Article Desk, tajnews.in | Wednesday, June 30, 2026, 05:44:11 AM IST


पहाड़ कभी नीयत नहीं बताते, सिर्फ कदमों की आहट सुनते हैं: पहाड़ पर भरोसे की भयानक हत्या
कथित तौर पर होने वाली पत्नी द्वारा धक्का देकर जान लेने के आरोपों के बीच अपराधी मानसिकता पर गहन मंथन
— रिमझिम वर्मा सचदेवा
पहाड़ कभी किसी की नीयत नहीं बताते। वे सिर्फ कदमों की आहट सुनते हैं। उस दिन भी शायद ऐसा ही हुआ होगा। एक युवक अपनी होने वाली पत्नी के साथ भविष्य के सपने लेकर पहाड़ की चढ़ाई कर रहा था। उसे क्या पता था कि जिस हाथ पर वह सबसे ज़्यादा भरोसा कर रहा है, उसी भरोसे के पीछे अगर जाँच एजेंसियों के आरोप सही साबित होते हैं, तो एक सुनियोजित साज़िश छिपी बैठी थी। जाँच में सामने आए दावों के अनुसार पहले योजना बनी फिर एक कोशिश हुई, जिसमें वह बच गया। उसने उस घटना को हादसा मान लिया। उसने विश्वास किया। लेकिन कुछ दिन बाद वही रास्ता, वही पहाड़, वही भरोसा और इस बार कथित तौर पर एक और साथी। एक धक्का लगा और एक ज़िंदगी खत्म हो गई। अगर अदालत में ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह सिर्फ एक हत्या नहीं होगी, बल्कि विश्वास की सबसे भयावह हत्या होगी।

लेकिन इस पूरी घटना से भी ज़्यादा डराने वाली बात वह है, जो घटना के बाद समाज में हुई। जैसे ही खबर सामने आई, लोगों ने बिना किसी ठहराव के फैसला सुना दिया – “मां-बाप ने संस्कार नहीं दिए होंगे”, “आजकल की लड़कियां ऐसी ही होती हैं”, “यही होता है जब बच्चों को ज़्यादा आज़ादी मिल जाती है।” शायद किसी अपराध के बाद सबसे आसान काम यही होता है कि दोष किसी पूरे परिवार, पूरे लिंग या पूरे पीढ़ी पर डाल दिया जाए। इससे सोचने की मेहनत बच जाती है। लेकिन सच इतना सीधा नहीं होता। हम अक्सर भूल जाते हैं कि मनुष्य का व्यक्तित्व केवल घर की चारदीवारी में नहीं बनता। परिवार जीवन की पहली पाठशाला है, आख़िरी नहीं। उसके बाद दोस्त आते हैं, रिश्ते आते हैं, प्रेम आता है, असुरक्षाएं आती हैं, लालच आता है, महत्वाकांक्षाएं आती हैं, असफलताएं आती हैं और धीरे-धीरे व्यक्ति अपने भीतर एक ऐसी दुनिया बना लेता है, जहाँ उसके माता-पिता की पहुँच भी नहीं रह जाती। कई बार जिन बच्चों को माता-पिता सबसे ज़्यादा जानते हैं, वही बच्चे अपने जीवन के सबसे बड़े फैसले उनसे छिपाकर लेते हैं। इसलिए हर अपराध के बाद परवरिश को कठघरे में खड़ा कर देना आसान तो है, लेकिन न्यायपूर्ण नहीं।
यह कहना भी गलत होगा कि संस्कारों का कोई महत्व नहीं है। संस्कार इंसान को सही और गलत का पहला बोध देते हैं। लेकिन जीवन के हर मोड़ पर निर्णय व्यक्ति स्वयं लेता है। वह किसकी संगत चुनता है, किससे प्रभावित होता है, किससे लिए अपने सिद्धांत छोड़ देता है और किस सीमा तक गिर सकता है, यह अंततः उसकी अपनी चेतना तय करती है। यही कारण है कि एक ही घर में पले दो भाई बिल्कुल अलग इंसान बन जाते हैं। कोई कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदार रहता है, तो कोई अच्छे माहौल में पलकर भी अपराध की राह चुन लेता है। इसलिए यह मान लेना कि हर अपराध का कारण केवल परवरिश है, मनुष्य के जटिल स्वभाव को नज़रअंदाज़ करना होगा।
असल सवाल संस्कारों से ज़्यादा अपराधी मानसिकता का है। अपराध अचानक पैदा नहीं होता। वह धीरे-धीरे मन में आकार लेता है। जब किसी व्यक्ति के लिए दूसरा इंसान एक जीवित मनुष्य नहीं, बल्कि अपने रास्ते की रुकावट बन जाता है, तब अपराध जन्म लेता है। जब स्वार्थ, संवेदना पर भारी पड़ जाता है और किसी की जान, किसी की इच्छा से छोटी लगने लगती है, तब एक बीमार मानसिकता सामने आती है। ऐसी मानसिकता किसी की सगी नहीं होती। उसने इतिहास में अपने माता-पिता की भी हत्या की है, अपने बच्चों की भी, अपने जीवनसाथी की भी और अपने सबसे करीबी मित्रों की भी। अपराधी का कोई रिश्ता नहीं होता, उसका रिश्ता केवल अपने स्वार्थ से होता है।
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इस घटना के बाद एक और प्रवृत्ति बहुत तेज़ी से दिखाई दी। कुछ लोगों ने इसे आधार बनाकर सभी लड़कियों के चरित्र पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। लेकिन क्या हर बार ऐसा ही होता है? जब किसी लड़की की हत्या उसका प्रेमी करता है, जब कोई पति अपनी पत्नी की जान ले लेता है, जब किसी महिला के साथ क्रूर अपराध होता है, तब क्या पूरा पुरुष समाज कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है? नहीं। क्योंकि हम जानते हैं कि एक व्यक्ति का अपराध पूरे समाज का चरित्र नहीं होता। फिर किसी एक महिला के कथित अपराध के आधार पर करोड़ों लड़कियों को एक ही तराज़ू में तौलना कैसे उचित हो सकता है? अपराध का कोई लिंग नहीं होता। न अच्छाई स्त्री होती है, न बुराई पुरुष। दोनों का संबंध केवल व्यक्ति की सोच और उसके कर्म से होता है।
ऐसे कई मामले पहले भी सामने आए हैं, जहाँ प्रेम, विश्वास और धोखे ने मिलकर भयावह अंत लिखा। कहीं प्रेमी ने प्रेमिका की हत्या की, कहीं पत्नी ने पति की, कहीं पति ने पत्नी की। हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन एक बात समान थी..अपराध किसी पूरे वर्ग ने नहीं किया था, बल्कि एक व्यक्ति ने किया था। इसलिए हर घटना के बाद हमें अपनी प्रतिक्रिया से ज़्यादा अपनी समझ की परीक्षा लेनी चाहिए।
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, इस मामले में अंतिम सत्य अदालत और न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी। लेकिन एक बात आज भी उतनी ही सच है कि अपराधी मानसिकता किसी का धर्म नहीं देखती, किसी का लिंग नहीं देखती, किसी का परिवार नहीं देखती। वह केवल अपने उद्देश्य को देखती है। इसलिए अगर समाज को सचमुच बदलना है, तो हमें बेटियों या बेटों से नहीं, बल्कि उस सोच से लड़ना होगा जो इंसान को इंसान नहीं, अपने स्वार्थ का साधन समझने लगती है। यही सोच सबसे बड़ा अपराधी है, और शायद वही इस पूरी घटना की सबसे बड़ी सीख भी।

Pawan Singh
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