संपादकीय संदर्भ: ‘परिसीमन’ का चक्रव्यूह, महिला आरक्षण और वैचारिक पाखंड
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ मुद्दे ऐसे रहे हैं, जो हर चुनाव में ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं, और चुनाव खत्म होते ही ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। ‘महिला आरक्षण’ (Women’s Reservation) एक ऐसा ही संवेदनशील और बहुचर्चित मुद्दा है। 2023 में जब संसद के दोनों सदनों ने भारी बहुमत से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन) पारित किया, तो ऐसा लगा मानो दशकों पुराना इंतज़ार खत्म हो गया हो। लेकिन राजनीति में जो सामने दिखता है, असल कहानी हमेशा उसके पीछे छिपी होती है। यह बिल पास तो हो गया, लेकिन इसके लागू होने को ‘जनगणना’ (Census) और ‘परिसीमन’ (Delimitation) जैसी जटिल और लंबी प्रक्रियाओं से जोड़ दिया गया। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि 2024 के आम चुनावों में देश की आधी आबादी को इस आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिल पाया।
असली खेल यहीं से शुरू होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण को ‘परिसीमन’ से जोड़ने की यह शर्त कोई तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘राजनीतिक चाल’ थी। परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा की सीटों की सीमाओं और संख्या का पुनर्निर्धारण करना। भारत में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 2001 में यह तय किया गया था कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक परिसीमन पर रोक (Freeze) रहेगी। यह रोक इसलिए लगाई गई थी ताकि परिवार नियोजन (Family Planning) और जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर शानदार काम करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल) को उनकी जागरूकता के लिए ‘दंडित’ न किया जा सके। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं, तो उत्तर भारत (विशेषकर यूपी और बिहार) में लोकसभा की सीटें भारी मात्रा में बढ़ जाएंगी, जिससे केंद्र की सत्ता का संतुलन पूरी तरह से उत्तर भारत की ओर झुक जाएगा।
हाल ही में 17 अप्रैल 2026 को संसद के एक विशेष सत्र में, जब सरकार ने ‘महिला आरक्षण’ को हथियार बनाकर 2011 की ‘पुरानी जनगणना’ के आधार पर परिसीमन लागू करने (लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने) की कोशिश की, तो विपक्ष ने इस दांव को समझ लिया और इसे सिरे से खारिज कर दिया। विपक्ष की मांग स्पष्ट थी: यदि सरकार की नीयत साफ़ है, तो वह परिसीमन की शर्त को हटाकर वर्तमान 543 सीटों में से ही 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित क्यों नहीं कर देती? लेकिन ऐसा करने का मतलब था वर्तमान पुरुष सांसदों के टिकट कटना, जो कि पितृसत्तात्मक राजनीतिक ढांचे को कतई मंज़ूर नहीं था। जब यह विधेयक गिर गया, तो सत्ताधारी दल ने ‘नारी वंदन’ के नाम पर विपक्ष को महिला विरोधी ठहराने का एक ज़बरदस्त मीडिया अभियान छेड़ दिया।
इसी मुद्दे पर ‘लोकजतन’ के संपादक और वामपंथी विचारक बादल सरोज जी ने अपना यह प्रखर आलेख लिखा है। बादल सरोज केवल वर्तमान ‘राजनीतिक ड्रामा’ तक सीमित नहीं रहते; वे इस पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के उस ऐतिहासिक वैचारिक आधार से जोड़ते हैं, जिसने हमेशा से ‘हिंदू कोड बिल’ (Hindu Code Bill) और महिलाओं के समान अधिकारों का विरोध किया है। वे सवाल उठाते हैं कि जिस पार्टी के सांसदों और विधायकों पर सबसे ज़्यादा यौन अपराधों के मामले दर्ज हैं, वह ‘नारी सम्मान’ का दावा कैसे कर सकती है? यह आलेख हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह ‘नारी वंदन’ है या फिर लोकतंत्र के संघीय ढांचे का एक सुनियोजित ‘एनकाउंटर’? पढ़िए वरिष्ठ विचारक बादल सरोज जी का यह 100% मूल और प्रामाणिक आलेख:
महिला आरक्षण की आड़ में लोकतंत्र के एन्काउंटर का खेल
(आलेख : राजेन्द्र शर्मा)
17 अप्रैल की शाम देश की लोकसभा ने एक खतरनाक साजिश को ठुकरा दिया। पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों के बीचों-बीच विशेष अधिवेशन बुलाकर मोदी सरकार ने 131वें संशोधन विधेयक को पारित कराने का जो नापाक मंसूबा साधा था, लोकसभा में समूचे विपक्ष ने एकजुट होकर उसे नाकाम कर दिया। यह विधेयक लोकसभा की सीटों के परिसीमन, मतलब संख्या बढाने, का था। इसके तहत लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 की जानी थी, जिसमें राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 सीटें होनी थीं। कोई 25 वर्ष पहले, इसी भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में किये गए 84वें संशोधन 2001 के अनुसार, परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद ही हो सकता था – मोदी सरकार उस रोक को हटाने का प्रावधान भी लेकर आ गयी। इतना भर नहीं, यह संशोधन खुद मोदी सरकार में तीन वर्ष पहले लोकसभा में सर्वसम्मति से पारित किये गए महिला आरक्षण वाले 106वें संशोधन 2023 के प्रावधान, जिसके अनुसार महिला आरक्षण नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होना था, नकार करता था。
कुल मिलाकर, सारी हड़बड़ी 2011 की जनगणना के आधार पर तुरंत ही परिसीमन कर देने की थी। इसके पीछे चिंता जन-प्रतिनिधित्व बढ़ाने की नहीं, पिछले लोकसभा चुनाव में बहुमत गंवाने से डरी भाजपा की सत्ता बचाने और इसके लिए अगले चुनाव से पहले ही लोकसभा को इस तरह बाँट कर साध लेने की थी कि हार की संभावनाएं कम से कम की जाए। सिर्फ जनसंख्या को आधार बनाकर सीटों की संख्या तय करने की कोशिश देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक निकाय का क्षेत्रीय संतुलन खत्म करने और उसके साथ संघ और भाजपा देश के जिस संघीय ढाँचे के हमेशा खिलाफ रहा है, उसको स्थायी रूप से कमजोर करने, लोकसभा और राज्यसभा की सीटों का अनुपात 2.2:1 से बदलकर 3.3:1 हो जाने से राज्यों की सभा को लगभग अप्रासंगिक बनाने की बदनीयत से भरी थी। इसके बड़े दूरगामी असर होने तय थे — विपक्ष ने इन्हें पहचाना और मोदी राज में पहली बार इकट्ठा होकर इस साजिश को असफल कर दिया। असल में यह भारत की अवधारणा को सुनिश्चित करने वाली उस संवैधानिक व्यवस्था को ध्वस्त करने की धूर्त कोशिश थी, जो भारत को राज्यों के संघ वाले गणराज्य के रूप में परिभाषित और स्थापित करती है।
अपनी इस कुटिलता पर पर्दा डालने के लिए पूरा कुनबा इसे महिला आरक्षण को रोका जाना बताकर नारी वंदन के घड़ियाली क्रंदन में सारी ताकत झोंके हुए है । इसकी तैयारी पहले ही की जा चुकी थी। शाम 7.40 पर लोकसभा में विधेयक नामंजूर हुआ, उसके 10 मिनट बाद सदन स्थगित हुआ और जब तक लोकसभा सदस्य सदन से बाहर निकलते, उससे पहले ही हाथों में छपे हुए पोस्टर्स और फैस्टून्स लेकर भाजपा की महिलायें संसद परिसर में ही प्रदर्शन करने खड़ी हो गयीं । तय बात है कि इन्हें पहले से ही लाकर बिठाया गया था। गर्मियों के मौसम में घर से बाहर निकलने तक में परहेज करने वाली भाजपा सांसद हेमा मालिनी शाम को ही विपक्ष के नेता के घर के बाहर नारे लगाने पहुँच गयीं। चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन और आकाशवाणी से ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ के नाम पर झूठ का गरल बहा दिया। गृहमंत्री अमित शाह ने सारी संसदीय गरिमाओं को ताक पर रखकर तड़ीपार की अपनी ख्याति को अमल में लाते हुए देश भर में विपक्ष के नेताओं का घेराव करने का आह्वान कर दिया。
सबसे चौंकाने वाली और खतरनाक भूमिका उस मीडिया की रही जिसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है और सच पहुंचाने की अपेक्षा की जाती है : छपाऊ और दिखाऊ दोनों तरह के मीडिया ने मोदी-शाह के सुर में सुर मिलाते हुए पूरी बेशर्मी के साथ यह जानते हुए भी कि इसका महिला आरक्षण क़ानून से कोई संबंध नहीं है, विपक्ष द्वारा उसे ख़त्म किये जाने का कोहराम मचाना शुरू कर दिया। खुद भाजपा के पैमाने से भी झूठ की यह प्रायोजित बौछार कुछ ज्यादा ही निर्लज्ज थी। इसके पीछे देश की जनता को मूर्ख और अज्ञानी समझने की समझदारी तो थी ही, एक झूठ को बार-बार बोलने से उसके सच हो जाने का मुगालता भी था。
ढीठता की अति यह है कि नारी वंदन के नाम पर घड़ियाली क्रंदन वह भाजपा कर रही है, जो विचार और व्यवहार में – मनसा, वाचा, कर्मणा – महिला विरोध से पगी हुई है। जिस समय उसके नेता महिलाओं के अधिकारों को लेकर संसद से राष्ट्र के नाम संबोधन तक घड़ियाली आंसू बहा रहे थे, ठीक उसी समय दिल्ली से ज़रा-सी दूरी पर मुज़फ्फरनगर में एक भाजपा नेता का बेटा राह चलती माँ और बेटी का एक साथ यौन उत्पीड़न करके अपने नेताओं के कहे के मर्म को उजागर कर रहा था। उसे मात्र डेढ़ घंटे में जमानत दिलवाकर योगी की सरकार उसका हौंसला बढ़ा रही थी। नारी सम्मान की बात मोदी और शाह की वह भाजपा कर रही थी, जिसके नवग्रहों में इस देश के सारे जघन्य उत्पीड़क पाए जाते हैं। अपनी ही छात्रा के साथ बलात्कार करने वाला चिन्मयानन्द इनकी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुका है। देश की महिला खिलाड़ियों के साथ अनेक बार यौन उत्पीड़न का आरोपी ब्रजभूषण शरण, बलात्कार और हत्याओं में सजायाफ्ता कुलदीप सेंगर इनके प्रिय नायकों में से एक है। महिलाओं के साथ जघन्य कारनामों की 2000 से अधिक विडियो सार्वजनिक होने के बाद भी खुद नरेंद्र मोदी प्रज्वल रेवन्ना को जिताने के लिए सभाएं करके वोट मांगते हैं। गोवा में 30 से अधिक नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार कर उनके विडियो बनाने वाला सोहम नायक भाजपा नेता का ही बेटा निकलता है। महाराष्ट्र के बलात्कारी अशोक खरात की जितनी भी तस्वीरें मिलती हैं, वे भाजपा के नेताओं, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों के साथ मिलती हैं। जिस महिला आयोग को पीड़ित महिलाओं का साथ देने के लिए गठित किया जाता है, राज्य के उस महिला आयोग की अध्यक्षा, भाजपा नेत्री खुद उसके जुर्मों में लिप्त पायी जाती हैं। अंकिता भंडारी को इन्साफ दिलाने के लिए पूरा उत्तराखंड सडकों पर है और उसके साथ बलात्कार करके हत्या के आरोपी को बचाने के लिए पूरी भाजपा उसकी ढाल, कवच और तलवार बनी हुई है। आसाराम से गुरमीत राम रहीम तक को यह अपना ब्रांड एम्बेसेडर बनाये हुए है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण और दिए जा सकते हैं – अटलजी के रूपक में कहें तो, भले हर भाजपाई बलात्कारी न हो, मगर ज्यादातर बलात्कारी भाजपाई कुनबे के जरूर निकलते हैं。
ऐसा नहीं कि यह सिर्फ नीचे या बीच के भाजपाईयों तक ही सीमित हो। संसद में परिसीमन विधेयक की नामंजूरी को महिलाओं के खिलाफ बताने की मुहिम मोदी और शाह की वह पार्टी कर रही है, जिसके सांसदों और विधायकों में बलात्कारियों और यौन अपराधियों की तादाद सबसे अधिक है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की अगस्त 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी के सबसे अधिक मौजूदा सांसद और विधायक महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे अपराध के मामलों का सामना कर रहे हैं। इनकी संख्या 54 है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के 5 सांसद, विधायक ऐसे हैं, जिन पर सीधे तौर पर बलात्कार की धारा 376 के आरोप हैं। यही सांसद 17 अप्रैल को लोकसभा में नारी उद्धार के नारे लगा-लगाकर अपना गला बिठाए हुए थे और अब पूरे देश में नारी वंदन के लिए भीड़ जुटा रहे हैं। अभी बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए भरे गए नामांकनों में भी भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा इसी तरह का है। पहले चरण में भाजपा ने जो 152 उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें से 106 यानी 70% ने अपने ऊपर लगे आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। इनमे से भी 96 यानी 63% ऐसे हैं, जिन पर गंभीर मामले दर्ज हैं । जिसका ऐसा कलंकित ट्रैक रिकॉर्ड है, वह पार्टी देश भर में नारी के सम्मान की बात करती घूमे, इससे ज्यादा निर्लज्ज पाखंड कोई और नहीं हो सकता。
यह सिर्फ व्यवहार का मामला नहीं है, महिला विरोध और नारी बहिष्करण कुनबे का वैचारिक आधार है। भारत की महिलाओं को सदियों पुरानी बेड़ियों से मुक्त कराने के कानून बनाने की शुरुआत आजादी के बाद क़ानून मंत्री के रूप में डॉ. अम्बेडकर द्वारा रखे गये हिदू कोड बिल के मसौदे के साथ हुई थी। इस मसौदे में महिलाओं और लड़कियों को साझा संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार, बेटी को वारिस मानने और विधवाओं को संपत्ति का अधिकार देने का प्रावधान किया था। तलाक के अधिकार के अलावा इसमें अंतर्जातीय विवाह का अधिकार और उसे प्रोत्साहन देने की बात थी तथा हिन्दू पुरुषों के एक से अधिक विवाह करने पर रोक लगाने की व्यवस्था थी। भाजपा का मात-पिता संगठन और हिन्दू महासभा देश के वे अकेले संगठन थे, जिन्होंने इस हिन्दू कोड बिल के खिलाफ आन्दोलन किये। आरएसएस ने तो इसके खिलाफ “धार्मिक युद्ध” का ही एलान कर दिया, इसे ‘हिन्दू समाज पर एटम बम’ बताया और 11 दिसम्बर 1949 को रामलीला मैदान में एक आमसभा करके डॉ. अम्बेडकर और नेहरू का पुतला जलाया। देश भर में इन ‘हिन्दू विरोधियों’ के पुतले फूंके जाने का ऐलान भी किया गया। इसी संघ द्वारा बनाए गए जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि “अम्बेडकर का हिन्दू कोड बिल हिन्दू राष्ट्रवादियों को इसलिए स्वीकार नहीं है, क्योंकि इसमें महिलाओं को ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिनसे शादी विवाह की परम्पराओं को ख़तरा उत्पन्न होता है ; यदि ऐसा हुआ तो परिवार और समाज की स्थिरता खत्म हो जायेगी।“
आरएसएस जिन्हें अपना परम पूज्यनीय गुरु मानता है, उन गोलवलकर के शब्दों में “एक निरपराध स्त्री का वध पापपूर्ण है, परन्तु यह सिद्धांत राक्षसी के लिए लागू नहीं होता। “ — राक्षसी कौन? राक्षसी वह, जो मनु परम्परा को न माने। वे एक कहानी सुनाते थे, जिसमें शादी के लिए अपने परिवार को राजी करने में असफल प्रेमी अपनी प्रेमिका का गला घोंट कर मार देता है और उसे तनिक भी पीड़ा नहीं होती। इन गुरूजी ने स्थापना दी थी कि ‘महिलायें मुख्य रूप से माँ है उनका काम बच्चों को जन्म देना, पालना-पोसना, संस्कार देना है। इसके अलावा कुछ नहीं।” यह राय सिर्फ गोलवलकर की नहीं हैं, यह उनकी आधिकारिक नीति है, जिसे उनके बाद बने सभी सरसंघचालकों ने बार-बार दोहराया है। वर्तमान संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत हर नियमित अंतराल के बाद कभी ‘शादी एक कॉन्ट्रैक्ट है, जिसमे पत्नी का काम घर की देखभाल और पति की सेवा करना है, पति का काम उसे सुरक्षा देना और उसका भरण पोषण करना है’ कहकर कभी बलात्कार को ‘इंडिया’ में ज्यादा ‘भारत’ में कम होने वाली घटनाएं बताकर’ और कभी ‘महिलाओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने’ की हिदायतें देकर दोहराते रहते हैं ।
संघ और भाजपा, मोदी और शाह जिन्हें वीर और आराध्य मानते हैं, वे विनायक दामोदर सावरकर भारत की वह अकेली शख्सियत हैं, जो बलात्कार को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का आह्वान करते हैं। बलात्कार का राजनीतिक इस्तेमाल न करने के लिए वे शिवाजी तक को नहीं बख्शते। अपनी पुस्तक “भारतीय इतिहास के छः गौरवशाली युग” में उन्होंने शिवाजी द्वारा पराजित मुस्लिम शासकों की महिलाओं को सम्मान के साथ वापस भेजने की नीति की आलोचना करते हुए उसे “महिलाओं के प्रति आत्मघाती हिंदू उदारता” बताया。
जिस संघ में स्त्री को शामिल होने तक की इजाजत नहीं है, उसी संघ की फ़ौज देश भर में नारी वंदन का कोहराम मचाये हुए हैं। एक अलग संगठन के रूप में जो राष्ट्र सेविका समिति 1936 में बनाई, वह भी मनु की स्त्री विरोधी धारणाओं की प्रचारक बनी। उसकी नेता सीता अन्नदानम ने सार्वजनिक बयान देकर कहा था कि : ‘पिता की संपत्ति में हिस्सा हमारी संस्कृति नहीं है। शास्त्रों में जिस तरह लिखा है, वैसा ही किया जाना चाहिए — वैवाहिक बलात्कार नाम की कोई चीज नहीं होती — यह पाश्चात्य धारणा है। समता, बराबरी, लोकतंत्र सब पाश्चात्य धारणा है।‘ भोपाल से भाजपा की सांसद रही ‘साध्वी’ प्रज्ञा ने तो अपनी मर्जी से विवाह करने वाली लड़कियों की टांग तोड़ने का ही अभियान छेड़ दिया था。
भाजपा और संघ का आदर्श ग्रंथ मनुस्मृति है, जिसे भारत के संविधान की जगह प्राण प्रतिष्ठित करने के लिए वह कटिबद्ध है। यह वह ग्रन्थ है, जो पूरे विस्तार के साथ महिलाओं की स्थिति के बारे में नियम निर्धारित करता है।इसके अध्याय नौ में 300 से ज्यादा श्लोक हैं, जिनमें महिलाओं के साथ किए जाने वाले बर्ताव के बारे में विस्तार से कुछ ज्यादा ही वीभत्स प्रावधान किए गए हैं। इनमे से एक श्लोक कहता है कि ‘सभी जातियों में इस कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए कि पत्नियों और महिलाओं पर चौकसी रखी जाये।‘ एक और श्लोक में कहा गया है कि ‘ईश्वर ने महिला को बनाते वक्त उसमें जिस तरह की मनोवृत्ति जोड़ी थी, उस को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि पुरुष पूरे ध्यान से उन पर निगरानी रखें।‘ इन्हें समय-समय पर लागू भी किया गया। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर एक ख़ास इंतजाम का एलान किया गया था। इसके अनुसार, मध्यप्रदेश में जो भी महिलायें नौकरी या काम पर जाएगी, उन्हें अपने पुलिस थाने में अपना पंजीयन कराना होगा, ताकि पुलिस उन्हें ट्रैक कर सके, मतलब उन पर निगरानी रखी जा सके। कामकाजी महिलाओं से शुरू किये गए इस इंतजाम में बाद में सभी लड़कियों, कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राओं और घर से बाहर निकलने वाली बाकी की महिलाओं को भी निगरानी के दायरे में लिया जाना है。
इस तरह की सोच का ही नतीजा है कि पूरे 12 सालों के राज में मोदी सरकार कथित सम्मान हत्याओं – ऑनर किलिंग – के खिलाफ कोई कानून नहीं लाई। उसे लगता है कि इतने सब के बावजूद वह परिसीमन क़ानून को महिला आरक्षण क़ानून बताकर देश की जनता को झांसा देने में सफल हो जायेगी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अभी फकत तीन दिन गुजरे हैं और इस झूठ के गुब्बारे की हवा निकल चुकी हैं। भक्तों के ब्रह्मा झाल मूड़ी के खोमचे पर खड़े पाए जाने लगे हैं। उम्मीद है, जल्द ही जनता उन्हें और तिक्खट झाल की झरप का स्वाद चखाएगी ।
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)
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