जब खबर बिक गई, और सच हार गया! सत्ता के आगे घुटने टेकती पत्रकारिता

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Opinion Desk, Taj News | Monday, July 06, 2026, 07:28:15 PM IST

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

जब खबर बिक गई, और सच हार गया! सत्ता के आगे घुटने टेकती पत्रकारिता

— बृज खंडेलवाल

मीडिया की दुनिया की आज सबसे बड़ी और कड़वी हकीकत यही है कि खबर अब खबर नहीं रही। वह पूरी तरह से एक व्यावसायिक उत्पाद बन गई है; जो बाजार के नियमों के अनुसार खुलेआम बिकती है, आकर्षक ढंग से पैक होकर आती है, रंग-बिरंगी लाइटों से सजती-संवरती है, स्क्रीन पर चमकती है, और फिर प्राइम टाइम में दर्शकों के सामने गरमा-गरम परोस दी जाती है। इस पूरे तमाशे के बीच आम जनता का वास्तविक सच कहीं बहुत पीछे छूट जाता है। उसकी जगह चालाकी से कॉर्पोरेट प्रचार, टीआरपी बढ़ाने वाली सनसनी और अकूत मुनाफे के काले कारोबार ने ले ली है।

कभी भारतीय पत्रकारिता को लोकतंत्र का मजबूत चौथा स्तंभ कहा जाता था, जिस पर देश के नागरिक आंख मूंदकर भरोसा करते थे। उस दौर के स्वाभिमानी पत्रकार सत्ता के गलियारों में बैठे ताकतवर हुक्मरानों की आंखों में आंखें डालकर तीखे सवाल पूछते थे। वे जनहित के मुद्दों को उठाने के लिए विधिक रूप से जेल जाते थे, बड़े-बड़े मुकदमे झेलते थे, माफियाओं की धमकियां सहते थे, पर अपनी ईमानदार कलम को किसी के आगे झुकने नहीं देते थे। लेकिन आज की बदली हुई विधिक और आर्थिक व्यवस्था में पूरी तस्वीर डरावने ढंग से बदल चुकी है।

भारत में तानाशाहीपूर्ण लोकतंत्र के इस दौर में खबर और पीआर (प्रचार) के बीच की पारंपरिक पवित्र दीवार पूरी तरह से ढह चुकी है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता कई जगह एक ही व्यावसायिक सिक्के के दो पहलू बन गए हैं। सत्ता और बड़े औद्योगिक घराने जो कुछ भी समाज में फैलाना चाहते हैं, वही सुबह के अखबारों की मुख्य सुर्खी बन जाता है; जो कोई भी निष्पक्षता के साथ तीखे सवाल पूछता है, उसे अक्सर देशद्रोही या व्यवस्था विरोधी बताकर मुख्यधारा से पूरी तरह किनारे कर दिया जाता है।

आज के आधुनिक न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर व्यक्ति कोई रीढ़ वाला संपादक नहीं, बल्कि भारी-भरकम विज्ञापन देने वाला विज्ञापनदाता या उद्योगपति है। वही विधिक और व्यावहारिक रूप से तय करता है कि कौन-सी खबर टीवी पर प्रमुखता से चलेगी और कौन-सी जनहित की जरूरी खबर ठंडे बस्ते में दबा दी जाएगी। जिस भी खबर से बड़े कारोबारियों या शक्तिशाली राजनीतिक आकाओं के विधिक हित प्रभावित होते हों, वह अक्सर जन्म लेने से पहले ही न्यूज़रूम के भीतर ही दम तोड़ देती है।

भारत में मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब गिने-चुने कॉरपोरेट हाथों में सिमटकर पूरी तरह कैद हो चुका है। मीडिया के इस सघन एकाधिकारवादी केंद्रीकरण की सबसे ज्वलंत और चर्चित मिसाल वर्ष 2022 के आखिर में प्रमुख उद्योगपति अडानी समूह द्वारा एनडीटीवी (NDTV) और प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी आईएएनएस (IANS) का किया गया व्यावसायिक अधिग्रहण है, जिसे दुनिया भर के कई स्वतंत्र पर्यवेक्षक भारतीय मुख्यधारा मीडिया में बची-खुची स्वतंत्र संपादकीय आवाज़ों के तेजी से सिकुड़ने के एक बेहद डरावने प्रतीक के तौर पर देखते हैं।

इसी दौर में देश के भाषाई विमर्श में “गोदी मीडिया” जैसा तीखा शब्द भी बहुत तेजी से लोकप्रिय हुआ; यानी वे समाचार चैनल और अखबार जो अपनी विधिक जिम्मेदारी भूलकर केवल सत्ता-पक्ष के प्रति अपना खुला और नग्न झुकाव रखते हैं। पत्रकारिता की वैश्विक स्वतंत्रता पर बारीक नज़र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) के ‘वर्ल्ड प्रेस Freedom इंडेक्स’ की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े इस विडंबना की पुष्टि विधिक रूप से करते हैं। भारत वर्ष 2025 में 180 देशों की सूची में 151वें स्थान पर था, जो वर्ष 2026 के नए सूचकांक में और ज्यादा नीचे फिसलकर अत्यंत शर्मनाक 157वें स्थान पर आ गया है; यानी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को प्रेस की आज़ादी के मामले में अब भी “अत्यंत गंभीर” और खतरनाक श्रेणी में गिना जाता है। वैश्विक रिपोर्ट इसकी सबसे बड़ी वजहों में मीडिया के मालिकाना हक का कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों के हाथों में सघन संकेंद्रण होना, सच्चाई लिखने वाले ग्राउंड पत्रकारों पर देश भर में बढ़ती बर्बर हिंसा और उनका उत्पीड़न, तथा राजद्रोह व मानहानि जैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर के काले कानूनों का चुनी हुई सरकारों द्वारा किए जा रहे बेलगाम दुरुपयोग को प्रमुखता से गिनाती है।

इधर कूटनीतिक पीआर एजेंसियों की गहरी पैठ ने भी दैनिक पत्रकारिता का बुनियादी ढांचा पूरी तरह बदल दिया है। कॉर्पोरेट दफ्तरों से तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार और एडिट की हुई तस्वीरें, नेताओं के पहले से लिखे-लिखाए बयान और प्रोपेगैंडा वीडियो सीधे डिजिटल न्यूज़रूम के कंप्यूटरों तक व्हाट्सएप के जरिए पहुंच जाते हैं। जमीनी रिपोर्टिंग के समय की भारी कमी और विधिक रूप से फील्ड रिपोर्टरों की छंटनी कर लागत बचाने की मजबूरी में कई बड़े संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों बिना किसी फैक्ट-चेक के बड़ी खबर बनाकर देश के सामने पेश कर देते हैं।

इस संस्थागत लापरवाही का घातक नतीजा आज सबके बिल्कुल सामने है। देश के सुदूर इलाकों में कड़कड़ाती ठंड और तपती धूप में मरते किसान की असली तकलीफ मुख्यधारा की बहसों से पूरी तरह पीछे छूट जाता है। देश के करोड़ों बेरोज़गार युवाओं की लाचारी और उनकी डिग्रियों की दर्दनाक कहानी को स्क्रीन पर कहीं कोई जगह नहीं पाती। जहरीला प्रदूषण, भयानक जल संकट, बुनियादी शिक्षा और जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे गंभीर मानवीय सरोकार के मुद्दे छोटे कोने में सिमटकर दम तोड़ देते हैं, जबकि किसी कॉरपोरेट उत्पाद की चमचमाती लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की निजी पार्टी या सत्ताधारी दल के भव्य सरकारी कार्यक्रमों को घंटों का लाइव प्रसारण विधिक रूप से दे दिया जाता है।

खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) कभी इस महान पेशे की असली रीढ़ और पहचान हुआ करती थी। तब एक सच्ची और खोजी खबर भ्रष्ट सरकारें तक गिरा देती थी, देश के बड़े-बड़े विधिक घोटाले उजागर होते थे और अपराधियों में खौफ रहता था। लेकिन आज के दौर में ऐसे साहसी उदाहरण ढूंढने से भी कम दिखते हैं। इसकी एक सबसे बड़ी वजह सत्ता का चौतरफा डर और खौफ भी है; पत्रकारों पर होने वाले फर्जी मुकदमे, सरकारी एजेंसियों के कानूनी दबाव, संस्थानों का आर्थिक संकट और पलक झपकते ही नौकरी चले जाने का गहरा भय। ऊपर बताए गए अंतरराष्ट्रीय सूचकांक के डरावने आंकड़े भी इसी बात की ओर स्पष्ट विधिक संकेत देते हैं कि आज के दौर में स्वतंत्र और ईमानदार पत्रकारिता करना पहले से कहीं ज़्यादा कठिन और जानलेवा होता जा रहा है।

शाम होते ही टीवी चैनलों पर शुरू होने वाली तथाकथित बहसों का घटिया स्तर देखिए; हर शाम वही घिसे-पिटे चेहरे, वही कानफोड़ू चीख-पुकार और वही पहले से तयशुदा सांप्रदायिक संवाद। चैनलों के महंगे एंकर कई बार जनता की तरफ से निष्पक्ष सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और कार्यपालिका के अनधिकृत प्रवक्ता ज्यादा प्रतीत होते हैं। उनका पूरा प्रयास स्थापित विधिक प्रक्रियाओं की रक्षा के बजाय सत्ता के पक्ष में वकालत करना होता है। इसके परिणामस्वरूप, जो नागरिक आज़ादी और लोकतांत्रिक चेतना समाज का आधार होनी चाहिए, वह इस अनवरत हो-हल्ले में कहीं दब जाती है।

आज के दौर में तर्क की जगह केवल तमाशा बिकता है और ठोस तथ्य से ज़्यादा एंकर की तेज़ आवाज़ मायने रखती है। देश के चोटी के वैज्ञानिकों और विषय विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार स्क्रीन पर अंधविश्वास फैलाने वाले ज्योतिषियों, विवादित स्वयंभू बाबाओं और समाज में नफरत व सनसनी फैलाने वाले असामाजिक तत्वों को आसानी से मिल जाती है। सोशल मीडिया की अंधाधुंध रफ्तार ने इस गंभीर बीमारी को और ज्यादा लाइलाज बनाया है; पहले खबर की विधिक पुष्टि और फैक्ट-चेक होता था, अब खबर सही हो या गलत, उसका पहले वायरल होना व्यावसायिक रूप से ज़्यादा ज़रूरी समझा जाता है।

प्रेस की आज़ादी का असली संवैधानिक मतलब कभी सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों से कड़े सवाल पूछने की लोकतांत्रिक आज़ादी था। लेकिन आज कई जगह इसका बुनियादी मतलब पूरी तरह बदलता दिख रहा है। कुछ बड़े मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के इतने ज्यादा करीब हो गए हैं कि कोई भी जायज आलोचना उन्हें निजी तौर पर नागवार गुज़रती है। सत्ता की बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंसों में अब जनहित के सवाल कम और मंत्रियों की तारीफों के कसीदे ज़्यादा सुनाई देते हैं। कई रसूखदार नेता अब स्वतंत्र पत्रकारों के कठिन और तीखे सवालों से बचने के लिए सीधे सोशल मीडिया और एकतरफा वीडियो के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। लोकतांत्रिक संवाद की जगह अब पूरी तरह से एकतरफा तानाशाही प्रसारण ने ले ली है।

यह गहरा संकट केवल भारत का नहीं है, बल्कि दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर से आम लोगों का विधिक भरोसा लगातार घट रहा है। वैश्विक नागरिकों को अब यह साफ लगने लगा है कि खबरें पूरी तरह से निष्पक्ष कम और किसी न किसी खास राजनीतिक या कॉर्पोरेट विचारधारा की तरफ झुकी हुई ज़्यादा हो गई हैं।

हर साल देश के नामी-गिरामी मास कम्युनिकेशन कॉलेज हज़ारों नए छात्रों को पत्रकारिता की डिग्रियां देकर तैयार कर रहे हैं, पर अच्छी और जनमुखी पत्रकारिता केवल कागज की डिग्री से नहीं आती। उसके लिए अपनी मातृभाषा पर मजबूत पकड़ चाहिए, देश के इतिहास और समाज की गहरी विधिक समझ चाहिए, और सबसे बढ़कर अपने पेशे के प्रति अटूट ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस की बात यह है कि डिजिटल क्लिकों की अंतहीन दौड़, बेहद कम वेतन और नौकरी की भारी असुरक्षा ने आज के नए पत्रकारों की मानसिकता पर भी गहरा और नकारात्मक असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल कॉरपोरेट पीआर या सोशल मीडिया पर एक डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की महज़ एक सीढ़ी बनकर रह गई है।

इस पूरे मीडिया अवमूल्यन का सबसे बड़ा और जानलेवा नुकसान इस देश का आम नागरिक उठाता है। जब एक नागरिक को समाज में घट रही घटनाओं की पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तो चारों तरफ घातक अफ़वाहें फैलती हैं, पूरा समाज हिंसक खेमों में बंटता है और लोग एक-दूसरे को सुनना-समझना पूरी तरह छोड़ देते हैं। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की जो सबसे बड़ी विधिक ताकत होती है – यानी एक ‘जागरूक नागरिक’, वह मुख्यधारा मीडिया के इस प्रोपेगैंडा के कारण धीरे-धीरे एक ‘भ्रमित और हिंसक नागरिक’ में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का विधिक काम कभी भी किसी चुनी हुई सरकार को गिराना नहीं होता, बल्कि उसका काम सरकार की नीतियों की कमियों पर तीखे सवाल पूछना है। उसका काम किसी राजनीतिक दल का अंधविरोध या अंधसमर्थन करना नहीं, बल्कि देश की अंतिम कतार में खड़े गरीब जनता के हितों की विधिक हिफाज़त करना है। लेकिन जब देश का मुख्यधारा का पत्रकार ही सत्ता का दरबारी और चाटुकार बन जाए, तो फिर इस देश की मूक और बेबस जनता की असली आवाज़ कौन बनेगा?

इतिहास गवाह है कि सच बोलना और सत्ता के सामने खड़े होना कभी भी आसान नहीं रहा है, पर इतिहास इस बात की भी गवाही देता है कि दुनिया में वही समाज और राष्ट्र आगे बढ़ते हैं जहां के स्वतंत्र पत्रकार सत्ता से विधिक सवाल पूछने से कतई नहीं डरते; जहां पत्रकारों की कलम चंद रुपयों के विज्ञापनों के लिए बिकती नहीं, किसी रसूखदार के आगे झुकती नहीं, और सत्ता के आलीशान दरबार में सलाम ठोकने के बजाय पीड़ित जनता के अदने दरवाज़े पर मुस्तैदी से खड़ी रहती है।

जिस दिन देश की मुख्यधारा की खबर फिर से पूरी ईमानदारी के साथ सच की तरफ लौटेगी, ठीक उसी दिन यह पत्रकारिता भी समाज में अपनी खोई हुई विधिक इज़्ज़त और साख वापस पा लेगी। वरना देश में रोज़ाना हज़ारों टन अख़बार छपते रहेंगे, चूबीस घंटे न्यूज़ चैनल चलते रहेंगे, और लोगों के मोबाइल पर सनसनीखेज नोटिफिकेशन लगातार बजते रहेंगे, पर देश का वास्तविक सच धीरे-धीरे हमारी ही आंखों के सामने तड़पकर दम तोड़ देगा। और तब होने वाला वह सबसे बड़ा ऐतिहासिक नुकसान किसी एक संस्थान या पत्रकार का नहीं, बल्कि इस पूरे महान भारतीय लोकतंत्र का होगा।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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