संपादकीय | 🌐 tajnews.in | 25 सितंबर 2026 | 02:16 बजे
मतदाता सूची की सफाई जरूरी है, लेकिन सवाल पूछने वाले मतदाता को कटघरे में क्यों खड़ा किया जाए?
लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी रजिस्टर नहीं होती। उसमें दर्ज एक नाम सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उस नागरिक के उस अधिकार की पहचान है जिसके जरिए वह अपने प्रतिनिधि चुनता है। इसलिए मतदाता सूची को समय-समय पर दुरुस्त करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि इस प्रक्रिया में किसी वास्तविक मतदाता का अधिकार गलती से न छिने।
यहीं से विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे मौजूदा सवाल गंभीर हो जाते हैं।
मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित, दोहराए गए या अपात्र नाम हटाना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। लेकिन जब इस प्रक्रिया का दायरा देश के बड़े हिस्से तक पहुंच जाए और करोड़ों नाम प्रारंभिक सूचियों से बाहर हो जाएं, तब सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होता कि सूची की सफाई की जा रही है। असली सवाल यह होता है कि जिन नामों पर सवाल उठाया गया, उनके सामने अपनी पात्रता साबित करने की प्रक्रिया कितनी सरल, पारदर्शी और मानवीय है।
यही SIR की सबसे बड़ी परीक्षा है।
- मतदाता सूची की शुचिता और पात्र मतदाता के अधिकार—दोनों की रक्षा जरूरी है।
- दो चुनाव आयुक्तों की SIR से जुड़े फैसलों पर दर्ज आपत्तियों ने पारदर्शिता का सवाल उठाया है।
- चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR समेत उसके सभी औपचारिक निर्णय तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से हुए।
- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में SIR नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर भी स्पष्टीकरण मांगा है।
चुनाव आयोग के भीतर उठे सवालों को हल्के में नहीं लिया जा सकता
हाल में सामने आई एक पड़ताल के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कई मौकों पर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े फैसलों पर आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कम से कम 14 ऐसी आपत्तियों का उल्लेख है।
इन आपत्तियों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि सवाल निर्वाचन व्यवस्था के शीर्ष संवैधानिक संस्थान के भीतर से उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने और बहाली, चुनावी डेटा तक पहुंच तथा SIR से जुड़े कुछ प्रशासनिक फैसलों से संबंधित थीं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने रखना जरूरी है। चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि SIR समेत उसके सभी औपचारिक निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की स्वीकृति से सर्वसम्मति में लिए गए। आयोग का कहना है कि विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग सुझाव, आपत्तियां और प्रशासनिक टिप्पणियां आना अपने आप में असामान्य नहीं है।
इसलिए अभी बहस का विषय किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि जिन सवालों को रिकॉर्ड पर उठाया गया, उनका रिकॉर्ड पर ही स्पष्ट उत्तर क्या है।
तकनीक सुविधा बने, दीवार नहीं
चुनावी व्यवस्था तेजी से डिजिटल हो रही है। यह जरूरी भी है। करोड़ों मतदाताओं के आंकड़ों को संभालने के लिए तकनीक के बिना काम आसान नहीं हो सकता। लेकिन तकनीक का असली उद्देश्य नागरिक की परेशानी कम करना होना चाहिए।
यदि किसी मतदाता का नाम किसी तकनीकी कारण से संदिग्ध हो जाता है, यदि कोई पात्र मतदाता अपने रिकॉर्ड को ठीक नहीं करा पाता, या यदि किसी अधिकारी के सामने किसी योग्य मतदाता का नाम बहाल करने का रास्ता तकनीकी रूप से उपलब्ध नहीं होता, तो समस्या सिर्फ सॉफ्टवेयर की नहीं रह जाती। वह लोकतांत्रिक अधिकार की समस्या बन जाती है।
चुनाव व्यवस्था में अंतिम फैसला मशीन का नहीं, कानून और अधिकृत अधिकारी का होना चाहिए। तकनीक निर्णय लेने में सहायता कर सकती है, लेकिन नागरिक को अपनी बात रखने का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए।
SIR का सबसे कठिन हिस्सा गरीब और कमजोर मतदाता है
एक पढ़ा-लिखा, तकनीकी सुविधा वाला और दस्तावेज आसानी से जुटा सकने वाला व्यक्ति किसी नोटिस का जवाब दे सकता है। लेकिन देश के हर मतदाता की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।
किसी के पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं। किसी के पास इंटरनेट नहीं है। किसी के पास रिकॉर्ड खोजने की जानकारी नहीं है। किसी बुजुर्ग के लिए सरकारी कार्यालय तक पहुंचना ही मुश्किल है। किसी मजदूर के लिए एक दिन की भागदौड़ का अर्थ एक दिन की मजदूरी का नुकसान हो सकता है।
ऐसे नागरिक से यदि कहा जाए कि अपने नाम और पात्रता के पक्ष में प्रमाण लेकर आइए, तो व्यवस्था को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसे स्पष्ट रूप से बताया जाए—कौन-सा प्रमाण चाहिए, कहां जमा करना है, कितने समय में करना है और यदि पहला निर्णय उसके खिलाफ हो तो अगला रास्ता क्या है।
न्याय सिर्फ अपील का अधिकार देने से नहीं मिलता। न्याय तब मिलता है जब अपील तक पहुंचना भी नागरिक के लिए संभव हो।
आंकड़े बड़े हैं, लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक इंसान है
SIR के अलग-अलग चरणों में बड़ी संख्या में नाम प्रारंभिक मतदाता सूचियों से बाहर किए गए हैं। सितंबर 2026 तक 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। इन नामों में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित, दोहराए गए या अन्य कारणों से सत्यापन में सामने न आए नाम शामिल हो सकते हैं।
इन आंकड़ों को केवल राजनीतिक बहस का हथियार बना देना समस्या का समाधान नहीं है। किसी नाम का हटना हमेशा गलत है—यह निष्कर्ष भी सही नहीं होगा। इसी तरह हर हटाए गए नाम को स्वतः गलत मान लेना भी उचित नहीं होगा। मतदाता सूची में वास्तविक मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अपात्र नामों की पहचान करना जरूरी है।
लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कितने वास्तविक मतदाता इस प्रक्रिया में परेशान हुए, कितनों को नोटिस मिला, कितनों को समय पर जानकारी मिली और कितनों की आपत्ति का समय रहते निपटारा हुआ।
यही वह आंकड़ा है जिस पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को सबसे अधिक पारदर्शिता दिखानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका अब और महत्वपूर्ण हो गई है
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में हुए SIR की वैधानिकता को बरकरार रखा था। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का अधिकार है और इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाना तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। अदालत ने साथ ही प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील जैसे सुरक्षा उपायों के महत्व को भी रेखांकित किया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि SIR के दौरान अपनाई जाने वाली हर प्रशासनिक प्रक्रिया न्यायिक जांच से बाहर हो जाती है। सितंबर 2026 में दिल्ली SIR से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से उन नोटिसों पर जवाब मांगा जिन्हें प्रथम दृष्टया बहुत यांत्रिक तरीके से जारी किए जाने की चिंता सामने आई थी। अदालत ने यह भी पूछा कि प्रक्रिया को बेहतर ढंग से छांटने के लिए अतिरिक्त फिल्टर की जरूरत है या नहीं।
यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल संतुलन है। चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुचिता सुनिश्चित करनी है और अदालत को यह देखना है कि उस प्रक्रिया में नागरिक के अधिकारों की रक्षा हो। दोनों उद्देश्यों में कोई टकराव नहीं होना चाहिए।
अदालत को सवाल पूछने चाहिए, आयोग को जवाब देने चाहिए
आज आवश्यकता किसी संस्था को कमजोर करने की नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता का भरोसा मजबूत करने की है।
यदि चुनाव आयोग के भीतर से कोई महत्वपूर्ण सवाल उठता है, तो उसका उत्तर भी स्पष्ट होना चाहिए। यदि किसी प्रक्रिया पर बाहर से सवाल उठते हैं, तो उसके नियम और आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए। यदि किसी मतदाता का नाम हटाया जाता है, तो उसे कारण पता होना चाहिए। यदि वह आपत्ति करता है, तो उसके मामले के निपटारे की स्पष्ट समय-सीमा होनी चाहिए।
और यदि किसी तकनीकी प्रणाली में गलती सामने आती है, तो उस गलती को सुधारने का मानवीय रास्ता भी होना चाहिए।
लोकतंत्र में चुनाव केवल मतदान के दिन नहीं होता। लोकतंत्र उस दिन से शुरू हो जाता है जब नागरिक यह भरोसा करता है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है और मतदान के अधिकार तक पहुंचने के लिए उसे ऐसी परीक्षा से नहीं गुजरना पड़ेगा जिसे वह समझ ही न सके।
अब जरूरत पारदर्शिता की है, टकराव की नहीं
SIR को लेकर चल रही बहस को सत्ता और विपक्ष की सामान्य राजनीतिक लड़ाई में सीमित कर देना आसान है। लेकिन मुद्दा उससे कहीं बड़ा है।
यह सवाल किसी एक पार्टी के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। आज जिस मतदाता का नाम जांच के दायरे में है, वह किसी भी राजनीतिक विचार का हो सकता है। कल यही प्रक्रिया किसी दूसरे राज्य और किसी दूसरे नागरिक के सामने हो सकती है।
इसलिए व्यवस्था की कसौटी यही होनी चाहिए कि एक भी पात्र मतदाता केवल प्रक्रिया की जटिलता, तकनीकी समस्या, दस्तावेजों की कमी या प्रशासनिक लापरवाही के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो।
चुनाव आयोग को अपने हर महत्वपूर्ण कदम की पारदर्शी व्याख्या करनी चाहिए। चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों का तथ्यात्मक जवाब सार्वजनिक विमर्श में आना चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनाव सुधार के नाम पर चलने वाली प्रक्रिया में नागरिक के अधिकार की कीमत न चुकानी पड़े।
मतदाता सूची साफ होनी चाहिए, लेकिन इतनी कठोर नहीं कि उसमें लोकतंत्र का असली मालिक ही परेशान होकर खड़ा रह जाए।
क्योंकि चुनाव की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने नाम सूची में हैं।
विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि सूची में मौजूद हर पात्र नागरिक को यह भरोसा हो कि उसका नाम, उसका वोट और उसका लोकतांत्रिक अधिकार—तीनों सुरक्षित हैं।





