हैप्पी डॉक्टर्स डे: सफ़ेद कोट पर काले दागों का सच
क्या इलाज अब इंसानियत का फ़र्ज़ रह गया है, या मुनाफ़े का धंधा?
— बृज खंडेलवाल
अस्पताल का दरवाज़ा खुलते ही हर इंसान अपनी जान डॉक्टर के हवाले कर देता है। उसे यक़ीन होता है कि अब उसकी ज़िंदगी महफ़ूज़ है। लेकिन जब वही अस्पताल उम्मीद की जगह मातम का घर बन जाए, तो सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या इलाज अब इंसानियत का फ़र्ज़ रह गया है, या सिर्फ़ मुनाफ़े का धंधा बनता जा रहा है? हर साल 1 जुलाई को भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। यह उन लाखों डॉक्टरों को सलाम करने का दिन है, जो दिन-रात मरीजों की ख़िदमत करते हैं। लेकिन यही दिन हमें चिकित्सा व्यवस्था के उस चेहरे से भी रूबरू कराता है, जिसे देखकर भरोसा डगमगाने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल लापरवाही के ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। यह सिर्फ़ कुछ डॉक्टरों की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कमज़ोरियों, जवाबदेही की कमी और बढ़ते बाज़ारीकरण की कहानी है।
अनुराधा साहा से लेकर जयपुर की राधा शर्मा और एर्नाकुलम में संध्या अनुप तक, मेडिकल लापरवाही के ये मामले सिस्टम की विफलता को दर्शाते हैं। कहीं पेट में कपड़ा छूट जाना, तो कहीं गलत बीमारी का इलाज जानलेवा बन जाता है। दूसरी तरफ़, झोलाछाप डॉक्टरों का आतंक भी कम नहीं है। समस्या की जड़ मेडिकल शिक्षा में भी छिपी है। हर साल लगभग 23 लाख छात्र नीट परीक्षा देते हैं, लेकिन सरकारी सीटें सीमित हैं। निजी कॉलेजों की करोड़ों की फीस छात्रों को मुनाफ़े की दौड़ में शामिल होने पर मजबूर करती है। जब डॉक्टर बनने की शुरुआत ही भारी कर्ज़ से होती है, तो कई छात्र उस कर्ज़ की भरपाई को ही अपना प्राथमिक लक्ष्य बना लेते हैं।
ग्रामीण बनाम शहरी चिकित्सा ढांचा
कागज़ों पर भारत में डॉक्टरों की संख्या संतोषजनक दिखाई देती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। बड़े शहरों में डॉक्टरों की भरमार है, जबकि ग्रामीण भारत आज भी एक अच्छे डॉक्टर के लिए तरस रहा है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में सर्जन, फिज़ीशियन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और बच्चों के डॉक्टरों की भारी कमी है। बेहतर वेतन और सुविधाओं की तलाश में युवा डॉक्टर विदेश का रुख कर रहे हैं, जिसका सीधा नुकसान आम मरीज को उठाना पड़ रहा है।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, निजी अस्पतालों पर मरीजों का भरोसा लगातार कम हो रहा है। ज़रूरत से ज़्यादा टेस्ट, महंगी दवाइयाँ, अनावश्यक सर्जरी और आईसीयू में मरीजों को लंबे समय तक रखकर भारी-भरकम बिल बनाने की शिकायतें आम हो चुकी हैं। दवा कंपनियों और पैथोलॉजी लैब्स से मिलने वाले कमीशन की चर्चाएँ अब कोई गुप्त बात नहीं रहीं। साल 2025 में मेडिकल लापरवाही के दर्ज 65 हज़ार मामले इस गंभीर समस्या का केवल एक छोटा सा हिस्सा भर हैं।
सुधार की राह: क्या मुमकिन है बदलाव?
यह सच है कि देश के अधिकांश डॉक्टर ईमानदारी और लगन से काम कर रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में सीमित संसाधनों के बीच जूझते डॉक्टर किसी फ़रिश्ते से कम नहीं हैं। लेकिन कुछ लोगों की ग़लतियों ने पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सुधार के लिए अस्पतालों में इलाज की जानकारी और खर्च का स्पष्ट विवरण पहले से लिखित में देना अनिवार्य होना चाहिए। लापरवाही पर तेज़ और निष्पक्ष कार्रवाई के साथ-साथ मेडिकल शिक्षा में नैतिकता व मानवीय मूल्यों पर ज़ोर देना होगा। डॉक्टर्स डे सिर्फ़ बधाई देने का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। सफ़ेद कोट सम्मान का प्रतीक है, और इसे मुनाफ़े के दागों से मुक्त रखना ही आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
(लेखक आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के संस्थापक हैं।)