कब तक पुकारें? प्रिय आगरा के नेताओं, कुछ तो शर्म करो : बृज खंडेलवाल

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आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | बुधवार, 2 सितंबर 2026, 04:00:00 AM IST

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कब तक पुकारें? प्रिय आगरा के नेताओं, कुछ तो शर्म करो

अब ताज की आड़ में मत छिपिए! नया टूरिस्ट सीजन शुरू होने को है | बृज खंडेलवाल द्वारा | 2 सितंबर 2026

प्रमुख अंश (Highlights):

  • पर्यटन सीजन से पहले तीखे सवाल: अक्टूबर से शुरू हो रहे नए टूरिस्ट सीजन से पूर्व ताजनगरी के बदहाल बुनियादी ढांचे, जलभराव और गड्ढों पर नेताओं को घेरा।
  • प्रचंड जनादेश और जवाबदेही: आगरा की सभी 9 विधानसभा, दोनों लोकसभा और नगर निगम में भाजपा की जीत के बावजूद यमुना प्रदूषण और सड़कों के धंसने पर सवाल।
  • यमुना और सीवेज प्रबंधन की विफलता: प्रतिदिन 280-300 एमएलडी सीवेज उत्पादन के बीच नालों की अधूरी टैपिंग और करोड़ों रुपये के बजट के बाद भी नदी की बदहाली।
  • स्मार्ट मेकअप बनाम जमीनी विकास: केवल दीवारों की रंगाई-पुताई और फीता काटने के बजाय ड्रेनेज, मजबूत सड़कों और ट्रैफिक के स्थायी समाधान की पुरजोर मांग।

ताजमहल बेशक चमक रहा है। मगर आगरा परेशान है। दुनिया ताज की तस्वीरें खींचती है। आगरा के लोग गड्ढों, जाम, गंदे नालों, सीवर, जलभराव और धूल की तस्वीरें खींच रहे हैं।

प्रिय आगरा के नेताओं और शहरी नियोजकों, अब फैसला आपको करना है: आप ताज को बचा रहे हैं या सिर्फ ताज की चमक को बेच रहे हैं?

अक्टूबर से पर्यटन सीजन शुरू होगा। देश-विदेश से लाखों लोग आगरा आएंगे। उन्हें ताजमहल तो शानदार मिलेगा। लेकिन उसके आसपास का शहर क्या उन्हें शर्मिंदा करेगा?

आप के पास बहाने नहीं, सत्ता है।

2022 में भाजपा ने आगरा की सभी नौ विधानसभा सीटें जीतीं। दोनों लोकसभा सीटें भी भाजपा के पास हैं। नगर निगम में भी भाजपा का नेतृत्व है।

इतना मजबूत राजनीतिक जनादेश किसी भी शहर को बदलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

फिर सवाल उठता है:
यमुना अब भी गंदी क्यों है?
सड़कें बार-बार क्यों धंसती हैं?
हर बारिश में शहर क्यों डूबता है?
ट्रैफिक रोज क्यों रेंगता है?

जनादेश सिर्फ कुर्सी नहीं देता।
जनादेश जवाबदेही भी देता है।

यमुना: घोषणाओं की नदी

यमुना के नाम पर योजनाएं बनती रही हैं। करोड़ों रुपये स्वीकृत होते रहे हैं। एसटीपी बनते रहे हैं। नालों की टैपिंग के निर्देश जारी होते रहे हैं।

लेकिन नदी आज भी सीवर ढो रही है।

आगरा रोज करीब 280-300 एमएलडी सीवेज पैदा करता है। नई उपचार क्षमता जुड़ रही है। फिर भी सभी नालों का पूरा इंटरसेप्शन और एसटीपी का लगातार मानकों के अनुसार संचालन अभी अधूरा है।

तो सवाल सीधा है?
पैसा कहां गया, काम कितना हुआ और नदी कब साफ होगी?

यमुना को एक और योजना नहीं चाहिए। उसे परिणाम चाहिए।

जब पार्षद को नाले में उतरना पड़े

जून में एक पार्षद ने गंदे नाले में खड़े होकर अपना जन्मदिन मनाया। उनका दावा था कि तीन साल में 30 से ज्यादा शिकायतें देने के बावजूद समस्या जस की तस रही।

तस्वीर वायरल हुई। सवाल भी उठा।

लेकिन असली सवाल यह है:
क्या किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी ही व्यवस्था जगाने के लिए नाले में उतरना चाहिए?

अगर पार्षद की शिकायत नहीं सुनी गई, तो आम आदमी किस उम्मीद से दरवाजा खटखटाए?

सड़कें विकास की परीक्षा हैं

अगस्त की बारिश में कई जगह सड़कें धंस गईं। कहीं विशाल गड्ढे बने। कहीं एक महीने में दूसरी या तीसरी बार सड़क बैठ गई।

अधिकारी कभी सीवर लीकेज, कभी पाइपलाइन को कारण बताते हैं।

लेकिन जनता पूछ रही है:
सड़क बनाने से पहले नीचे की जमीन और पाइपलाइन किसने जांची?
किसने डिजाइन मंजूर किया?
किसने गुणवत्ता प्रमाणित की?
किस ठेकेदार ने काम किया?
गारंटी क्या थी?
और सड़क टूटने पर जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

हर बार सड़क बनाना समाधान नहीं है।
पहले यह पता लगाइए कि सड़क बार-बार टूट क्यों रही है।

हर मानसून शहर क्यों डूबता है?

बालूगंज से दयालबाग तक। शास्त्रीपुरम से आईएसबीटी तक। यमुना किनारे से वीआईपी रोड तक।

बारिश होते ही कई सड़कें तालाब बन जाती हैं।

फिर वही दृश्य: जाम, डूबे वाहन, दुकानों में पानी और परेशान नागरिक।

क्या बारिश अचानक होती है?
नहीं।
मानसून हर साल आता है।
फिर तैयारी हर साल अधूरी क्यों रहती है?

यह मौसम की समस्या कम और शहरी नियोजन की विफलता ज्यादा है।

ट्रैफिक: डायवर्जन कोई नीति नहीं

आगरा में ट्रैफिक प्रबंधन अक्सर डायवर्जन के भरोसे चलता है।

त्योहार आया: डायवर्जन।
धार्मिक आयोजन हुआ: डायवर्जन।
भारी वाहन बढ़े: डायवर्जन।
पर्यटक बढ़े: फिर डायवर्जन।

लेकिन कब बनेगा स्थायी समाधान?

आगरा को चाहिए:
एक दीर्घकालिक मोबिलिटी प्लान।
बेहतर सार्वजनिक परिवहन।
व्यवस्थित पार्किंग।
सुरक्षित फुटपाथ।
पैदल पर्यटकों के लिए रास्ते।
बेहतर ट्रैफिक सिग्नल समन्वय।

एक विश्वस्तरीय पर्यटन शहर जुगाड़ से नहीं चलता।
वह योजना से चलता है।

शहरी नियोजकों से भी हिसाब चाहिए

सारी जिम्मेदारी नेताओं की नहीं है।
नगर नियोजक, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और संबंधित विभाग भी उतने ही जवाबदेह हैं।

क्या मास्टर प्लान आज की आबादी और वाहनों के हिसाब से तैयार है?
क्या नए निर्माण से पहले जलनिकासी की क्षमता देखी जाती है?
क्या तालाब, प्राकृतिक नाले और जलमार्ग सुरक्षित हैं?
क्या फुटपाथ वास्तव में पैदल चलने वालों के लिए हैं?
क्या शहर कारों के लिए बनाया जा रहा है या नागरिकों के लिए?

अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो विकास किस दिशा में जा रहा है?

स्मार्ट सिटी या स्मार्ट मेकअप?

नई दीवार। नया रंग। नया गेट। नया उद्घाटन।

फोटो खिंचती है। खबर छपती है। फीता कटता है।

लेकिन क्या इससे सीवर रुकता है?
क्या इससे जलभराव खत्म होता है?
क्या इससे ट्रैफिक कम होता है?
क्या इससे सड़क मजबूत होती है?

सजावट विकास नहीं है।
आगरा को फोटो के लिए सुंदर नहीं, जीवन के लिए बेहतर बनाना होगा।

अब हर नेता से एक सवाल

अक्टूबर में पर्यटक आएंगे।
इसलिए आगरा के हर सांसद, विधायक, मेयर और पार्षद से पूछिये।

एक अक्टूबर तक क्या बदलेगा?
कौन-से नाले पूरी तरह टैप होंगे?
कौन-से एसटीपी पूरी क्षमता से चलेंगे?
कौन-सी सड़कें स्थायी रूप से ठीक होंगी?
कहां जलभराव खत्म होगा?
ट्रैफिक के लिए क्या स्थायी कदम उठेंगे?
कितने पार्क और तालाब बचेंगे?

हर घोषणा के साथ समयसीमा हो। जिम्मेदार अधिकारी का नाम हो। प्रगति की सार्वजनिक रिपोर्ट हो।

और अगर काम नहीं हुआ?
तो जिम्मेदारी भी सार्वजनिक हो।

व्हाट्सऐप से आगे बढ़िए

आगरा के नागरिक भी अब सिर्फ शिकायतकर्ता न रहें।

हर गड्ढे की तस्वीर डालना काफी नहीं है। हर बारिश में वीडियो बनाना काफी नहीं है। हर बार व्हाट्सऐप पर गुस्सा निकालना भी काफी नहीं है।

सवाल पूछिए।
जनसुनवाई मांगिए।
समयसीमा मांगिए।
प्रगति रिपोर्ट मांगिए।

लोकतंत्र में वोट पांच साल में एक बार पड़ता है। सवाल हर दिन पूछा जा सकता है।

ताजमहल को किसी प्रचार की जरूरत नहीं है।
उसे बनाने वाले लोग सदियों पहले चले गए। उसकी खूबसूरती आज भी कायम है।

अब आज के नेताओं की बारी है।

वे इतिहास में क्या छोड़ेंगे?
एक और उद्घाटन पट्टिका?
या ऐसा आगरा, जहां यमुना साफ हो, सड़कें मजबूत हों, बारिश में शहर न डूबे, ट्रैफिक चले और नागरिक सम्मान से जी सकें?

ताज दुनिया की धरोहर है।
आगरा यहां के लोगों का घर है।

ताज को दुनिया बचा लेगी।
आगरा को उसके नेताओं और नागरिकों को बचाना होगा।

अब ताज की चमक के पीछे छिपने का वक्त खत्म हुआ।

प्रिय नेताओं,
ताज की तस्वीरें बहुत हो गईं।
अब आगरा का रिपोर्ट कार्ड दिखाइए।

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व पर्यावरणविद्
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल आगरा के नागरिक सरोकारों, यमुना प्रदूषण, धरोहर संरक्षण और शहरी नियोजन की विफलताओं पर दशकों से निरंतर बेबाक व शोधपरक स्तंभ लिखते रहे हैं।

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