दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Monday, 3 August, 2026, 06:53:00 AM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व पर्यावरणविद्
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल

यमुना कब तक राजधानी और उसके पड़ोसी राज्यों का सीवर बनी रहेगी?

नदियाँ कभी भौगोलिक सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति, सामाजिक समरसता और मानव सभ्यता को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं। लेकिन जब कोई विशाल शहर या समृद्ध राज्य अपनी औद्योगिक गंदगी और सीवेज नदी में निर्लज्जता से उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी राज्यों की सीमाएँ नहीं मानता। वह ज़हरीला पानी भी बहते-बहते बहुत दूर तक पहुँचता है। आज हमारी पवित्र यमुना नदी इसी राष्ट्रीय शर्म और प्रशासनिक नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता और संरक्षण के नाम पर केवल औपचारिक कागजी कार्रवाई अब बंद होनी चाहिए।

हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने पड़ोसी राज्य कर्नाटक पर गंभीर आरोप लगाया कि बेंगलुरु शहर का भारी सीवर मिला ज़हरीला पानी लगातार दक्षिण पिनाकिनी (थेनपेन्नई) नदी में बेधड़क छोड़ा जा रहा है। प्रयोगशाला में हुए जल परीक्षण में भारी जैविक प्रदूषण, जानलेवा अमोनिया, घातक फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और विषैले रासायनिक कचरे की प्रामाणिक पुष्टि हुई। तमिलनाडु ने इस पर न केवल सख़्त विरोध जताया, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से तत्काल प्रशासनिक दख़ल देने की कड़ी मांग भी की।

अब यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि जब दक्षिण भारत की एक नदी के प्रदूषण पर अंतरराज्यीय स्तर पर इतना भारी राजनीतिक व प्रशासनिक शोर उठ सकता है, तो उत्तर भारत की जीवनदायिनी यमुना नदी के इस भयावह विनाश पर यह रहस्यमयी ख़ामोशी क्यों छाई हुई है?

यमुना नदी देश की राजधानी दिल्ली पहुँचने से काफी पहले ही हरियाणा के सीमावर्ती इलाकों में बहुत बुरी तरह बीमार हो चुकी होती है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) के अपने आधिकारिक आँकड़े चीख-चीखकर बताते हैं कि राज्य के 11 बड़े औद्योगिक व सीवर नाले लगातार विषैली गंदगी यमुना में उँडेल रहे हैं। इनमें पानीपत-सोनीपत का कुख्यात ड्रेन नंबर-6, फरीदाबाद का जहरीला बुढ़िया नाला, बल्लभगढ़-पलवल का गौंछी ड्रेन और साइबर सिटी गुरुग्राम के कई बड़े गंदे नाले सीधे शामिल हैं।

इसमें भी सबसे चिंताजनक और खौफनाक बात यह है कि हरियाणा से यमुना नदी में पहुँचने वाले कुल प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत विशाल हिस्सा अकेला गुरुग्राम शहर छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्रों से हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनट्रीटेड (अपशिष्ट) सीवेज सीधे नदी में बिना किसी शोधन के गिराया जा रहा है। फरीदाबाद की सैकड़ों अवैध डाइंग और टेक्सटाइल इकाइयाँ विषैला रासायनिक व रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में बहा रही हैं। ठीक इसी तरह बल्लभगढ़ और पलवल से भी बिना किसी ट्रीटमेंट के लाखों लीटर सीवेज सीधे यमुना नदी की अविरल धारा में गिर रहा है।

इसके बाद जब यमुना दिल्ली सीमा में प्रवेश करती है, तो हालात बदतर से बदहाल हो जाते हैं। वज़ीराबाद बैराज से लेकर ओखला बैराज तक का केवल 22 किलोमीटर का छोटा सा हिस्सा यमुना नदी के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। नजफ़गढ़ नाला और शाहदरा नाले समेत दर्जनों बड़े नाले रोज़ाना करोड़ों-अरबों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में निर्बाध रूप से गिराते हैं। दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के ताज़ा आधिकारिक अनुमान बताते हैं कि इन जहरीले नालों का जल प्रवाह पहले के सभी सरकारी आकलनों से कहीं अधिक भयावह है। इसका सीधा खौफनाक नतीजा यह है कि दिल्ली के कई स्थानों पर यमुना के पानी में घुली हुई आवश्यक ऑक्सीजन (DO) का स्तर घटकर पूरी तरह ‘शून्य’ हो जाता है और घातक फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर सुरक्षित सीमा से सैकड़ों-हजारों गुना ऊपर पहुँच जाता है। यहाँ यमुना कोई पवित्र नदी नहीं, बल्कि एक बदबूदार और बदहाल नाला दिखाई देती है।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी ऐतिहासिक और मानवीय त्रासदी यह है कि दिल्ली और हरियाणा की यह साझा औद्योगिक व सीवर गंदगी नीचे बहते हुए आगरा, मथुरा, वृंदावन और पूरे पावन ब्रज मंडल के हिस्से आती है। ऊपर रहने वाले ताकतवर राज्यों की लापरवाही और नाकामी, नीचे रहने वाले निर्दोष ब्रजवासियों के लिए जानलेवा सज़ा बन जाती है।

ताज नगरी आगरा केवल उत्तर प्रदेश का एक आम शहर भर नहीं है, बल्कि यह विश्वप्रसिद्ध ताजमहल का ऐतिहासिक नगर है। यह अंतरराष्ट्रीय धरोहर और संपूर्ण भारत की वैश्विक पहचान है। लेकिन ताजमहल के ठीक सामने से होकर बहने वाली यमुना अब जीवन और शीतलता नहीं, बल्कि केवल भयानक बीमारियां और ज़हरीली बदबू लेकर आती है। नदी का यह विषैला पानी आसपास के भूजल (Groundwater) को तेज़ी से दूषित कर रहा है। नदी के जलीय जीव-जंतु पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पूरी तरह दम तोड़ चुका है। एक मृतप्राय, काली और बदबूदार नदी के तट पर दुनिया की सबसे खूबसूरत संगमरमरी इमारत भी बेहद उदास और लाचार दिखाई देती है।

इस पूरे राष्ट्रीय संकट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका भी पूरी तरह से कठघरे में खड़ी है। उनका संवैधानिक काम केवल प्रयोगशाला में बैठकर पानी के नमूनों की जाँच करना और फाइलें रंगना नहीं, बल्कि प्रदूषण को कड़ाई से रोकना भी है। यदि पिछले तीन-चार दशकों से यमुना की यही बदतर हालत बनी हुई है, तो जनता का यह सवाल पूछना पूरी तरह लाजमी है कि दोषियों पर प्रभावी विधिक कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की रिपोर्टें केवल सरकारी फाइलों की ज़ीनत बढ़ाने के लिए बनती हैं? क्या देश का पर्यावरण संरक्षण कानून सिर्फ़ छोटे नागरिकों और दुकानदारों पर लागू होता है? बड़े-बड़े महानगरों, अरबपति कॉरपोरेट उद्योगों और सरकारी एजेंसियों पर कानून का डंडा क्यों नहीं चलता?

यद्यपि हरियाणा सरकार ने दावा किया है कि 2027 तक बिना शोधन के सीवेज पानी को पूरी तरह रोका जाएगा और नालों के बीओडी (BOD) स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे लाया जाएगा। इसके लिए नए एसटीपी (STP), सीईटीपी (CETP) और ड्रेन टैपिंग की नई योजनाओं के दावे किए गए हैं। दूसरी ओर, दिल्ली सरकार भी अपनी सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने के बड़े-बड़े प्रशासनिक दावे कर रही है।

परंतु जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों के बिल्कुल उलट एक खौफनाक कहानी बयां करती है। पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल से भारी औद्योगिक प्रदूषण आज भी लगातार यमुना में बिना किसी रोक-टोक के पहुँच रहा है। सील की गई अवैध औद्योगिक इकाइयाँ अधिकारियों की मिलीभगत से फिर से चालू हो जाती हैं और नालों में सीधा डिस्चार्ज रुकने का नाम नहीं लेता।

हमें यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि यमुना नदी किसी एक राज्य की निजी जागीर नहीं है। यह भारत के करोड़ों नागरिकों की जीवनरेखा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को स्वच्छ जल और जीवन जीने का मौलिक अधिकार देता है। फिर आगरा, मथुरा और वृंदावन के निर्दोष लोगों को दिल्ली और हरियाणा का जहरीला और प्रदूषित पानी क्यों पीना पड़े? ब्रज मंडल की महान सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को प्रशासनिक लापरवाही की यह भारी कीमत क्यों चुकानी पड़े?

अब वह समय आ गया है कि दिल्ली और हरियाणा दोनों राज्य सरकारें बहानेबाजी छोड़कर अपनी साझा नैतिक व विधिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। देश की राजधानी और उसके आसपास के औद्योगिक शहरों का विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उनकी पैदा की गई गंदगी दूसरे राज्यों की तक़दीर न बने। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य बोर्डों को भी अपनी आपराधिक निष्क्रियता तत्काल छोड़नी होगी। केवल कागजी नोटिस जारी करना या नए लक्ष्य घोषित करना अब बिल्कुल काफ़ी नहीं है। दोषी प्रशासनिक एजेंसियों, नगर निगमों और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर सख्त आपराधिक मामले दर्ज होने चाहिए। यह हर हाल में सुनिश्चित किया जाए कि बिना शत-प्रतिशत शोधन का एक भी लीटर सीवेज या औद्योगिक कचरा यमुना की धारा में न गिरे।

यमुना सिर्फ़ पानी की एक धारा मात्र नहीं है, बल्कि वह हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म की धड़कन है। यदि हम अपनी ही जीवनदायिनी नदी को बचाने में नाकाम रहे, तो आने वाला इतिहास यह कभी नहीं पूछेगा कि सरकारों ने कितनी हज़ार करोड़ की योजनाएँ बनाईं या मंचों से कितने खोखले वादे किए। इतिहास पन्नों पर केवल इतना कड़वा सच लिखेगा कि एक पूरा राष्ट्र अपनी सबसे पवित्र और ऐतिहासिक नदियों में से एक को दिल्ली, फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल के गंदे सीवर में बदलने से नहीं रोक सका। यह हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी पर्यावरणीय, सामाजिक और नैतिक नाकामी मानी जाएगी। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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