूल गया, बल्कि जिनके बिना वह जी नहीं सकता, उन्हें मिटा रहा है।
प्राचीन वेद कहते हैं “मनुष्य ब्रह्मांड का हिस्सा है, स्वामी नहीं।” अरस्तू ने लिखा, “मनुष्य केवल नगर का नहीं, पृथ्वी-तंत्र का भी नागरिक है।”
और महात्मा गांधी की चेतावनी आज पहले से कहीं ज़्यादा गूंज रही है “पृथ्वी हर किसी की जरूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन हर किसी के लालच को नहीं।”
जो ‘विकास’ हमने रचा है, वह अगर धरती की सांसें रोकता है, तो वह विकास नहीं, विनाश है।
आज ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र बढ़ रहे हैं, मौसम पागल हो चुका है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के अनुसार, अगर वर्तमान तापमान वृद्धि की दर नहीं रुकी, तो 2050 तक भारत में 28 करोड़ लोग जलवायु आपदाओं के जोखिम क्षेत्र में होंगे। यह सिर्फ पर्यावरण का नहीं, मानव अस्तित्व का सवाल है।
यूनेस्को का कहना है, “मानवता की शांति, प्रकृति की शांति से अलग नहीं हो सकती।”
अगर नदी गंदी है, तो मन भी गंदा होगा। अगर हवा जहरीली है, तो समाज भी विषाक्त होगा।
इसलिए, आज यह संकल्प लेने की ज़रूरत है: हम पेड़ों को बढ़ने देंगे, नदियों को स्वच्छ बहने देंगे,
पहाड़ों को शांत रहने देंगे। क्योंकि प्रकृति बचेगी, तभी इंसानियत बचेगी। प्रकृति का सम्मान ही मानव गरिमा का सम्मान है।
अगर हम वास्तव में मानव अधिकारों की रक्षा करना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि प्रकृति और मानव अधिकार एक ही सूत्र में गुँथे हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है।
जंगल, नदी, और धरती की आवाज़ अब अनसुनी नहीं की जा सकती।
अब वक्त आ गया है कि हम “प्रकृति पर अधिकार” का नहीं, “प्रकृति के साथ अधिकार और कर्तव्य” का विचार अपनाएँ।

also read : दलदली जमीन पर आसमान छूते वादे: तेज़ रफ़्तार विकास के बीच छूटते छोटे सपने 🚉⚡

#HumanRightsDay #NatureRights #ClimateCrisis #SaveEarth #Environment #TajNews #AgraNews #BrijKhandelwal #SustainableDevelopment #Humanity

ग्रामीण भारत की नई तस्वीर: इंटरनेट, मोबाइल क्रांति और सड़क कनेक्टिविटी ने बदल दिया देहात का स्वरूप
✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
📧 pawansingh@tajnews.in
📱 अपनी खबर सीधे WhatsApp पर भेजें: 7579990777
👉 TajNews WhatsApp Channel
👉 Join WhatsApp Group
🌐 tajnews.in

By Thakur Pawan Singh

✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह 📧 pawansingh@tajnews.in 📱 अपनी खबर सीधे WhatsApp पर भेजें: 7579990777 👉 Taj News WhatsApp Channel

3 thoughts on “मानव अधिकार दिवस विशेष: अगर प्रकृति मरी, तो इंसान के अधिकार भी हो जाएंगे दफन; वक्त है जागने का”
  1. […] मानव अधिकार दिवस विशेष: अगर प्रकृति मर… ✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह 📧 pawansingh@tajnews.in 📱 अपनी खबर सीधे WhatsApp पर भेजें: 7579990777 👉 TajNews WhatsApp Channel 👉 Join WhatsApp Group 🐦 Follow on X (Twitter) 🌐 tajnews.in […]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *