स्पैम कॉल सिर्फ फोन की घंटी नहीं, आपके डेटा की कीमत का सवाल है

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DND के बावजूद लगातार आती अनचाही कॉलें बताती हैं कि समस्या केवल टेलीमार्केटिंग की नहीं, बल्कि डेटा के संग्रह, उपयोग, साझाकरण और निगरानी की पूरी व्यवस्था से जुड़ी है

संपादकीय डेस्क | 🌐 tajnews.in | 28 सितंबर 2026 | 19:45 बजे

मोबाइल फोन आज हमारी जरूरत है, लेकिन उसी फोन पर आने वाली अनचाही कॉलें धीरे-धीरे हमारी डिजिटल जिंदगी की बड़ी परेशानियों में शामिल हो गई हैं। कभी बैंकिंग सेवा के नाम पर, कभी बीमा, लोन, प्रॉपर्टी, क्रेडिट कार्ड या किसी दूसरी सेवा के बहाने फोन आता है। समस्या तब और गंभीर लगती है, जब व्यक्ति ने प्रचारात्मक कॉलों से बचने के लिए DND सुविधा का विकल्प चुन रखा हो, फिर भी कॉल का सिलसिला थमता नहीं।

लोकलसर्किल्स के 2022 के एक सर्वे में 64 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया था कि उन्हें औसतन प्रतिदिन तीन या उससे अधिक स्पैम कॉल मिलती हैं। इनमें 37 प्रतिशत ने रोज तीन से पांच, 18 प्रतिशत ने छह से दस और 9 प्रतिशत ने दस से अधिक कॉल मिलने की बात कही थी। इसी सर्वे में DND से जुड़े मोबाइल उपयोगकर्ताओं में 95 प्रतिशत ने कहा था कि उन्हें इसके बावजूद अनचाही कॉलें मिल रही थीं। यह आंकड़ा आज का सर्वे नहीं है, लेकिन यह दिखाता है कि समस्या कोई नई या मामूली समस्या नहीं है।

आज सवाल केवल इतना नहीं है कि किसी टेलीमार्केटर के पास हमारा मोबाइल नंबर कैसे पहुंचा। बड़ा सवाल यह है कि हमारे बारे में उसके पास कितनी जानकारी है। कई बार कॉल करने वाले को सिर्फ नाम और मोबाइल नंबर नहीं, बल्कि हमारी संभावित जरूरत, किसी सेवा में दिखाई गई रुचि या किसी उत्पाद के बारे में की गई पूछताछ जैसी जानकारी भी मालूम हो सकती है। यहीं से स्पैम कॉल और डेटा कारोबार के बीच का संबंध समझ में आता है।

मोबाइल नंबर कब बन जाता है कारोबार की लीड?

डिजिटल अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता का डेटा केवल पहचान बताने वाला रिकॉर्ड नहीं रह गया है। नाम, मोबाइल नंबर, शहर, खरीदे गए उत्पाद, किसी वेबसाइट पर की गई खोज, किसी सेवा के लिए भेजी गई पूछताछ और ऑनलाइन व्यवहार जैसी सूचनाएं मिलकर किसी व्यक्ति की उपभोक्ता प्रोफाइल तैयार कर सकती हैं। कारोबार की भाषा में यही जानकारी संभावित ग्राहक की लीड बन सकती है।

उदाहरण के लिए, केवल इतना पता होना कि किसी व्यक्ति का नाम क्या है और उसका मोबाइल नंबर क्या है, सीमित व्यावसायिक जानकारी हो सकती है। लेकिन यदि किसी डेटाबेस में यह संकेत भी मौजूद हो कि वही व्यक्ति कार खरीदने, बीमा कराने या होम लोन लेने में रुचि रखता है, तो उस जानकारी की व्यावसायिक उपयोगिता बढ़ जाती है। इसके बाद उपभोक्ता को मिलने वाली कॉल महज एक आकस्मिक बिक्री कॉल नहीं रह जाती, बल्कि वह किसी लीड-जनरेशन प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है।

डेटा की यात्रा समझना जरूरी है

किसी सेवा के लिए फॉर्म भरते समय हम अक्सर नियम और शर्तों को पढ़े बिना सहमति दे देते हैं। किसी वेबसाइट या ऐप को कई तरह की अनुमतियां दे देते हैं। कई मामलों में हमारी जानकारी सेवा उपलब्ध कराने वाली संस्था के पास जाती है और वहां से अधिकृत व्यावसायिक साझेदारों, सेवा प्रदाताओं या मार्केटिंग तंत्र में इस्तेमाल हो सकती है। हर डेटा ट्रांसफर को अवैध कहना सही नहीं होगा, क्योंकि कई उपयोगों के लिए वैध सहमति या अन्य कानूनी आधार मौजूद हो सकते हैं। लेकिन उपभोक्ता के लिए यह समझना कठिन रहता है कि उसकी जानकारी आगे कहां और किस उद्देश्य से इस्तेमाल हो रही है।

यही अस्पष्टता डेटा बाजार को जटिल बनाती है। कोई कंपनी संभावित ग्राहकों तक पहुंचने के लिए मार्केटिंग एजेंसी की मदद ले सकती है। एजेंसी डिजिटल विज्ञापन, वेबसाइट, ऐप या दूसरे माध्यमों से रुचि रखने वाले लोगों तक पहुंच सकती है। फिर लीड-जनरेशन कंपनियां उन संभावित ग्राहकों की जानकारी को संबंधित कारोबार तक पहुंचा सकती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उपभोक्ता को अक्सर यह पता ही नहीं होता कि उसने जिस जगह अपनी जानकारी दी थी, वहां से उसकी डिजिटल पहचान कितनी दूर तक चली गई।

DND के बाद भी समस्या क्यों बनी हुई है?

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने अवांछित वाणिज्यिक संचार यानी UCC से निपटने के लिए DND व्यवस्था और शिकायत तंत्र बनाया है। TRAI के अनुसार 2025 में सभी माध्यमों से 31.09 लाख UCC शिकायतें दर्ज हुईं और इनमें 17.06 लाख शिकायतें DND ऐप के माध्यम से आईं। इसी अवधि में नियामक ने उल्लंघन करने वाले अनरजिस्टर्ड टेलीमार्केटर्स के खिलाफ नोटिस, संचार प्रतिबंध और दूरसंचार संसाधनों के विच्छेदन जैसी कार्रवाई की।

फिर भी शिकायतों का बने रहना यह संकेत देता है कि केवल एक-एक नंबर को ब्लॉक करना पर्याप्त समाधान नहीं है। यदि एक नंबर बंद होने के बाद दूसरा नंबर सामने आ जाए या एक टेलीमार्केटर पर कार्रवाई के बाद वही व्यावसायिक गतिविधि किसी दूसरे माध्यम से जारी रहे, तो उपभोक्ता की परेशानी बनी रहती है। इसलिए व्यवस्था को केवल कॉल की पहचान तक सीमित रखने के बजाय उस पूरे नेटवर्क को समझना होगा, जिसके जरिए संपर्क जानकारी उपभोक्ता तक पहुंचती है।

डेटा ब्रीच और स्पैम कॉल को एक ही चीज मानना ठीक नहीं

यह फर्क भी समझना जरूरी है कि हर स्पैम कॉल किसी डेटा ब्रीच का परिणाम हो, ऐसा जरूरी नहीं है। किसी कंपनी के डेटाबेस से अनधिकृत तरीके से जानकारी बाहर निकलना डेटा ब्रीच है, जबकि किसी उपभोक्ता की जानकारी का वैध या अवैध व्यावसायिक इस्तेमाल अलग मुद्दा है। कई बार अनचाही कॉलें सहमति, डेटा साझाकरण, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी या अलग-अलग व्यावसायिक स्रोतों से प्राप्त लीड के कारण भी आ सकती हैं।

हालांकि हाल के डेटा सुरक्षा मामलों ने यह जरूर दिखाया है कि बड़े संस्थानों के पास मौजूद संवेदनशील जानकारी के साथ सुरक्षा जोखिम वास्तविक हैं। जुलाई 2026 में बैंक ऑफ बड़ौदा से जुड़े एक डेटा ब्रीच मामले में ग्राहक पहचान दस्तावेज, ऋण संबंधी जानकारी और आंतरिक रिकॉर्ड के ऑनलाइन लीक होने की रिपोर्ट सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार मामला एक कर्मचारी के ईमेल अकाउंट के समझौता किए जाने से जुड़ा था। ऐसे मामले इस बात की याद दिलाते हैं कि डेटा सुरक्षा केवल तकनीकी विभाग का विषय नहीं, बल्कि सीधे नागरिकों की निजता से जुड़ा प्रश्न है।

कानून बनना और कानून का असर दिखना अलग बातें हैं

भारत में व्यक्तिगत डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए Digital Personal Data Protection Act, 2023 मौजूद है और Digital Personal Data Protection Rules, 2025 को नवंबर 2025 में अधिसूचित किया गया। Data Protection Board of India की स्थापना के लिए भी सरकारी ढांचा सामने आ चुका है। यानी कानून और संस्थागत व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा चुके हैं।

लेकिन किसी भी डेटा संरक्षण व्यवस्था की असली परीक्षा उसके कागज पर मौजूद होने से नहीं, बल्कि उसके अनुपालन और प्रवर्तन से होती है। उपभोक्ता को यह भरोसा होना चाहिए कि यदि उसकी निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल होता है, तो शिकायत करने का रास्ता स्पष्ट है, जिम्मेदारी तय हो सकती है और उल्लंघन करने वाली संस्था पर प्रभावी कार्रवाई हो सकती है। दूसरी तरफ कंपनियों के लिए भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि डेटा लेने, रखने, साझा करने और इस्तेमाल करने की जिम्मेदारियां केवल औपचारिक शर्तें नहीं हैं।

उपभोक्ता की सहमति वास्तव में कितनी समझी हुई है?

डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ एक बुनियादी सवाल सामने खड़ा है—क्या किसी लंबे नियम-पत्र के अंत में लगाया गया एक टिक वास्तव में सूचित सहमति माना जा सकता है, जब सामान्य उपभोक्ता को यह मालूम ही न हो कि उसका डेटा किस उद्देश्य से और किन पक्षों तक पहुंच सकता है?

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें सहमति स्पष्ट हो, उद्देश्य समझ में आए और उपभोक्ता के पास अपनी जानकारी के इस्तेमाल पर वास्तविक नियंत्रण हो। कंपनियों को भी यह बताना होगा कि वे कौन-सा डेटा क्यों ले रही हैं और उसका इस्तेमाल किस सीमा तक होगा। इसी के साथ नियामकों को शिकायतों के आंकड़ों से आगे जाकर उन प्रक्रियाओं की जांच करनी होगी, जहां से बड़े पैमाने पर उपभोक्ता डेटा व्यावसायिक नेटवर्क में प्रवेश करता है।

स्पैम कॉल का समाधान केवल कॉल ब्लॉक करने से नहीं होगा

आज किसी अनजान नंबर को ब्लॉक करना आसान है, लेकिन उस नंबर के पीछे मौजूद डेटा नेटवर्क को ब्लॉक करना आसान नहीं। यही इस पूरी समस्या की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। अगर उपभोक्ता की जानकारी बार-बार अलग-अलग व्यावसायिक चैनलों में घूमती रहेगी, तो हर नए नंबर को ब्लॉक करना केवल अस्थायी राहत देगा।

इसलिए स्पैम कॉल की समस्या को केवल टेलीकॉम समस्या मानकर देखने के बजाय इसे डेटा गवर्नेंस, उपभोक्ता अधिकार, साइबर सुरक्षा और जिम्मेदार डिजिटल कारोबार के संयुक्त मुद्दे के रूप में देखना होगा। भारत में नियामकीय ढांचा लगातार विकसित हो रहा है। अब चुनौती यह है कि उस ढांचे का असर उस आम नागरिक तक पहुंचे, जिसके फोन की घंटी दिन में कई बार ऐसे काम के लिए बजती है जिसकी उसने कभी मांग ही नहीं की।

आखिर किसी व्यक्ति का मोबाइल नंबर केवल संपर्क का माध्यम नहीं है। उसके पीछे उसकी पहचान, उसकी निजता और कई बार उसके डिजिटल व्यवहार की कहानी जुड़ी होती है। उस कहानी की कीमत यदि बाजार समझता है, तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से तय होनी चाहिए।

पवन सिंह
पवन सिंह
Editor in chief, Taj News Network
pawansingh@tajnews.in | WhatsApp: 7579990777

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