हरित आंदोलन का हरा चश्मा और आगरा की धुंधली तस्वीर: कभी मिल बैठकर साझा एजेंडा और स्ट्रेटजी भी बने!
— बृज खंडेलवाल
ताजनगरी आगरा में पर्यावरण बचाने की विधिक लड़ाई पिछले कई दशकों से सिर्फ एक ही लीक पर और पुराने ढर्रे पर लगातार घूम रही है; वह विधिक तंत्र है—अदालत, सूचना का अधिकार (RTI) और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)। यथानुसार याचिका दायर होती है, न्यायपीठ से कड़ा आदेश आता है, प्रशासन पर पर्यावरणीय जुर्माना ठोक दिया जाता है, अगले दिन स्थानीय अखबारों में प्रमुखता से खबर छपती है, और फिर सब कुछ ठीक वैसे ही वहीं का वहीं ठहर जाता है। हवा वैसी ही दमघोंटू और ज़हरीली बनी रहती है, जीवनदायिनी यमुना नदी वैसी ही रासायनिक रूप से मरी हुई और सड़ी नजर आती है। साफ विधिक बात यह है कि कागजों पर बीमारी का इलाज तो खूब बढ़-चढ़कर हो रहा है, मगर जमीनी बीमारी ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही।
सर्वविदित है कि वरिष्ठ पर्यावरणविद एम.सी. मेहता की ऐतिहासिक जनहित याचिका के बाद देश में ‘ताज ट्रेपेजियम ज़ोन’ (TTZ) का विधिक गठन हुआ था। इसके विधिक दिशा-निर्देशों के तहत आगरा के सैकड़ों पारंपरिक उद्योग हमेशा के लिए बंद कर दिए गए या फिर उन्हें जबरन शहर की भौगोलिक सीमा से बाहर धकेल दिया गया। उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले कोयला और कोक जैसे पारंपरिक ईंधनों पर पूरी तरह विधिक रोक लगा दी गई। उस समय पर्यावरणविदों को बड़ी उम्मीद थी कि अब आगरा की हवा साफ होगी, और हमारी पौराणिक नदी पुनर्जीवित हो उठेगी। परंतु प्रशासनिक अदूरदर्शिता और लचर कूटनीति के कारण हुआ इसके बिल्कुल उल्टा; हज़ारों स्थानीय परिवारों का पुश्तैनी रोज़गार छीन लिया गया, उद्योग-धंधे पूरी तरह तबाह हो गए, लेकिन वायु प्रदूषण पहले से और गंदा हो गया तथा यमुना का पानी और ज्यादा संदूषित होकर सड़ गया।
आज भी आगरा का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर 100 से 150 के बीच ही असंतोषजनक रूप से झूलता रहता है। ताजनगरी की हवा में धूल के जो अति सूक्ष्म और महीन कण (PM 2.5 और PM 10) मौजूद हैं, वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तय की गई विधिक सुरक्षा सीमा से कई गुना ज़्यादा पाए जाते हैं। यही कारण है कि दुनिया का अजूबा ताजमहल कई-कई दिनों तक लगातार धूल और रासायनिक धुंध की घनी चादर में गुम रहता है, और दूर-दराज से आने वाले विदेशी पर्यटक यहाँ की खुली हवा में सांस लेने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर होते हैं। यह विधिक रूप से केवल किसी सामान्य शहर की प्रशासनिक नाकामी नहीं है, बल्कि एक वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर की अंतरराष्ट्रीय बेइज़्ज़ती है।
यमुना नदी का वर्तमान हाल तो और भी ज्यादा विडंबनापूर्ण और शर्मनाक है। शहर का करोड़ों लीटर बिना ट्रीट किया हुआ गंदा सीवर और औद्योगिक अपशिष्ट सीधे नदी की विधिक तलहटी में रोजाना उंडेला जा रहा है। पानी में जैविक और रासायनिक गंदगी का घनत्व इतना अधिक बढ़ चुका है कि नदी के कई हिस्सों में घुलनशील ऑक्सीजन (DO) का स्तर लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है; यानी अब यह कोई पवित्र नदी नहीं, बल्कि प्रशासनिक पाखंड के कारण एक बहता हुआ बदबूदार नाला मात्र बनकर रह गई है। जब जलीय जीव-जंतु ही इस प्रदूषित पानी में विधिक रूप से ज़िंदा नहीं रह सकते, तो इंसानों का इसके पास जाना तो बहुत दूर की बात है।
हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने यमुना नदी में बिना शोधन के लगातार गंदा पानी बहाने के गंभीर जुर्म पर आगरा नगर निगम पर 58.39 करोड़ रुपये का भारी-भरकम पर्यावरणीय जुर्माना (Environmental Compensation) विधिक रूप से ठोका था। देश के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में इस विधिक कार्रवाई को बरकरार रखते हुए नगर निगम प्रशासन को तत्काल 10 करोड़ रुपये अंतरिम रूप से जमा करने और आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाने का कड़ा विधिक आदेश जारी किया। ठीक है, विधिक न्यायपीठ की तरफ से कड़क कार्रवाई हुई, मगर असली और नीतिगत सवाल आज भी यही खड़ा है कि क्या सिर्फ वित्तीय जुर्माना भर देने से मृतप्राय नदी अचानक साफ हो जाएगी? यह जुर्माने का पैसा भी आखिर टैक्सपेयर जनता की गाढ़ी कमाई की जेब से ही प्रशासनिक रूप से निकाला जाएगा। जब तक दोषी अफसरों और सफेदपोश नेताओं को व्यक्तिगत (Personal Accountability) रूप से जवाबदेह ठहराकर दंडित नहीं किया जाता, तब तक ऐसे अदालती आदेश सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा ही बढ़ाते रहेंगे।
आगरा के स्थानीय हरित इतिहास को देखें तो यहाँ जोशी साहब, रमन जी, डॉ देवाशीष भट्टाचार्य, डॉ संजय चतुर्वेदी, डॉ शरद गुप्ता, डॉ मुनीश्वर गुप्ता, डॉ संजय कुलश्रेष्ठ, एडवोकेट के.सी. जैन, डॉ मुकुल पानाड्या, और जगन प्रसाद तेहरिया जैसे समर्पित लोगों ने बरसों तक पर्यावरण और ग्रीन बेल्ट की रक्षा के लिए एक विधिक लड़ाई लड़ी है। उनकी पवित्र नीयत और निस्वार्थ मेहनत पर कोई भी विवेकशील नागरिक उंगली नहीं उठा सकता। लेकिन कड़वा विधिक सच यह भी है कि यह पूरी लड़ाई आज तक मुट्ठी भर जागरूक लोगों और एक्टिविस्टों तक ही सिमट कर रह गई। अदालत से शानदार विधिक आदेश तो समय-समय पर मिलते रहे, मगर धरातल की जमीन पर उनका क्रियान्वयन शून्य ही रहा। इसी का नतीजा है कि आगरा की ऐतिहासिक कीठम झील का घना जंगल भी नहीं बच सका और शहर के प्राचीन पारंपरिक तालाब भू-माफियाओं के चंगुल में एक-एक कर घिरते चले गए। संबंधित प्रशासनिक विभागों में आपसी तालमेल का घोर अभाव है, स्थानीय नेताओं में कोई विधिक इच्छाशक्ति नहीं है, और खुद सिविल सोसाइटी के भीतर भी आपसी एकजुटता और एक साफ कूटनीतिक रणनीति की भारी कमी स्पष्ट दिखाई देती है।
शहरी नियोजन का सबसे बड़ा तमाशा यह है कि ‘ताज ट्रेपेजियम ज़ोन’ (TTZ) जैसी संवेदनशील विधिक बंदिशें लागू होने के बावजूद आगरा के चारों तरफ अवैध कॉलोनियां बेरोकटोक और धड़ल्ले से बसती गईं, हमारी हरित पट्टियां लगातार सिकुड़ती गईं, और यमुना नदी दिन-ब-दिन और अधिक मैली होती गई। अदालतों में मुकदमे चलते रहे, लापरवाह अफसर गोलमोल विधिक जवाब देते रहे, नगर निगम जुर्माना भरता रहा; लेकिन जिन जनप्रतिनिधियों को संसद और विधानसभा में इस तबाही के खिलाफ असली विधायी और विधिक जवाबदेही तय करनी थी, उनसे कभी भी जनता द्वारा सख्ती से सवाल नहीं पूछा गया। हमारा शहर बिना किसी मास्टर प्लान और दिशा के बेतरतीब बढ़ता रहा, और आधुनिक नगर नियोजन सिर्फ फाइलों के कागजों में ही क़ैद रहा।
ईमानदारी से सच कहें तो इस समूची पर्यावरणीय तबाही का पूरा दोष केवल स्वतंत्र अदालतों या मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं पर मढ़ना सरासर नाइंसाफी होगी। इसकी असली और प्राथमिक विधिक ज़िम्मेदारी हमारे राजनीतिक नेतृत्व और शासकीय शासन की है। लेकिन इसके साथ ही, आगरा के हरित आंदोलन को भी आत्ममंथन के आईने में अपनी शक्ल बहुत साफ़ तौर पर देखनी होगी। सिर्फ अदालत के विधिक भरोसे बैठे रहना और मुकदमों के सहारे पर्यावरण बचाना अब कतई चलने वाला नहीं है। अब आम जनता को इस आंदोलन के साथ सीधे जोड़ना होगा, एक प्रखर जनमत तैयार करना होगा, राजनीतिक दलों पर लोकतांत्रिक व विधिक दबाव बनाना होगा, और पूरी तरह एक आधुनिक वैज्ञानिक सोच के साथ शहर के सतत विकास की योजना तैयार करनी होगी; वरना विडंबनाओं का यही आत्मघाती चक्र बार-बार दोहराता रहेगा।
हमारी अदालतें केवल विधिक इंसाफ़ की राह दिखा सकती हैं, वे धरातल पर प्रत्यक्ष शासन नहीं चला सकतीं। आज आगरा को अनंत मुकदमों की फाइलों से ज़्यादा एक जवाबदेह राजनीति, एक बेहद ईमानदार प्रशासन और संप्रभु जनता की सक्रिय जनभागीदारी की तत्काल आवश्यकता है। तभी पर्यावरण बचाने की यह पवित्र मुहिम सच में धरातल पर कामयाब होगी, और आगरा की यह धुंधली तस्वीर विधिक रूप से साफ़ हो पाएगी। अब वक्त सिर्फ बंद कमरों में मुकदमे लड़ने का नहीं है, बल्कि साफ नीयत और जमीन पर कड़ा अमल दिखाने का है। आम जनता को धरातल पर लामबंद किए बिना कोई भी बड़ा ढांचागत बदलाव संभव नहीं है; वरना हर कोई अपनी-अपनी संकीर्ण ढोलक बजाता रहेगा, अपना-अपना राग गाता रहेगा, और हमारा यह ऐतिहासिक शहर प्रदूषण की इसी जहरीली धुंध में हमेशा के लिए डूबा रहेगा। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता।