गोदी से लठैत भये, Public लीने दौड़ाय! : राजेंद्र शर्मा

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Thursday, 6 August, 2026, 07:15:00 PM IST.

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Rajendra Sharma
राजेंद्र शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार व संपादक
हिंदी के शीर्षस्थ राजनैतिक व्यंग्यकार, प्रखर पत्रकार और संपादक राजेंद्र शर्मा अपनी मारक, चुटीली और समकालीन टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। ‘लोक लहर’ के संपादक शर्मा ने समकालीन राजनीति, सामाजिक विद्रूपताओं और जन-आंदोलनों पर सैकड़ों कालजयी व्यंग्य व विश्लेषणात्मक आलेख लिखे हैं।

गोदी से लठैत भये, पब्लिक लीने दौड़ाय! : राजेंद्र शर्मा

जंतर-मंतर पर केंद्रित ‘जेन जी’ के हाल के ऐतिहासिक आंदोलन के लगभग सभी निष्पक्ष प्रेक्षकों ने युवाओं की इस विशाल गोलबंदी की अन्य प्रमुख विशेषताओं के अलावा एक सबसे खास बात अनिवार्य रूप से नोट की है। और यह खासियत है, मुख्यधारा के कॉर्पोरेट मीडिया के प्रति युवाओं का खुला बैर-भाव और आक्रोश। तथाकथित गोदी मीडिया और उसमें भी खासतौर पर टीवी खबरिया चैनलों ने शुरुआत से ही इस युवा आंदोलन का विरोध करने और इसे दबाने की नकारात्मक भूमिका अपनाई। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के पहले एक दिवसीय धरने के समय, इंटरनेट पर उसके करोड़ों समर्थकों में से, कुछ हजार लोगों के ही जुटने के भ्रामक प्रचार के जरिए, युवाओं की इस नई कोशिश को पूरी तरह खारिज करने पर सारा जोर लगा दिया गया। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और गोदी मीडिया के इस आपराधिक चरित्र का पर्दाफाश होना बेहद जरूरी है। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

लेकिन, बाद में जब जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया और हफ्ते भर बाद अनिश्चितकालीन भूख हड़तालों का सिलसिला शुरू हुआ, तो गोदी टीवी चैनलों ने आम तौर पर इस आंदोलन को पूरी तरह अनदेखा करने की ही सोची-समझी रणनीति अपनाई। यह तब हो रहा था, जब सोशल मीडिया पर और जनतंत्र-समर्थक यूट्यूब चैनलों के चलते, यह सारी सरकारी घेरेबंदी भी इस आंदोलन की प्रामाणिक खबरों को दबा नहीं पा रही थी। नतीजा यह निकला कि जंतर-मंतर पर युवाओं का जमावड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया और गोदी मीडिया के खिलाफ आम जनता का गुस्सा भी चरम पर पहुँच गया। टीवी चैनलों के माइक देखते ही, गोदी मीडिया हाय-हाय या गो बैक के गूंजते नारे लगना और चैनलों के कनिष्ठ रिपोर्टरों को धरना स्थल से खदेड़ा जाना शुरू हो गया।

यह ठीक पांच साल पहले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के समय जो हुआ था, उसी की पुनरावृत्ति थी। फर्क सिर्फ इतना था कि किसान आंदोलन के समय, गोदी मीडिया शुरू से ही किसानों के खिलाफ दुष्प्रचार छेड़ने की प्रतिक्रिया में, लोगों के सीधे बहिष्कार के निशाने पर आया था, जबकि इस बार जन-शत्रु के रूप में उसकी पहचान, उसके जान-बूझकर आंखें फेरने और चुप्पी साधने से ही शुरू हो चुकी थी। यह नतीजा था किसान आंदोलन के दौरान, जन-शत्रु के रूप में गोदी मीडिया की पहचान स्थापित होने के बाद से, उसके सत्ता की चाटुकारिता में हमेशा जन-विरोधी हमलों के हथियार की भूमिका के लिए ज्यादा से ज्यादा तत्पर होते जाने का। अब गोदी मीडिया सिर्फ इस अर्थ में सत्ता की गोदी में बैठा यानी सत्ता का बचाव करने वाला मीडिया नहीं रहा था कि उसने सत्ताधारियों पर भौंकना बंद कर दिया था। अब वह सत्ता की ओर से, उसके विरोधियों या आलोचकों पर हमले का सीधा लठैत बन गया था। अब वह लैप डॉग से, सत्ता का हिंसक बुलडॉग बन गया था।

यह कड़वा सच तब और खुलकर सामने आ गया, जब लंबे खिंचते धरने और भूख हड़तालियों की बिगड़ती हालत के चलते, मोदी सरकार पर चौतरफा दबाव बढ़ने लगा। हर रात इसकी आशंका बनी रहती थी कि पुलिस बल के जरिए, जबर्दस्ती जंतर-मंतर को खाली कराया जा सकता है। यह सिलसिला 20 जुलाई के संसद मार्च के दिन तक जारी रहा, जब शाह की पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की विशाल संख्या को तितर-बितर करने के नाम पर, दमन की सारी सीमाएं ही पार कर दीं। उसने बिना वर्दी के बाहरी गुंडों, कील लगी घातक लाठियों और पैलेट गनों व बंदूकों के इस्तेमाल से लेकर, पूरी तरह से अकारण निहत्थे युवाओं पर हमले करने तक के सरासर आपराधिक हथकंडों का खुलकर इस्तेमाल किया। इनकी सच्चाई सैकड़ों सेलफोन कैमरों के जरिए, सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में इसके बावजूद पहुँच गई कि, जंतर-मंतर तथा आस-पास के पूरे इलाके में इंटरनेट सेवाएं ही बंद करा दी गई थीं। जाहिर है कि इस दमन की सच्चाई, गोदी मीडिया की ब्लैकमेलिंग के बावजूद, पूरी दुनिया तक पहुँच रही थी।

याद रहे कि वांगचुक के धरना स्थल से उठाए जाने के बाद से, टीवी चैनलों के कैमरे किसी बड़े एक्शन को कवर करने की उम्मीद में जंतर-मंतर पर पहुँचे तो जरूर थे, लेकिन आंदोलन को सच दिखाने के लिए नहीं। जैसा कि जंतर-मंतर से लगातार रिपोर्टिंग करते रहे एक निष्पक्ष समाचार वेबसाइट के पत्रकार ने लिखा, ‘वे शिकार पर निकले थे’—आंदोलन के खिलाफ कोई विवादित बाइट या तस्वीर पाएँ, तो खबर चलाकर उसे बदनाम करें। कहने की जरूरत नहीं है कि इस पूरे दौर में गोदी मीडिया के सचेत रूप से शासन की एक अलग तरह की लाठी की भूमिका में खुलकर सामने आने से, इस आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े युवाओं ही नहीं, व्यापक स्तर पर आम जनता का भी गोदी मीडिया के साथ विरोध का रिश्ता और पुख्ता तथा तीखा ही हुआ है। गोदी मीडिया के दुर्भाग्य से यह स्थिति, सत्ताधारियों की सेवा के लिए उसकी उपयोगिता को और इस सेवा के बदले में मिलने वाले मेवे की मात्रा को भी तेजी से घटा रही है। खबरिया चैनलों के दर्शकों की संख्या से लेकर विज्ञापन राजस्व तक, सब में तेजी से ऐतिहासिक गिरावट दर्ज हो रही है।

संसद मार्च पर बर्बर दमन चक्र, मोदीशाही को भारी पड़ गया। उसकी पुलिस बर्बरता की झांकी ही पूरी दुनिया ने नहीं देखी, बल्कि हमारे देश के विभिन्न शहरों और अनेक विश्व महानगरों में भी, इस युवा आंदोलन के समर्थन में उल्लेखनीय प्रदर्शन हुए। इधर दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी था और प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। समूचा विपक्ष एक स्वर में संसद में और संसद के बाहर, इस आंदोलन के पक्ष में आवाज उठा रहा था। इसी मुकाम पर, अपनी छवि और संघ-भाजपा शासन का नुकसान सीमित करने की नीयत से, किसान आंदोलन के बाद एक बार फिर, नरेंद्र मोदी ने युवाओं के आंदोलन के सामने झुकना ही फायदेमंद समझा। मोदी की ‘सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं’ की अकड़ छोड़कर, शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा दिलाया गया, ताकि इस आंदोलन को खत्म कराया जा सके। यहाँ तक कि गोदी चैनलों पर इस आंदोलन के विश्लेषण के नाम पर, कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं के साक्षात्कार भी नजर आने लगे।

लेकिन, मजबूरी में झुकने की बात दूसरी है, पर मोदी ने और जाहिर है कि उनके गोदी मीडिया ने भी, अपने खिलाफ बगावत करने वाले युवाओं को दिल से माफ नहीं किया था। नतीजा यह कि न सिर्फ आंदोलन के वापस लिए जाने के समय हुए समझौते के तहत सभी दर्ज केस वापस लेने के वादे को ईमानदारी से पूरा नहीं किया गया, बल्कि खुद प्रधानमंत्री मोदी का आंदोलन के दौरान अपने लिए कहे गए अपशब्दों को ‘माफ’ करने का स्वांग भी पूरी तरह झूठा निकला। हार से खिसियाई मोदीशाही की सरकारों से लेकर, संघ प्रायोजित गुंडा वाहिनियों तक के जरिए, इस आंदोलन में शामिल हुए युवाओं और खासतौर पर किशोरियों को, उनके वक्तव्यों से लेकर सोशल मीडिया पोस्टों तक के लिए, प्रताड़ित करने और डराने-धमकाने का नीच सिलसिला लगातार जारी है। नोएडा में एक पंद्रह वर्षीया स्कूली छात्रा के परिवार को तो अपना ठिकाना तक बदलने पर मजबूर होना पड़ा है।

राजा से बढ़कर उसका वफादार नजर आने की कोशिश में गोदी मीडिया इस गंदे खेल में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है और युवाओं के इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए नए बहाने गढ़ रहा है। इसमें, 20 जुलाई की घटनाओं में पुलिस को विक्टिम बनाने के जरिए, इस बगावत के लिए युवाओं को अपराधी और मोदी को विक्टिम बनाने का कुत्सित अभियान शामिल है। यह मोदीशाही और उसके गोदी-चढ़ाए मीडिया, दोनों को ही युवाओं की नजरों में पक्का जन-शत्रु बनाता जा रहा है। ताजातरीन विधानसभाई उप-चुनाव के नतीजे और खासतौर पर बांकीपुर सीट से तीन दशक बाद भाजपा की करारी हार तथा दतिया से कांग्रेस की वापसी और सबसे बड़े धन्नासेठों के खबरिया चैनलों के तेजी से बढ़ते वित्तीय घाटे, इसी ऐतिहासिक बदलाव का साफ इशारा कर रहे हैं।

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Pawan Singh

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Chief Editor, Taj News

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