आर्टिकल Desk, Taj News | Wednesday, April 08, 2026, 02:45:00 AM IST


एवं राजनीतिक विश्लेषक
मुख्य बिंदु
- असम, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, लेकिन मतदाताओं के मन में एक अजीब सी खामोशी और थकान है।
- दरअसल, रसोई गैस की महंगाई और भयानक बेरोज़गारी ने आम जनता की उम्मीदों को तोड़ दिया है, इसलिए वे सिर्फ राहत की तलाश कर रहे हैं।
- इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में चुनाव एक ‘जंग’ बन चुका है, जबकि असम में नागरिकता और पहचान की सबसे बड़ी लड़ाई चल रही है।
- आखिरकार, ये चुनाव महज़ सरकार चुनने का ज़रिया नहीं हैं, बल्कि यह सत्ता के झूठे वादों के खिलाफ जनता का एक खामोश ‘ऑडिट’ है।
क्या भारत सिर्फ वोट डाल रहा है… या सत्ता का हिसाब भी मांग रहा है?
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बृज खंडेलवाल
पड़ोस में युद्ध की गूंज है। सीमाओं के पार बारूद की गंध है। और इसी बीच भारत के चार राज्य वोट डालने निकल पड़े हैं। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब धुंधला। क्या ये चुनाव सिर्फ सरकार चुनने के लिए हैं… या सत्ता का लेखा-जोखा मांगने के लिए?
ऊपरी तस्वीर शांत दिखती है। कोई बड़ा उलटफेर नहीं। अनुमान कहते हैं असम में भाजपा की पकड़ बनी रहेगी। तमिलनाडु में स्टालिन की सरकार टिकी रहेगी। केरल में समीकरण ज्यादा नहीं बदलेंगे। पश्चिम बंगाल में हलचल है, पर भूकंप नहीं। यानी नतीजे शायद चौंकाएं नहीं。
लेकिन चुनाव सिर्फ नतीजों का खेल नहीं होते। वे मन की हलचल का आईना भी होते हैं。
इस बार मतदाता एक आवाज में नहीं बोल रहा। चार दिशाओं से चार अलग सुर उठ रहे हैं। केरल की सोच अलग है। बंगाल की धड़कन अलग। असम की बेचैनी अलग। तमिलनाडु का मिजाज अलग। एक शरीर है लोकतंत्र का, लेकिन दिल चार जगह धड़क रहा है。
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केरल में मतदाता आज भी पढ़ता हुआ बूथ तक जाता है। वहां विचारधारा अब भी जिंदा है। लेकिन इस बार उस विचार में एक थकान घुली है। मतदान प्रतिशत में मामूली गिरावट आंकड़ा नहीं, संकेत है। लंबे संघर्ष के बाद आई हुई एक धीमी सांस。
पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कभी शांत नहीं रहता। यहां वोट देना भी एक प्रदर्शन है। भीड़, नारे, जोश। यहां फुसफुसाहट भी फैसला बन जाती है। हर वोट एक बयान है। हर बूथ एक जंग का मैदान。
असम में मामला और गहरा है। यहां वोट सिर्फ सरकार के लिए नहीं डाला जाता। यहां पहचान दांव पर होती है। कौन अपना, कौन पराया। कागज, नागरिकता, जमीन। वोट यहां अधिकार से ज्यादा अस्तित्व बन जाता है。
तमिलनाडु में राजनीति एक रंगमंच है। चेहरे वही हैं, संवाद भी जाने-पहचाने। लेकिन दर्शकों का मूड बदल रहा है। शहरों में एक ठंडापन है। गांवों में अब भी गर्मी बची है। बीच में खड़ा मतदाता सोच रहा है, क्या कहानी अब भी वही रहेगी?
इन सबके नीचे एक अदृश्य धागा है जो चारों राज्यों को जोड़ता है। थकान। महंगाई। और वादों से उपजी निराशा。
वादे तेज होते जा रहे हैं। लेकिन उनका निभना धीमा पड़ता जा रहा है। रसोई में महंगाई की आंच तेज है। युवाओं के हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। घर के बजट में खामोशी है, लेकिन चिंता बहुत बोलती है。
केरल में कल्याण योजनाएं अब सवालों के घेरे में हैं। भरोसा टूट नहीं रहा, लेकिन घिस जरूर रहा है。
बंगाल में बेरोजगारी और कानून व्यवस्था नारों में बदल चुके हैं। राजनीति यहां सीधी टक्कर में है。
असम में पहचान की बहस हर घर तक पहुंच चुकी है। यह मुद्दा नहीं, रोजमर्रा की सच्चाई है。
तमिलनाडु में कर्ज, अपराध और अधूरे वादों की परतें एक जटिल तस्वीर बनाती हैं。
और तभी राजनीति एक पुराना दरवाजा खटखटाती है। आसमान की ओर देखती है। ज्योतिष की एंट्री होती है। ग्रह-नक्षत्रों की चाल पढ़ी जाती है। राजयोग खोजे जाते हैं। मानो जमीन के सवालों का जवाब आसमान में छिपा हो。
लेकिन सच यह है कि चुनाव न तो पूरी तरह गणित हैं, न पूरी तरह किस्मत। यह मनोविज्ञान है। एक छोटी सी लहर पूरी तस्वीर बदल सकती है। तीन प्रतिशत का झटका सत्ता हिला सकता है। एक वीडियो, एक बयान, एक गलती महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है。
तो यह चुनाव आखिर है क्या?
जनादेश?
एक और पड़ाव?
या एक खामोश ऑडिट?
शायद यह तीनों का मिश्रण है。
अगर सत्ताधारी गठबंधन नए इलाकों में पैर पसारता है, तो उसकी ताकत बढ़ेगी। अगर क्षेत्रीय दल टिके रहते हैं, तो संदेश साफ होगा कि भारत एक नहीं, कई भारतों का देश है。
यहां हर राज्य अपनी भाषा में वोट करता है。
केरल विचारधारा में बोलता है। बंगाल व्यक्तित्व में। असम पहचान में। तमिलनाडु विरासत में。
और इनके बीच खड़ा है आम मतदाता। न नारों में, न बहसों में। चुप। धैर्यवान। थोड़ा थका हुआ। वह वोट देता है उम्मीद में नहीं, राहत की तलाश में। महंगाई से राहत। अनिश्चितता से राहत। अधूरे वादों के बोझ से राहत。
मतपेटी बंद हो जाएगी। स्याही सूख जाएगी। टीवी स्टूडियो का शोर थम जाएगा。
लेकिन असली सवाल वहीं रहेगा। क्या यह सिर्फ वोट था… या सत्ता के खिलाफ दर्ज एक खामोश हिसाब?

Pawan Singh
7579990777













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