यमुना कोई खाली ज़मीन नहीं, एक जीवित नदी है: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप स्वागतयोग्य, लेकिन सरकारी लापरवाही अक्षम्य है

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Thursday, 23 July, 2026, 03:19:01 PM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

यमुना कोई खाली ज़मीन नहीं, एक जीवित नदी है: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप स्वागतयोग्य, लेकिन सरकारी लापरवाही अक्षम्य है

— बृज खंडेलवाल

आख़िरकार देश की सर्वोच्च अदालत को एक बार फिर कड़ा विधिक दख़ल देना ही पड़ा। यह मामला केवल पावन धाम वृंदावन में प्रस्तावित विवादित रिवर फ्रंट परियोजना के अनियंत्रित निर्माण कार्य पर तत्कालिक रोक लगाने भर का नहीं है। यह असल में हमारे प्रशासनिक ढांचे की उस अत्यंत खतरनाक और संकीर्ण सोच पर एक करारा प्रहार है जो एक जीवित, पवित्र और पौराणिक नदी को केवल एक खाली पड़ी ज़मीन का टुकड़ा मानती है, जिस पर जब मन चाहे भारी-भरकम सीमेंट, गर्डर और कंक्रीट का कफ़न बिछा दिया जाए।

देश की सर्वोच्च अदालत ने बृज वृंदावन देवालय समिति द्वारा दायर जनहित याचिका पर बेहद गंभीर विधिक सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक केशी घाट के पास धड़ल्ले से चल रहे अवैध निर्माण कार्य पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी है। इसके साथ ही न्यायपीठ ने उत्तर प्रदेश शासन और केंद्र सरकार को सख़्त निर्देश देते हुए छह सप्ताह के भीतर विस्तृत और पारदर्शी विधिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। यदि माननीय अदालत समय रहते यह विधिक हस्तक्षेप नहीं करती, तो दूर-दराज से लाई जा रही मलबे वाली मिट्टी से भरा जा रहा विशाल प्लेटफॉर्म यमुना नदी के एक और अत्यंत संवेदनशील हिस्से को हमेशा-हमेशा के लिए कंक्रीट के नीचे दफ़ना देता।

यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में कोई पहला मौका नहीं है जब न्यायपालिका को हमारी कार्यपालिका और सरकारी तंत्र की आपराधिक नाकामी की भरपाई करने के लिए आगे आना पड़ा हो। पिछले एक दशक से अधिक समय से देश की अदालतें बार-बार यमुना नदी की अस्तित्व रक्षा के लिए विधिक ढाल बनकर खड़ी हो रही हैं, जबकि विभिन्न राज्य और केंद्र सरकारें तथाकथित विकास की आड़ में इस जीवनदायिनी नदी का गला घोंटने में निर्लज्जता से लगी हुई हैं।

विधिक संदर्भों पर गौर करें तो वर्ष 2015 में ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने यमुना के आधिकारिक रूप से चिन्हित बाढ़ क्षेत्र (Floodplain Zone) में हर प्रकार के स्थायी व अस्थायी निर्माण पर पूर्ण विधिक पाबंदी लगा दी थी। उस दौरान बाढ़ क्षेत्र में बने सभी अवैध निर्माणों की पहचान कर उन्हें तत्काल ध्वस्त करने के कड़े आदेश भी जारी किए गए थे। इसके पश्चात देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेक मामलों में स्पष्ट और दोटूक शब्दों में कहा कि नदी का यह बाढ़ क्षेत्र उसका अभिन्न प्राकृतिक शरीर है, न कि किसी बिल्डर या ठेकेदार का निर्माण स्थल। यहाँ तक कि दिल्ली पुलिस को भी बाढ़ क्षेत्र की भूमि पर सुरक्षा बैरक बनाने की विधिक अनुमति नहीं दी गई थी। अदालत ने उस समय प्रशासनिक तंत्र से तीखा सवाल पूछा था कि जब मानसून में बाढ़ का पानी स्वयं सुप्रीम कोर्ट परिसर के मुख्य द्वारों तक पहुँच चुका है, तब कोई भी संस्था उस बाढ़ क्षेत्र में निर्माण करने की आत्मघाती ज़िद कैसे कर सकती है?

हाल ही के विधिक घटनाक्रमों में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी यमुना के संवेदनशील बाढ़ क्षेत्र में अवैध रूप से बसाई गई कॉलोनियों को पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी घोषित करते हुए वहाँ नए निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियों और मरम्मत कार्यों तक पर पूर्ण विधिक रोक लगा दी थी। यह साफ़ और प्रामाणिक ब्योरा सिद्ध करता है कि हमारी न्यायपालिका बार-बार उसी शाश्वत सत्य को दोहरा रही है जिसे सरकारी तंत्र और जनप्रतिनिधि कतई सुनना ही नहीं चाहते; बाढ़ का मैदान नदी का प्राकृतिक शरीर है, और उस पर कंक्रीट का कब्ज़ा करना पर्यावरण के विरुद्ध अक्षम्य अपराध है।

अगर आज भयानक कंक्रीटकरण के इस दौर में भी यमुना के बाढ़ क्षेत्र का थोड़ा-बहुत हिस्सा विधिक रूप से बचा हुआ है, तो उसका श्रेय किसी भी सरकार या प्रशासनिक विभाग को नहीं जाता, बल्कि इसका संपूर्ण श्रेय हमारे जागरूक नागरिकों, पर्यावरणविदों और समर्पित सिविल सोसाइटी को जाता है। ताजनगरी आगरा का ‘रिवर कनेक्ट अभियान’, दिल्ली का ‘यमुना जिए अभियान’, वृंदावन के पर्यावरण प्रेमी और अनेक निष्पक्ष सामाजिक संगठन दशकों से बिना किसी सरकारी इमदाद के अदालतों के दरवाज़े खटखटा रहे हैं। इन सजग कार्यकर्ताओं ने जमीनी सबूत जुटाए, जनहित याचिकाएँ दायर कीं और हर उस तथाकथित विकास परियोजना को विधिक चुनौती दी जो इस पौराणिक नदी के वजूद के लिए ख़तरा बन रही थी। विद्वान अधिवक्ता राहुल चौधरी और आकाश वशिष्ठ जैसे विधिक योद्धाओं ने वर्षों तक बिना किसी स्वार्थ के अदालती कमरों में यह ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी है। यह पवित्र संघर्ष बिना किसी मीडिया प्रचार और सरकारी आर्थिक मदद के अनवरत चलता रहा। कड़वा सच तो यह है कि आज यमुना की जो थोड़ी-बहुत कानूनी सुरक्षा बची है, वह हमारे नागरिक समाज की अटूट निष्ठा की बदौलत है, किसी भी सरकार की मेहरबानी से नहीं।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के आधिकारिक विश्लेषणों के अनुसार, यमुना नदी की वर्तमान तस्वीर बेहद ख़ौफ़नाक और भयावह है। यमुना में गिरने वाले कुल जहरीले औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा केवल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के महज 22 किलोमीटर लंबे संकीर्ण हिस्से में नदी में उंडेला जाता है। वहाँ पानी में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर कई मौसमों में घटकर शून्य तक पहुँच जाता है, जो जलीय जीवन के लिए साक्षात मौत है। देश का सुप्रीम कोर्ट भी इस भयावह स्थिति पर अनेक बार अपनी गंभीर चिंता व्यक्त कर चुका है। वहीं दूसरी ओर, धार्मिक नगरी मथुरा और पावन वृंदावन में भी रोज़ाना करोड़ों लीटर बिना शोधन (Untreated) का बदबूदार सीवर सीधे यमुना की अविरल धारा में बहाया जा रहा है।

अब सबसे बड़ा और नीतिगत सवाल यह खड़ा होता है कि पिछले दस से अधिक वर्षों के दौरान ‘नमामि गंगे’ जैसी बहुप्रचारित और महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय योजना के नाम पर सरकारी खजाने से हज़ारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जाने के बावजूद आज तक यमुना की जमीनी हालत क्यों नहीं सुधरी? यह पवित्र नदी आज भी दुनिया की सबसे प्रदूषित और मृतप्राय नदियों की सूची में शर्मनाक रूप से गिनी जाती है। नदी के भीतर की पारंपरिक मछलियाँ ख़त्म होती जा रही हैं, दुर्लभ प्रवासी पक्षियों का बसेरा उजड़ रहा है, जलीय जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो चुकी है, बाढ़ क्षेत्र सिकुड़ रहा है और भू-माफियाओं का अतिक्रमण बेरोकटोक बढ़ रहा है। दूसरी ओर, हमारे लापरवाह प्रशासनिक अधिकारी केवल रंग-बिरंगी टाइल्स लगे नए घाटों पर फीते काटकर और तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त हैं। नदी की असली जानलेवा बीमारी को कालीन के नीचे छिपाकर केवल बाहरी चेहरा चमकाने के इस दिखावटी पाखंड से नदी कभी नहीं बचेगी।

फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के वरिष्ठ संयोजक जगन्नाथ पोद्दार का इस पर स्पष्ट रूप से कहना है कि ‘वृंदावन रिवर फ्रंट’ की यह परियोजना प्रशासनिक पाखंड का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसे वर्षों पहले नदी तट के विस्तार और भव्य सौंदर्यीकरण के नाम पर सरकारी विज्ञापनों में पेश किया गया था। उस समय भी इस प्रकृति-विरोधी योजना पर विभिन्न उच्च अदालतों ने गंभीर विधिक सवाल खड़े किए थे। लेकिन अब पुनः उसी घातक परियोजना को नए रूप और नए बजट के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका सीधा और स्पष्ट तात्पर्य यह है कि देश के प्रतिष्ठित जल-वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सर्वोच्च अदालतों की गंभीर चेतावनियों का हमारे संवेदनहीन सरकारी तंत्र पर कोई असर नहीं पड़ा। आज भी नदियों के कायाकल्प की योजनाएँ कोई पर्यावरणविद या जल विशेषज्ञ तय नहीं कर रहे, बल्कि ठेकेदार, कॉरपोरेट बिल्डर और बुलडोज़र चलाने वाले माफिया तय कर रहे हैं।

विश्व के अनेक आधुनिक और विकसित शहर अब अपनी प्राकृतिक नदियों को कंक्रीट के शिकंजे से मुक्त कर पुनः खुला बहने की स्वतंत्रता दे रहे हैं। विदेशी महानगरों में नदियों के किनारे बनाई गई कंक्रीट की कृत्रिम दीवारें तोड़ी जा रही हैं ताकि नदियाँ अपने मूल प्राकृतिक और पारिस्थितिक स्वरूप में लौट सकें। लेकिन हमारे देश भारत में नीतिगत तस्वीर बिल्कुल उलटी दिखाई देती है। यहाँ आधुनिकता और पर्यटन विकास के नाम पर बहती हुई नदी को सीमेंट की ऊँची दीवारों और चौड़े-चौड़े कंक्रीट प्लेटफॉर्मों के बेजान पिंजरे में कैद किया जा रहा है। हमारे हुक्मरान इसे विकास का नाम दे रहे हैं, जबकि यह प्रत्यक्ष रूप से प्रकृति और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का भयावह विनाश है।

प्रतिष्ठित जनचिंतक प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी बिल्कुल सटीक कहते हैं कि संपूर्ण ब्रजमंडल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान केवल और केवल पावन यमुना महारानी से है। यदि यमुना की अविरल धारा ही सूखकर मर गई, तो ब्रज के प्राचीन घाट, ऐतिहासिक मंदिर, पवित्र परिक्रमा, हमारी समृद्ध संस्कृति और करोड़ों भक्तों की आस्था सब अपनी वास्तविक रूह खो देंगे। बिना जीवंत नदी के यह ब्रज केवल पत्थरों और ईंट-गारे की इमारतों का एक बेजान शहर बनकर रह जाएगा।

अब उत्तर प्रदेश सरकार और उसके प्रशासनिक अधिकारियों के पास कागजी बहाने बनाने या ढोल पीटने का बिल्कुल भी वक़्त नहीं बचा है। शासन को यह दिखावटी और प्रतीकात्मक सौंदर्यीकरण का खेल बंद कर धरातल पर असली काम करना होगा। मथुरा, वृंदावन और आगरा में बिना शोधन के गिर रहा सीवर का एक-एक कतरा तुरंत रोका जाए। यमुना में अपर-स्ट्रीम (हथिनीकुंड बैराज) से पर्याप्त न्यूनतम पर्यावरणीय जल प्रवाह (Environmental Flow) विधिक रूप से सुनिश्चित किया जाए। बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) में बने सभी अवैध कंक्रीट निर्माणों और कब्ज़ों को सख़्ती से हटाया जाए। करोड़ों की लागत से बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों (STP) को उनकी पूर्ण क्षमता के साथ 24 घंटे संचालित किया जाए और नदी को पुनः सांस लेने की अपनी प्राकृतिक जगह वापस दी जाए।

देश के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केशी घाट पर हो रहे इस बड़े विनाश पर अपनी विधिक रोक लगा दी है। एनजीटी और विभिन्न उच्च न्यायालय वर्षों से इसके लिए मजबूत कानूनी आधार तैयार कर चुके हैं। हमारे निस्वार्थ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी अपना नागरिक फ़र्ज़ पूरी ईमानदारी से निभाया है। अब सबसे बड़ा और सुलगता सवाल उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से है; क्या वे अदालतों की इस विधिक चेतावनी और जनता की कराहती आवाज़ को गंभीरता से सुनेंगे, या फिर विकास के इस अंधे नाम पर यमुना को हमेशा-हमेशा के लिए मिटाने का यह अंतहीन सिलसिला यूं ही जारी रहेगा? यदि हमें अपने ब्रज और अपनी धरोहरों को बचाना है, तो हर हाल में यमुना को बचाना होगा। क्योंकि जब कोई ऐतिहासिक नदी मरती है, तो केवल उसका पानी नहीं सूखता, बल्कि उसके साथ एक पूरी जीवंत सभ्यता, सदियों पुरानी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों का स्वर्णिम भविष्य भी हमेशा के लिए गंदे गटर में बह जाता है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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