Article Desk, 🌐 tajnews.in | Thursday, 16 July, 2026, 08:00:00 AM IST


गांव के मोड़ से ग्लोबल दुनिया तक: अंग्रेज़ी बन रही नई ताक़त
— बृज खंडेलवाल
सुबह के ठीक आठ बजे हैं। धर्म नगरी मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक सुदूर ग्रामीण मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, कसी हुई टाई और साफ-सुथरी इस्त्री की हुई यूनिफॉर्म पहने छोटे-छोटे लड़के और लड़कियों का एक उत्साहित झुंड अपनी स्कूल बस का बड़ी उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा है। उस कतार में खड़ा कोई मासूम बच्चा कह रहा है, “Hi, how are you?” तो दूसरा बच्चा तुरंत मासूमियत से मुस्कुराकर जवाब देता है, “I am fine, thank you.” वहीं तीसरी नन्ही बच्ची अपनी सहेली की कलाई थामकर पूछती है, “Where is your project?” उनकी अंग्रेज़ी की विधिक बनावट और उच्चारण अभी बहुत साधारण और शुरुआती हो सकते हैं, मगर उनके इरादे और सपने बेहद बड़े और कूटनीतिक रूप से वैश्विक हैं।
पास ही खेत की पगडंडी पर खड़े गाँव के कुछ बुज़ुर्ग बड़ी हैरानी, अचरज और गहरे फ़ख्र के साथ उन बच्चों के बदलते संवाद को अपलक देख रहे हैं। ये वही ग्रामीण बच्चे हैं जो कुछ साल पहले तक गाँव के ही टूटे-फूटे सरकारी हिंदी स्कूल की टाट-पट्टी पर ककहरा पढ़ने जाते थे, लेकिन आज रोज़ कई किलोमीटर दूर एक चमचमाते अंग्रेज़ी माध्यम के प्राइवेट पब्लिक स्कूल की आलीशान बस पकड़ते हैं। यह सिर्फ़ किसी बच्चे का स्कूल या माध्यम बदलने की कोई सामान्य कहानी नहीं है, बल्कि यह विधिक रूप से बदलते और वैश्विक कूटनीति की ओर अग्रसर नए भारत की एक साक्षात और धरातलीय तस्वीर है।
यदि देश के सुदूर दक्षिण में कदम बढ़ाएँ, तो केरल, कर्नाटक और तमिल नाडु के अनेकों शहरों में तथा आंतरिक ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट, कॉन्वेंट और मिशनरी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की एक अभूतपूर्व भरमार दिखाई देती है। प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ऊटी के पहाड़ी रास्ते में बसे मसिनीगुडी कस्बे में एक स्थानीय स्कूली हेड मास्टर ने इस जमीनी विडंबना को टटोलते हुए बहुत बारीक विधिक टिप्पणी की, “यहाँ के सरकारी स्कूलों में स्थानीय प्रांतीय भाषा ही शिक्षा का मुख्य माध्यम है, जहां विधिक रूप से अधिकांश गरीब और वंचित तबके के बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन जिन माता-पिता के पास थोड़े भी साधन हैं, वे अपने बच्चों को भारी फीस देकर प्राइवेट स्कूलों में स्टडी कराते हैं ताकि वे फर्राटेदार अंग्रेजी सीख सकें!” गाँव-गाँव की संकीर्ण गलियों से प्राइवेट बसें सुबह-सवेरे बच्चों को दूर-दराज के स्कूलों तक विधिक रूप से ढोती हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर पेरेंट्स अपने बच्चों को केवल डोमेस्टिक करियर के लिए नहीं पढ़ाते, बल्कि उनका मुख्य विधिक लक्ष्य बच्चों को खाड़ी देशों (गल्फ कंट्रीज) या अमेरिका भेजना होता है।
अब समूचे देश का जनमानस इस कड़वे सच को पूरी तरह स्वीकार करने लगा है कि भारत में अंग्रेज़ी अब किसी औपनिवेशिक हुकूमत या ब्रिटिश साम्राज्य की छोड़ी हुई गुलामी की कोई संकीर्ण निशानी मात्र नहीं रह गई है। इसके उलट, यह समकालीन दौर में विधिक रोज़गार, ढांचागत तरक्की, वैश्विक कूटनीति और नए असीमित मौकों की सबसे बड़ी व्यावहारिक ज़ुबान बन चुकी है। देश के करोड़ों मध्यवर्गीय और गरीब भारतीय आज इसे पूरी शिद्दत से पढ़ते, समझते और दैनिक जीवन में बोलते हैं। सांख्यिकीय विधिक अनुमान बताते हैं कि देश में करीब 26 करोड़ से अधिक लोगों को अंग्रेज़ी भाषा की बुनियादी और व्यावहारिक समझ है और हर साल लाखों नए बच्चे इस भाषाई सफ़र में विधिक रूप से शामिल हो रहे हैं।
एक पुराना राजनीतिक दौर था जब अंग्रेज़ी को सिर्फ़ बड़े-बड़े महानगरों और अति-अमीर घरानों की बपौती और जागीर समझा जाता था। लेकिन सूचना क्रांति के बाद अब यह गांवों की धूल भरी गलियों तक पूरी तरह पहुंच चुकी है। गाँव का आम किसान, छोटा दुकानदार, खेतिहर मज़दूर और स्थानीय कारोबारी भी अपनी आजीविका की तंगहाली के बावजूद यही चाहता है कि उसका बच्चा हर हाल में अंग्रेज़ी सीखे। वे व्यावहारिक रूप से भली-भांति जानते हैं कि इस तेजी से बदलती कूटनीतिक दुनिया में यह भाषाई हुनर उनके बच्चों के लिए सफलता की नई विधिक राहें खोल सकता है। यही कारण है कि देश के ग्रामीण इलाकों में भी अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की संख्या में एक अप्रत्याशित विधिक उछाल दर्ज किया गया है।
देश में मिशनरी और कॉन्वेंट शिक्षा प्रणालियों ने दशकों पहले इस भाषाई आधुनिकीकरण की मजबूत विधिक बुनियाद रखी थी। बाद के वर्षों में बड़े कॉर्पोरेट निजी स्कूल, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और आईसीएसई (ICSE) से संबद्ध विधिक संस्थान तेजी से आगे आए। अब तो स्थिति यह है कि कई राज्यों की प्रांतीय सरकारें भी अपने सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई विधिक रूप से शुरू करने पर मजबूर हो चुकी हैं। करोड़ों ग्रामीण बच्चे आज इन विधिक संस्थानों में आधुनिक वैश्विक शिक्षा पा रहे हैं। इस सामाजिक बदलाव पर गंभीर टिप्पणी करते हुए सुप्रसिद्ध पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “इस भाषाई बदलाव के पीछे कोई थोपा हुआ सियासी नारा या राजनीतिक प्रोपेगैंडा नहीं है, बल्कि इसके पीछे पूर्णतः धरातलीय हक़ीक़त है। भारत जैसे अत्यधिक बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी अलग-अलग बोलियाँ और भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच एक अत्यंत मजबूत और पारदर्शी ‘साझा विधिक पुल’ बन गई है। कश्मीर से केरल तक और गुजरात से असम तक, अलग-अलग भौगोलिक प्रदेशों के नागरिक इसी एक भाषा के सहारे विधिक और व्यावसायिक रूप से आसानी से संवाद स्थापित कर लेते हैं।”
हमारी उच्च शिक्षा (Higher Education) के क्षेत्र में भी अंग्रेज़ी की विधिक अहमियत लगातार बहुत ऊंचे पायदान पर पहुंच चुकी है। आधुनिक इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान (मेडिकल), प्रौद्योगिकी, उन्नत विज्ञान, विधिक क़ानून, व्यावसायिक प्रबंधन (MBA) और गंभीर शोध (Research) की अधिकांश मानक पुस्तकें और उच्च स्तरीय अध्ययन सामग्री केवल और केवल अंग्रेज़ी में ही विधिक रूप से उपलब्ध हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़ने में भी यही भाषा भारतीय मेधा के लिए सबसे बड़ा और कूटनीतिक सहारा बनती है। भारत की वैश्विक आईटी (IT) क्रांति में अंग्रेज़ी की जो ऐतिहासिक भूमिका रही है, वह वैश्विक मंचों पर किसी से भी छिपी नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुरुग्राम जैसे चमकते सॉफ्टवेयर शहरों ने दुनिया भर की मल्टीनेशनल कंपनियों को भारत की ओर कूटनीतिक रूप से आकर्षित किया।
भारतीय युवाओं ने अपनी तकनीकी मेहनत के साथ-साथ अंग्रेज़ी संप्रेषण क्षमता (Communication Skills) के दम पर वैश्विक आउटसोर्सिंग बाज़ार में एकतरफा धाक जमाई है। आज अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर, बीपीओ (BPO), सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, अत्याधुनिक डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन ई-कॉमर्स कारोबार देश के लाखों युवाओं को सम्मानजनक रोज़गार और विधिक आजीविका दे रहे हैं। वर्तमान की इस डिजिटल और वर्चुअल दुनिया में भी अंग्रेज़ी ज्ञान एक अत्यंत अनिवार्य और अचूक चाबी साबित हो रहा है। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑनलाइन सर्टिफिकेशन कोर्स, एडवांस रिसर्च और उभरती हुई नई तकनीकों का लगभग ९० प्रतिशत से अधिक हिस्सा मूल रूप से अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। विधिक रूप से जिसे अंग्रेज़ी पर पकड़ हासिल है, उसके सामने ज्ञान और प्रगति के रास्ते स्वतः बहुत व्यापक रूप से खुल जाते हैं।
परंतु इस विधिक सत्य का मतलब यह हरगिज़ नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमारी अपनी राजभाषा हिंदी या अन्य समृद्ध भारतीय क्षेत्रीय भाषाएं किसी भी स्तर पर कमज़ोर या दोयम दर्जे की हो जाएं। अपनी मातृभाषा वास्तव में हर एक इंसान की बुनियादी विधिक पहचान, उसकी गौरवशाली संस्कृति, ऐतिहासिक सरोकारों और उसकी पैतृक जड़ों से जुड़ी होती है। अंग्रेज़ी कभी भी उस आत्मिक पहचान और सांस्कृतिक जड़ों की विधिक जगह नहीं ले सकती। असली कूटनीतिक समझदारी और बुद्धिमानी इन दोनों भाषाओं को बिना किसी हीनभावना के एक साथ लेकर चलने में है। दुनिया के कई विकसित देशों (जैसे जापान, जर्मनी या फ्रांस) के बच्चे भी अपनी समृद्ध मातृभाषा के साथ-साथ वैश्विक कूटनीति के लिए अंग्रेज़ी को बहुत सख़्ती से सीखते हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए भी यही विधिक रास्ता सबसे बेहतर और दूरदर्शी साबित हो सकता है; घर के भीतर अपनी मातृभाषा, समाज में अपनी लोक-संस्कृति और बाहरी दुनिया से व्यावसायिक रूप से जुड़ने के लिए अंग्रेज़ी—यही कूटनीतिक संतुलन हमारे भविष्य की सबसे बड़ी विधिक ज़रूरत है।
अब समय की मांग है कि हमारी सरकारें अपने सरकारी स्कूलों में भी बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा, पूर्णतः प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक डिजिटल तकनीक (स्मार्ट क्लासेस) और उत्कृष्ट पाठ्य सामग्री विधिक रूप से उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें। अंग्रेज़ी भाषा अब किसी विशिष्ट महानगर या संकीर्ण एलिट वर्ग की जागीर बनकर नहीं रहनी चाहिए। देश के सुदूर गाँव का गरीब बच्चा भी वही समान विधिक अवसर और प्लेटफॉर्म पाए जो किसी बड़े महानगर के कॉन्वेंट छात्र को विशेषाधिकार के रूप में मिलता है। भारत को यह अंग्रेज़ी भाषा भले ही एक औपनिवेशिक विरासत के रूप में मिली थी, लेकिन हमारे देश ने इसे अपनी कठोर मेहनत, कूटनीतिक कतरब्योंत और व्यावहारिक ज़रूरत के मुताबिक़ एक नया ‘भारतीय रूप’ (Indianized English) दे दिया है। आज यह कोई विदेशी भाषा कम और हमारी आंतरिक भारतीय क्षमता का एक अभिन्न हिस्सा ज़्यादा बन चुकी है। शायद इसी लिए गोवर्धन के उस ग्रामीण चौराहे पर खड़े वे छोटे-छोटे बच्चे, जो हिचकिचाते हुए बड़े चाव से कहते हैं, “Good morning, teacher,” वे सिर्फ़ चंद अंग्रेज़ी शब्द नहीं बोल रहे होते, बल्कि वे विधिक रूप से अपने स्वर्णिम भविष्य के बंद दरवाज़े पर पूरी धमक के साथ दस्तक दे रहे होते हैं। उनके अबोध होंठों पर भले कुछ साधारण अंग्रेज़ी के शब्द तैर रहे हों, लेकिन उनकी चमकीली आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बदलते कल का एक अखंड और विकसित ख़वाब साफ़ तौर पर दमक रहा होता है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।
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Pawan Singh
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