इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Monday, 27 July, 2026, 11:25:00 AM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत

— बृज खंडेलवाल

देश की राजधानी नई दिल्ली का ऐतिहासिक जन-आंदोलन स्थल जंतर-मंतर इन दिनों सत्ता के ख़िलाफ़ बगावत के एक बेहद रंगीन, जीवंत और अनोखे मेले में बदल गया। देश की नई ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) पीढ़ी के नौजवान सड़कों पर गा रहे थे, नाच रहे थे, ताक़तवर नेताओं के कार्टून व मीम्स बना रहे थे, उनका मज़ाक उड़ा रहे थे और जंतर-मंतर पर ही बर्गर, पिज़्ज़ा व भटूरे खाते हुए ऐसी मस्ती कर रहे थे, मानो देश की रूखी राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट के परिसर में आ घुसी हो।

लेकिन इस युवाओं के सहज हंसी-मज़ाक, डिजिटल शोर-शराबे और मस्ती के पीछे केंद्र सरकार के लिए एक बिल्कुल साफ़, धारदार और मज़बूत संवैधानिक पैगाम था: उन्हें अपनी व्यवस्था में पारदर्शिता और शासन में विधिक जवाबदेही चाहिए। पिछले कुछ दिनों में हुई प्रशासनिक सख़्ती और पुलिस बल का भय भी इस आंदोलन के युवाओं के जोश और हौसले को कम नहीं कर सका। जंतर-मंतर पर युवाओं के नए-नए जत्थे देश के कोने-कोने से लगातार पहुँचते रहे; बेखौफ, निर्भीक और पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते जंतर-मंतर का यह धरना भारतीय लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में तब्दील हो गया।

जेन ज़ी का यह अभूतपूर्व युवा आंदोलन आज स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अत्यंत अहम, ऐतिहासिक और निर्णायक पड़ाव बन गया है। इस आंदोलन की शुरुआत भले ही नीट (NEET) जैसी राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था के ख़िलाफ़ छात्रों के सुलगते गुस्से से हुई थी, लेकिन बहुत जल्द यह एक व्यापक और गहरे संदेश में बदल गई कि अब देश की इस विशाल और जागृत युवा आबादी की आवाज़ को कोई भी सत्ता नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

जिस प्रचंड जन दबाव के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा, देश के प्रधानमंत्री से सीधे इंस्टाग्राम (Instagram) पर युवाओं से विधिक संवाद करने की मांग उठी और नंदन नीलेकणी समेत देश के शीर्ष तकनीकी विशेषज्ञों की एक उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स बनाने का ऐतिहासिक विधिक फैसला हुआ, उसने एक बात विधिक रूप से साबित कर दी है। भारतीय लोकतंत्र में शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव आज भी सर्वोच्च है और वह सरकारों को अपने बड़े से बड़े विधिक फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।

इस ऐतिहासिक युवा आंदोलन ने देश की राजनीति में सोशल मीडिया (Social Media) की असली, मारक और ज़मीनी ताक़त का भी मुकम्मल अहसास करा दिया है। जो ‘एजेंडा’ काम कभी देश के बड़े-बड़े मीडिया संस्थान और उनके स्टूडियो तय करते थे, वह काम इस बार इंटरनेट की डिजिटल ताक़त ने किया। कहानी (Narrative) सीधे छात्रों के बीच सड़कों पर बनी, वहीं से डिजिटल दुनिया में फैली और वहीं से पूरे देश के करोड़ों मोबाइल स्क्रीन्स तक पहुँची। देश के पारंपरिक मीडिया (गोदी मीडिया) को इस बार मज़बूरी में युवाओं के इस डिजिटल सैलाब के पीछे-पीछे चलना पड़ा।

देश की इस ‘जेन ज़ी’ पीढ़ी की अपनी एक बिल्कुल अलग, बेबाक और सहज भाषा थी; व्यंग्य, प्रतीकों और डिजिटल मीम्स से भरी हुई। उसने देश में राजनीतिक आंदोलनों के पुराने, रूखे और पारंपरिक तौर-तरीकों को पूरी तरह से तोड़ दिया। यह आंदोलन किसी राजनीतिक पार्टी का प्रायोजित कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह व्यवस्था से पूरी तरह भरोसा खो चुके करोड़ों छात्रों और युवाओं का स्वतःस्फूर्त आंदोलन बन गया। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में देश की इस डिजिटल पीढ़ी ने लोकतंत्र को सड़क और स्क्रीन—दोनों पर एक साथ जिया और जीता।

यद्यपि सरकार ने समय रहते कुछ विधिक और प्रशासनिक कदम उठाए, जिससे ज़मीनी तनाव और ज़्यादा नहीं बढ़ा। इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय लोकतंत्र की एक पुरानी, शाश्वत और संवैधानिक सच्चाई को फिर से याद दिला दिया है; देश में शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए ख़तरा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी विधिक ताक़त और सुरक्षा कवच होते हैं।

नीट (NEET) परीक्षा विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने केवल एक administrative या प्रशासनिक चुनौती मात्र नहीं थी। यह दरअसल सरकार और जनता के बीच ‘भरोसे का गंभीर संकट’ (Crisis of Trust) बन गया। देश के करोड़ों मध्यवर्गीय परिवार शिक्षा को ही अपने बच्चों के बेहतर और सुरक्षित भविष्य की इकलौती सीढ़ी मानते हैं। जब देश की उसी बुनियादी व्यवस्था पर विधिक सवाल उठते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि समूचे सिस्टम की विधिक विश्वसनीयता और पारदर्शिता कटघरे में खड़ी हो जाती है।

पिछले कई वर्षों तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर एक आत्मविश्वासी, सक्षम और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत की मज़बूत छवि गढ़ी। लेकिन नीट विवाद ने उनकी उस चमचमाती विधिक तस्वीर में एक गहरी दरार डाल दी है। पेपर लीक के पुख्ता सबूत, गड़बड़ियों के गंभीर आरोप और प्रशासनिक अव्यवस्था ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और देश की विधिक शिक्षा व्यवस्था की साख पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

लोकतंत्र में संकट आना किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए कोई असामान्य या अचरज की बात नहीं होती। सरकार की असली परीक्षा संकट के समय उसके नेतृत्व की, उसकी संवेदनशीलता और उसकी विधिक पारदर्शिता की होती है। देश की जनता सरकार की गलती से कम, लेकिन उस गलती को छिपाने, टालने या उसे साज़िश बताने के अहंकारी रवैये से ज़्यादा नाराज़ होती है। ऐसे नाज़ुक समय में केवल विधिक पारदर्शिता, मानवीय संवेदनशीलता और तेज़ प्रशासनिक कार्रवाई ही जनता का खोया हुआ भरोसा लौटा सकती है। लेकिन इस मामले में, सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया अक्सर बचाव वाली ज़्यादा और विधिक समाधान वाली कम दिखाई दी। इससे लोगों का संदेह और गहरा हुआ और जंतर-मंतर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा।

संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary Democracy) में विभाग के मंत्री कई बार अपने विभाग की ‘नैतिक ज़िम्मेदारी’ (Moral Responsibility) स्वीकार करते हुए पद छोड़ देते हैं, चाहे उनकी कोई व्यक्तिगत गलती सिद्ध न हुई हो। लाल बहादुर शास्त्री जैसे महापुरुषों के विधिक उदाहरण मौजूद हैं। ऐसे नैतिक फैसले लोकतंत्र को कमज़ोर नहीं, बल्कि विधिक रूप से मज़बूत और विश्वसनीय बनाते हैं क्योंकि वे देश की जनता को यह सर्वोच्च भरोसा देते हैं कि सत्ता अंततः जनता के प्रति जवाबदेह है।

इस विवाद ने केंद्र सरकार के लिए एक और गहरे ख़तरे की ओर विधिक संकेत किया है। लगातार भारी चुनावी सफलताएं कई बार सरकारों को यह अवांछित भरोसा दिला देती हैं कि जनता की नब्ज़ हमेशा उनके हाथ में रहेगी और जनता हमेशा उनके हर विधिक-अविधिक फैसले के साथ खड़ी रहेगी। यहीं से सत्ता के ‘आत्मविश्वास’ और ‘अति-आत्मविश्वास’ (Hubris) के बीच की विधिक रेखा धुंधली पड़ने लगती है। लोकतंत्र में विधिक सवाल पूछने वाले युवाओं को विरोधी या देशद्रोही नहीं, बल्कि चेतावनी देने वाला सच्चा साथी समझना चाहिए।

हमारी गौरवशाली भारतीय परंपरा भी यही शाश्वत संदेश देती है। सत्ता और ताक़त के मद में चूर देवराज इंद्र को अंततः एक बालक रूपी कृष्ण के सामने झुकना पड़ा था। महान देवर्षि नारद का अहंकार भी भगवान विष्णु ने तोड़ा था। रामायण का वह साधारण-सा धोबी भी यही याद दिलाता है कि एक विधिक शासक सबसे साधारण और अंतिम नागरिक की आवाज़ को भी अनसुनी नहीं कर सकता। इतिहास और पुराण दोनों गवाह हैं, अहंकार शासक की निर्णय क्षमता को धुंधला कर देता है, जबकि विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही ही सही रास्ता दिखाती है।

आज के इस डिजिटल दौर में किसी भी सरकार की आँखें और कान केवल उसके प्रशासनिक अधिकारी या खुफिया एजेंसियां नहीं होते। देश की स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं, स्वतंत्र मीडिया, निष्पक्ष विशेषज्ञ और नागरिक समाज (Civil Society) भी उतने ही महत्वपूर्ण और विधिक रूप से आवश्यक होते हैं। जब ये लोकतांत्रिक आवाज़ें अनसुनी होने लगती हैं, तब सरकारें अपने ही बनाए हुए खुशामदी घेरे में क़ैद हो जाती हैं। फिर केवल वही सुनाई देता है, जो सत्ता को अच्छा लगता है। असुविधाजनक और कड़वा सच फिर बहुत देर से सामने आता है, तब तक बहुत डैमेज हो चुका होता है।

1975 का आपातकाल (Emergency) भी तत्कालीन सत्ता और जनता के बीच बढ़ती दूरी की एक भयानक और ऐतिहासिक विधिक चेतावनी थी। विधिक परिस्थितियां आज अलग हैं, लेकिन लोकतंत्र का मूल सबक वही है; सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण, आलोचना की उपेक्षा और अति-आत्मविश्वास अंततः किसी भी मज़बूत सरकार को भारी पड़ सकते हैं।

नीट विवाद केवल एक राष्ट्रीय परीक्षा की विफलता नहीं है। यह देश की समूची शासन व्यवस्था के लिए एक कड़वी विधिक चेतावनी है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की साख केवल पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक जवाबदेही से ही बनती है। राजनीतिक ताक़त की असली और स्थाई नींव चुनावी जीत या अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि देश की जनता का अटूट भरोसा होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी इस विधिक संकट को एक अवसर में बदलने का पूरा मौका है। मज़बूत नेतृत्व का अर्थ यह कतई नहीं कि उससे कभी कोई गलती न हो। मज़बूत और ऐतिहासिक नेता वह होता है, जो अपनी गलती को विनम्रता से स्वीकार करे, दोषियों को कठोर विधिक सज़ा दे, संस्थाओं में आमूलचूल विधिक सुधार लाए और जनता की आवाज़ को पूरी ईमानदारी से सुने।

जंतर-मंतर का यह ऐतिहासिक युवा आंदोलन शायद आने वाले वर्षों में केवल नीट विवाद के लिए ही याद न रखा जाए। संभव है, स्वतंत्र भारत का इतिहास इसे उस पल के रूप में याद करे, जब भारत की इस डिजिटल पीढ़ी ने पहली बार भारतीय लोकतंत्र को एक नई भाषा, नई ऊर्जा, नई शैली और नई विधिक दिशा दी। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन जनता की आवाज़ अंततः सबसे ऊँची और सर्वोच्च होती है। चुनावी तालियां कुछ समय तक सत्ता के अहंकार का साथ दे सकती हैं, पर जनता का वास्तविक भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और संवैधानिक जवाबदेही से ही जीता जाता है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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