International Desk, tajnews.in | Friday, April 24, 2026, 07:45:30 PM IST

इस्लामाबाद/वाशिंगटन: मध्य पूर्व (Middle East) में लगातार भड़कती युद्ध की आग और वैश्विक अस्थिरता के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से एक बहुत बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है। ईरान के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए वहां के विदेश मंत्री अब्बास अरागची पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पहुंचने वाले हैं। ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, अब्बास अरागची के इस कूटनीतिक दौरे के शुरू होते ही वाशिंगटन (अमेरिका) से एक बड़ा और चौंकाने वाला बयान सामने आया है। अमेरिका ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ईरान के पास अब एक ऐतिहासिक शांति समझौते (Peace Deal) और कूटनीतिक बहाली के लिए ‘खुला मौका’ है। अमेरिकी रक्षा विभाग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी पीट हेगसेथ के हालिया बयानों ने इस बात के पुख्ता संकेत दिए हैं कि अमेरिका अब ईरान के साथ शांति वार्ता के दूसरे दौर (Second Round of Peace Talks) के लिए पूरी तरह से तैयार है। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका एक अहम मध्यस्थ (Mediator) के रूप में देखी जा रही है। एक तरफ जहां इजरायल और ईरान समर्थित गुटों के बीच तनाव चरम पर है, वहीं अमेरिका का यह ‘खुला प्रस्ताव’ दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने से वापस खींचने का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। आइए, इस पूरी कूटनीतिक बिसात, पाकिस्तान की भूमिका और अमेरिका-ईरान की संभावित डील का गहराई से विश्लेषण करते हैं।
ईरान-पाकिस्तान कूटनीति: अब्बास अरागची का अहम दौरा
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का यह इस्लामाबाद दौरा कूटनीतिक और रणनीतिक (Strategic) दोनों ही पैमानों पर बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरान और पाकिस्तान के बीच 900 किलोमीटर से अधिक लंबी और अस्थिर सीमा है, जहां दोनों देशों को अक्सर बलूच अलगाववादियों और आतंकी गुटों की घुसपैठ का सामना करना पड़ता है। अब्बास अरागची अपने इस दौरे पर पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ सबसे पहले सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी संयुक्त अभियानों और रुकी हुई ‘ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन’ (Iran-Pakistan Gas Pipeline) परियोजना पर विस्तृत चर्चा करेंगे। पाकिस्तान इस वक्त भयानक ऊर्जा संकट से जूझ रहा है और उसे इस गैस पाइपलाइन की सख्त जरूरत है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों (US Sanctions) के डर से इस्लामाबाद इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से कतराता रहा है।
हालांकि, इस दौरे का दायरा केवल द्विपक्षीय व्यापार और सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि अरागची का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब ईरान खुद को मध्य पूर्व के एक बड़े युद्ध में फंसा हुआ महसूस कर रहा है। ऐसे में ईरान पाकिस्तान के जरिए दुनिया और विशेषकर अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता का पक्षधर है और कूटनीतिक रास्ते उसके लिए हमेशा खुले हैं। पाकिस्तान, जो ऐतिहासिक रूप से अमेरिका का भी एक पुराना (भले ही उतार-चढ़ाव भरा) सहयोगी रहा है, इस पूरे मामले में एक बहुत ही सुरक्षित और उपयुक्त ‘संदेशवाहक’ की भूमिका निभा रहा है। ईरान का प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद से न केवल क्षेत्रीय देशों को बल्कि पश्चिमी दुनिया को भी अपनी भावी रणनीतियों का संकेत देने वाला है।
अमेरिका का ‘खुला मौका’: क्या होने जा रही है नई डील?
इस पूरी कूटनीतिक बिसात में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम अमेरिका की ओर से आया है। जिस वक्त अब्बास अरागची इस्लामाबाद पहुंच रहे हैं, ठीक उसी वक्त अमेरिका ने ईरान के सामने ‘डील’ (Deal) का एक खुला प्रस्ताव रख दिया है। अमेरिकी प्रशासन के प्रमुख रणनीतिकारों में शुमार और रक्षा मामलों के दिग्गज पीट हेगसेथ के हालिया बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हलचल मचा दी है। वाशिंगटन से यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि अगर ईरान अपने परमाणु संवर्धन (Nuclear Enrichment) कार्यक्रम को रोकता है और मध्य पूर्व में अपने प्रॉक्सी गुटों (जैसे हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों) को समर्थन देना बंद करता है, तो अमेरिका उसके साथ ‘शांति वार्ता के दूसरे दौर’ (Second Round of Peace Talks) को शुरू करने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
अमेरिका ने यह साफ कर दिया है कि वह मध्य पूर्व में एक और लंबा और खर्चीला युद्ध नहीं चाहता। अमेरिका की ‘कैरट एंड स्टिक’ (Carrot and Stick) पॉलिसी यहां साफ नजर आ रही है। एक तरफ जहां इजरायल के जरिए ईरान पर भारी सैन्य दबाव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक खिड़की खोलकर ईरान को अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को बचाने का ‘खुला मौका’ दिया जा रहा है। अगर ईरान इस डील को स्वीकार करता है, तो उसके ऊपर से कई कड़े अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं, जिससे उसे वैश्विक बाजार में अपना कच्चा तेल (Crude Oil) बेचने की दोबारा आजादी मिल जाएगी। यह प्रस्ताव ईरान के लिए एक बहुत बड़ी लाइफलाइन साबित हो सकता है, बशर्ते वह अपनी क्षेत्रीय आक्रामकता को त्यागने के लिए तैयार हो।
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पाकिस्तान की दोधारी कूटनीति: अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन
इस पूरे अंतरराष्ट्रीय ड्रामे में पाकिस्तान एक बहुत ही जटिल और दोधारी कूटनीति (Tightrope Walk) का पालन कर रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस वक्त अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बेलआउट पैकेजों पर पूरी तरह से निर्भर है, और आईएमएफ में अमेरिका का भारी दबदबा है। इसलिए पाकिस्तान किसी भी कीमत पर अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता। दूसरी ओर, ईरान उसका एक शक्तिशाली पड़ोसी देश है, जिसके साथ उसके गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं। अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पाकिस्तान को ईरान की भी उतनी ही आवश्यकता है।
ऐसे में जब अब्बास अरागची इस्लामाबाद में होंगे, तो पाकिस्तानी नेतृत्व उन्हें अमेरिका के उस ‘खुले प्रस्ताव’ पर गंभीरता से विचार करने के लिए राजी करने की पूरी कोशिश करेगा। पाकिस्तान खुद भी चाहता है कि ईरान और अमेरिका के बीच कोई शांति समझौता (JCPOA जैसी कोई नई डील) हो जाए, ताकि उस पर से ‘ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन’ को लेकर लटक रही अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार हट जाए। इस्लामाबाद इस समय पर्दे के पीछे से (Back-channel diplomacy) वाशिंगटन और तेहरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा है। यदि पाकिस्तान इस शांति वार्ता के दूसरे दौर को शुरू करवाने में सफल रहता है, तो यह वैश्विक कूटनीति में उसकी एक बहुत बड़ी जीत मानी जाएगी और इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि में भी भारी सुधार होगा।
आगे का रास्ता: क्या ईरान स्वीकार करेगा अमेरिका का प्रस्ताव?
अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान का सर्वोच्च नेतृत्व (Supreme Leader) अमेरिका के इस खुले मौके पर क्या प्रतिक्रिया देता है। ईरान के भीतर इस समय भारी उथल-पुथल मची हुई है। देश की जनता भीषण आर्थिक मंदी, महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त है। ईरान की मुद्रा (Rial) अपने सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गई है। इन घरेलू दबावों के कारण ईरान की सरकार पर भी पश्चिमी देशों के साथ समझौता करने का भारी दबाव है। विदेश मंत्री अब्बास अरागची को ईरान के उदारवादी और कूटनीतिक धड़े का नेता माना जाता है, जो हमेशा से परमाणु वार्ता (Nuclear Talks) के पक्ष में रहे हैं।
हालांकि, ईरान के कट्टरपंथी धड़े और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) अमेरिका पर आसानी से भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि अमेरिका की यह डील केवल एक कूटनीतिक जाल है। फिर भी, मध्य पूर्व के वर्तमान हालात, इजरायल के आक्रामक रुख और कमजोर होती अर्थव्यवस्था को देखते हुए, ईरान के पास बातचीत की मेज पर आने के अलावा कोई बहुत अच्छा विकल्प भी नहीं बचा है। इस्लामाबाद में होने वाली ये बैठकें तय करेंगी कि ईरान शांति का रास्ता चुनता है या फिर टकराव का। अगर अब्बास अरागची इस अमेरिकी प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख अपनाते हैं, तो आने वाले कुछ ही महीनों में हम दुनिया के सबसे बड़े भू-राजनीतिक (Geopolitical) समझौतों में से एक को आकार लेते हुए देख सकते हैं, जो पूरे मध्य पूर्व की तस्वीर को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा।
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Thakur Pawan Singh
Editor in Chief, Taj News
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