नारीवाद के नाम पर नौटंकी या इंसाफ़ की पुकार: आधी आबादी की आज़ादी या आधी दुनिया से दुश्मनी?
🌐 tajnews.in | शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026, 05:45:00 PM IST.


हक़ की लड़ाई या रिश्तों की तबाही? नारीवाद के नाम पर नौटंकी या इंसाफ़ की पुकार? बराबरी चाहिए, बदला नहीं!
एक कचौरी, दो समोसे, मर्दों का क्या भरोसा!
एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय!
एक जीरा, दो अजवाइन, मर्द समाज इस्तीफा दे!
आलू लो, पूरी लो, मर्द जात से दूरी लो!
चाय गरम, दूध गरम, मर्द जात बेशरम!
हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!
मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!
शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में?
दो कबाब, एक बिरयानी, हर मर्द की अलग कहानी!
एक पराठा, एक अचार, मर्द समाज बेकार!
वाह! क्या क्रांति है! कचौरी से शुरू होकर बिरयानी पर खत्म! अगर यही नारी मुक्ति का नया घोषणापत्र है, तो इंसाफ़ की अदालत में समोसे तलने की तैयारी कर लीजिए।
सवाल यह नहीं कि औरतें नारे क्यों लगा रही हैं। सवाल यह है कि बराबरी की लड़ाई में पूरे वर्ग को कटघरे में खड़ा करना कहाँ तक जायज़ है?
बराबरी चाहिए, बदला नहीं। अधिकार चाहिए, मगर जिम्मेदारी से मुँह मोड़कर नहीं।
ज़रा एक तस्वीर देखिए। रात के तीन बजे हैं। घर के दरवाज़े पर पुलिस दस्तक देती है। सत्तर साल के बुज़ुर्ग ससुर दिल के मरीज़ हैं। सास के हाथ काँप रहे हैं। तभी शादीशुदा ननद का फोन आता है। उसे पता चलता है कि उसके खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हो गया है।
जिस परिवार ने बरसों में इज़्ज़त कमाई, उसकी साख एक झटके में मिट्टी में मिल जाती है। पड़ोसी कानाफूसी करने लगते हैं। रिश्तेदार फोन उठाना बंद कर देते हैं। अदालत के चक्कर शुरू होते हैं। पैसा, वक्त और सुकून, सबकी बलि चढ़ने लगती है।
यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि वैवाहिक विवादों में सामने आने वाली कुछ शिकायतों की तस्वीर है। नारीवाद का मकसद औरत को बराबरी, सम्मान, सुरक्षा और अपने फैसले लेने की आज़ादी देना है। इस बुनियादी हक़ पर किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन आज़ादी का मतलब मनमानी हो जाए और सशक्तिकरण के नाम पर किसी को बेइज़्ज़त करना जायज़ मान लिया जाए, तो सवाल उठेंगे ही।
आखिर बराबरी का मतलब क्या है? अपने अधिकारों की सूची याद रखना और अपने फ़र्ज़ का पन्ना फाड़ देना? इंसाफ़ का तकाज़ा है कि हक़ भी मिले और जिम्मेदारी भी निभाई जाए।
घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के खिलाफ कानून महिलाओं के लिए जरूरी सुरक्षा कवच हैं। इन कानूनों ने अनेक पीड़ित महिलाओं को इंसाफ़ पाने का रास्ता दिया है। मगर किसी भी कानून के दुरुपयोग की आशंका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत पति और उसके रिश्तेदारों पर क्रूरता के आरोपों से जुड़े मामले दर्ज होते थे। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86 इस विषय से संबंधित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में गिरफ्तारी को लेकर अहम निर्देश दिए थे। अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपने आप नहीं होनी चाहिए। कानून की शर्तों और जरूरी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
कुछ वैवाहिक विवादों में पति के साथ सास-ससुर, भाई-बहन और दूसरे रिश्तेदार भी आरोपों के घेरे में आ जाते हैं। अदालतों ने कई मामलों में बेवजह रिश्तेदारों को घसीटने पर चिंता जताई है।
आजकल सड़क, मेट्रो और कॉलेजों में होने वाले झगड़ों के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब घूमते हैं। कहीं थप्पड़ बरस रहे हैं, कहीं चप्पल चल रही है। फिर वीडियो वायरल होता है और कमेंटों की अदालत सज जाती है।
क्या किसी को थप्पड़ मार देना आज़ादी का प्रमाणपत्र है? क्या दूसरे को अपमानित करना अपने अधिकारों का इस्तेमाल है?
अगर पुरुष हाथ उठाए, तो उसे हिंसा कहते हैं। महिला हाथ उठाए, तो क्या उसे बहादुरी का तमगा मिलना चाहिए?
बराबरी का मतलब यह नहीं कि महिलाओं को भी वही गलतियाँ करने की छूट मिले, जिनके लिए पुरुषों की आलोचना होती है।
तलाक और वैवाहिक विवादों में गुज़ारा भत्ता अक्सर बहस का बड़ा मुद्दा बन जाता है। अदालतें पति-पत्नी की आमदनी, जरूरतों, संपत्ति और दूसरी परिस्थितियों पर विचार करती हैं।
लेकिन जब किसी पक्ष को लगता है कि उसकी आर्थिक हालत का सही आकलन नहीं हुआ, तो नाराजगी बढ़ती है। पति को डर रहता है कि उसकी जिंदगी भर की कमाई और भविष्य की बचत खत्म हो जाएगी। पत्नी को चिंता होती है कि अलग होने के बाद उसका और बच्चों का खर्च कैसे चलेगा।
दोनों की चिंताएँ वास्तविक हो सकती हैं। इसलिए फैसला किसी एक पक्ष की कहानी सुनकर नहीं होना चाहिए। पत्नी की आमदनी और जरूरतें देखी जाएँ। पति की कमाई, जिम्मेदारियाँ और भुगतान की क्षमता भी परखी जाए।
गुज़ारा भत्ता न किसी को सजा देने का तरीका है, न जरूरतमंद को बेसहारा छोड़ने का बहाना। मकसद होना चाहिए कि अलग होने के बाद भी दोनों पक्ष सम्मान से जी सकें।
आखिर माता-पिता की लड़ाई में बच्चों का क्या कसूर?
मीटू (Me Too) आंदोलन ने यौन उत्पीड़न झेलने वाली अनेक महिलाओं को अपनी बात कहने का हौसला दिया। जिन मामलों में पीड़िताएँ डर, दबाव या बदनामी के कारण चुप रहती थीं, वहाँ इस आंदोलन ने बहस को नई दिशा दी।
यह उसकी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन सोशल मीडिया पर किसी पर आरोप लगते ही उसे दोषी मान लेना भी खतरनाक है। कुछ मामलों में आरोपों को लेकर विवाद सामने आए हैं। इसलिए हर शिकायत की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए।
किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, नौकरी और परिवार दाँव पर लग सकते हैं। आरोप सही हों, तो कार्रवाई होनी चाहिए। आरोप गलत साबित हों, तो कानून के मुताबिक राहत का रास्ता भी खुला रहना चाहिए।
सोशल मीडिया की अदालत में फैसला सुनाना आसान है। लेकिन वहाँ न गवाहों की पूरी जाँच होती है, न बचाव का मुकम्मल मौका मिलता है। वायरल पोस्ट से किसी की जिंदगी पर मुहर लगा देना इंसाफ़ नहीं है।
पति-पत्नी के झगड़े में सबसे ज्यादा चोट बच्चों को लगती है। कभी उन्हें माँ और पिता के बीच चुनाव करने को मजबूर किया जाता है। कभी मिलने-जुलने पर रोक लगती है। कभी बच्चे को दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने का जरिया बना दिया जाता है।
यह कैसी जीत है, जिसमें बच्चे का बचपन हार जाए?
आधुनिक जीवन में निजी आज़ादी और आत्मनिर्भरता की अहमियत बढ़ी है। मगर परिवार में जिम्मेदारी और आपसी सहयोग भी जरूरी हैं।
परंपरा के नाम पर महिलाओं को दबाना गलत है। आज़ादी के नाम पर हर रिश्ते को बोझ समझ लेना भी समझदारी नहीं है। रिश्ते तभी टिकते हैं, जब उनमें सम्मान, संवाद और जिम्मेदारी हो।
कर्नाटक की सेवानिवृत्त स्कूल प्रिंसिपल शोभा कहती हैं, “घरेलू हिंसा की असली शिकायतों को हल्के में लेना उतना ही गलत है। जिस महिला पर जुल्म हुआ है, उसे इंसाफ़ जरूर मिलना चाहिए। लेकिन हर आरोप की निष्पक्ष जाँच भी जरूरी है। महिला आयोगों और अदालतों का काम न्याय दिलाना है, किसी एक पक्ष को आँख मूँदकर सही ठहराना नहीं।”
समाजसेवी पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पश्चिम की नकल करना आधुनिकता की शर्त नहीं है। “औरत की आज़ादी सिर्फ कपड़े पहनने, खानपान या शादी का फैसला करने तक सीमित नहीं है। पढ़ाई, नौकरी, आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपनी पसंद की जिंदगी जीना भी उसका बुनियादी हक़ है। किसी दूसरे धर्म या समुदाय में शादी करने से कोई महिला संस्कारहीन नहीं हो जाती। असली कसौटी उसका किरदार, ईमानदारी और दूसरों के प्रति सम्मान है।”
उनकी बात में एक जरूरी सवाल छिपा है। हम महिलाओं की आज़ादी को आखिर किस तराजू पर तौलते हैं? कपड़ों से, खानपान से, शादी से या उनके हुनर, आत्मसम्मान और फैसले लेने की ताकत से?
पब्लिक कमेंटेटर प्रोफेसर पारसनाथ चौधरी कहते हैं, “दिक्कत नारीवाद में नहीं है। दिक्कत उस सोच में है, जो उसके नाम पर हिंसा, बेइज़्ज़ती, झूठे इल्ज़ाम और गैर-जिम्मेदारी को सही ठहराती है। इसी तरह, परंपरा बचाने के नाम पर महिलाओं की आज़ादी कुचलना भी गलत है।”
सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता का मानना है कि समाज को न अंधा नारीवाद चाहिए, न अंधी मर्दाना हुकूमत। उसे चाहिए बराबरी का हक़, आपसी इज़्ज़त और साझा जिम्मेदारी।
बात बिल्कुल सीधी है। मर्दों की हर गलती का ठीकरा पूरी मर्द जात पर फोड़ना कहाँ का इंसाफ़ है? और महिलाओं के हर आरोप को शक की निगाह से देखना भी कौन-सी समझदारी है?
नारीवाद का मतलब मर्दों से नफरत करना नहीं है। इसका मकसद उस व्यवस्था को बदलना है, जिसमें किसी महिला को सिर्फ महिला होने के कारण कमतर समझा जाता है। उसी तरह, पुरुष होने का मतलब किसी को दबाने का लाइसेंस नहीं है।
संस्कार भाषणों से नहीं, आचरण से झलकते हैं। इंसाफ़ का तराजू तभी संतुलित रहेगा, जब शिकायत की सुनवाई गंभीरता से हो, जाँच निष्पक्ष हो और दोष साबित होने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
औरत को दबाना भी गलत है, मर्द को बिना सुने दोषी ठहराना भी।
कचौरी, समोसे और बिरयानी वाले नारे कुछ देर हँसा सकते हैं। मगर बराबरी की लड़ाई को ठोस मुद्दों, बेहतर कानून और जिम्मेदार व्यवहार की जरूरत है।
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