फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर: उत्तर प्रदेश कब जागेगा? फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Tuesday, 21 July, 2026, 04:35:00 AM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर: उत्तर प्रदेश कब जागेगा? फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

— बृज खंडेलवाल

अपना एक छोटा-सा सुंदर घर होना हर आम और मध्यमवर्गीय इंसान का जीवन में सबसे बड़ा विधिक और भावनात्मक सपना होता है। लोग अपनी पूरी उम्र की गाढ़ी कमाई, भविष्य निधि (PF) का संचित पैसा, जीवन भर की बचत और बैंकों से भारी-भरकम कर्ज (Home Loan) लेकर एक अपार्टमेंट या सोसाइटी में फ्लैट खरीदते हैं। मन में एक ही उम्मीद और आश्वस्ति रहती है कि अब परिवार को एक सुरक्षित, आधुनिक और सुकून भरी ज़िंदगी हासिल होगी। मगर उत्तर प्रदेश के हजारों आवासीय अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक और कड़वी हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट की चाबियाँ मिलने और जीवन भर का कर्ज अपने सिर चढ़ाने के बाद भी लोगों को सुकून नहीं मिलता, बल्कि वे रोज़ की नई परेशानियों, आपसी झगड़ों, बुनियादी अव्यवस्थाओं और वर्षों लंबी चलने वाली खर्चीली कानूनी लड़ाइयों में विधिक रूप से उलझ कर रह जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट संस्कृति मुख्य रूप से शहरी इलाकों और विकासशील महानगरों की पहचान रही है, और अभी भी देश के कुल आवासों के अनुपात में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, भारत के बड़े शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में निवास करते हैं, जबकि Tier-2 और छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत दर्ज किया जाता है। समग्र राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो केवल 10 से 15 प्रतिशत परिवार ही बहुमंजिला इमारतों में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश आबादी, विशेषकर विशाल ग्रामीण क्षेत्रों में, आज भी स्वतंत्र मकानों में रहती है। परंतु तेज़ी से होता अनियंत्रित शहरीकरण, उपजाऊ ज़मीन की भारी कमी, एकल होते छोटे परिवार और आधुनिक नागरिक सुविधाओं की बढ़ती मांग इस फ्लैट संस्कृति को बहुत तेज़ी से बढ़ावा दे रही है। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैटों का निर्माण होता है, लेकिन विडंबना यह है कि देशभर में बने फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन आधिकारिक सरकारी आंकड़ा आज तक उपलब्ध नहीं है।

इसी बीच दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी नीतिगत पहल की है, जिससे उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों को भी तुरंत सबक लेना चाहिए। कर्नाटक सरकार ने ‘कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026’ का एक पारदर्शी मसौदा (Draft) तैयार किया है। इस प्रगतिशील कानून को अंतिम रूप देने से पहले राज्य भर की 500 से अधिक पंजीकृत अपार्टमेंट एसोसिएशनों और फ्लैट मालिकों के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत विधिक परामर्श किया गया। उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के समक्ष फ्लैट मालिकों ने स्पष्ट और दोटूक शब्दों में कहा कि उन्हें बिल्डरों की मनमानी से पूर्ण विधिक सुरक्षा, वित्तीय खातों में पूरी पारदर्शिता और रखरखाव के मामलों में जवाबदेही चाहिए। अब बुनियादी और सुलगता सवाल यह है कि देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश ऐसा कड़ा और जनहितैषी कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, पावन वृंदावन, राजधानी लखनऊ, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते प्रदेश के अन्य शहरों में आज लाखों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले आम नागरिक अक्सर एक साथ ‘तीन तरफ़ा दबाव’ झेलने को मजबूर हैं। एक ओर अनैतिक बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचकर पूरी रकम वसूलने के बाद अपनी नैतिक और विधिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर सोसाइटियों में गठित कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) हैं, जहाँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता की जगह कुछ रसूखदार लोगों का तानाशाही कब्ज़ा बना रहता है। वहीं तीसरी ओर हमारी निष्क्रिय सरकारी एजेंसियां और विकास प्राधिकरण (जैसे ADA, LDA, NOIDA) हैं, जो तब तक विधिक रूप से सक्रिय नहीं होतीं जब तक मामला किसी बड़ी अदालती अवमानना या सड़कों पर उग्र विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुँच जाता।

उत्तर प्रदेश की कई हाई-राइज सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव ही नहीं हुए हैं। वही पुराने लोग असंवैधानिक रूप से लगातार पदों पर काबिज रहते हैं। मेंटेनेंस चार्ज हर साल अपनी मर्जी से बढ़ा दिया जाता है, लेकिन उस भारी-भरकम राशि के खर्च का कोई लेखा-जोखा या बिल निवासियों के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जाता। स्वतंत्र सीए (CA) से ऑडिट या तो कराया ही नहीं जाता, या उसकी विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में साझा नहीं की जाती। नतीजतन, फ्लैट का आम निवासी यह तक नहीं जान पाता कि उसकी मेहनत की कमाई आखिर किस मद में और कहाँ उड़ाई जा रही है। मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती; कई अनैतिक बिल्डर आरडब्ल्यूए का विधिक गठन हो जाने के बाद भी कॉमन एरिया, पार्क, क्लब हाउस, कॉरपस मेंटेनेंस फंड (IFMS) और प्रोजेक्ट के महत्वपूर्ण विधिक दस्तावेज एसोसिएशन को सौंपने से साफ मुकर जाते हैं, जिससे निवासी सालों तक अधर में लटके रहते हैं।

दूसरी तरफ, बहुमंजिला इमारतों के घटिया निर्माण की गुणवत्ता भी एक भयानक और जानलेवा संकट बनी हुई है। नई इमारतों में भी पहली ही बारिश में छतें टपकने लगती हैं, गर्डरों और दीवारों में गहरी दरारें आ जाती हैं। घटिया पाइपलाइनों के फटने, लिफ्ट के अचानक गिर जाने, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग से होने वाले शॉर्ट सर्किट और अग्निशमन (Fire Safety) के अधूरे इंतजाम आए दिन निवासियों की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े करते हैं। शिकायत करने पर बिल्डर और प्रशासनिक अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लेते हैं। इसके अलावा, बिल्डरों द्वारा विज्ञापनों में दिखाया गया भव्य मंदिर या पूजा स्थल, स्विमिंग पूल, जिम, सुसज्जित क्लब हाउस और बच्चों का खेल का मैदान केवल ब्रॉशर के रंगीन पन्नों तक ही सीमित रह जाता है।

सोसाइटियों के भीतर पार्किंग को लेकर होने वाले खूनी विवाद भी अब आम बात बन चुके हैं। कई सोसाइटियों में बिल्डरों द्वारा नियम विरुद्ध तरीके से विजिटर पार्किंग (Visitor Parking) तक को व्यावसायिक रूप से बेच दिया जाता है, जिससे आए दिन गाड़ियों को खड़ा करने पर पड़ोसियों के बीच झगड़े और मुकदमेबाजी होती है। इन धांधलियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले सजग नागरिकों को आरडब्ल्यूए और बिल्डर गठजोड़ द्वारा मेंटेनेंस, पानी या लिफ्ट की सप्लाई काटकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। सबसे बड़ी कानूनी पेचीदगी यह है कि पुराने और बिखरे हुए नियमों के कारण बिल्डरों और आरडब्ल्यूए के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं, जिससे उपभोक्ता अदालतों और यूपी-रेरा (UP-RERA) में हजारों मामले सालों से धूल फांक रहे हैं।

अतः अब समय की मांग है कि उत्तर प्रदेश सरकार भी कर्नाटक की तर्ज पर एक सशक्त और व्यापक ‘उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन अधिनियम’ तत्काल प्रभाव से लागू करे। इस प्रस्तावित कानून के तहत हर सोसाइटी में समयबद्ध, ऑनलाइन और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य किए जाएँ। बिल्डर के लिए तय समय सीमा में कॉरपस फंड, मेंटेनेंस कॉर्पस और सभी कॉमन एरियाज का मालिकाना हक आरडब्ल्यूए को सौंपना विधिक रूप से बाध्यकारी हो। हर साल किसी थर्ड-पार्टी स्वतंत्र ऑडिटर से वित्तीय जांच कराकर रिपोर्ट निवासियों के लिए सार्वजनिक की जाए। साथ ही, रेरा और स्थानीय निकायों को यह अधिकार दिया जाए कि वे मनमानी करने वाले बिल्डरों और अवैध आरडब्ल्यूए पदाधिकारियों पर भारी वित्तीय जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान कर सकें। घर इंसान के लिए सुकून और शांति का आशियाना होना चाहिए, अदालतों और पुलिस थानों का चक्कर लगाने का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश सरकार जितनी जल्दी इस कड़वी हकीकत को समझेगी, उतनी ही जल्दी राज्य के लाखों परिवारों का जीवन सुरक्षित और सुगम हो सकेगा। सच से आंखें चुराना अब पूरी तरह बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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