दीयों की रोशनी में सत्ता, व्यक्ति पूजा, सरकारी तंत्र और बदलते राजनीतिक माहौल पर बादल सरोज का तीखा राजनीतिक आलेख।
आर्टिकल डेस्क | 🌐 tajnews.in | 7 अक्टूबर 2026 | 14:46 बजे


“मोदी है तो मुमकिन है” के आप्तवचन में कोई शक-शुबहा पहले भी शायद ही किसी के मन में बचा हो, इतना कर दिखाने के बाद भी यदि कुछ के दिमाग में शेष रहा होगा, तो उसे भी पृथ्वी की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने सकल ब्रह्माण्ड के अपने सबसे बड़े नेता का जन्मदिन धूमधाम से मनाकर दूर कर दिया है। सहज मानवीय संवेदनशीलता को मुंह चिढाते हुए यह कारनामा उस समय अंजाम दिया गया, जब इधर दिल्ली के पीजी हॉस्टल सत्य निकेतन के मलबे से उठी धूल थमी नहीं थी, उसमे मारे गए विद्यार्थियों की चिताओं की अग्निं ठंडी नहीं हुई थी, मध्यप्रदेश में एक कटोरी दूध और एक रोटी के इंतज़ार में मौत के मुंह में जा रहे बैगा आदिवासी बच्चों की गिनती रुकने पर नहीं आ रही थी, चढ़ी बाढ़ में डूबे बिहार के 15 जिलों में बेघर और बर्बाद हुए 50 लाख लोगों की विपदा उतार पर नहीं आई थी कि मूल रूप से बिहार से ही आने वाले भाजपा के अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपने आका को दीये जलाकर हैप्पी बर्थडे बोलने का हुकुम सारे देश के लिए जारी कर दिया। या तो चाटुकारिता में इतने लीन हो जाने की वजह से या धर्म और परम्परा के न्यूनतम ज्ञान के अभाव के चलते मोदी के नाम पर दीपक जलाने का आह्वान कर दिया। वे यह भूल गए कि सिर्फ हिन्दू परम्पराओं के हिसाब से ही नहीं, मानव समाज के हर तबके में जीवित और अस्तित्ववान व्यक्तियों के आगे या उनके नाम पर दीपक या मोमबत्ती जलाना, अगरबत्ती सुलगाना किस तरह का माना जाता है।
यह बंदर की स्वामिभक्ति की तरह स्वयं कर्ता के दिमाग की खुराफात नहीं थी – हो भी नहीं सकती थी, क्योंकि कुछ ही दिन पहले ही तो मोदी दिमाग का इस्तेमाल न करने की सख्त हिदायत दे चुके थे। यह दिनों-दिन कुम्हलाते चेहरे को संवारने, विफलताओं की झुर्रियों को लेप से छुपाने और चमकाने का तयशुदा, व्यवस्थित और मार्केटिंग की सिद्ध प्रसिद्ध कंपनियों द्वारा सुविचारित अभियान का चरण था। घोषणा पार्टी के लिए पार्टी के अध्यक्ष द्वारा की गयी थी – मगर बिना किसी लाज-शर्म के तुरंत इसे भाजपा की सरकारों ने सरकारी कार्यक्रम बना दिया। कलेक्टर दीयों में तेल भरने के काम में लगा दिए गए, आला पुलिस अफसर सहेज कर बाती को यथास्थान लगाने और उन्हें सुलगाने में व्यस्त हो गए। पूरा सरकारी अमला चमचागिरी के महोत्सव को चमचमाने में भिड़ गया। जनता में तनिक भर भी उत्साह न देखकर संस्थानों में बाकायदा निर्देश जारी किये गए। जम्मू की आईआईएम के छात्रों पर तो कथित रूप से दीये न जलाने पर पांच-पांच सौ रूपये का जुर्माना तक ठोंक दिया गया। ऐसा नहीं है कि यह बर्थडे बॉय से पूछे बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध हो रहा था। एक जमाने में खुद को गरीबतर बताते हुए “मैं अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाता” कहकर लोगों की सहानुभूति बटोरने वाले नरेन्द्र मोदी भी इस ‘दिया जलाओ जगमग जगमग’ के कोहराम से अभिभूत, आल्हादित, और प्रमुदित थे। दिखावे के लिए भी ना नहीं कहा।
दीये जले – जहां चराग मयस्सर नहीं था पूरे शहर के लिए, जहां जरूरी था उन घरों, आवासों, मजरों, टोलों को छोड़, बाकी जगहों पर दीये जले। गृहमंत्री अमित शाह दीयों के साथ महाआरती करते हुए शर्मिष्ठा झील पर देखे गए। दिल्ली सरकार ने बाकी भाजपा सरकारों से अलग दिखने की धुन में जन्मोत्सव को महीने भर का कर दिया, सवा लाख दीयों के साथ 108 कुण्डीय महायज्ञ अपनी तरफ से जोड़ दिया। मध्यप्रदेश के पर्ची-प्रसूत मुख्यमंत्री ने पर्ची के कभी न चुकने वाले ऋण की अगली किश्त में अपने गृह जिले उज्जैन में दीये जलाने का विश्व रिकॉर्ड कायम करने का दावा ठोंकते हुए सिर्फ उज्जैन में 33 लाख 27 हजार दीये जलवा दिए। यह भी बताया कि पूरे मध्यप्रदेश में 3 करोड़ 55 लाख दीये जले हैं। बाढ़ में डूबे-उतरा रहे बिहार के सम्राट चौधरी अपने सुपर सम्राट को दिखाने के लिए पूरे बिहार को 21 लाख दीयों से जगमगाने के काम में जुटे रहे। हरियाणा में अकेले पीजीआईएमएस में ही 10 हजार दीयों को जलाने में पूरा अमला झोंक दिया गया। भक्तों ने नॉन-बायोलॉजिकल मोदी जी का जन्मदिन ही नहीं, उनका पैतृक गाँव भी ढूंढ निकाला और डमरू की थाप और शंख ध्वनि के साथ सेलीब्रेशन किया। ओड़िसा में एक करोड़, छत्तीसगढ़ में अकेले रायपुर में 25 लाख दीये जलाए गए। गिनती और भी प्रदेशों की गिनाई जा सकती है, मगर फिलहाल इतना ही बहुत है। उत्साह इतना था कि जिन मुगलों को इतिहास से हटाने का बीड़ा उठाया हुआ है, उस शाहजहाँ के कहने पर उस्ताद अहमद लाहौरी नाम के शिल्पकार द्वारा बनाये गए किला-ए-मुबारक मतलब लाल किले पर भी 76 दीये जलाकर लोकतंत्र में शहंशाह होने का मुगालता पाले बैठे आत्ममुग्ध प्रधानमन्त्री की सालगिरह मनाई।
- लेख में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर हुए दीप प्रज्वलन कार्यक्रमों को लेकर तीखी राजनीतिक टिप्पणी की गई है।
- लेखक ने सरकारी तंत्र की भागीदारी और विभिन्न राज्यों में हुए आयोजनों को अपने तर्क का आधार बनाया है।
- आलेख व्यक्ति पूजा, सत्ता, राजनीतिक प्रचार और सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल उठाता है।
- लेख के अंतिम हिस्से में संघ नेतृत्व के बयानों को मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखा गया है।
चाटुकारिता के इस अश्लील और जुगुप्सा जगाने वाले आयोजन पर जैसे संघ की स्वीकृति और सहमति की मोहर लगाने के लिए, जिन्हें विचारक माना जाता है, वे भी मोदी स्तुति की तुकबंदियों के साथ हाजिर हो गए। इस ‘न भूतो न भविष्यतः’ जन्मदिन विशेष पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता राम माधव ने संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ सहित बाकी कई जगह बाकायदा एक लेख लिखकर मोदी जी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों, ‘सेवा संकल्प’ और परिवर्तनकारी नेतृत्व का विश्लेषण किया। बताया कि उनके शासन की भारतीय अवधारणा ‘सेवा’ और ‘नर सेवा नारायण सेवा’ — वे शायद अडानी, अम्बानी और ट्रम्प सेवा कहना चाहते थे — पर आधारित है। लिखते-लिखते भाई जी इतने भावुक हो गए कि उन्होंने मोदी की राजकाज शैली को महाभारत और कौटिल्य के राजधर्म तथा साहस, संवेदना और सूझबूझ के समकक्ष बता दिया। दावा किया कि मोदी एक ऐसी परंपरा और विचारधारा से आते हैं, जिसका अंतिम लक्ष्य सिर्फ सिंहासन पर बैठना नहीं, बल्कि पूरे समाज को साथ लेकर आगे बढ़ना और राष्ट्र का वैभव बढ़ाना है। ‘अहो रूपम अहो ध्वनि’ का यह गान उस समय हो रहा था, जब दीयों के बुझने के इन्तजार में खड़े और उनमे से बूँद-बूँद तेल बटोरते बच्चों, बूढों और महिलाओं की विचलित तस्वीरें सामने आ रही थीं।
पाखंड की हद यह थी कि तेल का इस कदर अपव्यय उनकी सालगिरह के नाम पर किया जा रहा था, जो आमसभाओं में बार-बार अपील कर रहे थे कि तेल का इस्तेमाल कम करना “देशभक्ति का कार्य” है। जो कह रहे थे कि कम तेल का सेवन करने से मोटापा, हृदय रोग और अन्य जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों से बचाव होता है, इसलिए “देश सेवा भी होगी और देह – शरीर-सेवा भी होगी”। जो याद दिला रहे थे कि भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 60 प्रतिशत) खाद्य तेल का आयात करता है, जिस पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है। “वैश्विक तनाव और अनिश्चितता के बीच आयात पर निर्भरता कम करना देश के हित में है।“ उन्हीं की सूखती और छितरती छवि को तेल लगाने के लिए कितना तेल बहाया जा रहा था, इसका अनुमान लगाने के लिए साधारण से गणित पर नजर डालना काफी होगा। यदि एक छोटे से दीये में मात्र 10 मिलीलीटर तेल डाले जाने का औसत ही निकालें, तो अकेले उज्जैन में जलाए गए 33 लाख 27 हजार दीयों में ही 45 हजार लीटर तेल का इस्तेमाल हुआ। इसी अनुपात को यदि सिर्फ मध्यप्रदेश में जले दीयों के लिए लागू करें, तो इस एक प्रदेश में ही साढ़े चार लाख लीटर से अधिक तेल बर्बाद कर दिया गया। लगता है, तीन महीने पहले से मोदी खाने में तेल के उपयोग को कम करने की बार-बार अपील इसीलिए कर रहे थे, ताकि उनके अवतरण दिवस पर फूंकने के लिए कुछ करोड़ लीटर तेल बचा रहे।
यह नार्सिसिज्म — आत्ममुग्धता — के रोग का परपीड़ा में सुख लेने — सैडिज्म – की अवस्था तक पहुँच जाना है। इस तरह की मनोवृत्तियों के उस्ताद मोदी ही नहीं है, कहते हैं कि पहले के जमाने में कोई नीरो भी था। अपनी असाधारण फिजूलखर्ची, विलासिता और भव्य पार्टियां देने के लिए इतिहास में कुख्यात और प्राचीन रोमन इतिहास के रिकॉर्ड और सुएटोनियस जैसे इतिहासकारों के अनुसार, नीरो न केवल अपना, बल्कि अपने परिवार के सदस्यों का जन्मदिन भी मनाता था। यहाँ तक कि उसने अपने मृत जैविक पिता के जन्मदिन को भी शाही कैलेंडर में शामिल करवाकर उत्सव मनवाया था। उसके समय में दीये जलाने का विचार प्रचलित नहीं हुआ था, इसलिए जीवित मनुष्यों को ही खम्भे से बंधवाकर उनकी जलती देह से ही अपनी महफ़िल रोशन कर डाली थी। तुलनात्मक रूप से ताजे इतिहास में एडॉल्फ हिटलर के 50वें जन्मदिन का जिक्र मिलता है, जिसे 20 अप्रैल, 1939 को नाज़ी जर्मनी में एक बहुत बड़े और शानदार राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया गया। उसके प्रमुख प्रचारक जोसेफ गोएबेल्स की अगुआई में इस दिन बर्लिन में सड़कों को सजाया गया, स्वास्तिक वाले झंडे लगाए गए और हिटलर की रोशनी से जगमगाती तस्वीरें लगाई गईं। बर्लिन में चार से पांच घंटे तक चली एक विशाल सैन्य परेड में 40,000 से 50,000 सैनिक, भारी बख्तरबंद गाड़ियां, टैंक और आसमान में उड़ते 162 जर्मन वायु सेना के विमान शामिल हुए। इस तरह सत्ता के मद में मगरूर होकर गिरती लोकप्रियता को थामने के लिए इस तरह के तामझाम इतिहास में पहले भी हुए हैं और जिन्होंने किये हैं, इतिहास ने उनके साथ क्या किया है – यह दोहराने की जरुरत नहीं।
व्यक्ति पूजा के इस सतही प्रदर्शन के आयोजक भूल रहे हैं कि शहर के सारे चरागों को हवा जानती है, उनकी बाती से चमकते हैं कहाँ किन के महल, उनकी लौ किनको अंधेरों के कहर बांटती है। मोदी और उनका कुनबा अपने किये-धरे की जिन कालिमाओं को छुपाने के लिए उधार के तेल से दिए सुलगा रहे हैं, उन्हें वसीम बरेलवी का यह शेर याद रखना चाहिए कि “रात तो वक़्त की पाबन्द है, ढल जायेगी/ देखना है कि चरागों का सफ़र कितना है।” वे जिन दीपकों से राजनीति का खेल खेलना चाहते हैं, उन्हें नहीं पता कि उनकी ताब कितनी है। भारतीय संगीत में दीपक राग को साधने से जुड़ी एक कहानी है, जिसके मुताबिक़ संगीत सम्राट भी इसे नहीं साध पाए थे। जब तानसेन ने अकबर के दरबार में दीपक राग गाया था, तो खुद उनके शरीर में भयंकर आग लग गई थी। कहते हैं कि उस वक़्त मेघ मल्हार राग गाकर उनके प्राणों की रक्षा की गयी थी।
लगता है, संघ प्रमुख मोहन भागवत इस जोखिम को भांप गए हैं। उन्हें फीडबैक मिल गया है कि सारी कोशिशों, दवाब और घेराबंदी के बाद भी इस बार आम लोगों ने ड्रामे का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया है। मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग, कारोबारियों और जिन्हें कुनबा अपना पक्का अनुयायी मानता है – उनकी बसाहटों में दीया तो दूर, जुगनू तक नहीं चमका। अपने जीवन की चौतरफा बढ़ती मुश्किलों के बीच असफल साबित हुए राजा के जन्मदिन के जश्न का बाजा बजाने के इस फूहड़ राजसी तमाशे ने उन्हें क्षुब्ध और हतप्रभ ही किया है। देश भर में इस तरह की बेरुखी के धमाके को देख, जनता के इस हिस्से – बहुत बड़े हिस्से – को भरमाने के लिए अगले ही दिन 18 सितम्बर को भागवत साहब ने इशारों-इशारों में ही कुछ ज्यादा ही गहरा इशारा कर दिया। बिना नाम लिए अहंकार और सत्ता पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि “जो नहीं मानते, वे भले मत माने, मगर जिसका उदय हुआ है, उसका अस्त निश्चित है। मनुष्य अहंकार पाल लेता है कि सब ओर मेरी सत्ता चलती है, सब कुछ उसकी इच्छा और नियंत्रण के अनुसार चलता है। वह कितनी भी गलतफहमी पाल ले, लेकिन ऐसा होता नहीं है।” जिस सभा में उन्होंने यह बोला, वहां विषय कुछ और था। मगर इसके बाद भी यह ज्ञान देने के लिए उन्हें विवश होना पड़ रहा है, तो इसलिए कि उन्हें पतली गली की गुंजाइश बनाकर रखनी है।
यही अदा है, जो एक तरफ राम माधव और पांचजन्य के चारण गान, संघ दक्ष मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों द्वारा बढ़-चढ़कर किये जा रहे दीया जलाओअनुष्ठान और ठीक उसी बीच संघ प्रमुख के दिए जा रहे ज्ञान में नुमायाँ हो रही है। यह दोनों नावों पर सवार होने की चतुराई तो है ही, एक सेफ्टी वाल्व का खोलकर रखना भी है। अंग्रेजों के जमाने के जेलरों के हवलदारों की तरह उन्हें लगता है कि ऐसा करने से जो आधे उधर और आधे इधर हो गए हैं, उनके अलावा बाकी सब इनके पीछे आ जायेंगे।





