National Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 15 July, 2026, 02:45:10 PM IST.

tajnews.in | नई दिल्ली: साल 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं द्वारा दिए गए कथित नफरती भाषण (हेट स्पीच) का मामला एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। माकपा (सीपीएम) नेता वृंदा करात ने सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटिशन) दाखिल कर 29 अप्रैल के उस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है, जिसमें अदालत ने भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया था। वृंदा करात का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष और तथ्यात्मक सबूतों की विस्तृत जांच किए बिना ही यह निष्कर्ष निकाल दिया कि दोनों नेताओं के बयानों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है, जो न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से रिकॉर्ड पर एक स्पष्ट भूल है।
विधिक गलियारों और न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पूरा विवाद साल 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सीएए (CAA) विरोधी प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दिए गए भाषणों से जुड़ा है। वृंदा करात ने आरोप लगाया था कि 27 जनवरी 2020 को एक चुनावी रैली में अनुराग ठाकुर द्वारा लगवाया गया विवादित नारा और प्रवेश वर्मा द्वारा शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को लेकर दिया गया बयान सीधे तौर पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और धार्मिक समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाला था। उन्होंने इन बयानों को आईपीसी की धाराओं 153ए, 153बी, 295ए और 505 के तहत संज्ञेय अपराध बताते हुए निचली अदालत में धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने की गुहार लगाई थी। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट और बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी से धारा 196 सीआरपीसी के तहत पूर्व मंजूरी न होने के तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर दी थी।
जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 29 अप्रैल को हाई कोर्ट के पूर्व मंजूरी वाले कानूनी नजरिए को तो पलट दिया और माना कि मजिस्ट्रेट को एफआईआर का आदेश देने के लिए ऐसी मंजूरी की जरूरत नहीं है, लेकिन साथ ही पीठ ने यह भी कह दिया कि इन भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। इसी विरोधाभास को अब वृंदा करात ने अपनी समीक्षा याचिका में मुख्य आधार बनाया है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने बहस केवल इस कानूनी मुद्दे पर केंद्रित थी कि क्या धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देने से पहले पूर्व मंजूरी आवश्यक थी या नहीं। हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में साफ लिखा था कि उसने मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधे मामले के तथ्यों की विस्तृत दलीलें सुने बिना अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच जाना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में यह कहना कि भाषण में किसी खास समुदाय का नाम नहीं था, इसलिए कोई अपराध नहीं बनता, पूरी तरह गलत है। चुनाव आयोग ने अपनी जांच में इन भाषणों को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना था और सामाजिक शांति के लिए खतरनाक बताते हुए दोनों नेताओं पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। इन सारे दस्तावेजी सबूतों और वीडियो रिकॉर्डिंग की अनदेखी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीधे याचिका खारिज कर दी। अब अधिवक्ता सिलौना महापात्रा, तारा निरुला और आदित पुजारी के माध्यम से दाखिल इस समीक्षा याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह अपने पुराने निष्कर्ष को वापस ले और सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद नफरती भाषण के आरोपों के गुण-दोष पर कानून के अनुसार दोबारा विचार करे।
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Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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