“विद्वान या विद्यावान: ज्ञान का अहंकार, अहंकार का ज्ञान और आचरण की वास्तविक कसौटी” : डॉ प्रमोद कुमार

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आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | शनिवार, 12 सितंबर 2026, 11:05:00 PM IST

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“विद्वान या विद्यावान: ज्ञान का अहंकार, अहंकार का ज्ञान और आचरण की वास्तविक कसौटी”

डॉ प्रमोद कुमार | डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov, डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

प्रमुख अंश (Highlights):

  • विद्वान बनाम विद्यावान का बुनियादी भेद: विद्वान को ज्ञान का अहंकार हो सकता है, जबकि विद्यावान को अपने अहंकार का ज्ञान और आत्म-सीमाओं का गहरा बोध होता है।
  • भय और भाव से उपजा सम्मान: पद, शक्ति या तर्क के भय से मिला आदर क्षणिक होता है, जबकि संवेदना, विनम्रता और आचरण से उत्पन्न सम्मान व्यक्ति के जाने के बाद भी अमर रहता है।
  • संबंधों में संवाद और विनम्रता: विद्वता यदि दूसरों को पराजित करने का अस्त्र बने तो मित्रों को शत्रु बना देती है, जबकि विद्यावत्ता की वास्तविक विनम्रता विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
  • ज्ञान का चरित्र में रूपांतरण: केवल उपाधियां, डिग्रियां या सोशल मीडिया पर विशेषज्ञता नहीं, बल्कि भूल स्वीकारने का साहस और मानवीय गरिमा का आदर ही ज्ञान की सच्ची परिपक्वता है।
Dr Pramod Kumar

डॉ प्रमोद कुमार

डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov | डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा
शैक्षिक दर्शन, मानवीय मूल्य, प्रशासनिक जवाबदेही, नागरिक चेतना और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण पर निरंतर विश्लेषणात्मक लेखन।

ज्ञान मनुष्य का आभूषण है और ज्ञान ही व्यक्ति की सुंदरता व शक्ति है। ज्ञान मनुष्य को सक्षम बनाता है, लेकिन ज्ञान का उपयोग मनुष्य को कैसा बनाता है, यही उसकी वास्तविक गुणवत्ता का निर्धारण करता है। किसी व्यक्ति के पास बहुत-सा ज्ञान, अनेक उपाधियाँ, शास्त्रों का गहरा अध्ययन, तर्क करने की क्षमता और विषय पर असाधारण पकड़ हो सकती है; फिर भी यह आवश्यक नहीं कि वह व्यवहार में विवेकशील, विनम्र और मानवीय हो। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति अपनी विद्वता का प्रदर्शन किए बिना अपने ज्ञान को जीवन-मूल्यों, विवेक, संवेदना और व्यवहार में उतार सकता है। इसलिए सामान्य अर्थ में ‘विद्वान’ और ‘विद्यावान’ शब्द समानार्थी प्रतीत होने पर भी उनके आशय में एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक अंतर देखा जा सकता है। इस अंतर को एक सूत्र में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है—“विद्वान को ज्ञान का अहंकार हो सकता है, जबकि विद्यावान को अहंकार का ज्ञान होता है।” यह कथन किसी भी विद्वान व्यक्ति के प्रति आरोप या किसी विद्यावान व्यक्ति के प्रति अंध-प्रशंसा नहीं है, बल्कि ज्ञान और उसके व्यवहारिक रूप के बीच के अंतर को समझने का एक वैचारिक प्रयास है।

सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ‘विद्वान’ शब्द को नकारात्मक अर्थ में और ‘विद्यावान’ शब्द को पूर्णतः सकारात्मक अर्थ में लेना उचित नहीं होगा। प्रत्येक विद्वान अहंकारी नहीं होता और प्रत्येक विद्यावान अनिवार्य रूप से विनम्र नहीं होता। मनुष्य का स्वभाव अनेक परिस्थितियों, संस्कारों, अनुभवों, सामाजिक परिवेश, उपलब्धियों, असुरक्षाओं और आत्मबोध से निर्मित होता है। इसलिए यहां विद्वान और विद्यावान के बीच किया गया अंतर किसी व्यक्ति विशेष का नैतिक मूल्यांकन नहीं, बल्कि दो प्रकार की ज्ञान-दृष्टियों का विश्लेषण है। विद्वता मुख्यतः ज्ञान की व्यापकता, गहराई और बौद्धिक क्षमता से संबंधित हो सकती है, जबकि विद्यावत्ता उस ज्ञान के आत्मसात होने, विवेक में बदलने और आचरण में दिखाई देने से संबंधित मानी जा सकती है। ज्ञान सिर में रहता है, लेकिन विद्या जब जीवन का हिस्सा बनती है तो वह व्यवहार में दिखाई देने लगती है।

विद्वान वह हो सकता है जो किसी विषय का अत्यंत गहरा जानकार हो। वह इतिहास, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, धर्म, राजनीति, कानून या किसी अन्य क्षेत्र में असाधारण विशेषज्ञता रख सकता है। उसकी तर्कशक्ति मजबूत हो सकती है और वह दूसरों की गलतियों को शीघ्र पकड़ सकता है। ऐसी विद्वता समाज के लिए अत्यंत उपयोगी है। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान और साहित्य सभी को विद्वानों की आवश्यकता होती है। सभ्यता का बौद्धिक विकास ज्ञान-संपन्न लोगों के बिना संभव नहीं है। समस्या ज्ञान में नहीं, बल्कि ज्ञान के साथ उत्पन्न होने वाली आत्मश्रेष्ठता की भावना में है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान को सत्य तक पहुंचने का साधन मानने के बजाय दूसरों को पराजित करने का उपकरण मानने लगता है, तब विद्वता का स्वरूप बदलने लगता है।

ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य को दो दिशाओं में ले जा सकती है। पहली दिशा आत्मबोध की है और दूसरी आत्मश्रेष्ठता की। आत्मबोध की दिशा में बढ़ने वाला व्यक्ति जितना अधिक सीखता है, उतना ही उसे यह अनुभव होता है कि ज्ञान का क्षेत्र कितना विशाल है और उसकी अपनी जानकारी कितनी सीमित है। वह प्रश्न पूछता है, दूसरे दृष्टिकोणों को सुनता है और अपनी धारणाओं को संशोधित करने के लिए तैयार रहता है। इसके विपरीत आत्मश्रेष्ठता की दिशा में बढ़ने वाला व्यक्ति अपनी जानकारी को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण समझ सकता है। उसे असहमति व्यक्तिगत चुनौती लगने लगती है। वह तर्क को सत्य की खोज के बजाय विजय का माध्यम बना सकता है। यही वह स्थिति है जहां ज्ञान अहंकार का आधार बन जाता है।

इस संदर्भ में यह कथन अत्यंत अर्थपूर्ण है कि “विद्वान को ज्ञान का अहंकार होता है, जबकि विद्यावान को अहंकार का ज्ञान होता है।” ज्ञान का अहंकार व्यक्ति को यह विश्वास दिला सकता है कि “मैं जानता हूं, इसलिए मैं श्रेष्ठ हूं।” अहंकार का ज्ञान व्यक्ति को यह समझ देता है कि “मेरे भीतर भी सीमाएं, पूर्वाग्रह और गलतियां हो सकती हैं।” पहला दृष्टिकोण दूसरों का मूल्यांकन करता है, दूसरा स्वयं का परीक्षण करता है। पहला व्यक्ति को दूसरों के दोष दिखाई देता है, दूसरा व्यक्ति को अपने दोष देखने की क्षमता देता है। इसलिए विद्यावान व्यक्ति की वास्तविक पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह कितना जानता है, बल्कि इससे भी होती है कि वह अपने ज्ञान की सीमाओं को कितना पहचानता है।

वास्तविक जीवन में इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण संवाद में दिखाई देता है। एक व्यक्ति किसी विषय पर अपनी विशेषज्ञता के कारण बातचीत में लगातार दूसरों को रोकता है, उनकी बात पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकाल देता है और हर चर्चा को अपनी जानकारी प्रदर्शित करने का अवसर बना लेता है। वह तथ्यात्मक रूप से सही भी हो सकता है, फिर भी उसके साथ संवाद करना कठिन हो जाता है। दूसरी ओर, ज्ञानवान और विवेकशील व्यक्ति पहले सुनता है, फिर बोलता है। वह यह मानकर चलता है कि सामने वाले के पास भी कोई अनुभव या दृष्टिकोण हो सकता है। वह असहमति को शत्रुता नहीं मानता। यही व्यवहारिक विनम्रता ज्ञान को प्रभावशाली बनाती है।

इसी से दूसरा कथन जुड़ता है—“विद्वान को लोग उसके भय के कारण सम्मान करते हैं, जबकि विद्यावान को लोग उसके भाव के कारण सम्मान देते हैं।” यहां ‘भय’ का अर्थ केवल डर नहीं है। भय में पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, प्रभाव, दंड देने की क्षमता या सामाजिक दबाव भी शामिल हो सकता है। किसी अधिकारी, शिक्षक, प्रशासक या प्रभावशाली व्यक्ति के सामने लोग औपचारिक सम्मान प्रदर्शित कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें उसके अधिकार या प्रतिक्रिया का भय होता है। लेकिन यह सम्मान हमेशा व्यक्ति के प्रति वास्तविक आदर नहीं होता। व्यक्ति के जाते ही वही लोग उसकी आलोचना भी कर सकते हैं।

भाव से उत्पन्न सम्मान की प्रकृति अलग होती है। जब किसी व्यक्ति के व्यवहार में न्याय, संवेदना, सहयोग, निष्पक्षता और मानवीयता दिखाई देती है, तो लोग उसके प्रति स्वाभाविक सम्मान विकसित करते हैं। ऐसा सम्मान पद पर निर्भर नहीं रहता। व्यक्ति पद से हट जाए, तब भी उसकी प्रतिष्ठा बनी रह सकती है। भय आधारित सम्मान बाहर से दिखाई देता है, भाव आधारित सम्मान भीतर से उत्पन्न होता है। पहला अनुशासन कायम कर सकता है, दूसरा संबंध कायम करता है। प्रशासन और संगठन में दोनों की अपनी भूमिका हो सकती है, लेकिन दीर्घकालीन विश्वास के लिए केवल भय पर्याप्त नहीं होता।

शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध में यह अंतर विशेष रूप से दिखाई देता है। ऐसा शिक्षक जो अपने ज्ञान और पद का लगातार प्रदर्शन करता है, विद्यार्थियों को चुप करा सकता है, अनुशासन बनाए रख सकता है और परीक्षा में अच्छे परिणाम भी दिला सकता है। लेकिन विद्यार्थी उसके विषय से अधिक उसके व्यक्तित्व से भयभीत हो सकते हैं। इसके विपरीत ऐसा शिक्षक जो विषय में गहरा ज्ञान रखने के साथ विद्यार्थियों के प्रश्नों को सम्मान देता है, अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच नहीं करता और जिज्ञासा को प्रोत्साहित करता है, विद्यार्थियों के मन में दीर्घकालीन सम्मान उत्पन्न करता है। विद्यार्थी वर्षों बाद भी ऐसे शिक्षक को केवल उसके पढ़ाए हुए पाठ के लिए नहीं, बल्कि उसके व्यवहार के लिए याद रखते हैं।

तीसरा कथन और अधिक गहरा सामाजिक सत्य सामने रखता है—“विद्वान व्यक्ति अपनी विद्वता के कारण अपने मित्रों को भी अपना शत्रु बना लेता है, जबकि विद्यावान व्यक्ति अपनी विनम्रता के कारण अपने शत्रुओं को भी अपना मित्र बना लेता है।” यहां भी इसे शाब्दिक सार्वभौमिक सत्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इसमें मानवीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण मनोविज्ञान अवश्य छिपा है। किसी व्यक्ति की प्रतिभा जब निरंतर दूसरों को छोटा दिखाने का माध्यम बन जाती है, तो उसके निकट रहने वाले लोग धीरे-धीरे असहज हो सकते हैं। मित्रता बराबरी और पारस्परिक सम्मान पर टिकती है। यदि कोई व्यक्ति प्रत्येक चर्चा में स्वयं को निर्णायक मानता है, दूसरों की बुद्धि का उपहास करता है और अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करता रहता है, तो उसके मित्रों में प्रतिस्पर्धा, असंतोष या दूरी पैदा होना स्वाभाविक है।

इसके विपरीत विनम्रता संबंधों में स्थान बनाती है। विनम्र व्यक्ति सामने वाले को महत्व देता है। वह अपने ज्ञान का उपयोग दूसरे को दबाने के लिए नहीं, बल्कि समझाने और सहयोग करने के लिए करता है। इसलिए उससे असहमत व्यक्ति भी उसके साथ संवाद जारी रख सकता है। यही कारण है कि विनम्रता कई बार विरोध को सहयोग में बदलने की क्षमता रखती है। हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विनम्रता का अर्थ कमजोरी, आत्महीनता या अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। वास्तविक विनम्रता के साथ आत्मसम्मान और सिद्धांत भी होते हैं। विद्यावान व्यक्ति आवश्यक होने पर दृढ़ता से असहमति व्यक्त कर सकता है, लेकिन वह व्यक्ति पर आक्रमण करने के बजाय विचार की आलोचना करता है।

ज्ञान और अहंकार के संबंध को समझने के लिए आत्मविश्वास और अहंकार के बीच अंतर करना भी आवश्यक है। आत्मविश्वास कहता है—“मैं इस विषय को जानता हूं और अपने तर्क के आधार पर अपनी बात रख सकता हूं।” अहंकार कहता है—“मैं जानता हूं, इसलिए तुम्हारी बात महत्वहीन है।” आत्मविश्वास व्यक्ति को सक्षम बनाता है, जबकि अहंकार उसे अलग-थलग कर सकता है। आत्मविश्वासी व्यक्ति अपनी क्षमता स्वीकार करता है; विनम्र व्यक्ति अपनी सीमाएं भी स्वीकार करता है। इसलिए वास्तविक विद्यावत्ता आत्मविश्वास को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे संतुलित करती है।

विद्वान और विद्यावान का अंतर इस बात से भी समझा जा सकता है कि दोनों आलोचना के प्रति कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। अहंकारी विद्वान आलोचना को अपनी प्रतिष्ठा पर हमला समझ सकता है। वह आलोचक की योग्यता पर प्रश्न उठाकर मूल प्रश्न से बचने की कोशिश कर सकता है। विद्यावान व्यक्ति आलोचना में भी उपयोगी तत्व खोजने का प्रयास करता है। यदि आलोचना गलत है तो वह तर्क से उसे अस्वीकार करता है और यदि सही है तो उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं करता। किसी व्यक्ति का वास्तविक बौद्धिक स्तर इस बात से कम और इस बात से अधिक पहचाना जा सकता है कि वह अपनी भूल स्वीकार करने की कितनी क्षमता रखता है।

ज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य केवल दूसरों को प्रभावित करना नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाना होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की शिक्षा बढ़ती जाए लेकिन उसका व्यवहार कठोर होता जाए, यदि उसकी भाषा अधिक प्रभावशाली होती जाए लेकिन उसकी संवेदनशीलता घटती जाए, यदि उसकी डिग्रियां बढ़ती जाएं लेकिन उसका धैर्य कम होता जाए, तो यह विचार करना आवश्यक है कि ज्ञान ने उसके जीवन को वास्तव में कितना बदला है। शिक्षा की सफलता केवल सूचना की मात्रा से नहीं मापी जा सकती। उसका मूल्य इस बात में भी है कि उसने व्यक्ति में विवेक, सहिष्णुता, न्याय-बोध, आत्मसंयम और मानवीय संवेदना कितनी विकसित की।

यहां एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—विनम्रता और अज्ञान के बीच अंतर। केवल कम बोलना या स्वयं को छोटा दिखाना विद्यावत्ता नहीं है। कोई व्यक्ति अत्यंत विनम्र भाषा का प्रयोग कर सकता है, लेकिन भीतर से अहंकारी हो सकता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति स्पष्ट और दृढ़ भाषा में अपनी बात रख सकता है, फिर भी वह अत्यंत विनम्र और विद्यावान हो सकता है। इसलिए केवल बाहरी व्यवहार के आधार पर निर्णय करना उचित नहीं। वास्तविक विनम्रता तब दिखाई देती है जब व्यक्ति के पास शक्ति होने के बावजूद वह उसका दुरुपयोग नहीं करता, जब वह सही होने के बावजूद दूसरे को अपमानित नहीं करता और जब उसे सम्मान मिलने के बावजूद वह स्वयं को दूसरों से ऊपर नहीं समझता।

आज के सामाजिक और डिजिटल वातावरण में यह अंतर और अधिक प्रासंगिक हो गया है। सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने का मंच दिया है। किसी विषय पर कुछ जानकारी प्राप्त होते ही व्यक्ति विशेषज्ञ की भूमिका ग्रहण कर लेता है। बहस में तर्क से अधिक व्यक्तिगत आक्रमण दिखाई देने लगते हैं। लोग अपनी बात सिद्ध करने से अधिक दूसरे को गलत सिद्ध करने में रुचि लेने लगते हैं। ऐसे वातावरण में विद्यावत्ता का अर्थ और महत्वपूर्ण हो जाता है। सही जानकारी रखना आवश्यक है, लेकिन उतना ही आवश्यक यह जानना भी है कि कब बोलना है, कैसे बोलना है और कब यह स्वीकार करना है कि “मुझे इस विषय की पर्याप्त जानकारी नहीं है।”

कार्यस्थल में भी विद्वान और विद्यावान के व्यवहार का अंतर स्पष्ट होता है। किसी संगठन में सबसे अधिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति हमेशा सबसे अच्छा नेता नहीं होता। नेतृत्व के लिए विषय-ज्ञान के साथ लोगों को समझने की क्षमता, सुनने का धैर्य, निर्णय की निष्पक्षता और दूसरों की क्षमता को विकसित करने की योग्यता भी आवश्यक है। ऐसा विशेषज्ञ जो अपने subordinates को लगातार अयोग्य सिद्ध करता रहे, संगठन में भय पैदा कर सकता है, लेकिन ऐसा नेतृत्व लंबे समय में रचनात्मकता को कमजोर कर सकता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपनी टीम की प्रतिभा को पहचानता है और सफलता का श्रेय साझा करता है, वह विश्वास पैदा करता है। यही विश्वास किसी संस्था की वास्तविक शक्ति बन सकता है।

परिवार में भी यही सिद्धांत लागू होता है। माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन या अन्य संबंधों में केवल यह सिद्ध करना कि “मैं सही हूं” हमेशा संबंधों को मजबूत नहीं करता। कभी-कभी संबंध बचाने के लिए सही होते हुए भी भाषा में संयम आवश्यक होता है। विद्यावान व्यक्ति सत्य को छोड़ता नहीं, लेकिन सत्य कहने की विधि पर विचार करता है। उसे पता होता है कि सत्य केवल तथ्य नहीं है; उसका सामाजिक और भावनात्मक संदर्भ भी होता है। इसी कारण विवेक ज्ञान से एक कदम आगे की अवस्था प्रतीत होता है।

फिर भी इस पूरे विश्लेषण में एक सावधानी आवश्यक है। हमें विद्वता को संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। समाज को उत्कृष्ट विद्वानों की उतनी ही आवश्यकता है जितनी विनम्र और संवेदनशील व्यक्तियों की। विज्ञान, साहित्य, दर्शन, कानून और शिक्षा का विकास कठोर बौद्धिक अनुशासन के बिना नहीं हो सकता। प्रश्न विद्वता को कम करने का नहीं, बल्कि उसे अहंकार से मुक्त करने का है। आदर्श स्थिति वह होगी जहां विद्वता और विद्यावत्ता एक ही व्यक्ति में मिल जाएं—ज्ञान गहरा हो, तर्क मजबूत हो, दृष्टि व्यापक हो और व्यवहार विनम्र हो।

वास्तव में विद्वान और विद्यावान का सर्वोत्तम समन्वय वही है जिसमें ज्ञान शक्ति तो देता है, लेकिन शक्ति के साथ संयम भी आता है; तर्क क्षमता देता है, लेकिन तर्क के साथ सहिष्णुता भी आती है; सफलता प्रतिष्ठा देती है, लेकिन प्रतिष्ठा के साथ विनम्रता भी बनी रहती है। ऐसा व्यक्ति अपनी विद्वता को हथियार नहीं बनाता। वह ज्ञान को प्रकाश की तरह इस्तेमाल करता है। प्रकाश का उद्देश्य दूसरे की आंखें चौंधियाना नहीं, बल्कि रास्ता दिखाना है।

इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि विद्वता ज्ञान की ऊंचाई है, जबकि विद्यावत्ता ज्ञान की परिपक्वता। विद्वता व्यक्ति को यह बता सकती है कि संसार में क्या है; विद्यावत्ता उसे यह समझने में सहायता करती है कि उस ज्ञान के साथ व्यवहार कैसे करना है। विद्वता प्रश्नों के उत्तर खोजती है; विद्यावत्ता यह भी पूछती है कि उन उत्तरों का उपयोग किस प्रकार किया जाए। विद्वता व्यक्ति को तर्क करना सिखाती है; विद्यावत्ता उसे यह सिखाती है कि हर तर्क को युद्ध बनाना आवश्यक नहीं है। विद्वता दूसरों की भूल पहचान सकती है; विद्यावत्ता अपनी भूल स्वीकार करने का साहस देती है।

अंततः यह अंतर किसी व्यक्ति की डिग्री, पद, प्रसिद्धि या भाषा से निर्धारित नहीं किया जा सकता। वास्तविक पहचान उसके व्यवहार से होती है। उसके साथ कमजोर व्यक्ति कैसा महसूस करता है, असहमत व्यक्ति उसके सामने कितना सुरक्षित महसूस करता है, अधीनस्थ उसके साथ कितनी स्वतंत्रता से संवाद कर पाता है, आलोचना सुनकर वह कैसी प्रतिक्रिया देता है और सफलता मिलने पर उसका व्यवहार कैसा रहता है—ये सभी उसकी ज्ञान-संस्कृति के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। जो व्यक्ति अपने ज्ञान के कारण दूसरों को छोटा समझता है, वह बहुत कुछ जानकर भी जीवन की एक बड़ी शिक्षा से वंचित रह सकता है। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि ज्ञान का वास्तविक मूल्य स्वयं को बड़ा सिद्ध करने में नहीं, बल्कि स्वयं को अधिक विवेकशील, न्यायपूर्ण और मानवीय बनाने में है, वह ज्ञान को विद्या में रूपांतरित करने की दिशा में आगे बढ़ता है।

इसलिए “विद्वान को ज्ञान का अहंकार होता है, जबकि विद्यावान को अहंकार का ज्ञान होता है” को किसी कठोर वर्गीकरण के बजाय एक आत्मपरीक्षण का सूत्र मानना अधिक उचित होगा। प्रत्येक व्यक्ति को समय-समय पर स्वयं से पूछना चाहिए कि उसका ज्ञान उसे दूसरों से दूर कर रहा है या जोड़ रहा है, उसकी विद्वता संवाद को बंद कर रही है या खोल रही है, उसकी सफलता में विनम्रता बढ़ रही है या श्रेष्ठता-बोध। यदि ज्ञान हमें अधिक सुनने वाला, अधिक समझने वाला, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक मानवीय बना रहा है, तभी वह जीवन में सार्थक रूप से उतर रहा है।

अंततः मनुष्य की श्रेष्ठता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह कितना जानता है, बल्कि इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि वह अपने ज्ञान के साथ कैसा व्यवहार करता है। विद्वता सम्मान अर्जित कर सकती है, लेकिन विद्यावत्ता विश्वास अर्जित करती है; विद्वता लोगों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन विद्यावत्ता लोगों को जोड़ती है; विद्वता ज्ञान का परिचय है, जबकि विद्यावत्ता ज्ञान के चरित्र में रूपांतरण का नाम है। यही वह बिंदु है जहां ज्ञान सूचना से ऊपर उठकर विवेक बनता है और व्यक्ति केवल विद्वान नहीं, वास्तव में विद्यावान कहलाने योग्य बनता है।

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