आर्टिकल डेस्क, 🌐 tajnews.in | सोमवार, 7 सितंबर 2026, 06:15:00 PM IST

नेता मौज में, अफसर उदासीन, आगरा का भविष्य अधर में
ताज की छाया में ठहरा आगरा: TTZ के उद्योगों का उजड़ा हुआ सपना
बृज खंडेलवाल द्वारा | 7 सितंबर 2026
प्रमुख अंश (Highlights):
- औद्योगिक पहचान का क्षरण: 1996 के एम.सी. मेहता फैसले और टीटीजेड की पाबंदियों के बाद 1,168 में से केवल 250 इकाइयां बचीं; पूंजी, निवेश और उद्योगों का पड़ोसी राज्यों में भारी पलायन।
- हुनरमंद शहर पर दोहरी मार: फाउंड्री और कांच उद्योग की चमक फीकी; 4 से 5 लाख आजीविकाओं को थामे फुटवियर सेक्टर भी बढ़ती लागत, ईंधन बाधाओं और कड़े नियमों के चक्रव्यूह में उलझा।
- कागजी योजनाओं में फंसा विकास: अछनेरा का लेदर पार्क वर्षों से फाइलों और मुआवजे के पेच में अटका; इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर और गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों के वादे जमीन पर अधूरे।
- संरक्षण बनाम आजीविका का संतुलन: सिर्फ कारखाने बंद करना समाधान नहीं; स्वच्छ तकनीक, गैस-बिजली की सुलभ आपूर्ति और पारदर्शी नीतियों से विरासत व रोजगार दोनों को साथ बचाने की जरूरत।

बृज खंडेलवाल
कभी आगरा भारत के औद्योगिक नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखता था।
यह शहर केवल ताजमहल और पेठे के लिए नहीं जाना जाता था।
यहां भट्टियां जलती थीं, कारखाने चलते थे और हुनर बिकता था। देश विदेश में उद्योगों की पहचान थी। ताज महल से ज्यादा कमाई व्यापार उद्योगों से थी।
आज वही आगरा औद्योगिक विकास की दौड़ में पिछड़ रहा है।
तीन दशक पहले ताज बचाने के लिए उठाए गए कदम जरूरी थे। लेकिन उनकी कीमत आज भी आगरा और पूरे टीटीजेड को चुकानी पड़ रही है।
1990 के दशक में आगरा के उद्योगों पर संकट मंडराया। ताजमहल को प्रदूषण से बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से सख्त कदम उठाने शुरू किए।
1996 के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता फैसले ने तस्वीर बदल दी। कोयला और कोक इस्तेमाल करने वाली इकाइयों को गैस अपनानी थी। या फिर उन्हें टीटीजेड से बाहर जाना था।
ताज ट्रेपेजियम जोन करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, हाथरस और एटा शामिल हैं। राजस्थान का भरतपुर भी इसका हिस्सा है। यह इलाका पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील घोषित हुआ।
करीब 292 प्रदूषणकारी इकाइयों पर कार्रवाई हुई। कई बंद हुईं, कई दूसरी जगह चली गईं।
2017 के एक सर्वे ने तस्वीर और साफ कर दी। 1996 तक चल रही करीब 1,168 इकाइयों में केवल 250 बचीं।
बाकी बंद हुईं या दूसरे राज्यों की ओर निकल गईं। कई उद्यमी राजस्थान और मध्य प्रदेश चले गए। निवेश गया, रोजगार गया और औद्योगिक आत्मविश्वास भी कमजोर हुआ।
यहां एक सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या ताज को बचाने के लिए उद्योगों को खत्म करना जरूरी था?
जवाब इतना सीधा नहीं है।
पर्यावरण की हिफाजत जरूरी थी और आज भी है। लेकिन उद्योगों के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करना भी जरूरी था। यहीं नीति और अमल के बीच बड़ी खाई दिखाई देती है।
हुनर और उद्यमशीलता की पुरानी ताकत
आगरा की उद्यमशीलता पर कभी शक नहीं रहा। यहां लोगों ने हमेशा कम साधनों से बड़ा काम किया।
कच्चा माल दूर-दराज के इलाकों से आता रहा। लोहा, कोयला, गैस, शीशे का कच्चा माल बाहर से आया।
चमड़ा दक्षिण भारत से आया और फिर जूते बने। गुजरात और राजस्थान से सिलिका सैंड और सोडा ऐश आया।
लौकी से पेठा बना और पूरी दुनिया तक पहुंचा।
यही आगरा की असली ताकत थी। यहां प्राकृतिक संसाधन कम थे, लेकिन हुनर भरपूर था। फाउंड्री, कांच, जूते और हस्तशिल्प ने पहचान बनाई।
कारीगरों ने मामूली चीजों में भी बड़ी कीमत पैदा की। व्यापारियों ने छोटे कारोबार को बड़े बाजार से जोड़ा।
लेकिन आज वही ऊर्जा ठहराव से जूझ रही है।
फुटवियर, फाउंड्री और कांच: संघर्षरत पारंपरिक आधार
आगरा का फुटवियर उद्योग अब भी सबसे मजबूत आधार है। यह सीधे और परोक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है। अनुमान है कि चार से पांच लाख आजीविकाएं इससे जुड़ी हैं। देश की घरेलू फुटवियर मांग में आगरा की हिस्सेदारी बड़ी है।
निर्यात में भी शहर की पुरानी मजबूत मौजूदगी है।
लेकिन बढ़ती लागत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने मुश्किलें बढ़ाई हैं।
फिरोजाबाद का कांच उद्योग भी अपनी पुरानी चमक खो चुका है।
तकनीक बदली, लेकिन आधुनिकीकरण की रफ्तार धीमी रही।
कभी कृषि उपकरण और पाइप बनाने वाली फाउंड्रियां भी सिकुड़ गईं।
पारंपरिक उद्योगों के सामने ईंधन और प्रदूषण की पाबंदियां हैं।
नई पीढ़ी को इनमें भविष्य कम दिखाई देता है।
इसका असर केवल कारखानों पर नहीं पड़ा।
रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ा।
कई युवा दिल्ली-एनसीआर की तरफ निकल गए।
जहां मजदूरी बेहतर मिली, वहीं उन्होंने डेरा डाल लिया।
आगरा में हुनर रहा, लेकिन अवसर कम होते गए।
यह किसी भी शहर के लिए बेहद अफसोसनाक स्थिति है।
नीतिगत अड़चनें और अटकी परियोजनाएं
सरकारों को भी पूरी तरह कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।
मूल प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से आए थे।
वे आज की सरकारों से बहुत पहले के फैसले हैं।
बाद की सरकारों ने गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों का वादा किया।
लेकिन योजनाओं का जमीन पर असर असमान रहा।
वर्तमान सरकार ने भी कई पहल की हैं।
फुटवियर और हस्तशिल्प को ओडीओपी में बढ़ावा मिला है।
कौशल प्रशिक्षण से बड़ी संख्या में कारीगर जुड़े हैं।
नई फुटवियर और लेदर नीति भी सामने आई है।
आगरा में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर की योजना बनी है। शास्त्रीपुरम में एसटीपीआई सुविधा भी पूरी हुई है। एक्सप्रेसवे और ग्रेटर आगरा की योजनाएं भी उम्मीद जगाती हैं। फिर भी असली अड़चनें खत्म नहीं हुई हैं।
अछनेरा का प्रस्तावित लेदर पार्क इसका बड़ा उदाहरण है। सालों से यह परियोजना कागजी और कानूनी पेच में फंसी है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे के बाद भी रास्ता साफ नहीं है।
गैस की आपूर्ति भी कई बार उद्योगों के लिए संकट बनी। प्रदूषण नियंत्रण की अपनी चुनौतियां भी बरकरार हैं।
विकल्प निर्माण का वक्त
सवाल यह नहीं कि ताज बचे या उद्योग। सवाल यह है कि दोनों साथ क्यों नहीं बच सकते?
दुनिया में स्वच्छ तकनीक के साथ उद्योग चलते हैं। आगरा को भी उसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।
भविष्य प्रदूषणकारी भारी उद्योगों में नहीं है। लेकिन स्वच्छ विनिर्माण, आईटी, डिजाइन और सेवाओं में है।
ताज की हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है। लेकिन ताज की छाया में पलती युवा पीढ़ी भी हमारी जिम्मेदारी है।
आगरा को केवल पर्यटन शहर बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह मेहनती लोगों और उद्यमियों का शहर भी है। उसकी औद्योगिक रूह को फिर से जगाना होगा। तीन दशक का अनुभव एक साफ सबक देता है।
सिर्फ बंद करना आसान है, विकल्प बनाना मुश्किल।
अब विकल्प बनाने का वक्त है।
साफ उद्योगों के लिए जमीन, गैस और बिजली चाहिए। अनुमतियों की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी होनी चाहिए। अटकी परियोजनाओं पर तेज फैसला होना चाहिए।
ताज चमकता रहे और कारखाने भी जलें। यमुना साफ रहे और रोजगार भी बढ़े। यही आगरा के लिए सही तरक्की होगी।
वरना इतिहास गवाही देगा कि हमने ताज तो बचा लिया, लेकिन उसके आसपास की औद्योगिक दुनिया को मुरझाने दिया।
यह भी पढ़ें

Thakur Pawan Singh
7579990777




