गरीबों का इलाज करने वाला डॉक्टर जेल में, आदिवासियों की आवाज कौन सुनेगा?

ओडिशा के कालाहांडी में डॉ. रैंडल सिकेरा की गिरफ्तारी ने स्वास्थ्य सेवा, आदिवासी अधिकारों, बॉक्साइट खनन और राज्य की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं

🌐 tajnews.in | गुरुवार, 29 अक्टूबर, 2026, 04:55 PM IST

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संपादकीय डेस्क
Pawan Singh

पवन सिंह

लेखक

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक। जमीनी सरोकार, प्रशासनिक पारदर्शिता, जन-अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े विषयों पर नियमित संपादकीय लेखन।

गरीबों का इलाज करने वाला डॉक्टर जेल में, आदिवासियों की आवाज कौन सुनेगा?

पवन सिंह | 29 अक्टूबर 2026

ओडिशा के कालाहांडी में डॉ. रैंडल सिकेरा की गिरफ्तारी ने स्वास्थ्य सेवा, आदिवासी अधिकारों, बॉक्साइट खनन और राज्य की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला केवल एक डॉक्टर का नहीं, बल्कि विकास की उस परिभाषा का भी है जिसमें स्थानीय लोगों की जमीन, जंगल और जीवन की चिंताओं को बराबर जगह मिलनी चाहिए।

किसी डॉक्टर की पहचान उसके अस्पताल, उसकी फीस या उसके मरीजों की आर्थिक हैसियत से नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह उन लोगों तक पहुँचता है या नहीं जिन्हें इलाज की सबसे अधिक जरूरत है। ओडिशा के कालाहांडी में काम करने वाले डॉ. रैंडल सिकेरा ने चिकित्सा के पेशे को इसी नजरिए से देखने का रास्ता चुना। मुंबई में पले-बढ़े, बेंगलुरु से एमबीबीएस और जयपुर से मेडिसिन में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने 2017 में कालाहांडी के आदिवासी बहुल इलाके में काम शुरू किया।

HIGHLIGHTS
  • स्वास्थ्य सेवा और जन-अधिकार: कालाहांडी के सुदूर आदिवासी अंचलों में निस्वार्थ चिकित्सा सेवा दे रहे डॉ. रैंडल सिकेरा की गिरफ्तारी से उपजे गंभीर वैधानिक व नैतिक सवाल।
  • बॉक्साइट खनन बनाम जल-जंगल-जमीन: सिजिमाली और कुटरुमाली पहाड़ियों में बड़े औद्योगिक घरानों की परियोजनाओं और विस्थापन की आशंकाओं के बीच स्थानीय आदिवासियों का संघर्ष।
  • पुलिस कार्रवाई और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता: अप्रैल की झड़प में शुरुआती नाम न होने के बाद हुई गिरफ्तारी पर कानूनी पारदर्शिता और साक्ष्यों के न्यायिक परीक्षण की दरकार।
  • लोकतंत्र में असहमति का सम्मान: विकास के दावों के साथ-साथ शांतिपूर्ण जन-आंदोलन, नागरिक अधिकारों और कमजोर तबकों की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व।

उनके काम के बारे में प्रकाशित रिपोर्टें बताती हैं कि वह दूरदराज के गाँवों में स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने, गर्भवती महिलाओं और कुपोषित बच्चों के लिए स्वास्थ्य शिविर लगाने तथा स्थानीय समुदायों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को समझने में लगे रहे। लेकिन उनकी सार्वजनिक भूमिका केवल इलाज तक सीमित नहीं रही। वह उन आदिवासी समुदायों के साथ भी खड़े दिखाई दिए जो अपनी पहाड़ियों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं।

16 अक्टूबर 2026 की रात डॉ. सिकेरा और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता लक्ष्मण नायक की गिरफ्तारी ने इस पूरे संघर्ष को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। पुलिस ने दोनों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। नागरिक अधिकार समूहों और उनके समर्थकों ने गिरफ्तारी की परिस्थितियों तथा खनन-विरोधी आंदोलन पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं।

अब जरूरी है कि भावनाओं और राजनीतिक दावों से आगे बढ़कर इस मामले को उसके व्यापक संदर्भ में समझा जाए।

खनन का सवाल केवल खनिज का सवाल नहीं

ओडिशा के दक्षिणी हिस्से में स्थित सिजिमाली और कुटरुमाली की पहाड़ियाँ बॉक्साइट के भंडार के लिए जानी जाती हैं। इन क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं को लेकर वर्षों से विरोध और तनाव की स्थिति बनी हुई है। सिजिमाली परियोजना वेदांता से जुड़ी है, जबकि कुटरुमाली ब्लॉक के लिए अडानी समूह से जुड़ी कंपनी को पसंदीदा बोलीदाता घोषित किए जाने की खबरें आई हैं।

खनिज संसाधनों का उपयोग किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था, उद्योग और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। देश को कच्चे माल की जरूरत है और सरकारों को विकास संबंधी फैसले भी लेने होते हैं। लेकिन किसी क्षेत्र में खनिज उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं कि वहाँ रहने वाले लोगों की चिंताएँ अपने आप गौण हो जाएँ।

आदिवासी समुदायों के लिए पहाड़ केवल खनिज का भंडार नहीं होते। जंगल, जलस्रोत, खेती, वन उपज, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ और सामुदायिक जीवन उसी भूगोल से जुड़े होते हैं। यदि किसी परियोजना से इन संसाधनों या आजीविका पर असर पड़ने की आशंका है, तो स्थानीय लोगों की आपत्तियों को महज विकास-विरोधी कहकर खारिज करना पर्याप्त जवाब नहीं है।

दूसरी ओर, हर खनन परियोजना के बारे में निष्कर्ष केवल आशंकाओं के आधार पर भी नहीं निकाला जा सकता। उसके पर्यावरणीय प्रभाव, भूमि अधिकार, पुनर्वास, रोजगार, स्थानीय सहमति और लागू कानूनी मंजूरियों की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। विकास की वैधता का आकलन केवल निवेश या उत्पादन से नहीं, बल्कि उससे प्रभावित लोगों के अधिकारों और वास्तविक लाभ-हानि से भी होना चाहिए।

डॉक्टर की गिरफ्तारी और पुलिस का पक्ष

पुलिस का कहना है कि डॉ. सिकेरा और लक्ष्मण नायक को अप्रैल 2026 में कांटामाल गाँव में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़प से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया। अधिकारियों के अनुसार, दोनों पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं और उनकी भूमिका की जाँच की गई है। पुलिस ने यह आरोप भी लगाया है कि उन्होंने लोगों को राज्य सरकार के खिलाफ भड़काने का काम किया।

इन आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा भड़काने या दूसरे गंभीर अपराध में शामिल होने के प्रमाण हैं, तो कानून के तहत जाँच और न्यायिक प्रक्रिया होनी चाहिए। किसी व्यक्ति का डॉक्टर, सामाजिक कार्यकर्ता या आदिवासी अधिकारों का समर्थक होना उसे कानून से ऊपर नहीं रखता।

लेकिन यही सिद्धांत दूसरी दिशा में भी लागू होता है। किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर धाराएँ लगा देना अपने आप में उसके अपराध का प्रमाण नहीं है। आरोपों की जाँच निष्पक्ष होनी चाहिए, साक्ष्य अदालत के सामने आने चाहिए और आरोपी को अपना बचाव करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल की झड़प से संबंधित शुरुआती एफआईआर में डॉ. सिकेरा का नाम नहीं था और पुलिस ने बाद में जाँच के दौरान उनकी भूमिका सामने आने की बात कही। यह तथ्य अपने आप में न तो उन्हें निर्दोष साबित करता है, न दोषी। लेकिन यह सवाल जरूर उठाता है कि जाँच में उनकी कथित भूमिका किस सामग्री के आधार पर स्थापित की गई और उस सामग्री का न्यायिक परीक्षण कैसे होगा।

इसी तरह, गिरफ्तारी की परिस्थितियों, परिवार और वकील से संपर्क तथा हिरासत की प्रक्रिया को लेकर लगाए गए आरोपों की भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। यदि प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता हुई है, तो उसका जवाब कानून के अनुसार तय होना चाहिए।

न्याय का अर्थ केवल अपराध की जाँच करना नहीं, बल्कि जाँच करने की प्रक्रिया को भी कानून के दायरे में रखना है।

जब स्वास्थ्य सेवा और जन-अधिकार एक-दूसरे से जुड़ते हैं

डॉ. सिकेरा के मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनका काम उन इलाकों में रहा है जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच आसान नहीं है। जब डॉक्टर दूरदराज के गाँवों में जाकर लोगों का इलाज करता है, पोषण और मातृ स्वास्थ्य पर काम करता है और स्थानीय समस्याओं को समझता है, तो उसका संबंध समुदाय से केवल चिकित्सकीय नहीं रह जाता।

लेकिन किसी डॉक्टर का सामाजिक या सार्वजनिक मुद्दों पर राय रखना भी अपने आप में अपराध नहीं है। लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने, संगठित होने और सार्वजनिक नीतियों पर सवाल उठाने का अधिकार है। यह अधिकार संविधान और कानून के अधीन है; हिंसा या दूसरे अपराधों के आरोपों की जाँच भी उसी कानूनी व्यवस्था के तहत होनी चाहिए।

जुलाई 2025 में ओडिशा हाईकोर्ट ने डॉ. सिकेरा को रायगड़ा जिले में प्रवेश से रोकने वाला प्रशासनिक आदेश रद्द कर दिया था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने के उनके अधिकार की रक्षा करने का निर्देश दिया था। यह फैसला मौजूदा आपराधिक मामले का निर्णय नहीं है, लेकिन यह याद दिलाता है कि प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग भी कानूनी कसौटी पर परखा जा सकता है।

शांतिपूर्ण असहमति और हिंसक गतिविधि के बीच स्पष्ट अंतर करना राज्य की जिम्मेदारी है। यदि दोनों को एक ही नजर से देखा जाने लगे, तो वैध जन-आंदोलन और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच जरूरी लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर पड़ सकता है।

विकास की कीमत कौन चुकाता है?

खनन परियोजनाओं के समर्थन में अक्सर निवेश, रोजगार, औद्योगिक उत्पादन और राजस्व की दलीलें दी जाती हैं। ये सभी महत्वपूर्ण पहलू हैं। लेकिन परियोजना से प्रभावित गाँवों में रहने वाले परिवारों के लिए सवाल अलग भी हो सकते हैं: क्या उनके जलस्रोत सुरक्षित रहेंगे? क्या खेती और वन उपज पर असर पड़ेगा? क्या विस्थापन की स्थिति में पर्याप्त पुनर्वास होगा? क्या स्थानीय लोगों को परियोजना के लाभों में उचित हिस्सा मिलेगा? और क्या निर्णय लेने से पहले उनकी बात प्रभावी ढंग से सुनी गई?

इन प्रश्नों का उत्तर दस्तावेजों, पर्यावरणीय आकलन, लागू कानूनों, ग्रामसभा की भूमिका और परियोजना की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर दिया जाना चाहिए। न कंपनियों के वादे अपने आप में अंतिम प्रमाण हैं, न विरोध करने वालों की हर आशंका स्वतः सिद्ध तथ्य है।

यही कारण है कि खनन से जुड़े विवादों में पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। यदि परियोजना कानून के अनुसार है और उससे स्थानीय समुदायों को नुकसान नहीं होगा, तो सरकार और संबंधित कंपनियों को अपने दावों के समर्थन में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि गंभीर जोखिम हैं या कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ, तो उन पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।

विकास का अर्थ केवल जमीन से संसाधन निकालना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उस जमीन पर रहने वाले लोगों का भविष्य असुरक्षित न हो जाए।

लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह

आदिवासी समुदायों के भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों का सवाल केवल ओडिशा तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में सड़क, बाँध, खदान और औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर स्थानीय समुदायों तथा प्रशासन के बीच विवाद सामने आते रहे हैं। हर मामले की परिस्थितियाँ अलग होती हैं, लेकिन एक सामान्य कसौटी लागू होती है: क्या निर्णय कानून के अनुसार लिए गए, क्या प्रभावित लोगों को सुना गया और क्या असहमति का जवाब पारदर्शी तरीके से दिया गया?

सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार और दायित्व दोनों हैं। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल ऐसा नहीं होना चाहिए कि शांतिपूर्ण विरोध और हिंसक अपराध के बीच अंतर धुँधला हो जाए। इसी तरह, आंदोलनकारियों को भी अपने विरोध के तरीकों के लिए कानून के प्रति जवाबदेह रहना होगा।

इस मामले में डॉ. सिकेरा के खिलाफ आरोपों का फैसला अदालत को साक्ष्यों के आधार पर करना है। साथ ही, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, अप्रैल की झड़प और खनन-विरोधी आंदोलन से जुड़े व्यापक आरोपों की भी तथ्यात्मक जाँच होनी चाहिए। किसी भी पक्ष को पहले से दोषी या निर्दोष घोषित करना न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।

असली कसौटी न्याय और जवाबदेही की है

डॉ. रैंडल सिकेरा की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह हमें एक साथ कई प्रश्नों के सामने खड़ा करती है। क्या दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना राज्य की प्राथमिकता है? क्या खनन से प्रभावित समुदायों की चिंताओं को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व मिलता है? क्या पुलिस कार्रवाई के पीछे के साक्ष्य और प्रक्रिया पारदर्शी हैं? और क्या नागरिकों को यह भरोसा है कि शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार की रक्षा होगी?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक नारे से नहीं मिल सकता। इसके लिए निष्पक्ष जाँच, खुली जानकारी, कानून का समान अनुप्रयोग और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान जरूरी है।

डॉक्टर का काम जीवन बचाना है। लोकतंत्र का काम यह सुनिश्चित करना है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ जी सकें। राज्य की जिम्मेदारी दोनों के बीच टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना है जिसमें स्वास्थ्य सेवा, विकास और नागरिक अधिकार साथ आगे बढ़ सकें।

यदि डॉ. सिकेरा के विरुद्ध आरोपों के पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो उनका परीक्षण अदालत में होना चाहिए। यदि गिरफ्तारी या जाँच में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। और यदि खनन परियोजनाओं से प्रभावित समुदायों की शिकायतें हैं, तो उन्हें सुने बिना केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न बताकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि सत्ता कितनी तेजी से विरोध को नियंत्रित कर सकती है, बल्कि यह है कि वह कानून का पालन करते हुए असहमति, न्याय और कमजोर समुदायों के अधिकारों की रक्षा कितनी विश्वसनीयता से करती है।

Pawan Singh
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