प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो! सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं

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Article Desk, 🌐 tajnews.in | Wednesday, 15 July, 2026, 11:10:29 AM IST.

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Brij Khandelwal
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
आगरा के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने वर्ष 1972 में ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC, नई दिल्ली) से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘INDIA TODAY’, ‘इंडिया एब्रॉड’, और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘IANS’ सहित देश-विदेश के कई शीर्ष मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं। ‘ब्रज मंडल हेरिटेज कंवर्जेशन सोसाइटी’ के संस्थापक खंडेलवाल ने यमुना और ताजमहल संरक्षण पर दो ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी हैं।

प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो! सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं

— बृज खंडेलवाल

नेताओं और आला अफ़सरों से एक छोटी-सी गुज़ारिश है। एक दिन बिना किसी लालबत्ती, बिना सरकारी ठसके वाली गाड़ी और बिना किसी भारी-भरकम सुरक्षा घेरे के आगरा की ऐतिहासिक सड़कों पर पैदल चलकर दिखाइए। तब आपको विधिक रूप से धरातल पर मालूम होगा कि इस शहर में पैदल चलना अब कोई सामान्य सफ़र नहीं, बल्कि रोज़ का एक ख़तरनाक इम्तिहान बन चुका है। आगरा का कोई एक भी ऐसा इलाक़ा बता दीजिए, जहाँ एक आम आदमी बिना किसी खौफ़ के निडर होकर सिर्फ़ फुटपाथ पर सुगमता से चल सके। सूबे की सरकार तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे और ढांचागत गलियारे बनाने में व्यस्त है, लेकिन पैदल चलने वाले आम नागरिकों की रफ़्तार और उनकी सुरक्षा जैसे किसी भी स्तर पर प्रशासनिक और नीतिगत प्राथमिकता में शामिल ही नहीं रही। ताजमहल दुनिया की शान है, मगर शहर की असली नागरिक पहचान उसकी सड़कें होती हैं। और आगरा की सड़कें आज एक कड़वी हक़ीक़त बयान करती हैं: यह शहर अब पैदल चलने वालों का नहीं रहा।

फुटपाथ, जो मूलतः आम लोगों के सुरक्षित आवागमन के लिए विधिक रूप से बनाए गए थे, अब रसूखदार दुकानों के शो-रूम, अवैध ठेलों, बेतरतीब वाहनों की पार्किंग और अनियंत्रित अतिक्रमण की जागीर बन चुके हैं। कहीं व्यावसायिक सामान खुलेआम फैला है, कहीं पक्के शेड खड़े कर दिए गए हैं, तो कहीं मोटरसाइकिलें और कारें अवैध कब्ज़ा किए बैठी हैं। इसका सीधा और घातक नतीजा साफ़ है; पैदल चलने वाला बेबस आदमी मजबूरन मुख्य सड़क पर उतरता है और तेज़ रफ़्तार गाड़ियों के बीच मौत के साए में चलने को विवश हो जाता है। बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड, लोहामंडी, राजा मंडी, किनारी बाज़ार, सदर और शहर के दर्जनों व्यस्त इलाक़ों में रोज़ यही भयावह मंजर दिखाई देता है। कहीं फुटपाथ बुरी तरह टूटे पड़े हैं, कहीं वे पूरी तरह ग़ायब हो चुके हैं और जहाँ कतिपय विधिक सीमाओं में बचे भी हैं, वहाँ अनियंत्रित अतिक्रमण ने उनका दम पूरी तरह घोंट दिया है।

यह विडंबना सिर्फ़ नागरिकों की असुविधा का विषय नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का एक अत्यंत गंभीर विधिक संकट है। हाल ही में जारी “सेफ़ स्ट्रीट्स फ़ॉर आगरा” की एक स्वतंत्र रिपोर्ट बताती है कि शहर में होने वाले विभिन्न सड़क हादसों में कुल मौतों का ८८ प्रतिशत हिस्सा पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया वाहन चालकों जैसी सबसे कमज़ोर श्रेणी के लोगों का होता है। यानी जो इस यातायात व्यवस्था में सबसे कम सुरक्षित हैं, वही अपनी जान सबसे ज़्यादा गंवा रहे हैं। विधिक आंकड़ों पर गौर करें तो देशभर में हर साल तीस हज़ार से अधिक पैदल यात्री सड़क हादसों में अपनी जान गंवा देते हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश की कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा सिर्फ़ पैदल यात्रियों का है। आगरा में प्रशासनिक लापरवाही से टूटे फुटपाथ, खुले हुए गहरे मैनहोल, उखड़ी हुई टाइलें और बरसात के मौसम में पानी से लबालब छिपे हुए जानलेवा गड्ढे इस ख़तरे को कई गुना अधिक बढ़ा देते हैं।

इस अव्यवस्था से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ और पीड़ा हमारे बुज़ुर्गों, महिलाओं, मासूम बच्चों और दिव्यांग नागरिकों को उठानी पड़ती है। हर दिन कोई न कोई नागरिक संतुलन बिगड़ने से गिरता है, घायल होता है। छोटी चोटें लगना तो अब एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन बड़े और जानलेवा हादसे किसी भी दिन किसी के भी साथ घटित हो सकते हैं। इस ऐतिहासिक नगरी की विडम्बना देखिए; हर साल देश-विदेश से लाखों सैलानी और कूटनीतिक मेहमान आगरा आते हैं। वे इस ऐतिहासिक शहर की रूह को पैदल चलकर महसूस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भी अनियंत्रित ट्रैफ़िक के बीच अपनी जान हथेली पर रखकर सड़कों पर जूझना पड़ता है। विश्व धरोहर का यह वैश्विक शहर अगर पैदल यात्रियों के लिए इतना असुरक्षित है, तो यह हमारी शहरी नियोजन सोच और प्रशासनिक प्रणाली की बहुत बड़ी नाकामी है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में अपने एक युगांतकारी विधिक हस्तक्षेप में साफ़ कहा है कि स्वच्छ, सुरक्षित और पूरी तरह से बाधारहित फुटपाथ पर चलना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) के तहत देश के नागरिकों का एक बुनियादी मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पहला और विधिक हक़ पैदल चलने वालों का है, वाहनों का नहीं। मगर आगरा में यह संवैधानिक अधिकार हर दिन व्यवस्था के पहियों तले कुचला जा रहा है। आगरा नगर निगम को अब सिर्फ़ कागजी रंग-रोगन और दिखावटी सौंदर्यीकरण के सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा। फुटपाथों की तत्काल विधिक मरम्मत, खुले मैनहोलों को बंद करना, जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त करना और सख़्ती से स्थायी अतिक्रमण हटाना उसकी पहली विधिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। कोई भी दुकानदार या रसूखदार व्यक्ति सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर सकता। इसके साथ ही, रेहड़ी-पटरी वालों के लिए व्यवस्थित और विधिक ‘वेंडिंग ज़ोन’ बनाए जाएँ, ताकि उनका रोज़गार भी सुरक्षित रहे और पैदल यात्रियों का रास्ता भी अवरुद्ध न हो।

अब वक्त आ गया है कि जनभागीदारी के साथ “प्रिय आगरा, फुटपाथ वापस दो” अभियान को एक बड़े डिजिटल जन आंदोलन में बदला जाए। सजग नागरिक अपने मोबाइल से टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल और अवैध अतिक्रमण की लाइव तस्वीरें प्रशासन को भेजें। नगर निगम को एक तय समय-सीमा के भीतर विधिक कार्रवाई करने के लिए विवश किया जाए और हर सप्ताह इस पर की गई कार्रवाई की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो। इसके साथ ही स्थानीय अख़बार भी नागरिक शिकायतों को उठाने के लिए अपने पृष्ठों पर स्थायी कॉलम शुरू करें। जब तक विधिक जवाबदेही और प्रशासनिक कूटनीति तय नहीं होगी, तब तक कोई धरातलीय बदलाव नहीं आएगा। बेंगलुरु समेत देश के कई महानगरों ने सख़्ती से फुटपाथ अतिक्रमण हटाने की बेहतरीन विधिक शुरुआत कर दी है। आखिर आगरा का प्रशासनिक तंत्र कब जागेगा? या फिर हमारे हुक्मरान वाशिंगटन इरविंग की कहानी के ‘रिप वैन विंकल’ की तरह गहरी नींद में सोते ही रहेंगे?

किसी भी शहर की वास्तविक पहचान उसकी चौड़ी और कंक्रीट से बनी सड़कों से नहीं होती, बल्कि उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ एक मासूम बच्चा, एक लाचार बुज़ुर्ग, एक महिला, एक दिव्यांग और एक विदेशी पर्यटक कितनी बेफ़िक्री और सुरक्षा के साथ पैदल चल सकता है। आगरा प्रशासन ने अपने निर्जीव स्मारकों पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, अब समय की मांग है कि अपने जीवित नागरिकों की सुरक्षा पर भी कुछ विधिक निवेश कीजिए। हमें हमारे फुटपाथ हर हाल में वापस चाहिए, क्योंकि कोई भी शहर तभी सभ्य कहलाता है, जब सड़क पर चलने वाला सबसे कमज़ोर इंसान भी बिना किसी डर के सुरक्षित महसूस कर सके। ताजमहल की वैश्विक ख़ूबसूरती विधिक रूप से तभी मुकम्मल होगी, जब उसके शहर की सड़कें भी इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हों। सच से आंखें चुराना अब बंद होना चाहिए।

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Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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