Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | 06 March 2026, 09:15 pm IST
Taj News Business & National Desk
देश की अर्थव्यवस्था, गैस-पेट्रोल के दाम और राष्ट्रीय सुरक्षा की खबरें
नई दिल्ली (New Delhi): ईरान जंग से रसोई गैस की किल्लत भारत में बहुत ज्यादा बढ़ सकती है। दरअसल, अमेरिका-इजराइल और ईरान का युद्ध अब बहुत ही भयानक हो गया है। ताज न्यूज़ (Taj News) की बिजनेस डेस्क के अनुसार, भारत सरकार ने रसोई गैस संकट रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने अपनी खास इमरजेंसी पावर का तुरंत और सीधा इस्तेमाल किया है। इसलिए, देश की सभी ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को सरकार ने एक बहुत सख्त आदेश दिया है। अंततः, अब रिफाइनरी कंपनियां प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल सिर्फ रसोई गैस बनाने के लिए ही करेंगी।
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रिफाइनरी कंपनियों को सरकार ने दिया बहुत ही सख्त और सीधा आदेश
मुख्य रूप से, सरकार ने एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का बहुत ही स्पष्ट आदेश जारी किया है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने गैस सप्लाई को पूरी तरह खतरे में डाल दिया है। दूसरी ओर, रॉयटर्स की एक नई रिपोर्ट ने इस बड़े खतरे की पक्की पुष्टि की है। अतः, सभी रिफाइनरियां अब केवल रसोई गैस का ही अधिक से अधिक उत्पादन करेंगी। इसलिए, प्रोपेन और ब्यूटेन की सप्लाई अब सीधे सरकारी तेल कंपनियों को करनी होगी। अंततः, इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम उपभोक्ताओं को बिना रुकावट गैस सिलेंडर बांटेंगी।
सप्लाई संकट की पहली और सबसे बड़ी वजह बना ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’
भारत के लिए सबसे बड़ी और खतरनाक चुनौती ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का बंद होना है। दरअसल, यह करीब 167 किलोमीटर लंबा एक बहुत ही अहम और संकरा जलमार्ग है। इसके अलावा, यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से सीधे जोड़ता है। दूसरी ओर, ईरान जंग के कारण यह पूरा रूट अब बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं रहा है। अतः, इस भारी खतरे को देखते हुए कोई भी तेल टैंकर वहां से बिल्कुल नहीं गुजर रहा है। इसलिए, दुनिया के कुल पेट्रोलियम का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह से फंस गया है। अंततः, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की भारी कमी तुरंत शुरू हो गई है।
भारत का कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) आयात हुआ बुरी तरह प्रभावित
सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे बड़े देश इसी मार्ग पर पूरी तरह निर्भर हैं। मुख्य रूप से, भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत कच्चा तेल यहीं से भारी मात्रा में मंगाता है। इसके अतिरिक्त, भारत का 54 प्रतिशत एलएनजी आयात भी इसी संकरे रास्ते से हमेशा होता है। दूसरी ओर, ईरान खुद भी इसी रूट से अपना सारा बड़ा एक्सपोर्ट पूरी दुनिया में करता है। अतः, युद्ध के कारण इस मार्ग का बंद होना भारत के लिए एक बहुत बड़ा और खतरनाक झटका है। अंततः, सरकार ने इसी भारी संकट से बचने के लिए अपनी पूरी और सख्त तैयारी शुरू कर दी है।
कतर के गैस प्लांट पर ड्रोन हमले से एलएनजी का प्रोडक्शन पूरी तरह रुका
सप्लाई संकट की दूसरी सबसे बड़ी वजह कतर का एक अहम गैस प्लांट बन गया है। दरअसल, पिछले हफ्ते अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर एक बहुत बड़ी स्ट्राइक की थी। इसके परिणामस्वरूप, ईरान ने अपने दुश्मनों के अंतरराष्ट्रीय (International) ठिकानों पर भारी ड्रोन हमले शुरू कर दिए हैं। दूसरी ओर, ईरान ने कतर के ‘रास लफान’ स्थित गैस प्लांट पर बहुत भयानक ड्रोन हमला किया है। अतः, सुरक्षा कारणों से कतर ने अपने एलएनजी प्लांट का प्रोडक्शन फिलहाल पूरी तरह रोक दिया है। इसलिए, भारत को गैस सप्लाई करने वाले इस सबसे बड़े देश से सप्लाई बिल्कुल घट गई है।
भारत कतर से करता है अपनी 40 प्रतिशत गैस का भारी और सीधा आयात
कतर की राजधानी दोहा के औद्योगिक इलाके में भारी और काला धुआं उठता साफ दिखा है। मुख्य रूप से, भारत अपनी जरूरत की 40 प्रतिशत एलएनजी कतर से ही सीधे आयात करता है। इसके अलावा, यह मात्रा करीब 2.7 करोड़ टन सालाना के बहुत बड़े और भारी आंकड़े को छूती है। दूसरी ओर, इस अचानक आई रुकावट ने भारतीय गैस कंपनियों की चिंता बहुत ज्यादा बढ़ा दी है। अतः, घरेलू बाजार में गैस की किल्लत का एक बहुत ही वास्तविक और बड़ा डर पैदा हो गया है। अंततः, सरकार इस कमी को पूरा करने के लिए लगातार कई नए विकल्प तुरंत तलाश रही है।
सीएनजी (CNG) कंपनियों ने सरकार को लिखी एक बहुत ही जरूरी और अहम चिट्ठी
गैस की इस भारी किल्लत को देखते हुए सीएनजी कंपनियों ने तुरंत अपना कड़ा रुख अपनाया है। दरअसल, ‘एसोसिएशन ऑफ सीजीडी एंटिटीज’ ने सरकारी कंपनी गेल को एक बहुत अहम पत्र लिखा है। इसके अलावा, कंपनियों ने इस पत्र के माध्यम से सरकार से पूरी स्पष्टता तुरंत मांगी है। दूसरी ओर, कंपनियों का कहना है कि कतर से आने वाली सस्ती गैस अब बिल्कुल नहीं मिलेगी। अतः, उन्हें मजबूर होकर ‘स्पॉट मार्केट’ से बहुत ज्यादा महंगी गैस तुरंत खरीदनी पड़ेगी। इसलिए, स्पॉट मार्केट में गैस की कीमत अब 25 डॉलर प्रति यूनिट तक बहुत तेजी से पहुंच गई है। अंततः, यह स्थिति कंपनियों के लिए बहुत ही भारी घाटे का सौदा बन गई है।
दाम बढ़ने से लोग परमानेंटली इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) में शिफ्ट हो जाएंगे
यह नई गैस कीमत कॉन्ट्रैक्ट वाली पुरानी गैस की कीमत से दोगुनी से भी बहुत ज्यादा है। मुख्य रूप से, गैस कंपनियों को अब अपने भारी और बड़े नुकसान का बहुत ज्यादा डर सता रहा है। इसके अतिरिक्त, कंपनियों को डर है कि सीएनजी के दाम अचानक और बहुत तेजी से बढ़ेंगे। दूसरी ओर, दाम बढ़ने पर लोग परमानेंटली इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर तुरंत शिफ्ट हो जाएंगे। अतः, इससे पूरे गैस सेक्टर को बहुत ही भारी और कभी न पूरा होने वाला नुकसान होगा। अंततः, कंपनियां सरकार से इस बड़े मुद्दे पर तुरंत कोई भारी और ठोस राहत चाहती हैं।
सरकार के इस फैसले का प्राइवेट कंपनियों पर पड़ेगा बहुत सीधा और बुरा असर
सरकार के इस नए आदेश का सीधा असर कई बड़ी प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों पर जरूर पड़ेगा। दरअसल, रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) जैसी बड़ी कंपनियों को इसका सबसे ज्यादा और भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। इसके अलावा, प्रोपेन और ब्यूटेन का डायवर्जन होने से पेट्रोकेमिकल के प्रोडक्शन में भारी कमी आएगी। दूसरी ओर, अल्काइलेट्स का प्रोडक्शन पेट्रोल की ग्रेडिंग सुधारने में बहुत अहम और बड़ा काम करता है। अतः, प्राइवेट कंपनियों को पेट्रोकेमिकल के बजाय अब केवल एलपीजी (LPG) ही बनानी पड़ेगी। इसलिए, इन सभी प्राइवेट कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर बहुत ही बुरा और गहरा असर पड़ेगा।
पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स बाजार में एलपीजी के मुकाबले बहुत ज्यादा कीमत पर बिकते हैं
एक्सपर्ट्स और ट्रेड सोर्सेज ने इस नई स्थिति पर अपनी बहुत ही स्पष्ट और बेबाक राय दी है। मुख्य रूप से, पॉलीप्रोपाइलीन और अल्काइलेट्स जैसे बड़े पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स बाजार में बहुत महंगे बिकते हैं। इसके अलावा, ये महंगे प्रोडक्ट्स कंपनियों को एलपीजी के मुकाबले बहुत ही ज्यादा मुनाफा देते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने देशहित में इन कंपनियों को मुनाफा छोड़कर सिर्फ जनता के लिए काम करने को कहा है। अतः, राष्ट्रीय सुरक्षा और आम जनता की सुविधा के सामने कंपनियों का मुनाफा बहुत छोटा है। अंततः, सरकार ने देशवासियों को रसोई गैस की कोई भी कमी बिल्कुल नहीं होने देने का पक्का वादा किया है।
भारत के लिए राहत की बात, अकेले होर्मुज रूट के भरोसे बिल्कुल नहीं है देश
हालात बहुत ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन सरकार ने देशवासियों को बिल्कुल भी न घबराने की स्पष्ट सलाह दी है। दरअसल, भारत अब अपनी जरूरत का 20 प्रतिशत कच्चा तेल सीधे रूस से मंगा रहा है। इसके अलावा, फरवरी महीने में भारत ने रूस से 10.4 लाख बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन खरीदा है। दूसरी ओर, यह रूसी आयात होर्मुज रूट पर भारत की भारी निर्भरता को बहुत तेजी से कम करता है। अतः, सूत्रों के अनुसार देश के पास वर्तमान में पेट्रोलियम और एलपीजी का एकदम पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। इसलिए, एमआरपीएल (MRPL) जैसी रिफाइनरियों के बंद होने की सभी खबरें महज एक कोरी और बहुत ही झूठी अफवाह हैं। अंततः, भारत ने पहले से ही अपने सुरक्षित गैस भंडार पूरी तरह से भरकर रखे हैं।
आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodity Act 1955) आखिर क्या है?
सरकार ने यह आदेश ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955’ के तहत मिली भारी शक्तियों का सीधा इस्तेमाल करके जारी किया है। मुख्य रूप से, इस कानून को एस्मा (ESMA) के नाम से भी बहुत अच्छी तरह से जाना जाता है। इसके अलावा, सरकार ने यूक्रेन युद्ध के बाद भी तेल क्षेत्र में इन कड़े नियमों को लागू किया था। दूसरी ओर, तब रिफाइनिंग कंपनियों से देश में फ्यूल की कमी न होने देने को बहुत सख्ती से कहा गया था। अतः, कंपनियों को अपना तेल बाहर एक्सपोर्ट करने से पूरी तरह और सख्ती से रोक दिया गया था। अंततः, भारी मार्जिन के बावजूद सरकार ने घरेलू बाजार को हमेशा अपनी पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता दी है।
प्रोपेन और ब्यूटेन गैस के मुख्य और सबसे अहम औद्योगिक उपयोग
प्रोपेन और ब्यूटेन दोनों गैसें आम जनता के दैनिक जीवन में बहुत अहम और बड़ी भूमिका निभाती हैं। दरअसल, इन दोनों गैसों के एकदम सही मिश्रण से ही हमारी घरेलू रसोई गैस (LPG) पूरी तरह तैयार होती है। इसके अलावा, प्रोपेन गैस का उपयोग औद्योगिक और भारी हीटिंग के लिए भी बहुत ज्यादा किया जाता है। दूसरी ओर, ब्यूटेन गैस मुख्य रूप से सिगरेट लाइटर और छोटे पोर्टेबल स्टोव में बहुत आसानी से इस्तेमाल होती है। अतः, सरकार ने इन्हीं दोनों गैसों को बचाने के लिए यह इतना बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। इसलिए, अब इन गैसों का किसी और काम में इस्तेमाल पूरी तरह से गैरकानूनी माना जाएगा। अंततः, इस फैसले से देश की करोड़ों महिलाओं को रसोई गैस की बिल्कुल निर्बाध और सुरक्षित सप्लाई मिलेगी।
Thakur Pawan Singh
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