भारत में रहना है, तो ‘वन्देमातरम’ कहना होगा?
(आलेख : संजय पराते)
किसी विषय-वस्तु को विवादित बनाना और उसके आधार पर सांप्रदायिक खेला करना कोई भाजपा-आरएसएस से सीखे। वन्देमातरम आजादी के दीवानों के मुंह में बसा स्वतंत्रता मंत्र था। इस मंत्र ने हजारों देशभक्तों को हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूलना सिखाया। लेकिन आजादी के आंदोलन के दौरान भी वन्देमातरम कभी किसी की देशभक्ति की कसौटी नहीं बना。
जिस संघी गिरोह ने आजादी के आंदोलन के दौरान कभी अपनी जुबान पर वन्देमातरम नहीं लाया, जो केवल अंग्रेजों के लिए मुखबिरी करने और स्वतंत्रता संग्रामियों को पकड़वाने के काम में ही मशगूल रही, वह आज वन्देमातरम को देशभक्ति की कसौटी बना रही है।
जन-गण-मन बनाम वंदेमातरम का विवाद इस देश में कभी नहीं रहा। दोनों में से कौन सर्वश्रेष्ठ है, यह बहस भी कभी नहीं रही। कांग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम के पहले दो छंदों का नियमित गायन होता रहा। यही इस गीत के मूल छंद हैं। इन छंदों पर भी कभी विवाद नहीं हुआ। (वन्देमातरम के बाकी के छंद बंकिम चंद्र ने बाद में लिखकर आनंदमठ में जोड़े थे और बाद के छंद विवादित हुए।) आजादी के बाद संविधान लागू करते समय जन-गण-मन को राष्ट्र गान के रूप में, तो वन्देमातरम को राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया गया। उस समय भी कोई विवाद नहीं था।
आजादी के बाद आरएसएस ने अपने कपड़ों में लगे देशद्रोह के दाग को छुड़ाने के लिए “भारत में रहना है, तो वन्देमातरम कहना होगा” का नारा लगाया। लेकिन इस नारे को कभी किसी ने तवज्जो नहीं दी, इसलिए कि पूरा देश संघी गिरोह के असली चरित्र को जानता था。
8वें-9वें दशक से भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति को उभार मिला और 2014 से मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सांप्रदायिक मुद्दे पूरी तरह से राजनीति के केंद्र में आ गए। अब वन्देमातरम को भी सांप्रदायिक राजनीति का हथियार बनाया गया। इस पर संसद का विशेष अधिवेशन हुआ, जिसमें भाजपा और उसके संगी-साथी अलग-थलग पड़ गए, क्योंकि इतिहास संघी गिरोह द्वारा प्रचारित मिथकों का समर्थन नहीं करता। ऐतिहासिक तथ्य संघी गिरोह की सांप्रदायिक राजनीति को बेनकाब करते हैं।
लेकिन भाजपा ने जन-गण-मन के विरुद्ध वन्देमातरम को प्रस्तुत करना जारी रखा। इसके कारण भी काफी स्पष्ट है। भाजपा अपने आपको जन-गण-मन के रवींद्रनाथ की धर्मनिरपेक्ष, समभावी, उदारवादी, बहुलतावादी और समाजवाद की ओर झुकी सोच के बरक्स बंकिमचंद्र की कट्टर हिंदूवादी सांप्रदायिक सोच के करीब पाती है। रवींद्रनाथ संघी गिरोह को फूटी आंखों नहीं सुहाते और बंकिमचंद्र उसे जान से भी बहुत ज्यादा प्यारे हैं। सो, संसद के विशेष अधिवेशन के तिकड़म के बाद अब मोदी मंडल ने सरकारी तौर पर वन्देमातरम को जन-गण-मन के समकक्ष रखने का फैसला किया है और यह प्रावधान किया है कि लगभग चार मिनट के इस पूरे गीत के गायन के दौरान नागरिकों को ससम्मान सावधान की मुद्रा में खड़ा रहना होगा, वरना 3 साल की जेल और/या जुर्माना लगाया जा सकता है। इस सरकार का बस चले, तो वह जन गण मन को पदच्युत करके वन्देमातरम को ही राष्ट्रगान घोषित कर दे, लेकिन पूरी बेशर्मी के बावजूद इतनी हिम्मत अभी उसमें आई नहीं है。
यह फैसला भारतीय समाज को तोड़ने वाला और धर्म के आधार पर विभाजित करने वाला फैसला है और इसीलिए इसी मकसद से जान-बूझकर लिया गया फैसला है, क्योंकि सभी जानते हैं कि मुस्लिम समुदाय इस गीत के दो छंदों के बाद के छंदों को मानने/गाने/सम्मान देने के लिए तैयार नहीं है। धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय की देशभक्ति का आंकलन संघी गिरोह पिछले सौ सालों से कर रहा है, लेकिन किसी सरकार द्वारा अधिकृत ढंग से अब किया जा रहा है। सवाल यही है कि क्या किसी सरकार को इस देश में रहने वाले नागरिकों की देशभक्ति को आंकने का पैमाना बनाने का अधिकार हमारा संविधान देता है?
मोदी सरकार का यह कदम निश्चित ही संविधान विरोधी है और इसे सुप्रीम अदालत में चुनौती भी दी जाएगी। जब स्कूलों में इसे गाने के आदेश जारी किए गए थे, तब सुप्रीम कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि इसके पीछे अनिवार्यता की कोई बाध्यता नहीं है। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल के इस फैसले के बाद यह अनिवार्यता केवल छात्रों पर ही नहीं, इस देश के प्रत्येक नागरिक पर लागू हो जाती है। अब देखना होगा कि केंद्र के सामने लगातार घुटने टेकती सुप्रीम अदालत क्या रुख अख्तियार करती है? क्या संघी गिरोह को या भाजपा को इस देश में देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने का अधिकार दिया जा सकता है? वन्देमातरम पर मोदी सरकार का फैसला इसी अधिकार को लेने की कोशिश है。
जिस देश में संघी गिरोह बलात्कारियों के समर्थन में तिरंगा हाथ में लेकर जुलूस निकालता है, दंगे भड़काने के लिए मुस्लिम बनकर मंदिरों में गाय का मांस फेंकता है, गौ रक्षा के नाम पर गौ-तस्करी और अवैध वसूली में लगा रहता है, माथे पर तिलक लगाकर हर तरह के पतित कामों में लगा रहता है, सत्ता के संरक्षण में आबाओं और बाबाओं को हर तरह का निकृष्ट काम करने की छूट हो, उस देश में अब वह इन तमाम लंपटों और अपराधियों से वन्देमातरम कहलाकर उनके अपराधों से बरी करना चाहता है। और यह पूरी तिकड़मबाजी इसलिए कि जा रही है कि लोग राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद का खेल खेलते रहे और जन विरोधी यह सरकार इस देश के संविधान और लोकतंत्र से लेकर मताधिकार, प्राकृतिक संसाधन, उनकी शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य और रोजगार तक सब कुछ चुराती रहे。
मणिपुर जलकर स्वाहा होने के कगार पर है। रवींद्रनाथ का ‘सोनार बांग्ला’ आज संघ-पोषित राजनैतिक हिंसा की आग में सुलग रहा है। इसे आग को बुझाने के बजाय संघ-भाजपा वन्देमातरम के नाम पर अब एक नया हवन कुंड बना रहा है, जिसमें हर उस नागरिक की आहुति दी जाएगी, जो उसके खिलाफ खड़ा है।
(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94252-31650)
ताज न्यूज़ का विशेष संपादकीय विश्लेषण: राष्ट्रवाद का नया ‘लिटमस टेस्ट’ और खोखले होते बुनियादी मुद्दे
संजय पराते जी का यह आलेख समकालीन भारतीय राजनीति के उस सबसे संवेदनशील और खतरनाक विमर्श को बेनकाब करता है, जहाँ प्रतीकों (Symbols) को देशभक्ति का पर्याय मान लिया गया है। ‘वन्देमातरम’ निस्संदेह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा उद्घोष था जिसने अनगिनत क्रांतिकारियों की रगों में मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने की आग भर दी थी। लेकिन उस दौर में यह गीत किसी नागरिक की ‘जांच’ का पैमाना नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक सत्ता (Colonial Power) के खिलाफ एक सामूहिक चेतना का स्वर था। आज विडंबना यह है कि सत्ताधारी प्रतिष्ठान इसी गीत को एक ‘लिटमस टेस्ट’ के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जिसके ज़रिए वह तय करता है कि कौन ‘सच्चा भारतीय’ है और कौन ‘गद्दार’।
प्रतीकों की राजनीति और असल मुद्दों से भटकाव:
लेखक ने बहुत ही स्पष्टता से रेखांकित किया है कि कैसे ‘जन-गण-मन’ (राष्ट्रगान) और ‘वन्देमातरम’ (राष्ट्रगीत) के बीच एक कृत्रिम (Artificial) टकराव पैदा किया जा रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर की बहुलतावादी (Pluralistic) और सार्वभौमिक सोच बनाम बंकिमचंद्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान की यह बहस कोई नई नहीं है, लेकिन इसे सजा और जुर्माने के कानूनी प्रावधानों के साथ थोपना एक लोकतांत्रिक राज्य (Democratic State) के स्वरूप पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब किसी राष्ट्र में 3 साल की सज़ा का डर दिखाकर देशभक्ति साबित करनी पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि वह राष्ट्रवाद प्राकृतिक (Natural) नहीं, बल्कि राज्य द्वारा प्रायोजित ‘भय’ (State-sponsored Fear) है। पराते जी का यह तर्क बेहद मारक है कि इस पूरे ‘राष्ट्रवाद’ के शोर के पीछे का असली मक़सद जनता का ध्यान बुनियादी अधिकारों—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और जल-जंगल-ज़मीन की लूट से भटकाना है। जब जनता वन्देमातरम गाने या न गाने की बहसों में उलझी रहेगी, तो वह आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और कॉरपोरेट एकाधिकार पर सवाल कैसे पूछेगी?
बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यक ‘अदरिंग’ (Othering):
आलेख इस कड़वे सच को भी सामने लाता है कि ‘वन्देमातरम’ के पूरे पाठ (Full text) को अनिवार्य बनाने का सीधा लक्ष्य अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुसलमानों को अलग-थलग (Isolate) करना है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि इस्लाम में एकेश्वरवाद (Monotheism) की मान्यता के कारण इस गीत के बाद वाले छंदों (जहाँ मातृभूमि को देवी तुल्य मानकर वंदना की गई है) को लेकर कुछ धार्मिक आपत्तियां रही हैं। संविधान निर्माताओं ने इसी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए केवल पहले दो छंदों को मान्यता दी थी। लेकिन आज की राजनीति उन घावों को कुरेद कर एक नया ध्रुवीकरण पैदा करना चाहती है। जब राज्य खुद एक बहुसंख्यकवादी नरेटिव (Majoritarian Narrative) को संस्थागत रूप (Institutionalize) देने लगे, तो यह धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के संवैधानिक ताने-बाने को तार-तार कर देता है।
न्यायपालिका और भविष्य की दिशा:
अंत में, लेखक ने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगाया है। क्या सर्वोच्च अदालत इस नए कानूनी फरमान को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Expression) और ‘विवेक की स्वतंत्रता’ (Freedom of Conscience) की कसौटी पर परखेगी? मणिपुर की हिंसा और बंगाल की सुलगती आग के बीच, देश को बांटने वाले प्रतीकात्मक मुद्दों से कहीं अधिक जरूरत सामाजिक सद्भाव और शांति बहाल करने की है। राष्ट्रवाद का असली पैमाना कोई गीत नहीं, बल्कि संविधान के प्रति निष्ठा और नागरिकों की खुशहाली है। संजय पराते का यह लेख हमें इस बात के लिए आगाह करता है कि हम भावनाओं की राजनीति के दलदल में फंसकर अपने उन अधिकारों को न खो दें जो हमारे लोकतंत्र की असली नींव हैं। ‘वन्देमातरम’ के नाम पर नया हवन कुंड बनाने की बजाय, देश की सुलगती समस्याओं को शांत करने की आवश्यकता है।