नागरिक परिक्रमा: एनसीआर में भड़का मजदूर आंदोलन- किसके पक्ष में खड़ी है भाजपा सरकार? संजय पराते की बेबाक टिप्पणी

आर्टिकल Desk, Taj News | Saturday, April 18, 2026, 04:04:00 PM IST

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Sanjay Parate Writer
संजय पराते
उपाध्यक्ष, छत्तीसगढ़ किसान सभा
एवं राजनैतिक विश्लेषक
वरिष्ठ वामपंथी नेता और राजनैतिक विश्लेषक संजय पराते ने अपनी विशेष सीरीज़ ‘नागरिक परिक्रमा’ में दिल्ली-एनसीआर (NCR) में भड़के ‘मजदूर आंदोलन’ और पुलिस की बर्बरता पर मोदी सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा किया है। दरअसल, उन्होंने सवाल उठाया है कि जब कॉर्पोरेट घरानों का मुनाफा लगातार बढ़ रहा है, तो 12 घंटे खटने वाले मजदूरों को उनके हक़ की ‘न्यूनतम मजदूरी’ (Minimum Wage) और छुट्टियां क्यों नहीं दी जा रही हैं? इसके अलावा, उन्होंने हक़ मांगने वाले मजदूरों को ‘नक्सली’ या ‘पाकिस्तानी’ बताने की साजिश पर भी बहुत गहरा प्रहार किया है। इसलिए, बिना किसी देरी के पढ़िए यह बेबाक राजनीतिक टिप्पणी:
HIGHLIGHTS
  1. दिल्ली, नोएडा और पूरे एनसीआर क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी और जायज हकों की मांग को लेकर लाखों मजदूरों का आंदोलन उग्र हो गया है।
  2. दरअसल, श्रम कानूनों में बदलाव कर 12 घंटे काम का नियम तो लागू कर दिया गया, लेकिन मालिक मज़दूरों को घोषित न्यूनतम वेतन तक नहीं दे रहे हैं।
  3. इसके अलावा, बाबा साहेब का हवाला देते हुए लेखक ने साफ कहा कि कानून चाहे जितने अच्छे हों, अगर सरकार ‘लुटेरे कॉरपोरेटों’ के साथ है, तो गरीबों को न्याय नहीं मिलेगा।
  4. हकीकत में, जब पूंजीपतियों का मुनाफा बेतहाशा बढ़ रहा है, तो 30 हजार रुपये न्यूनतम मजदूरी मांगने वाले मजदूरों को ‘नक्सल’ या ‘पाकिस्तानी’ साजिश क्यों बताया जा रहा है?

नागरिक परिक्रमा
(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां) एनसीआर में मजदूर आंदोलन : किसके पक्ष में खड़ी है भाजपा सरकार?

नोएडा-दिल्ली-एनसीआर ये तीनों सटे हुए क्षेत्र हैं, जहां हजारों फैक्टरियां और कंपनियां हैं और इनमें लाखों मजदूर काम करते हैं। न्यूनतम मजदूरी देने की मांग को लेकर हरियाणा से उठी मांग में ये तीनों क्षेत्र भी पिछले चार दिनों में शामिल हो गए हैं। इस जायज मांग पर आंदोलनकारियों पर पुलिस की नाजायज सख्ती के कारण हिंसा भड़क उठी है और आगजनी की वारदातें हुई है। इस मजदूर आंदोलन ने पिछले एक दशक से ज्यादा से जारी भाजपा राज का असली चेहरा सामने ला दिया है。

और मजदूरों की मांगें क्या है? वे न्यूनतम मजदूरी की मांग कर रहे हैं, वे अतिरिक्त काम के उचित भुगतान की मांग कर रहे हैं, वे समय पर वेतन देने की मांग कर रहे हैं और वे छुट्टी के प्रावधानों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। इन मांगों में नाजायज क्या हैं? ये सब प्रावधान तो हमारे श्रम कानूनों में और हाल फिलहाल पारित श्रम संहिताओं में पहले से ही मौजूद हैं। फिर मजदूरों को इन अधिकारों और सुविधाओं को पाने के लिए सड़कों पर उतरना क्यों पड़ा है?

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वर्ग विभाजित समाज की असली कहानी यही है कि विधानमंडल कितने भी अच्छे कानून बना लें, यदि उसे लागू करवाने वाली मशीनरी, शासन और प्रशासन, लूटेरों के साथ खड़ा है, तो गरीबों को न्याय की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। बाबा साहेब ने यही तो कहा था कि हमने दुनिया का सर्वोत्तम संविधान बनाया है, लेकिन इसे लागू करने की शासन में इच्छाशक्ति नहीं होगी, तो यह संविधान बदतर साबित होगा। पिछले एक दशक में मोदी का शासन शोषित मजदूरों के पक्ष में नहीं, लूटेरे कॉरपोरेटों के साथ ही खड़ा रहा है。

आज मजदूरों की असली हालत क्या है? मजदूर न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि जिस रफ्तार से महंगाई बढ़ रही है, उससे वे जानवरों की तरह जिंदा रहने की हालत में भी नहीं रह गए हैं। लेकिन इस सरकार ने जो न्यूनतम मजदूरी घोषित भी की है, कारखानों के मालिक इस मजदूरी से भी उन्हें वंचित रखे हुए हैं और इस बात को छिपाने के लिए वे मजदूरों को कानूनी रूप से अनिवार्य वेतन स्लिप भी नहीं दे रहे हैं。

सरकार ने श्रम कानून में बदलाव कर मालिकों को मजदूरों से 12 घंटे काम करा सकने की छूट दे दी है। इसके लिए अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान है। लेकिन आज की हकीकत यह है कि 8 घंटों के लिए घोषित मजदूरी पर ही 12 घंटों तक काम लिया जा रहा है। श्रम संहिता में काम के अधिकतम घंटों के साथ न्यूनतम छुट्टियों का भी प्रावधान है, लेकिन काम के घंटे तो बढ़ा दिए गए हैं और छुट्टियों से उन्हें वंचित कर दिया गया है।

मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी कितनी है? हमारे देश में अलग-अलग राज्यों में मजदूरों की अलग-अलग श्रेणियों के हिसाब से यह मजदूरी 12 से 15 हजार रूपये मासिक निर्धारित है। वास्तविक मजदूरी उन्हें इससे भी कम मिलती है। इस मजदूरी में उन्हें अपने कम से कम 5 सदस्यों के परिवार को पालना पड़ता है। परिवार को पालने का मतलब है : मकान के किराए का इंतजाम, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य की देखभाल, उनके पोषण-आहार और पेट भरने का इंतजाम, परिवहन व्यय और वे सभी आवश्यक खर्च, जो एक इंसान के जिंदा रहने के लिए जरूरी है।

सरकारी आयोगों का भी मानना है कि आज एक मजदूर के परिवार को जिंदा रखने के लिए उन्हें न्यूनतम 30 हजार रूपये मजदूरी मिलना चाहिए。

सवाल यही है कि जब अनुपातहीन ढंग से पूंजीपतियों के मुनाफे बढ़ रहे हैं, तो मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी क्यों नहीं बढ़नी चाहिए? मजदूर यदि न्यूनतम मजदूरी और अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो आंदोलन में पाकिस्तान का हाथ कहां से आ जाता है या वह नक्सल प्रेरित आंदोलन कैसे बन जाता है? मोदी सरकार को साफ करना चाहिए कि कानूनों का उल्लंघन करने वाले कारखाना मालिकों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाए वह मजदूरों के आंदोलन को कुचलने पर आमादा क्यों है?

(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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