लंदन, पेरिस, रोम और वेनिस की नदियों के किनारे से लौटकर अपनी यमुना के लिए उठी कसक और अंतर्यात्रा के मर्मस्पर्शी अनुभवों पर वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का विशेष संस्मरण
आर्टिकल डेस्क | 🌐 tajnews.in | 27 सितंबर 2026 | 14:55 बजे


बृज खंडेलवाल
वह मन में है। एक बड़ा क्षितिज। थोड़ी ज्यादा विनम्रता। बहुत सारी कृतज्ञता। और अपनी यमुना के लिए फिर कुछ करने की बेचैनी।
सूटकेस खाली हो जाएंगे। कपड़े धुल जाएंगे। तस्वीरें परिवार और दोस्तों तक पहुंच जाएंगी। कुछ दिनों बाद हमारी यात्रा भी पुरानी खबर हो जाएगी। फिर कोई पूछेगा, “तो बताइए, यूरोप में सबसे अच्छी जगह कौन सी लगी?”
- यूरोपीय सफर का आत्ममंथन: लंदन, पेरिस, रोम और वेनिस की भव्यता से परे मन में अपनी यमुना के लिए जागी गहरी कसक।
- घर की व्यापक परिभाषा: दुनिया घूमने से अपनी मिट्टी और जड़ों का महत्व कम नहीं होता, बल्कि घर का दायरा और बड़ा हो जाता है।
- नदियों से मिला सबसे बड़ा उपहार: टेम्स, सीन और नेकर के साफ-सुथरे तटों ने फिर से आगरा की जीवनदायिनी यमुना की याद दिलाई।
- भीतर की सबसे लंबी यात्रा: सूटकेस खाली होने और तस्वीरें पुरानी पड़ने के बाद भी अंतरात्मा में निरंतर बहती रहेगी एक नदी।
मैं शायद मुस्कुराऊंगा। लंदन नहीं। पेरिस नहीं। रोम नहीं। वेनिस भी नहीं।
यूरोप की नदियाँ और यमुना की पुकार
मेरे लिए सबसे यादगार वह क्षण था, जब यूरोप की तमाम नदियों ने मिलकर मुझे वापस यमुना के किनारे खड़ा कर दिया। तब समझ आया। दुनिया देखने से घर छोटा नहीं होता। घर की परिभाषा बड़ी हो जाती है।
हम यूरोप देखने निकले थे। यूरोप ने हमें इतिहास दिया, वास्तुकला दी, व्यवस्था दिखाई, नदियां दिखाईं और ढेरों यादें दीं। लेकिन सबसे बड़ा उपहार यह था कि उसने हमें फिर से अपनी यमुना याद दिला दी।
बाहरी सफर से अंतर्यात्रा तक का मर्म
दुनिया घूमकर लौटे तो पाया, सबसे लंबी यात्रा बाहर की नहीं थी। सबसे लंबी यात्रा अपने भीतर की थी। और उस यात्रा के अंत में भी एक नदी बह रही थी।

Pawan Singh
Editor in chief, Taj News Network
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