निष्पक्षता का अर्थ चुप्पी नहीं; पत्रकारिता का धर्म तथ्य, जनता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जवाबदेही है
ठाकुर पवन सिंह, प्रधान संपादक, ताज न्यूज़ | 🌐 tajnews.in | Monday, 17 August, 2026, 12:18 AM IST


लोकतंत्र, निष्पक्ष पत्रकारिता और जनसरोकारों पर केंद्रित विशेष संपादकीय आलेख
tajnews.in | प्रधान संपादक की कलम से: पत्रकारिता के बारे में जब भी चर्चा होती है, एक शब्द बार-बार सामने आता है—निष्पक्षता।
पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह निष्पक्ष रहे। किसी राजनीतिक दल का पक्ष न ले। किसी व्यक्ति से प्रभावित न हो। सत्ता के दबाव में न आए और विरोधी विचारों से भी दूरी बनाए रखे।
यह अपेक्षा बिल्कुल उचित है।
लेकिन पत्रकारिता की दुनिया में एक सवाल ऐसा है जिस पर गंभीरता से विचार किए बिना निष्पक्षता की पूरी अवधारणा अधूरी रह जाती है—
क्या निष्पक्षता का अर्थ तटस्थ रहना है?
और यदि पत्रकार के सामने सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय, तथ्य और दुष्प्रचार, पीड़ित और प्रभावशाली व्यक्ति के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा हो, तब भी क्या उसे केवल इसलिए मौन रहना चाहिए कि वह ‘तटस्थ’ दिखाई दे?
यहीं से पत्रकारिता का वास्तविक विमर्श शुरू होता है।
हाल में पत्रकारिता की भूमिका, स्वतंत्रता आंदोलन में समाचार माध्यमों की भूमिका और आज की मीडिया व्यवस्था पर हुई एक विस्तृत चर्चा में भी यही प्रश्न प्रमुखता से सामने आया। चर्चा में निष्पक्षता और तटस्थता के अंतर, पत्रकारिता के सामाजिक दायित्व, सत्ता से प्रश्न करने की अनिवार्यता तथा विज्ञापन और पूंजी के प्रभाव जैसे गंभीर विषयों पर विचार किया गया।
मुझे लगता है कि इस विमर्श को केवल पत्रकारों के बीच की बहस मानना भूल होगी।
यह प्रश्न हर उस प्रबुद्ध नागरिक का है जो लोकतंत्र में अपने अधिकारों, अपनी सरकार और अपने समाज के बारे में प्रामाणिक जानकारी चाहता है।
तटस्थता और निष्पक्षता में अंतर समझना होगा
तटस्थता और निष्पक्षता अक्सर एक ही अर्थ में प्रयुक्त की जाती हैं, जबकि पत्रकारिता के संदर्भ में दोनों के बीच स्पष्ट और मौलिक अंतर है।
निष्पक्षता का अर्थ है—तथ्यों, साक्ष्यों, प्रामाणिक स्रोतों और सभी संबंधित पक्षों को पूरी ईमानदारी से देखना।
तटस्थता का अर्थ कई बार ऐसी स्थिति से लगाया जाता है जिसमें पत्रकार किसी भी पक्ष से कोई सरोकार न रखे।
यहीं से नैतिक संकट उत्पन्न होता है।
मान लीजिए किसी कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है और दूसरी तरफ कोई अत्यंत शक्तिशाली संस्था या प्रभाव है।
पत्रकार दोनों पक्षों का वक्तव्य दर्ज करता है।
यह आवश्यक है।
लेकिन यदि दस्तावेज, प्रत्यक्ष प्रमाण और निष्पक्ष जांच यह प्रमाणित करते हैं कि अन्याय हुआ है, तो केवल “दोनों पक्षों का बयान प्रकाशित कर दिया” कहकर पत्रकार अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।
उसका कर्तव्य तथ्यों की तह तक जाकर पड़ताल करना भी है।
यही वह बिंदु है जहां निष्पक्षता का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। पत्रकार को किसी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखना चाहिए, लेकिन सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पूरी तरह अडिग होनी चाहिए।
पत्रकारिता का पहला धर्म—जो घटित हुआ है, उसे वैसा ही प्रस्तुत करना
मेरे विचार से पत्रकारिता की पहली और सबसे अनिवार्य शर्त है—तथ्य के प्रति अटूट निष्ठा।
पत्रकार किसी घटना को अपनी इच्छा अथवा पसंद के अनुसार नहीं बदल सकता।
वह किसी व्यक्ति को केवल इसलिए कटघरे में खड़ा नहीं कर सकता क्योंकि वह उसे व्यक्तिगत रूप से पसंद नहीं है।
वह किसी सरकार की वास्तविक उपलब्धि को केवल इसलिए नहीं नकार सकता क्योंकि उसकी राजनीतिक सोच उससे भिन्न है।
और वह किसी अप्रमाणित आरोप को अकाट्य तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं कर सकता।
यहीं समाचार रिपोर्टिंग और विचार लेखन के बीच के अंतर को भी समझना आवश्यक है।
समाचार का मूलाधार तथ्य है।
संपादकीय का आधार तथ्यों पर आधारित विवेकपूर्ण और संतुलित विश्लेषण है।
दोनों ही विधाओं में पत्रकार की निष्ठा और सत्यनिष्ठा अनिवार्य है।
लेकिन पत्रकारिता की निष्पक्षता का अर्थ यह कदापि नहीं कि प्रत्येक प्रकरण में दोनों पक्षों को केवल इसलिए बराबर का भार दे दिया जाए, भले ही तथ्य किसी एक पक्ष को स्पष्ट रूप से गलत साबित कर रहे हों।
यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि सूर्य पश्चिम से उदय होता है, तो पत्रकार का कार्य यह लिखना नहीं है कि “एक पक्ष का कहना है कि सूर्य पश्चिम से निकलता है और दूसरे पक्ष का कहना है पूर्व से।”
तथ्यात्मक सत्यापन के उपरांत उसे स्पष्टता से बताना होगा कि सच्चाई क्या है।
राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों के मामलों में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए।
आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता ने सत्ता से सवाल करने का साहस दिखाया
भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास को देखें तो स्वाधीनता आंदोलन के समय पत्रकारिता का एक बहुत बड़ा हिस्सा निरंकुश औपनिवेशिक सत्ता के समक्ष पूरी दृढ़ता से खड़ा था।
वह पत्रकारिता केवल घटनाओं की सूचना नहीं देती थी।
वह जनमानस को यह समझाने का बौद्धिक और नैतिक प्रयास भी करती थी कि पराधीनता कोई स्वाभाविक व्यवस्था नहीं है।
उस दौर में कलमकारों के सम्मुख जोखिम भी साधारण नहीं थे।
अखबारों पर ताले लग सकते थे।
लेख और संस्करण जब्त किए जा सकते थे।
संपादकों को बंदी बनाया जा सकता था।
और जेल की यातनाएं झेलना भी पत्रकारिता का अनिवार्य मूल्य हो सकता था।
इसके बावजूद कलम कभी नहीं रुकी।
क्योंकि उस समय पत्रकारिता का लक्ष्य केवल व्यावसायिक लाभ नहीं था।
उसके सम्मुख राष्ट्र की स्वतंत्रता और जनचेतना का परम लक्ष्य था।
गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता आज भी सवाल पूछती है
गणेश शंकर विद्यार्थी का उदाहरण इसलिए सर्वकालिक है क्योंकि उनकी पत्रकारिता को केवल संकीर्ण राजनीतिक नजरिए से नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने समाज के सबसे निर्बल, वंचित और पीड़ित वर्ग के प्रश्नों को मुखर आवाज दी।
उनका समाचार पत्र ‘प्रताप’ सत्ता की निरंकुशता और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का सबसे सशक्त माध्यम बना।
लेकिन विद्यार्थी जी की सबसे बड़ी सीख शायद यह है कि पत्रकारिता केवल सत्ता से प्रश्न पूछने तक सीमित नहीं है।
पत्रकारिता सदैव मनुष्यता और मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़े होने का नाम है।
1931 में कानपुर के भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान निर्दोष लोगों की जान बचाते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
इस सर्वोच्च बलिदान को केवल इतिहास की एक तारीख मान लेना उनके योगदान को सीमित करना होगा।
यह ऐतिहासिक घटना पत्रकारिता के सामने आज भी एक बुनियादी नैतिक प्रश्न रखती है—
जब समाज में विभाजन और तनाव बढ़ रहा हो, तब पत्रकार की वास्तविक भूमिका क्या होगी?
क्या वह केवल घटनाओं का ब्यौरा दर्ज करेगा?
या वह समाज को जोड़ने, समझाने और संवेदनशील दृष्टि देने का प्रयास भी करेगा?
पत्रकारिता का पक्ष जनता है, किसी दल का नहीं
यहां एक और महत्वपूर्ण और गंभीर सावधानी आवश्यक है।
यदि हम यह कहते हैं कि पत्रकारिता को सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, तो इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि पत्रकार किसी राजनीतिक दल का पक्षधर बन जाए।
पत्रकार को सत्ता का अकारण विरोधी नहीं होना चाहिए।
लेकिन उसे किसी भी परिस्थिति में सत्ता का प्रवक्ता भी नहीं बनना चाहिए।
सरकार जनहित में उत्कृष्ट कार्य करे तो उसकी उपलब्धि को निष्पक्षता से रेखांकित करना पत्रकारिता है।
सरकार की नीतियों में खामियां हों या विफलताएं दिखें, तो निर्भीकता से सवाल उठाना भी पत्रकारिता है।
विपक्ष यदि जनहित के वाजिब सवाल उठाए तो उसे प्रमुखता से स्थान देना पत्रकारिता है।
और यदि विपक्ष भ्रामक तथ्य प्रस्तुत करे तो उसकी प्रामाणिकता की जांच करना भी पत्रकारिता का अनिवार्य हिस्सा है।
तात्पर्य यह है कि पत्रकारिता का कोई भी स्थायी संबंध किसी राजनीतिक दल से नहीं हो सकता।
उसका स्थायी संबंध होना चाहिए—
तथ्य से।
जनता से।
और संविधानसम्मत लोकतांत्रिक मूल्यों से।
सत्ता बदलती रहती है, पत्रकारिता की कसौटी अडिग रहनी चाहिए
आज एक व्यवस्था सत्ता में है।
कल कोई दूसरी व्यवस्था सत्ता में हो सकती है।
आज शासन में कोई एक दल है।
कल कोई दूसरा दल हो सकता है।
यदि पत्रकारिता की नीति सत्ता परिवर्तन के साथ बदलती रहेगी, तो उसकी साख और विश्वसनीयता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।
पत्रकार को प्रत्येक व्यवस्था और शासन से निरंतर वही बुनियादी सवाल पूछने चाहिए—
जनता को धरातल पर क्या मिला?
जनता के गाढ़े पसीने के टैक्स और सरकारी धन का उपयोग कैसे हुआ?
योजनाओं और नीतियों का जमीनी प्रभाव क्या है?
निर्णयों से वास्तविक लाभ किसे प्राप्त हुआ?
नीतियों से नुकसान किस वर्ग का हुआ?
और सरकारी दावों की पुष्टि के स्वतंत्र व ठोस प्रमाण क्या हैं?
यही पत्रकारिता की मूल कसौटी होनी चाहिए।
सवाल व्यक्ति का चेहरा देखकर नहीं, बल्कि जनसरोकार के मुद्दे को देखकर पूछे जाने चाहिए।
स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के सामने आया नया दायित्व
1947 के उपरांत पत्रकारिता के समक्ष परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं।
अब सामने कोई विदेशी शासक नहीं था।
अब सामने हमारा अपना संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य था।
लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं था कि पत्रकारिता का दायित्व समाप्त हो गया।
बल्कि उसका स्वरूप और अधिक उत्तरदायी हो गया।
अब मूलभूत प्रश्न यह था—
क्या स्वतंत्र भारत उन उच्च आदर्शों की दिशा में अग्रसर है जिनके लिए स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया था?
क्या प्रत्येक नागरिक को वास्तविक समानता प्राप्त हो रही है?
क्या न्याय अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक सुलभ है?
क्या निर्बल की पीड़ा सुनी जा रही है?
क्या सत्ता जनता के प्रति पूरी तरह जवाबदेह है?
और क्या नागरिक स्वतंत्रताएं सुरक्षित हैं?
आजादी के बाद पत्रकारिता को संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देखने की अनिवार्यता यहीं से स्थापित होती है।
संविधान पत्रकारिता के लिए भी नैतिक मार्गदर्शिका है
भारत का संविधान पत्रकारों के लिए कोई तकनीकी निर्देशिका नहीं है।
लेकिन वह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था और समाज की सुदृढ़ नींव अवश्य है जिसके भीतर स्वतंत्र पत्रकारिता कार्य करती है।
न्याय।
स्वतंत्रता।
समानता।
बंधुत्व।
और मौलिक अधिकार।
ये केवल संविधान के पृष्ठों पर अंकित शब्द नहीं हैं।
इनकी वास्तविक जमीनी स्थिति पर सतत प्रश्न पूछना भी पत्रकारिता के नैतिक दायित्व का अनिवार्य हिस्सा है।
यदि समाज के किसी वर्ग को न्याय से वंचित रखा जा रहा है, तो सवाल उठना चाहिए।
यदि किसी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार आहत हो रहे हैं, तो सवाल उठना चाहिए।
यदि सरकारी नीतियों का धरातल दावों से बिल्कुल विपरीत है, तो सवाल उठना चाहिए।
और यदि कोई निष्पक्ष रिपोर्ट इन प्रश्नों को उजागर करती है, तो उसे केवल इसलिए “पक्षपाती” नहीं ठहराया जा सकता कि वह किसी असुविधाजनक सत्य को सामने ला रही है।
विज्ञापन और पत्रकारिता—सबसे संवेदनशील संतुलन
आज के युग में मीडिया संस्थानों की आर्थिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
समाचार पत्र और डिजिटल संस्थान के संचालन के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
पत्रकारों और तकनीकी कर्मियों का पारिश्रमिक, अत्याधुनिक उपकरण, कार्यालयीन ढांचा, मुद्रण तथा वितरण व्यवस्था सब कुछ खर्च की मांग करता है।
डिजिटल पत्रकारिता में सर्वर, डेटा सुरक्षा, वीडियो प्रोडक्शन और तकनीकी विशेषज्ञता की अपनी लागत है।
इसलिए विज्ञापन आवश्यक हैं।
लेकिन यहां एक बहुत स्पष्ट सीमा रेखा भी है।
विज्ञापन किसी संस्थान को आर्थिक मजबूती प्रदान कर सकता है, परंतु उसे संपादकीय स्वतंत्रता और विवेक को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
यदि कोई व्यावसायिक हित यह तय करने लगे कि कौन सा सच प्रकाशित होगा और कौन सा दफना दिया जाएगा, तो वहीं से पत्रकारिता और विशुद्ध प्रचार के बीच का भेद समाप्त हो जाता है।
यह चुनौती केवल किसी एक संस्थान की नहीं, बल्कि संपूर्ण पत्रकारिता जगत के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
प्रेस की स्वतंत्रता केवल बाहरी दबावों से नहीं बंधी
हम अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता पर विमर्श करते समय केवल सरकारी या राजनीतिक दबाव की चर्चा करते हैं।
लेकिन वर्तमान समय में दबाव के अनेक सूक्ष्म और प्रत्यक्ष स्वरूप हैं।
राजनीतिक दबाव।
आर्थिक व कॉरपोरेट हित।
विज्ञापन का अप्रत्यक्ष नियंत्रण।
सोशल मीडिया की आक्रामकता और ट्रोलिंग का भय।
और टीआरपी व क्लिक्स की अंधी दौड़।
और इन सबसे अधिक घातक है—पत्रकार का स्वयं किया गया आत्म-सेंसरशिप।
जब कोई पत्रकार यह सोचकर तथ्य को दबाने लगे कि “यह प्रकाशित करने से कौन नाराज होगा?”, तब किसी भी बाहरी पहरेदार की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का सबसे कठिन और सच्चा संघर्ष इसी आंतरिक भय पर विजय प्राप्त करना है।
डिजिटल क्रांति ने गति तो दी, पर क्या प्रामाणिकता भी दी?
आज सूचनाएं कुछ ही क्षणों में स्क्रीन पर तैरने लगती हैं।
पहले पाठक समाचार पत्र का प्रतीक्षा करता था, आज मोबाइल पर हर क्षण सूचनाओं की बाढ़ है।
यह तकनीकी विस्तार पत्रकारिता के लिए एक अद्वितीय अवसर भी है और उतनी ही बड़ी चुनौती भी।
अवसर इसलिए कि आज दूर-दराज के किसी छोटे कस्बे का पत्रकार भी अपनी रिपोर्ट से वैश्विक संवाद स्थापित कर सकता है।
चुनौती इसलिए कि भ्रामक और असत्य सूचनाएं भी उसी तीव्र गति से प्रसारित होती हैं।
आज “सबसे पहले सूचना देने” की अंधी होड़ में प्रायः “सटीक और प्रामाणिक सूचना देने” का मूल उद्देश्य हाशिए पर चला जाता है।
परंतु स्मरण रहे, पत्रकारिता का गौरव गति से नहीं, बल्कि उसकी सत्यता और विश्वसनीयता से बनता है।
सबसे पहले अपुष्ट बात कहने वाला भुला दिया जाता है, लेकिन प्रामाणिक सच सामने लाने वाले पर पाठक का विश्वास सदैव बना रहता है।
सोशल मीडिया का प्रसार पत्रकारिता का पैमाना नहीं
यह बात आज पूरी स्पष्टता से समझनी होगी।
किसी वीडियो को लाखों लोगों ने देखा है, केवल इसलिए वह गंभीर पत्रकारिता नहीं बन जाता।
किसी भड़काऊ पोस्ट को हजारों बार साझा किया गया है, तो वह सत्य का पर्याय नहीं हो जाता।
किसी व्यक्ति के लाखों अनुगामी हैं, तो उसका हर कथन स्वतः प्रमाणित नहीं माना जा सकता।
पत्रकारिता में लोकप्रियता से कहीं पहले निष्पक्ष जांच और सत्यापन आता है।
‘वायरल’ होना और ‘सत्यापित’ होना—दो सर्वथा भिन्न आयाम हैं।
आज डिजिटल मीडिया को इस महीन और निर्णायक अंतर को पूरी गंभीरता से आत्मसात करने की आवश्यकता है।
पत्रकार से भूल संभव है, परंतु लापरवाही अक्षम्य है
पत्रकार भी एक मनुष्य है।
अनजाने में उससे भी तथ्यात्मक त्रुटि हो सकती है।
परंतु जिम्मेदार और नैतिक पत्रकारिता वही है जो त्रुटि का भान होते ही उसे पूरी विनम्रता और स्पष्टता से सार्वजनिक रूप से सुधारे।
भूल का सुधार प्रकाशित करना किसी संस्थान की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी उच्च सत्यनिष्ठा और विश्वसनीयता का प्रमाण है।
त्रुटि को छिपाना अनैतिक है और जानबूझकर भ्रामक तथ्यों को गढ़ना पत्रकारिता के साथ सबसे बड़ा छल है।
अतः पत्रकारिता की असली परीक्षा यह नहीं कि कभी कोई चूक हुई या नहीं, बल्कि कसौटी यह है कि—
क्या चूक उजागर होने पर उसे स्वीकार कर तत्काल सुधारा गया?
पत्रकारिता को सनसनी नहीं, समग्र संदर्भ की आवश्यकता है
आज पाठक के पास समय का अभाव है।
शीर्षक छोटे होते जा रहे हैं, दृश्य छोटे होते जा रहे हैं और कुछ सेकंडों के वीडियो में किसी भी बड़े मुद्दे का पूरा संदर्भ गायब हो जाता है।
परंतु राष्ट्र और समाज से जुड़े जटिल प्रश्नों को कभी भी चंद पलों में नहीं समेटा जा सकता।
किसी विधान या कानून को समझना हो तो उसकी विधायी पृष्ठभूमि की समझ आवश्यक है।
किसी सरकारी नीति का विश्लेषण करना हो तो उसके यथार्थवादी आंकड़ों का अध्ययन अनिवार्य है।
किसी राजनीतिक गतिरोध को देखना हो तो उसके ऐतिहासिक संदर्भों की जानकारी चाहिए।
और किसी सामाजिक विषमता को समझना हो तो धरातल पर रहने वाले जनमानस की वास्तविक पीड़ा को देखना होगा।
इसलिए पत्रकारिता को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि ‘क्या हुआ’, बल्कि जहां भी संभव हो, यह भी विस्तार से स्पष्ट करना चाहिए—
यह घटना क्यों हुई?
इसके पीछे की वास्तविक प्रक्रिया क्या थी?
इसका दूरगामी प्रभाव समाज और सामान्य नागरिक पर क्या पड़ेगा?
और भविष्य में इसके क्या परिणाम संभावित हैं?
तभी कोई समाचार मात्र सूचना न रहकर सार्थक और उपयोगी पत्रकारिता का रूप धारण करता है।
स्वाधीनता संग्राम की पत्रकारिता से क्या सीखे वर्तमान पीढ़ी?
प्रथम सीख—सत्ता से निर्भीक होकर सच पर आधारित सवाल पूछना।
द्वितीय सीख—हर खतरे के बावजूद केवल सत्य के साथ खड़े रहना।
तृतीय सीख—निर्बल और उपेक्षित की दबी हुई आवाज बनना।
चतुर्थ सीख—समाज को केवल समाचार नहीं, बल्कि वैचारिक दिशा और चेतना देना।
पंचम सीख—शासन में कोई भी दल या व्यक्ति हो, उससे निरंतर जनहितैषी जवाबदेही मांगना।
और षष्ठ सीख—पत्रकारिता के पवित्र धर्म को कभी विशुद्ध व्यापार में तब्दील न होने देना।
भारत के स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता ने जनचेतना के निर्माण में जो ऐतिहासिक भूमिका निभाई, वह हमें सिखाती है कि शब्द केवल कागजी अक्षर नहीं होते; वे समाज और राष्ट्र की दिशा बदलने की सामर्थ्य रखते हैं।
आज पत्रकारिता को पुनः जनविश्वास अर्जित करना होगा
वर्तमान दौर में मीडिया के सामने सबसे बड़ा संकट तकनीक का नहीं है।
सबसे बड़ा संकट खोते हुए जनविश्वास और साख का है।
जब पाठक किसी समाचार को पढ़ने के बाद सशंकित होकर पूछता है—
“क्या यह सच है या कोई प्रायोजित खबर?”
तो यह संपूर्ण पत्रकारिता के लिए आत्मनिरीक्षण का क्षण है।
जब पाठक समाचार और प्रचार के बीच का फर्क न समझ पाए, तो यह दोष केवल पाठक का नहीं होता; मीडिया संस्थानों को भी अपने गिरते मानदंडों पर विचार करना होगा।
मेरी दृष्टि में पत्रकारिता का वास्तविक मंतव्य
मैं पत्रकारिता को केवल एक आजीविका या व्यवसाय नहीं मानता।
यह एक अत्यंत पावन और गंभीर सामाजिक दायित्व है।
यह दायित्व किसी सरकार, किसी राजनीतिक संगठन या किसी कॉरपोरेट विज्ञापनदाता के प्रति नहीं है।
यह दायित्व उस साधारण पाठक के प्रति है जो ताज न्यूज़ या किसी भी मंच पर विश्वास के साथ आता है कि उसे भ्रमित नहीं किया जाएगा।
उस अटूट भरोसे की रक्षा करना ही हमारी सबसे अनमोल पूंजी है।
इसलिए मेरा स्पष्ट दृष्टिकोण है कि पत्रकार को न तो पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर केवल विरोध करना चाहिए और न ही चाटुकारिता में लीन होकर अंध-समर्थन।
उसे तथ्यों की कसौटी पर जांचना चाहिए।
उसे तटस्थ भाव से सत्यापित करना चाहिए।
उसे निर्भय होकर प्रश्न पूछने चाहिए।
और जो भी सत्य सामने आए, उसे बिना किसी भय और बिना किसी प्रलोभन के जनता के समक्ष ज्यों का त्यों रख देना चाहिए।
सरकार जनहित में निर्णय ले तो उसकी सराहना होनी चाहिए।
सरकार से जनहित में चूक हो तो तीखे सवाल पूछे जाने चाहिए।
विपक्ष यदि जनसरोकारों को उठाए तो उसे यथोचित स्थान मिलना चाहिए।
और यदि विपक्ष भ्रामक आचरण करे तो उसे भी पूरी निर्भीकता से कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।
पत्रकारिता का तराजू किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न से नहीं, बल्कि केवल और केवल सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक मूल्यों से संतुलित होना चाहिए।
अंतिम प्रश्न—हम आने वाली पीढ़ी को कैसी पत्रकारिता सौंपेंगे?
आज हम जिन परंपराओं और मर्यादाओं का पालन करेंगे, वही आने वाले कल में नई पीढ़ी की पत्रकारिता का पथ प्रशस्त करेंगी।
यदि हम उन्हें सिखाएंगे कि पत्रकारिता का अर्थ केवल सनसनी और टीआरपी है, तो वे वैसी ही निरर्थक पत्रकारिता करेंगे।
यदि हम उन्हें सिखाएंगे कि खबर वही है जो बाजार और विज्ञापन तय करे, तो वे मूल्यों का सौदा करेंगे।
यदि हम उन्हें सिखाएंगे कि सत्ता से प्रश्न पूछना अनुचित है, तो वे चाटुकारिता का मार्ग चुनेंगे।
परंतु यदि हम यह संस्कार स्थापित करेंगे कि—
तथ्य सर्वोपरि हैं।
जनता का हित सर्वोच्च है।
प्रश्न पूछना लोकतंत्र की आत्मा है।
सत्ता सदैव संविधान के प्रति जवाबदेह है।
और पत्रकार की एकमात्र निष्ठा सत्य के प्रति है।
तो हम निसंदेह एक ऐसी सशक्त और गौरवशाली विरासत छोड़कर जाएंगे जिस पर भविष्य की पीढ़ियां गर्व कर सकेंगी।
स्वाधीनता आंदोलन के पत्रकारों के पास आधुनिक संसाधन, डिजिटल तकनीक और 24 घंटे के चैनल नहीं थे, परंतु उनके पास एक अडिग नैतिक बल और लोककल्याण का पावन संकल्प था।
आज हमारे पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है, बस आवश्यकता इस बात की है कि हमारा मूल ध्येय कभी धूमिल न पड़े।
पत्रकारिता को किसी के विरुद्ध पूर्वाग्रह रखने की आवश्यकता नहीं है; उसे केवल सत्य के साथ अडिग खड़े रहने की आवश्यकता है।
और पत्रकारिता की सबसे महान शक्ति आज भी यही है—
वह सत्ता से बड़ा होने का दंभ नहीं भरती, परंतु सत्ता से निर्भीकता से सवाल पूछने का अपना लोकतांत्रिक अधिकार कभी नहीं छोड़ती।
वह जनता के विवेक पर अपना निर्णय नहीं थोपती, परंतु जनता को सही निर्णय लेने योग्य निष्पक्ष और प्रामाणिक तथ्य अवश्य उपलब्ध कराती है।
यही स्वतंत्र पत्रकारिता की परिभाषा है, यही लोकतंत्र में उसकी सार्थकता है और यही वह पवित्र अमानत है जिसे हमें आने वाली पीढ़ियों तक पूरी निष्ठा के साथ पहुंचाना है।
— प्रधान संपादक की कलम से
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Pawan Kumar Singh
Chief Editor, Taj News
7579990777




