बढ़ती फीस, घटते स्तर: निजी स्कूलों की बढ़ती फीस, क्या हमें अपनी जेब के हिसाब से तालीम मिल रही है?
— बृज खंडेलवाल
साल 1964-65 में मेरे माता-पिता ताजनगरी आगरा के प्रसिद्ध सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ 6 से 10 रुपये भरते थे। उस जमाने में स्कूल की यूनिफॉर्म बहुत साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा अभिभावकों पर कोई भी छिपा हुआ विधिक या वित्तीय खर्च नहीं लादा जाता था। लेकिन आज के दौर में देखें तो आगरा के डीपीएस या प्रील्यूड पब्लिक स्कूल जैसे बड़े निजी संस्थान हर महीने 12,000 से 16,000 रुपये तक की भारी-भरकम फीस वसूल रहे हैं। इसका सीधा सांख्यिकीय अर्थ यह है कि एक बच्चे की स्कूली शिक्षा पर साल भर में करीब 1.5 लाख से 4 लाख रुपये तक का मोटा खर्च आ रहा है। विधिक और गणितीय रूप से देखें तो यह बढ़ोतरी 1,50,000 प्रतिशत से भी ज्यादा दर्ज की गई है, जबकि इसी छह दशक के दौरान देश में आम महंगाई लगभग 100 से 120 गुना ही बढ़ी है।
अब बुनियादी और कूटनीतिक सवाल यह उठता है कि निजी स्कूलों की फीस बाकी दैनिक वस्तुओं और सेवाओं के मुकाबले इतनी अनियंत्रित रफ़्तार से क्यों बढ़ी? और क्या इस भारी-भरकम रकम के बदले दी जाने वाली तालीम की गुणवत्ता भी उसी अनुपात में बेहतर हुई है? इस बेतहाशा फीस वृद्धि के पीछे कई प्रशासनिक और बुनियादी वजहें गिनाई जाती हैं। निजी स्कूलों में शिक्षकों का वेतन बढ़ा है, इमारतों का ढांचा बहुमंजिला और आधुनिक हुआ है, और स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर लैब, अत्याधुनिक साइंस लैब्स तथा खेल सुविधाओं पर खर्च कई गुना बढ़ गया है। इसके अलावा, राज्य सरकारों के नए-नए विधिक नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन करने के नाम पर भी शुल्क बढ़ाए जाते हैं। साथ ही, आज का महत्वाकांक्षी मध्यम वर्ग अपने बच्चों को सामाजिक प्रतिष्ठा की होड़ में हर हाल में “प्रीमियम” ब्रांडेड स्कूलों में ही पढ़ाना चाहता है।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत के लगभग आधे बच्चे अब निजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। ये बड़े कॉन्वेंट व प्राइवेट स्कूल स्मार्ट क्लासरूम, हाई-टेक विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, वातानुकूलित बस सेवा, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और जेईई (JEE) तथा नीट (NEET) जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की एकीकृत तैयारी कराने के आकर्षक दावे करते हैं। अभिभावक भी अब केवल बुनियादी पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि बेहतर माहौल, कुलीन सहपाठियों, उच्च सामाजिक रुतबे और भविष्य में शीर्ष कॉलेजों में दाखिले की पक्की उम्मीद के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा न्योछावर कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों के दौरान ही देश के विभिन्न शहरों में निजी स्कूलों की फीस में करीब 169 प्रतिशत का उछाल आया है, जबकि इस अवधि में आम नागरिकों की वास्तविक आय में इतनी तेज़ वृद्धि दर्ज नहीं की गई है।
वास्तविक फिक्र और नीतिगत चिंता की शुरुआत ठीक यहीं से होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज के निजी स्कूल 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक और वातानुकूलित हैं। भारतीय छात्र प्रांतीय व केंद्रीय बोर्ड परीक्षाओं, जेईई और नीट जैसे राष्ट्रीय स्तर के कॉम्पिटिशन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं, जिसके बल पर भारत वैश्विक मंच पर बड़ी संख्या में सक्षम इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार कर रहा है। लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की मानक परीक्षा पीसा (Programme for International Student Assessment – PISA) की आती है, जो पारंपरिक रटने की क्षमता के बजाय विश्लेषणात्मक सोचने, मौलिक रूप से समझने और वास्तविक जीवन की समस्याओं में ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता को परखती है, तब हमारे शैक्षणिक तंत्र का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक और चिंताजनक साबित होता है।
वर्ष 2009 में, जब भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘पीसा’ परीक्षा में भाग लिया था, तब ७४ प्रतिभागी देशों की सूची में हमारी रैंकिंग सबसे नीचे से दूसरे पायदान पर थी। छोटे-छोटे देश जैसे वियतनाम, एस्टोनिया और फिनलैंड भारत के मेधावी माने जाने वाले छात्रों से बहुत आगे निकल गए थे। उस समय निजी स्कूलों के छात्रों का प्रदर्शन भले ही सरकारी स्कूलों से थोड़ा बेहतर दर्ज किया गया था, लेकिन वे भी वैश्विक शैक्षणिक मानकों की कसौटी पर बुरी तरह पीछे रह गए। उस करारी असफलता के बाद भारत ने लंबे समय तक ‘पीसा’ में हिस्सा नहीं लिया। परंतु देश के भीतर होने वाले विभिन्न स्वतंत्र सर्वे भी आज इसी कड़वी हक़ीक़त को उजागर करते हैं। प्रथम संस्था का असर (Annual Status of Education Report – ASER) सर्वे और राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS – जिसे अब परख/PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण कहा जाता है) स्पष्ट रूप से बताते हैं कि महँगे निजी स्कूलों के बहुत से बच्चे भी अपनी कक्षा के निर्धारित स्तर के अनुसार न तो ठीक से पुस्तक पढ़ पाते हैं और न ही गणित के बुनियादी सवाल हल कर पाते हैं।
इस गंभीर शैक्षणिक गिरावट की एक सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारे महँगे निजी स्कूल भी आज व्यावहारिक समझ विकसित करने के बजाय केवल रटने और परीक्षा-केंद्रित अंकों की होड़ पर ही ज़ोर दे रहे हैं। शिक्षा जगत के एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त शिक्षक का इस पर तीखा और बेबाक विश्लेषण है कि निजी स्कूलों की तथाकथित ‘बेहतर छवि’ का असली राज़ कुछ और ही है। इन नामचीन स्कूलों में ज़्यादातर दाखिला उन संभ्रांत और उच्च-मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को मिलता है, जिनकी आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पहले से ही सुदृढ़ होती है। ऐसे बच्चों को घरों में भी अध्ययन का समृद्ध माहौल और कोचिंग की अतिरिक्त सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए बोर्ड परीक्षाओं के अच्छे नतीजों का पूरा श्रेय केवल निजी स्कूलों की क्लासरूम पढ़ाई को नहीं दिया जा सकता।
अभिभावक हर महीने भारी-भरकम फीस इस विधिक उम्मीद से भरते हैं कि उनके बच्चों को विश्वस्तरीय तालीम मिलेगी। लेकिन फीस जितनी तेज़ी से आसमान छू रही है, शिक्षा का वास्तविक स्तर उतनी रफ़्तार से नहीं सुधरा है। ओवरक्राउडेड बड़ी कक्षाएं, संविदा पर रखे गए शिक्षकों की असमान और घटिया ट्रेनिंग, और केवल परीक्षा पास कराने वाली रटंत प्रणाली आज भी हमारे निजी स्कूलों की सबसे आम समस्या बनी हुई है। यद्यपि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) का मुख्य मकसद रटने की इस पारंपरिक संस्कृति को समाप्त कर बच्चों में आलोचनात्मक सोच, रचनात्मक हुनर और व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा देना है, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण ज़मीन पर इन नीतिगत बदलावों को पूर्णतः लागू होने में अभी एक लंबा वक्त लगेगा।
बढ़ती फीस और शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता के बीच लगातार चौड़ा होता यह फ़ासला मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की जेब पर बेहद भारी पड़ रहा है। इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल धनवानों तक ही सीमित होने का एक नया सामाजिक और संवैधानिक ख़तरा पैदा हो रहा है। इस समूचे तंत्र की सबसे बड़ी विधिक कमी यह है कि राज्य सरकारों या रेरा जैसी संस्थाओं द्वारा निजी स्कूल प्रबंधनों से यह साबित करने की कोई ठोस विधिक जवाबदेही नहीं मांगी जाती कि वर्ष-दर-वर्ष बढ़ाई गई फीस से बच्चों के सीखने के नतीजों (Learning Outcomes) में वास्तव में कितना गुणात्मक सुधार हुआ है।
अगर 1965 के दौर का कोई छात्र आज के चकाचौंध से भरे स्कूलों को देखे, तो वह भव्य इमारतों, स्विमिंग पूल, डिजिटल बोर्ड और आधुनिक बसों को देखकर भले हैरान रह जाए, लेकिन वह यह कड़वा सवाल भी ज़रूर पूछेगा कि क्या हमारी असली तालीम और विचारशीलता भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी कि फीस के आंकड़े बढ़े हैं? जब तक हमारे स्कूलों की गुणवत्ता का हिसाब सिर्फ़ चमकदार इमारतों, ब्रांडेड विज्ञापनों और आधुनिक सुविधाओं से नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों और नैतिक सोच से नहीं लिया जाएगा, तब तक देश के बेबस अभिभावक अच्छी शिक्षा के नाम पर केवल उसकी बाहरी चमक-धमक और व्यावसायिकता की भारी कीमत चुकाने को मजबूर रहेंगे। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।