“शिक्षितों द्वारा शिक्षा का व्यापार: समाज के लिए एक गंभीर चुनौती”

खबर शेयर कीजिए

Article Desk, 🌐 tajnews.in | Tuesday, 28 July, 2026, 02:40:08 PM IST.

Taj News Logo
Taj News
Article Desk
Dr. Pramod Kumar
डॉ प्रमोद कुमार
प्रखर चिंतक व लेखक
देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद, प्रखर चिंतक और लेखक डॉ प्रमोद कुमार वर्तमान में डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा में ‘माईगव’ (MyGov) के डिप्टी नोडल अधिकारी हैं। वे भारतीय संस्कृति, संवैधानिक मूल्यों, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक समरसता के गंभीर मुद्दों पर अपने बेबाक, तथ्यपरक तथा प्रखर वैचारिक लेखों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं।

शिक्षितों द्वारा शिक्षा का व्यापार: समाज के लिए एक गंभीर चुनौती

— डॉ प्रमोद कुमार

भारतवर्ष में, प्राचीन काल से ही गुरु शिष्य परम्परा की संस्कृति रही है। सदियां से भारत में शिक्षा के महत्व को सर्वप्रथम मना गया है। यहां शिक्षा को सरस्वती जी के रूप में देवी मानकर पूजा गया है। विश्व में, सर्वप्रथम भारत में ही विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय नालंदा व तक्षशिला के नाम से थे। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु समान है। भारतरत्न बौद्ध सत्व बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर जी के विश्व प्रसिद्ध कथन “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” में सर्वप्रथम शिक्षा की बात कही गई है। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान या परीक्षा उत्तीर्ण करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता के विकास का साधन बताया। उनका प्रसिद्ध कथन है: “शिक्षा मनुष्य में पहले से विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है।” शिक्षा के महत्व पर उनके प्रमुख विचार संक्षेप में इस प्रकार हैं— चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास का विकास, मनुष्य निर्माण, स्वावलंबन, व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं राष्ट्र निर्माण।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “वह शिक्षा नहीं जो केवल जानकारी दे, बल्कि वह शिक्षा है जो चरित्र का निर्माण करे, मन की शक्ति बढ़ाए, बुद्धि का विकास करे और व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाए।” यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है। शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की आत्मा होती है। यह केवल अक्षरज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर विवेक, नैतिकता, संवेदनशीलता, तार्किकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करने वाली प्रक्रिया है। शिक्षा व्यक्ति को केवल रोजगार योग्य नहीं बनाती, बल्कि उसे एक बेहतर नागरिक और बेहतर मनुष्य भी बनाती है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में शिक्षा को दान, तप और लोककल्याण का माध्यम माना गया है।

गुरु को समाज में सर्वोच्च सम्मान इसलिए प्राप्त था क्योंकि वह ज्ञान को व्यापार नहीं, बल्कि सेवा और उत्तरदायित्व के रूप में देखता था। किंतु वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं, वे गंभीर चिंता का विषय हैं। आज शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान का प्रसार कम और आर्थिक लाभ अधिक होता जा रहा है। अनेक शिक्षित लोग, जो स्वयं शिक्षा की शक्ति और महत्व को समझते हैं, वही शिक्षा को व्यापार का साधन बना रहे हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य धूमिल होता जा रहा है और समाज एक गंभीर संकट की ओर बढ़ रहा है। चिंताजनक बात है जिस देश में शिक्षा को सरस्वती देवी के रूप में पूजा जाता हो, आज उसी शिक्षा का व्यापार के रूप में लाभार्जन हेतु माध्यम बनाया जा रहा है।

शिक्षा देना और शिक्षा का व्यापार करना दोनों में मूलभूत अंतर है। शिक्षा देना एक सामाजिक, नैतिक और मानवीय दायित्व है, जबकि शिक्षा का व्यापार लाभ कमाने की मानसिकता से प्रेरित गतिविधि है। शिक्षक का उद्देश्य विद्यार्थी के व्यक्तित्व का विकास करना होता है, जबकि व्यापारी का उद्देश्य अपने निवेश पर अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है। शिक्षा में मूल्य, आदर्श, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का स्थान होता है, जबकि व्यापार में लाभ और हानि की गणना प्रमुख होती है। व्यापारी सामान्यतः सही और गलत के प्रश्नों से अधिक अपने आर्थिक हितों को महत्व देता है। यदि यही मानसिकता शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश कर जाए तो शिक्षा का चरित्र बदल जाता है और वह समाज निर्माण का माध्यम न रहकर केवल धन अर्जित करने का साधन बन जाती है।

आज अनेक निजी शिक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा का क्षेत्र तेजी से व्यावसायिक होता जा रहा है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और प्रशिक्षण केंद्रों में शिक्षा को एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। आकर्षक भवन, भव्य विज्ञापन, कृत्रिम रैंकिंग, ऊँची फीस और रोजगार के बड़े-बड़े दावे शिक्षा के नए बाजार की पहचान बन चुके हैं। विद्यार्थी को ज्ञान प्राप्त करने वाला जिज्ञासु नहीं, बल्कि ग्राहक माना जाने लगा है। अभिभावक को सेवा प्राप्त करने वाला नागरिक नहीं, बल्कि भुगतान करने वाला उपभोक्ता समझा जाने लगा है। ऐसी स्थिति में शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट जाता है।

सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि इस व्यापार को बढ़ावा देने वाले अधिकांश लोग स्वयं शिक्षित वर्ग से आते हैं। वे शिक्षा के महत्व को समझते हैं, लेकिन फिर भी शिक्षा को लाभ कमाने का माध्यम बनाने में संकोच नहीं करते। यह विडंबना है कि जिन लोगों को समाज में ज्ञान और नैतिकता का प्रतिनिधि माना जाता है, वही लोग कभी-कभी शिक्षा की गरिमा को सबसे अधिक क्षति पहुँचाते हैं। जब शिक्षित वर्ग स्वयं शिक्षा को बाजार की वस्तु बना देता है, तब समाज में शिक्षा के प्रति सम्मान और विश्वास दोनों कम होने लगते हैं।

शिक्षा के व्यवसायीकरण का एक बड़ा परिणाम यह हुआ है कि शिक्षा की पहुँच आर्थिक स्थिति पर निर्भर होने लगी है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारी शुल्क देना पड़ता है। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के अनेक परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए कर्ज लेने तक को विवश हो जाते हैं। शिक्षा, जो सामाजिक समानता का माध्यम होनी चाहिए थी, वह कई बार सामाजिक असमानता को और अधिक बढ़ाने का कारण बन जाती है। आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग अपने बच्चों को महंगे संस्थानों में भेज सकता है, जबकि गरीब वर्ग सीमित संसाधनों के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाता है। इससे अवसरों की समानता का सिद्धांत कमजोर पड़ता है।

व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी की प्रतिभा और क्षमता से अधिक उसकी भुगतान क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है। अनेक संस्थान प्रवेश प्रक्रिया से लेकर विभिन्न सुविधाओं तक में आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा का लोकतांत्रिक स्वरूप प्रभावित होता है। समाज में यह धारणा बनने लगती है कि अच्छी शिक्षा केवल उन्हीं के लिए उपलब्ध है जो अधिक धन खर्च कर सकते हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी समाज के लिए उचित नहीं कही जा सकती।

शिक्षा के व्यापार का दूसरा गंभीर प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। जब संस्थान का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना बन जाता है, तब गुणवत्ता कई बार द्वितीयक हो जाती है। योग्य शिक्षकों की नियुक्ति के स्थान पर कम वेतन पर उपलब्ध कर्मचारियों को रखा जाता है। अनुसंधान, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और शैक्षणिक नवाचारों पर पर्याप्त निवेश नहीं किया जाता। शिक्षा को एक सेवा के बजाय उत्पाद मानने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र तो मिल जाते हैं, लेकिन वास्तविक ज्ञान और कौशल का विकास नहीं हो पाता।

आज अनेक विद्यार्थी उच्च डिग्रियाँ प्राप्त करने के बावजूद रोजगार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसका एक कारण शिक्षा और वास्तविक ज्ञान के बीच बढ़ती दूरी भी है। जब शिक्षा का केंद्र ज्ञान नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ हो जाए तो शिक्षण प्रक्रिया औपचारिकता बन जाती है। विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण करने की तकनीक सीख जाते हैं, लेकिन जीवन की वास्तविक समस्याओं का समाधान करने की क्षमता विकसित नहीं कर पाते। यह स्थिति न केवल व्यक्ति के लिए बल्कि राष्ट्र के विकास के लिए भी हानिकारक है।

शिक्षा के व्यवसायीकरण ने नैतिक मूल्यों को भी प्रभावित किया है। पहले शिक्षा का उद्देश्य सत्य, ईमानदारी, अनुशासन, सहिष्णुता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे गुणों का विकास करना माना जाता था। आज कई स्थानों पर सफलता को केवल आर्थिक उपलब्धि के आधार पर मापा जाने लगा है। जब विद्यार्थी देखते हैं कि शिक्षा संस्थान स्वयं लाभ कमाने की होड़ में लगे हैं, तो उनके भीतर भी नैतिक मूल्यों की अपेक्षा भौतिक सफलता को अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। यह समाज के दीर्घकालिक नैतिक स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक संकेत है।

कोचिंग संस्कृति का विस्तार भी शिक्षा के व्यवसायीकरण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर अरबों रुपये का उद्योग खड़ा हो चुका है। अनेक कोचिंग संस्थान विद्यार्थियों और अभिभावकों की आकांक्षाओं का व्यावसायिक उपयोग करते हैं। चयनित विद्यार्थियों की सफलता का व्यापक प्रचार किया जाता है, जबकि असफल विद्यार्थियों की बड़ी संख्या पर चर्चा नहीं होती। शिक्षा का उद्देश्य व्यापक बौद्धिक विकास होना चाहिए, लेकिन कई बार यह केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करने तक सीमित हो जाता है। इससे शिक्षा की व्यापकता और गहराई दोनों प्रभावित होती हैं।

डिजिटल युग में शिक्षा का व्यवसायीकरण नए रूपों में भी सामने आया है। ऑनलाइन पाठ्यक्रम, डिजिटल प्लेटफॉर्म, प्रमाणपत्र कार्यक्रम और विभिन्न शैक्षणिक सेवाएँ नई संभावनाएँ लेकर आई हैं। इनमें से अनेक पहलें सकारात्मक भी हैं, किंतु कुछ मामलों में शिक्षा को केवल बाजार के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। आकर्षक प्रचार और बड़े-बड़े दावों के माध्यम से विद्यार्थियों को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। इससे शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य और बाज़ार की रणनीतियों के बीच का अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाता है।

यह भी सत्य है कि सभी निजी संस्थान या शिक्षित व्यक्ति शिक्षा का अनुचित व्यापार नहीं कर रहे हैं। अनेक संस्थान उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। समस्या निजी क्षेत्र की उपस्थिति नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें शिक्षा को केवल लाभ कमाने का साधन माना जाता है। शिक्षा में आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है, लेकिन जब लाभ ही प्रमुख उद्देश्य बन जाए और ज्ञान, नैतिकता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व पीछे छूट जाएँ, तब संकट उत्पन्न होता है।

समाज को यह समझना होगा कि शिक्षा कोई सामान्य वस्तु नहीं है जिसे बाजार के सिद्धांतों पर पूरी तरह छोड़ दिया जाए। शिक्षा का संबंध राष्ट्र के भविष्य, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय विकास से है। यदि शिक्षा का चरित्र केवल व्यावसायिक हो जाएगा तो समाज में ज्ञान की गुणवत्ता, नैतिकता और समान अवसरों की अवधारणा कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, जहाँ आर्थिक स्थिरता भी हो और सामाजिक उत्तरदायित्व भी। सरकार, शिक्षण संस्थानों, शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों सभी की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

शिक्षा संस्थानों के लिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और गुणवत्ता मानकों का पालन अनिवार्य होना चाहिए। शुल्क निर्धारण में संतुलन होना चाहिए तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए पर्याप्त अवसर सुनिश्चित किए जाने चाहिए। शिक्षकों को अपने पेशे को केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में देखने की आवश्यकता है। अभिभावकों को भी केवल चमकदार विज्ञापनों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय संस्थानों की वास्तविक शैक्षणिक गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

अंततः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा देना और शिक्षा का व्यापार करना वास्तव में दो भिन्न अवधारणाएँ हैं। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति और समाज का विकास है, जबकि व्यापार का उद्देश्य लाभ अर्जन है। जब शिक्षा पर व्यापारिक मानसिकता हावी हो जाती है तो ज्ञान का महत्व कम होने लगता है और शिक्षा की आत्मा आहत होती है। आज शिक्षा के महत्व को कम करने में अशिक्षितों से अधिक उन शिक्षित लोगों की भूमिका पर प्रश्न उठते हैं जिन्होंने शिक्षा को लाभ कमाने का साधन बना दिया है। यह प्रवृत्ति केवल शिक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को पुनः उसके मूल उद्देश्य—ज्ञान, विवेक, नैतिकता और सामाजिक उत्थान—से जोड़ा जाए। तभी शिक्षा वास्तव में समाज परिवर्तन और मानव कल्याण का प्रभावी माध्यम बन सकेगी। विधिक सच को अब और दबाया नहीं जा सकता। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

यह भी पढ़ें

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

खबर शेयर कीजिए

Leave a Comment