Taj News Satire Desk, Taj News | Tuesday, March 24, 2026, 09:12:35 PM IST

Taj News Satire Desk

वरिष्ठ पत्रकार एवं व्यंग्यकार
मुख्य बिंदु
- ईरान पर अमरीका-इस्राइल के भयानक हमले के बावजूद भारत ने अभी तक निंदा का एक शब्द भी नहीं कहा है।
- इसे ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताया जा रहा है कि मोदी जी ने ‘डियर फ्रेंड’ ट्रंप और नेतन्याहू की दोस्ती में कोई दरार नहीं आने दी।
- भारत को रूस और ईरान से तेल खरीदने के लिए भी अब सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से ‘इजाज़त’ लेनी पड़ रही है।
- क्या ‘शांति के नोबेल पुरस्कार’ के चक्कर में विश्वगुरु ईरान-इस्राइल युद्ध को रुकवाने का श्रेय लेंगे?
ये लो, कर लो बात। कहां तो हमारे मोदी जी सीधे डाइरेक्ट ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियां से फोन पर बात कर रहे हैं। वे उन्हें ईद तो ईद, बल्कि नौरोज तक की मीठी बधाइयां भी दे रहे हैं। और वह भी सिर्फ वहां के राष्ट्रपति को ही नहीं दे रहे हैं। बल्कि वे ईरान की सरकार और वहां की पूरी जनता को भी दे रहे हैं। जिनके सिर पर आज दिन-रात खतरनाक बम बरस रहे हैं। वे उनके लिए नये वर्ष के शांति से भरा होने की बहुत गहरी कामनाएं कर रहे हैं। और हां! अगर यह सब फोन पर ही सिर्फ एक ‘झप्पी-पप्पी’ करने के बराबर ही मान लिया जाए। तब भी, हमारे मोदी जी इतने पर ही बिल्कुल रुक नहीं गए हैं। वह पश्चिम एशिया में तनाव और भारी टकराव बढ़ने पर अपनी बहुत गहरी चिंता भी जता रहे हैं।
वे इस इलाके में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर हो रहे तमाम हमलों की कड़ी निंदा कर रहे हैं। वे दुनिया को बार-बार चेता रहे हैं कि ऐसी हरकतों से सारी दुनिया की खाद्य तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। इसके अलावा, दुनिया भर में कृषि निर्यातों के लिए भी एक बहुत बड़ा खतरा पैदा हो रहा है। वे होर्मुज की खाड़ी की सुरक्षा बनी रहना सुनिश्चित करने का बड़ा महत्व दुनिया को समझा रहे हैं। इसके साथ ही, वे फारस की खाड़ी में नौवहन की आजादी सुनिश्चित करने का भारी ज्ञान भी दे रहे हैं। इस लंबे सिलसिले में वे विभिन्न विश्व नेताओं से अपनी बातचीत होने का बड़ा हवाला भी दे रहे हैं। और तो और, वे इसका कूटनीतिक ज्ञान भी दे रहे हैं कि युद्ध का रास्ता चुनना आज किसी के भी हित में बिल्कुल नहीं है।
आखिर में वे इसका उपदेश भी दे रहे हैं कि सभी पक्षों को जितना जल्दी हो सके, शांति की ओर तेज़ी से बढ़ना चाहिए। लेकिन, ये नासमझ और बल्कि नालायक विपक्षी आज भी उसी बीती बात पर बुरी तरह अटके हुए हैं। वे पूछते हैं कि क्या मोदी जी ने ईरान पर अमरीका और इस्राइल के हमले की कोई निंदा की? क्या मोदी जी ने ईरान के सुप्रीम लीडर समेत कई बड़े नेताओं की चुन-चुनकर हत्या किए जाने की कोई निंदा की? क्या मोदी जी ने बच्चियों के एक स्कूल समेत, ईरान में हजारों नागरिक ठिकानों पर हुए अमरीकी और इस्राइली हमलों की कोई निंदा की? इसका सीधा जवाब है, बिल्कुल नहीं की! उन्होंने पहले हफ्ते न तो कोई बात की, और न ही कोई निंदा की। फिर उन्होंने दूसरे हफ्ते में बात तो की, पर निंदा बिल्कुल नहीं की।
यह भी पढ़ें
तीसरे हफ्ते के आखिरी दिन फिर से फोन पर बात की, पर निंदा फिर भी बिल्कुल नहीं की। उन्होंने पूरे तीन हफ्ते ऐसे ही निकाल दिए, पर निंदा फिर भी नहीं की! अब मोदी जी का अंधा विरोध करने वाले इन पप्पुओं को कोई कैसे समझाए? कि यह खामोशी कोई कूटनीतिक चूक बिल्कुल नहीं है, बल्कि यह एक ‘मास्टर स्ट्रोक’ है। दरअसल, यह मोदी जी का बिल्कुल नया ‘मास्टर स्ट्रोक’ है! क्या तुमने देखा नहीं, कैसे इस हमले के ठीक दो दिन पहले, जब मोदी जी ने इस्राइल का दौरा किया था। उन्होंने वहां नेतन्याहू के साथ ज़ोरदार झप्पी-पप्पी की थी। उन्होंने इस्राइल की संसद में अपना एक बहुत ऐतिहासिक भाषण दिया था। और, उन्होंने बदले में उससे एकदम नया-निकोरा ‘मैडल’ भी वसूल किया था। तब यही नासमझ विरोधी क्या कह रहे थे? वे कह रहे थे कि मोदी जी ने भारत को नेतन्याहू के खूनी पाले में जबरदस्ती भर्ती करा दिया है।
और जब अमरीका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर एक भयानक हमला कर दिया। और उसके कई बड़े नेताओं को चुन-चुनकर मौत के घाट उतार दिया। और मोदी जी ने फिर भी इसकी निंदा का एक शब्द तक अपने मुंह से नहीं कहा। तब वही विरोधी ‘शर्म-शर्म’ के ज़ोरदार नारे लगा रहे थे। जब मोदी जी ने पहले हफ्ते में नेतन्याहू समेत, खाड़ी देशों के कई नेताओं से बात की थी। और उन पर हुए हमले की कड़ी निंदा भी की थी। पर उन्होंने ईरान के नेताओं से न तो कोई बात की थी और न ही ईरान पर हुए हमले की कोई निंदा की थी। तब यही विरोधी इसे भारत का एक बहुत बड़ा ‘विश्वासघात’ बता रहे थे। लेकिन, जब दूसरे हफ्ते में मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बात तो की। पर उन्होंने बाकी सब तो किया, लेकिन उस अमरीकी-इस्राइली हमले की कोई भी निंदा नहीं की।
तब वही विरोधी देश में गैस की तंगी और तेल की तंगी का भारी शोर मचा रहे थे। और वे होर्मुज के समुद्री फंदे से अपने फंसे हुए टैंकर छुड़ाने की ज़ोरदार गुहार लगा रहे थे। और अब जब तीसरे हफ्ते में मोदी जी ने ईरान से फिर बात की है। पर उन्होंने उस हमले की निंदा अब भी बिल्कुल नहीं की है। तो विरोधी अब इसकी शिकायतें कर रहे हैं कि हमारे ढाई दर्जन तेल टैंकर अब भी होर्मुज में क्यों अटके पड़े हैं? और वे इसकी भी शिकायतें कर रहे हैं कि गैस के बाद अब पेट्रोल और तेल के भारी दाम बढ़ने वाले हैं। बस देश में ज़रा विधानसभाई चुनावों का अगले महीने वाला यह अहम चक्र निकल जाए। देखा आपने, कैसे मोदी जी ने तीन हफ्ते में ही विरोधियों के इन तीरों को विदेश नीति से हटाकर, तेल-गैस के दाम की तरफ चालाकी से मोड़ दिया है। पर उनका असली मास्टर स्ट्रोक इतना ही नहीं है।
उन्होंने सब कुछ किया पर मोदी जी ने निंदा का एक भी शब्द अपनी जुबान से बाहर नहीं आने दिया। उन्होंने अपने ‘डियर फ्रेंड’ ट्रंप और ‘डियर फ्रेंड’ नेतन्याहू की पक्की दोस्ती में, बाल के बराबर भी कोई दरार नहीं आने दी। उन्होंने खाड़ी वाले अपने पुराने दोस्तों की भी दोस्ती और ज्यादा पुख्ता कर ली है। पर उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति को भी फोन किया और उसे भी बहुत ज्यादा नाराज नहीं किया। इसका शानदार नतीजा देखिए! वे होर्मुज की खाड़ी में फंसे गैस के अपने दो जहाज भी सुरक्षित निकाल लाए। वे अमरीका से इसकी खास इजाजत भी आसानी से ले आए। कि भारत, एक महीने तक वह रूसी तेल खुशी-खुशी खरीद सकता है। जो तेल पहले ही जहाजों पर लदा हुआ है और जो अभी समुद्र के बीच में ही है।
और अब तक तो अमरीका ने ईरान से भी उसका तेल लेने की पूरी इजाजत दे दी है। जो तेल पहले से ही उन जहाजों पर लदा हुआ है। बल्कि हम तो यह कहेंगे कि ईद और नवरोज की मीठी मुबारकबाद के बाद, मोदी जी होर्मुज से भारत के दो-चार और फंसे हुए कंटेनर तो पक्का निकाल ही लाएंगे। यानी लड़ने वाले देश भले ही आपस में लड़ते रहें और खून बहाते रहें। लेकिन, भारत तक अपना तेल और गैस आराम से आता रहेगा। वह रूस और ईरान से भी आता रहेगा और वह भी ट्रंप साहब की खास ‘इजाजत’ से! भला इससे बड़ा मास्टर स्ट्रोक और क्या होगा! फिर भी, उनका मास्टरस्ट्रोक इतना ही नहीं है। ट्रंप और नेतन्याहू से मोदी जी की वह गहरी दोस्ती बनी ही रही है। और ईरान वालों से भी उन्होंने अपनी ज्यादा दुश्मनी नहीं होने दी है। फिलहाल, ‘ब्रिक्स’ (BRICS) का शक्तिशाली अध्यक्ष होने से मोदी जी के भारत ने एक बड़ा खेल किया है।
उसने ब्रिक्स के मंच से उस अमरीका-इस्राइल के हमले की कोई निंदा नहीं होने दी है। पर उसने ईरान वालों की यह भारी उम्मीद भी बनाए रखी है। कि ब्रिक्स कम से कम अपने एक सदस्य के नाते ईरान पर हुए हमले की निंदा जरूर करेगा। और जल्दी न भी सही, तब भी कभी न कभी तो, सुलह की कोई बात जरूर चलेगी ही। और उस सुलह के लिए बीच-बचाव करने वाले किसी देश की जरूरत भी तो पड़ेगी ही। उस समय बीच-बचाव करने के लिए मोदी जी से बेहतर स्थिति में आखिर कौन होगा? जिसे हमला करने वाला भी अपना पक्का संगी माने और हमले का मुकाबला करने वाला भी अपना कोई दुश्मन नहीं माने। आखिरकार, भागवत जी ने एंवें ही थोड़े कह दिया है कि सारी दुनिया आज यही कह रही है। कि इस खूनी युद्ध को अगर कोई रुकवा सकता है, तो मोदी जी का भारत ही रुकवा सकता है।
मोदी जी को वैसे भी युद्ध रुकवाने का काफी भारी ‘एक्सपीरिएंस’ (अनुभव) भी तो है। चौबीस घंटे के लिए ही सही, रूस और यूक्रेन का भारी युद्ध तो मोदी जी ने ही रुकवाया था। यह बात देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तक साफ कह चुके हैं। भारत और पाकिस्तान की वह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की लड़ाई भी वैसे रुकवायी तो मोदी जी ने ही थी। हालांकि, यह दूसरी बात है कि मोदी जी ने शांति के नोबेल पुरस्कार के लालच के चक्कर में ट्रंप को इसका पूरा श्रेय आसानी से छीन लेने दिया। पर इस बार वे ऐसा बिल्कुल नहीं होने देंगे। यह भयंकर वॉर (War) जब भी रुके, इस बार मोदी जी उसे रुकवाना अपने नाम करा के ही रहेंगे। आखिर, यह उनके विश्व गुरु की ऊंची गद्दी का सबसे बड़ा सवाल है। और यही होगा उनके सारे मास्टर स्ट्रोकों का सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक।

Pawan Singh
7579990777











